हड्डी टूट जाने पर


हड्डी टूट जाने पर

FRACTURE


प्राथमिक चिकित्सा :

परिचय-

         किसी भी तरह की दुर्घटना घटित होने पर घाव आदि लगने के बाद सबसे अधिक आशंका शरीर की किसी हड्डी के टूट जाने की होती है। ज्यादातर दुर्घटनाओं में व्यक्ति के शरीर में घाव हो जाने, रक्तस्राव होने, हड्डी टूटने और उसके शॉक की स्थिति में आ जाने की घटनाएं एकसाथ घट जाती हैं। जब हड्डी के किसी भाग पर बहुत तेज धक्का या चोट लगती है तो वह टूट जाती है। कठोर सतह पर जोर से गिरने, पत्थर या गोली जैसी कोई वस्तु के जोर से लगने या भारी बोझ के नीचे दब जाने से भी हड्डी टूट जाती है।

उदाहरण- अगर ऊंचाई से गिरता हुआ आदमी अपनी भुजा फैला लेता है, तो हथेली के बल गिरने पर भी उसकी कॉलर (हसली) की हड्डी टूट जाती है। बहुत जोर से खांसी आ जाने पर अनेक मांसपेशियों के एकाएक बहुत बुरी तरह सिकुड़ने के फलस्वरूप भी लोगों की पसलियों की हड्डियां टूटती देखी गई हैं।

        वयस्कों की अपेक्षा बच्चों की हड्डियों में कैल्शियम और फॉस्फोरस की मात्रा कम होती है। इसलिए अगर उन पर अचानक भारी दबाव पड़ता है तो वे टूटती नहीं बल्कि उनमें दरारें पड़ जाती हैं। इस प्रकार की स्थिति  अस्थिभंग को ‘ग्रीनस्टिक’ अस्थिभंग कहते हैं।

        संयुक्त अस्थिभंग इनसे कहीं अधिक गंभीर होता है। इसमें टूटी हड्डी के सिरे मांसपेशियों और त्वचा में घुस जाते हैं जिससे दूसरे ऊतकों को हानि पहुंचने की आशंका तो रहती ही हैं साथ ही संक्रमण का खतरा भी बढ़ जाता है।

        हड्डियों के साथ रक्तवाहिकाएं जुड़ी होती हैं। इसलिए हड्डियों, विशेष रूप से बड़ी हड्डियों, के टूटने पर भारी मात्रा में रक्तस्राव भी होता है। उदाहरणार्थ- जाँघ की प्रमुख हड्डी (फीमर) के टूटने पर बहने वाले रक्त की मात्रा एक लीटर तक हो सकती है।

        कभी-कभी भयंकर दुर्घटनाओं में फंसे व्यक्तियों के हाथ-पैरों की हड्डियां टूटने के साथ-साथ उनके मस्तिष्क, हृदय, गुर्दे, रीढ़ आदि जैसे नाजुक अंगों पर भी गंभीर चोट लग जाती है। यह अवस्था बहुत खतरनाक होती है। इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति के जीवन को भी खतरा हो सकता है।

     प्राथमिक उपचारकर्ता के लिए जरूरी है कि किसी दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को देखने पर वह यह भी जांच करें कि उसके किसी अंग की हड्डी तो नहीं टूटी है।

हड्डी टूटने के बाहरीय लक्षण इस प्रकार हैं-

  • जिस स्थान की हड्डी टूटी हो वहां पर या उसके आसपास बहुत तेज दर्द होता है, चाहे देखने पर वहां पर किसी प्रकार की चोट दिखाई न दे। टूटी हुई हड्डी़ के स्थान पर पर हल्के से छूने से भी दर्द महसूस होने लगता है।
  • टूटी हुई हड्डी का स्थान सूज जाता है और उसका रंग बदल जाता है। अगर कोई अंग स्वाभाविक रूप से हिल-डुल न रहा हो, तो उसकी हड्डी टूट जाने की संभावना अधिक हो जाती है।
  • ऐसे अंग की स्वाभाविक आकृति बिगड़ जाती है। कभी-कभी ऐसा भी होता है कि मांसपेशियां टूटी हड्डी के निचले टुकड़ों को उठा देती है जिसके कारण दुर्घटनाग्रस्त अंग छोटा लगने लगता है।
  • हड्डी टूट जाने से खुद हड्डी की आकृति भी बदल जाती है। टांग की हड्डी टूट जाने पर ऐसा अक्सर हो जाता है।

उपचार-

  • हड्डियां अक्सर बड़ी दुर्घटनाओं में टूटती हैं, जिनमें बड़े घाव लगने, रक्तस्राव होने, सांस रूकने आदि जैसी घटनाएं एकसाथ हो सकती हैं। इसलिए उपचार करने वाले के लिए यह जरूरी है कि टूटी हड्डी का उपचार करने से पहले वह यह तय कर लें कि शरीर में कही और गंभीर चोट तो नहीं है जिसका उपचार टूटी हड्डी के उपचार से पहले होना चाहिए। सांस रुकना, दिल की धड़कन का बंद हो जाना, अत्यधिक रक्तस्राव कुछ ऐसी घटनाएं हैं जिनका सबसे पहले उपचार करना जरूरी होता है।
  • इसके साथ ही प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति के लिए यह भी जरूरी है कि वह जांच करके यह निश्चित कर ले कि शरीर के किस-किस अंग की हड्डी टूटी है या एक ही हड्डी एक से अधिक जगहों पर तो नहीं टूटी है।
  • हड्डी टूट जाने पर यह जरूरी होता है कि उसके बाद होने वाली हानियों को रोका जाए और पीड़ित व्यक्ति के दर्द को कम करके उसे ज्यादा-से-ज्यादा आराम पहुंचाया जाए।
  • इस अवस्था में प्राथमिक उपचार का उद्देश्य होता है- पीड़ि व्यक्ति को शॉक की अवस्था में आने से रोकना या कम कर देना; रक्तवाहिकाओं और तंत्रिकाओं को और अधिक हानि न पहुंचने देना और उसके दर्द को कम करना।
  • पीड़ित व्यक्ति को दुर्घटनास्थल पर ही प्राथमिक उपचार देना सही रहता है। यदि उसे वहां से हटाना जरूरी हो तो दूसरे स्थान पर ले जाने के दौरान उसे कम-से-कम हिलाएं-डुलाएं। कोई ऐसी हरकत न करें जिससे पीड़ित व्यक्ति अनावश्यक रूप से हिले।
  • अगर टूटी हड्डी के सिरे त्वचा को फाड़कर बाहर निकल आए हों तो उन सिरों को छेड़ें नहीं। न तो उन्हें पानी आदि धोएं और न ही उन पर कोई एंटीसैप्टिक लगाएं।
  • प्राथमिक उपचारकर्ता को खुद पीड़ित व्यक्ति की टूटी हड्डियों को स्वाभाविक स्थिति में बैठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि वह चिकित्सक नहीं है। ऐसा करने पर पीड़ित व्यक्ति की हालत और बिगड़ सकती है और बाद में हड्डी को सही तरीके से बैठाने और जोड़ने में अनेक कठिनाइयां पैदा हो सकती है।
  • हड्डी टूटना काफी गंभीर घटना होती है। इसलिए यह बेहतर होता है कि प्राथमिक उपचार शुरु करने से पहले चिकित्सक को बुलवाने के लिए संदेश भेज दिया जाए और पीड़ित व्यक्ति के घरवालों को खबर कर दी जाए।
  • उस अंग को, जिसकी हड्डी टूटी है, तत्काल इस प्रकार सहारा दें जिससे उस अंग को हिलाया नहीं जा सके और जितना भी संभव हो, वह अपनी स्वाभाविक स्थिति में रहे। ऐसा करने पर अधिक हानि होने की आशंका कम हो जाती है और आमतौर से रक्तस्राव बंद हो जाता है। इसके साथ ही टूटी हड्डी के सिरों से धमनियों, शिराओं आदि को और अधिक हानि नहीं पहुँचती।
  • संभव हो तो उस अंग को, जिसकी हड्डी टूटी हो, थोड़ा-सा ऊपर उठा दें। दुर्घनाग्रस्त अंग के ऊपर और नीचे के अंगों को भी हिलने-डुलने न दें। ऐसा दो तरीकों से किया जा सकता है और इन दोनों तरीकों को अलग-अलग या एकसाथ प्रयोग में लाया जा सकता है।
  • पहला तरीका है पट्टी बांधने का। पट्टी बांधने के लिए स्प्लिंट की जरूरत होती है। स्प्लिंट के रूप में, सहारा देने के लिए, शरीर के स्वस्थ अंगों का भी उपयोग किया जा सकता है। पट्टी बांधते समय ध्यान रखें कि पट्टी उस स्थान पर बांधी जाए जहां की हड्डी टूट गई है। पट्टी इस प्रकार बांधनी चाहिए कि घायल अंग स्थिर रहे। पट्टी अधिक कसकर न बांधें अन्यथा रक्तप्रवाह रुक जाने से पीड़ित अंग पर सूजन और अधिक बढ़ जाती है। पट्टी को कुछ ढीला रखना जरूरी होता है।
  • टखनों, घुटनों जैसे अंगों को आपस में बांधना पड़े, तो उसके बीच में पैड जरूर रखें, अन्यथा पीड़ित को परेशानी हो सकती है और वह बेचैन हो सकता है।
  • आमतौर से चौड़ी पट्टी अच्छी मानी जाती है। इसी प्रकार तिकोनी और क्रेप पट्टियां एमरजैंसी में अधिक उपयोगी हो सकती हैं। पट्टी की गांठ हमेशा शरीर के स्वस्थ हिस्से पर बांधनी चाहिए।
  • टूटी हुई हड्डी को हिलने-डुलने न देने का दूसरा तरीका है उसे किसी स्प्लिंट के साथ बांध देना। यह तरीका दोनों टांगों की (जांघों की) हड्डियां टूट जाने की अवस्था में बहुत उपयोगी होता है। स्प्लिंट लकड़ी, प्लास्टिक, धातु आदि का एक कठोर लंबा टुकड़ा हो सकता है। उसे इतना लंबा होना चाहिए कि वह दुर्घटनाग्रस्त अंग के ऊपरी और निचले जोड़ों तक पहुंच जाए। स्प्लिंट की चौड़ाई इतनी हो कि उस पर अंग को सही प्रकार से रखा जा सके।
  • स्प्लिंट पर अंग को रखने से पहले उस पर काफी मात्रा में रूई या मुलायम कपड़े रख लेने चाहिए। पीड़ित व्यक्ति के पहने कपड़ों के ऊपर ही स्प्लिंट को बांध देना अच्छा रहता है, लेकिन हमेशा ऐसा संभव नहीं हो पाता।
  • स्प्लिंट के रूप में इस्तेमाल करने के लिए लकड़ी, प्लास्टिक आदि न मिल पाने पर एमरजैंसी में छड़ी (वॉकिंग स्टिक), छाता, किताब और अखबार जैसी वस्तुएं भी इस्तेमाल की जा सकती हैं.
  • दुर्घटनाओं में अनेक बार रीढ़ (मेरूरज्जू), सिर (खोपड़ी), पसली, छाती आदि अंगों की हड्डियां टूट जाती हैं। ऐसा होने पर पीड़ित व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देते समय विशेष सावधानियां बरतनी चाहिए, अन्यथा उसे भारी नुकसान पहुंच सकता है। उक्त अंगों की हड्डी टूटने  की अवस्था में प्रदान किए जाने वाले प्राथमिक उपचारों की चर्चा कुछ विस्तार से करना युक्तिसंगत होगा।

रीढ़- रीढ़ छोटी-छोटी हड्डियों (कशेरूकाओं) से मिलकर बनी होती है। इन हड्डियों की बनी लंबी श्रृंखला को ही ‘रीढ़ की हड्डी’ कहा जाता है। यह सिर और धड़ के भार को संभालकर रखती है। जब कोई व्यक्ति काफी ऊंचाई से किसी कठोर सतह पर या डंडे जैसी किसी वस्तु पर, पीठ के बल गिरता है, अथवा उसकी पीठ पर कोई भारी वजन, जैसे खंभा, मकान की छत इत्यादि गिर पड़ती है तो अक्सर ही रीढ़ की कशेरुकाएं टूट जाती हैं। ऐसी स्थिति भूकंप या भूस्खलन के दौरान या मलबे के नीचे दब जाने पर पैदा होती है।

  • कभी-कभी कुछ अप्रत्यक्ष कारणों से भी कशेरूकाएं टूट जाती हैं; जैसे बहुत भारी वजन उठाने से या ऊंचाई से पैरों के बल या नितंबों के बल गिरने से या कार आदि की दुर्घटनाओं में एकाएक बहुत जोर से आगे की ओर फेंक दिए जाने पर।
  • कई बार दुर्घटनाग्रस्त व्यक्ति को पड़ा देखकर यह पता नहीं चल पाता कि उसकी रीढ़ की हड्डी टूटी है। ऐसी सभी स्थितियों में, जब पीड़ित व्यक्ति की पीठ में चोट आई हो, उसे कमर में पीड़ा हो रही हो था वह शॉक की अवस्था में हो, तो रीढ़ की हड्डी टूटने की आशंका के अनुसार ही उसका प्राथमिक उपचार करना चाहिए।
  • रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर पीड़ित की हालत बहुत गंभीर हो जाती है। ऐसी हालत में कभी-कभी, पीड़ित व्यक्ति अपनी मांसपेशियों पर नियंत्रण खो देता है (उसे लकवा हो जाता है) और चोट के स्थान से निचले अंगों में कोई संवेदन नहीं होता। प्राथमिक उपचारकर्ता के लिए यह एमरजैंसी (आपातकालीन) अवस्था है। उसे बहुत शीघ्रता से, घबराहट और हड़बड़ी के बिना, धैर्य और पूरी सूझ-बूझ के साथ, अपना काम करना चाहिए। साथ ही उसे डॉक्टर को तुरंत बुलवाने का प्रबंध कर लेना चाहिए। डॉक्टर के आने तक प्राथमिक उपचार करने वाले को अपना कार्य जारी रखना चाहिए।
  • उस पीड़ित व्यक्ति पर भी पूरा ध्यान देना चाहिए जिसकी रीढ़ की हड्डी टूट जाने पर भी, उसने मांसपेशियों पर नियंत्रण खोया नहीं है। यह हालत भी नाजुक होती है और इसके अनुसार ही प्राथमिक उपचार देना जरूरी होता है।
  •  डॉक्टर के आने तक पीड़ित व्यक्ति को हिलने-डुलने नहीं देना चाहिए। उसे खड़ा तो कभी भी न होने दें। वह बेहोश हो तो उसका मुंह खोलकर जीभ की स्थिति देख लें कि कहीं जीभ उलटकर सांस की नली में तो न फंस गई है। अगर ऐसा हो तो जीभ को तुरंत सीधी कर दें।
  • पीड़ित व्यक्ति को शरीर को चादर आदि से ढक दें। अगर सर्दी हो तो उसे हल्का कंबल उड़ा दें। डॉक्टर के पहुंचने तक उस पर नजर रखें। सांस या दिल की धड़कन रुकना महसूस होते ही, उसे तदनुसार प्राथमिक उपचार दें।
  • अगर दुर्घटना में पीड़ित व्यक्ति की रीढ़ की हड्डी टूट गई हो और दुर्घटना हुई भी ऐसे स्थान पर जहां डॉक्टर को बुलाना संभव नहीं हो, तो ऐसी स्थिति में स्वयं ही पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टर के पास ले जाना पड़ता है। इसके लिए स्ट्रेचर का इस्तेमाल जरूर करना चाहिए।
  •  स्ट्रेचर पर लिटाने से पहले पीड़ित व्यक्ति की जांघों, घुटनों और टखनों के बीच में पैड रख दें। टखनों और पैरों के ऊपर ‘आठ के आकार’ की पट्टी इस प्रकार बांधें कि उसकी गांठ पैर के तलवों पर हो। घुटनों और जांघों पर चौड़ी पट्टियां बांधें।
  •  स्ट्रेचर पर ले जाते समय पीड़ित को हमेशा पीठ के बल सीधा लिटाएं। इससे रीढ़ की हड्डी को और अधिक हानि नहीं पहुंचेगी।
  • आमतौर से, स्ट्रेचर दो मजबूत गोल लकड़ियों के बीच मजबूत कैनवस के टुकड़े को सींकर बनाया जाता है। उस व्यक्ति को ले जाने के लिए जिसकी रीढ़ की हड्डी टूटी हुई हो, स्ट्रेचर की सतह को कठोर बनाना जरूरी होता है। इसके लिए स्ट्रेचर की लकड़ियों की चौड़ाई के साथ-साथ लकड़ी के कई छोटी पटिए अथवा लंबाई के साथ एक लंबा पटिया टिका देना चाहिए। लेकिन ध्यान रखें कि ये पटिए पीड़ित को ले जाते समय सरकें नहीं।
  • अनेक बार दुर्घटनास्थल पर स्ट्रेचर मिलना मुश्किल हो जाता है। ऐसी स्थिति में स्ट्रेचर के स्थान पर लकड़ी के किसी मजबूत और चौड़े पटिए अथवा बोर्ड का उपयोग किया जा सकता है।
  • पीड़ित व्यक्ति चादर पर लेटा हुआ हो तो उसे चादर सहित स्ट्रेचर पर लिटा दें। स्ट्रेचर को उस व्यक्ति के एकदम पास ले आएं। चादर के दो सिरों को एक आदमी मजबूती से पकड़े और दूसरा आदमी दो अन्य सिरों को। अब चादर को तानते हुए दोनों आदमी उसे एक साथ ऊपर उठा लें। साथ ही तीसरा आदमी पीड़ित व्यक्ति के सिर को और चौथा आदमी उसके पैरों को टखनों के पास सहारा दे। फिर उसे धीरे से स्ट्रेचर पर रख दें। ध्यान रहे कि ऐसा करते समय पीड़ित व्यक्ति के किसी अंग, विशेष रूप से उसकी गर्दन और धड़ को, झटका न लगे। इसके लिए चादर पकड़ने वाले व्यक्तियों का एक साथ काम करना जरूरी है।
  • पीड़ित व्यक्ति चादर पर न लेटा हो लेकिन उसने कोट या कमीज पहना हुआ हो तो उसके बटन खोलकर खुले भागों को पीड़ित के शरीर के पास तक लपेट लें। अब दो आदमी कोट के सिरों को मजबूती से तानते हुए, खींचकर और दो अन्य आदमी पीड़ित के सिर और पैरों को सहारा देते हुए, पीड़ित को वैसे ही उठा लें, जैसे चादर पर लेटे मरीज को उठाते हैं। फिर उसे धीरे से स्ट्रेचर पर लिटा दें।
  •  पीड़ित व्यक्ति की गर्दन में चोट लगी होने पर उसे स्थिर रखने के लिए सिर के दोनों ओर रेत के थैले रख दें। गर्दन, पीठ और घुटनों के नीचे कंबल, चादर आदि लपेटकर रख दें।
  •  उस स्थिति में जब पीड़ित व्यक्ति को काफी दूर ले जाना हो और रास्ता ऊबड़-खाबड़ हो तो उसके शरीर को कोहनियों, जांघों, नितंबों के ऊपर से तथा घुटनों के निचले भागों के ऊपर से पट्टिय़ां निकालकर स्ट्रेचर के साथ बांध दें।
  • अस्पताल पहुंचने के बाद पीड़ित को तब तक न हिलाएं जब तक डॉक्टर ऐसा करने को न कहे।

खोपड़ी- खोपड़ी की हड्डी टूटने पर पीड़ित के मस्तिष्क, तंत्रिका तंत्र तथा धमनियों को गंभीर हानि पहुंच सकती है। साथ ही शॉक और संपीड़न भी हो सकता है। खोपड़ी पर सीधी, गंभीर चोट लगने से या सिर के बल जोर से गिरने के फलस्वरूप भी खोपड़ी के ऊपरी भाग में अथवा बाजुओं में अस्थिभंग (हड्डी टूटना) हो सकता है। इसके बाह्य लक्षण के रूप में सिर में लंबी य़ा गोलाकार सूजन आ जाती है।

  • पैरों के बल जोर से गिरने या पीठ के निचले भाग के बल गिरने या निचले जबड़े पर भारी प्रहार होने पर सिर पर अप्रत्यक्ष चोट लग जाती है और कान या नाक से रक्त या मस्तिष्क तरल बहने लग सकता है। कभी-कभी रक्त और यह तरल मुंह में भी चला जाता है और उल्टी के साथ बाहर निकलता है। चोट का असर आंखों की अस्थिमय गुहा पर होने पर वे रक्त की अधिकता के कारण लाल हो जाती हैं। आमतौर से खोपड़ी की हड्डियां टूट जाने पर व्यक्ति बेहोश हो जाता है और उसकी दोनों आंखों के तारों के आकार में अंतर आ जाता है।
  • खोपड़ी की हड्डी टूटने के प्रभाव बहुत गंभीर होते हैं। इसके कारण पीड़ित व्यक्ति की श्वसन क्रिया पर भी असर हो सकता है। अगर पीड़ित व्यक्ति की सांस सामान्य गति से चल रही हो तो उसे पीठ के बल लिटा दें और उसके सिर तथा कंधों को तकिया लगाकर थोड़ा ऊंचा कर दें। उसे एकदम शांत रखें और बिल्कुल हिलने-डुलने न दें। उसका सिर जिस ओर चोट हो उससे दूसरी ओर कर दें। उसे कंबल उड़ा दें। उसे कठोर स्ट्रेचर पर अधलेटी अवस्था में अस्पताल ले जाएं।
  • पीड़ित व्यक्ति की श्वसन क्रिया स्वाभाविक न हो तथा उसकी छाती में हो रहे रक्तस्राव के कारण सांस लेते समय बुलबुले बन रहे हों तो उसे करवट के बल लिटा दें। उसकी छाती के सामने की ओर पैड रखकर उसे सहारा दें और उसका घुटना ऊपर की ओर मोड़ दें।
  • यदि पीड़ित शॉक की स्थिति में हो तो शॉक का भी उपचार करें। यह देखें कि पीड़ित की वायुनली में कोई वस्तु अटकी हुई न हो। अगर कान में से रक्त आ रहा हो, तो पीड़ित को उस करवट लिटाएं कि वह कान नीचे की ओर रहे। उसे कुछ भी खाने-पीने के लिए न दें और बिल्कुल भी हिलाएं-डुलाएं नहीं। अस्पताल ले जाते समय भी, उसे इसी तरह लेटा रहने दें।

पसलियां- पसलियों पर सीधी चोट लगने से या छाती के बल जोर से गिरने या कार के ड्राइविंग ह्रील पर सीधा टकराने से अक्सर पसलियां टूट जाती हैं। उनके टूटे हुए भाग शरीर में अंदर तक घुस जाते हैं। इससे फेफड़ों को भी चोट पहुंच सकती है।

  • जब किसी व्यक्ति की छाती पर, एक साथ आगे और पीछे, दोनों ओर से दबाव पड़ता है तो भी पसलियां टूट सकती हैं। लेकिन ऐसा होने से पसलियों के टूटे हुए भाग शरीर में अंदर की ओर नहीं घुसते तथा फेफड़ों को हानि पहुंचने की आशंका भी नहीं होती।
  • पसलियों के टूटने के बाह्य लक्षण हैं- चोट के स्थान पर दर्द होना, जो गहरी सांस लेने अथवा खांसने पर बढ़ जाता है। इसी वजह से पीड़ित व्यक्ति छोटी-छोटी सांस लेने की कोशिश करता है और खांसते हुए डरता है।
  • यदि पीड़ित व्यक्ति की पसलियां टूटकर अंदर की ओर धंस गई हों, तो आंतरिक रक्तस्राव की संभावना बहुत बढ़ जाती है और पीड़ित की हालत अधिक गंभीर हो जाती है। टूटी पसली का सिरा फेफड़े में घुस जाने पर पीड़ित के थूक के साथ चटकीला लाल झागयुक्त रक्त निकलता है। कभी-कभी टूटी पसलियों के सिरे छाती में धंस जाने के कारण छाती में छेद हो जाते हैं। उस समय छाती की दीवार मजबूत नहीं रह पाती और छेदों में से हवा अंदर जाने लगती है। ऐसी हालत में, सांस लेने पर धौंकनी जैसी आवाज आती है। यह हालत बहुत नाजुक होती है। इसमें पीड़ित को जल्दी से जल्दी प्राथमिक उपचार दिया जाना जरूरी होता है।
  • टूटी पसलियों के सिरे छाती में धंसे होने पर पीड़ित व्यक्ति की छाती पर पट्टी न बांधें लेकिन  अगर उसकी छाती में छेद हो गए हों तो छाती के कमजोर भाग को स्थिर रखने के लिए क्रेवाट पट्टी से दाब ड्रैसिंग करें। इससे सांस छोड़ने पर छाती की दीवार बाहर की ओर नहीं फूलती। मरीज को अधलेटी अवस्था में रखें। उसकी पीठ के पीछे गोल करके कंबल इत्यादि लगा दें। सिर और कंधों को ऊंचा रखें। फिर उसे स्ट्रेचर पर इसी स्थिति में अस्पताल ले जाएं।
  • पीड़ित के शरीर में जिस ओर चोट लगी हो, उस ओर भी भुजा को स्लिंग में लटका दें। पट्टी वगैरह बांधने पर पीड़ित व्यक्ति को आराम महसूस न हो तो पट्टी खोल दें और पीड़ित व्यक्ति को डॉक्टर के पास भेज दें। ऐसा करते समय उसे अधलेटी स्थिति में रखें।

छाती की हड्डी- दुर्घटना के दौरान कुचल जाने के फलस्वरूप अनेक बार पीड़ित व्यक्ति की छाती की हड्डी टूट जाती है। साथ ही दिल और प्रमुख रक्तवाहिकाओं को भी गंभीर चोट लगने की आशंका हो जाती है।

  • ऐसा होने पर टूटी हड्डी के स्थान पर पीड़ा होती है। सांस लेने में कठिनाई होती है और छाती पर हाथ फेरने से हड्डी की बिगड़ी हुई आकृति का आभास हो जाता है।
  • इस अवस्था के उपचार के लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति की पोशाक को ढीला कर दें। उसे पीठ के बल आरामदायक स्थिति में लिटा दें। साथ ही चादर आदि से उसके शरीर को ढक दें और स्ट्रेचर पर अस्पताल ले जाएं।

कॉलर की हड्डी- कॉलर की हड्डी अक्सर उस समय टूटती है जब आदमी काफी ऊंचाई से कंधे के बल गिरे या गिरते समय उसकी फैली हुई हथेली जमीन पर टिक जाए।

  • कॉ़लर की हड्डी टूट जाने पर उस ओर की भुजा आंशिक रूप से बेकार हो जाती है जिस ओर की हड्डी टूटी हो। भुजा उठाते समय पीड़ित व्यक्ति आमतौर से अपने दूसरे हाथ से कोहनी पर सहारा देता है। साथ ही पीड़ित व्यक्ति का सिर चोट की ओर झुक जाता है।
  • इस स्थिति में टूटी हड्डी के उन सिरों को देखा और महसूस किया जा सकता है, जो एक-दूसरे पर चढ़ जाते हैं। बाहरी सिरा नीचे की ओर रहता है।
  • इस अवस्था में प्राथमिक उपचार करने के लिए पीड़ित व्यक्ति का कोट, बुशर्ट, कमीज आदि न उतारें। चोट की ओर की उसकी भुजा के अगले भाग को सहारा देकर ऊपर उठाएं और बगल में पैड रख दें। अब भुजा के अगले भाग को मुक्त रखते हुए उसके ऊपरी भाग पर, एक चौड़ी पट्टी से स्लिंग को छाती के साथ बांध दें। साथ ही ऊपरी भुजा को तिकोने स्लिंग से सहारा दें। ऐसा करने के बाद उसमें रक्त परिसंचरण की जांच करें। इसके लिए कलाई पर नब्ज की जांच करके देखें कि वह सामान्य रूप से चल रही है, अन्यथा भुजा की पट्टी को थोड़ा ढीला कर दें।
  • अगर पीड़ित व्यक्ति शॉक की स्थिति में न हो तो उसे पैदल भी अस्पताल ले जाया जा सकता है लेकिन शॉक की स्थिति में होने पर शॉक का प्राथमिक उपचार करें और पीड़ित व्यक्ति को गाड़ी आदि में अस्पताल ले जाएं।

कूल्हे की हड्डी- अक्सर भारी वजन गिरने या भारी गाड़ी आदि के नीचे कुचल जाने पर कू्ल्हे की हड्डी टूट जाती है। कभी-कभी यह हड्डी उस समय भी टूट जाती है जब आदमी काफी ऊंचाई से पैरों के बल जमीन पर गिरे और गिरते समय अपने निचले अंगों को कठोर कर ले। अनेक बार कार दुर्घटनाओं में भी कूल्हे की हड्डियां टूट जाती हैं।

  • कूल्हे की हड्डी के टूटने से मूत्राशय और मूत्रमार्ग को भी हानि पहुंच सकती है। इस अवस्था के बाह्य लक्षण हैं- कूल्हों और कमर में पीड़ा, जो खांसने या हिलने-डुलने से बढ़ जाती है।
  • कूल्हे की हड्डी टूट जाने पर निचले अंगों में कोई चोट नहीं होने पर भी पीड़ित व्यक्ति खड़ा नहीं हो पाता। उसे मूत्र त्याग करने में भी परेशानी होती है। उसके पेशाब में लाल या काला रक्त मिला हुआ आता है। हो सकता है कि उसके शरीर के आंतरिक अंगों में रक्तस्राव हुआ हो। ऐसी हालत में प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति को पीड़ित को ऐसी स्थिति में लिटाना चाहिए जो उसके लिए सबसे ज्यादा आरामदायक हो। पीठ के बल लिटाकर उसकी टांगें सीधी फैला देना भी उचित रहता है। पीड़ित को मूत्र त्याग न करने दें।
  • अस्पताल अगर पास में हो तो पीड़ित को आरामदायक स्थिति में स्ट्रेचर पर लिटाकर ले जाएं। ऐसी स्थिति में पट्टी बांधने की जरूरत नहीं होती। अगर अस्पताल काफी दूर हो और रास्ता ऊबड़-खाबड़ हो तो पीड़ित व्यक्ति के शरीर पर पट्टियां बांध देनी चाहिए। एक चौड़ी पट्टी शरीर के मध्य भाग के इर्द-गिर्द इस प्रकार बांधें कि उसका मध्य भाग चोट की ओर के नितंब के जोड़ पर और गांठ दूसरी ओर के कूल्हे पर रहे। दूसरी चौड़ी पट्टी बांधते समय यह ध्यान रखें कि वह पहली पट्टी की आधी चौड़ाई पर चढ़ी रहे और उसकी गांठ स्वस्थ कूल्हे पर रहे। ये पट्टियां मजबूती से बंधी होनी चाहिए लेकिन ज्यादा कसी हुई नहीं होनी चाहिए। ध्यान रखना चाहिए कि इन्हें बांधने पर चोट लगे अंग अंदर की ओर न दबें।
  • घुटनों और टखनों के नीचे पैड रखकर, उन पर ‘आठ की आकृति’ में चौड़ी पट्टियां बांध दें।

जांघ की हड्डी (फीमर)- फीमर जांघ की प्रमुख हड्डी को कहते हैं। अगर यह हड्डी टूट जाती है तो पीड़ित व्यक्ति न तो खड़ा हो पाता है और न ही बैठ पाता है। बूढ़े आदमियों की फीमर हड्डी पैर फिसल जाने जैसे छोटे-छोटे कारणों से भी टूट जाती है लेकिन अनेक बार लोग यह समझते रहते हैं कि फिसलने से उनके नितंब पर सिर्फ खरोंच आई है। ऐसी स्थिति में खरोंच की अच्छी तरह जांच कर लेनी चाहिए और इस बात की पुष्टि कर लेनी चाहिए कि पीड़ित व्यक्ति की फीमर हड्डी तो टूटी हुई नहीं है।

  • फीमर हड्डी लंबाई में कहीं से भी टूट सकती है लेकिन उसका टूटना हमेशा ही गंभीरता का विषय हो सकता है क्योंकि इससे पीड़ित व्यक्ति को गहरा शॉक लग सकता है और उसके आसपास के ऊतकों से रक्तस्राव हो सकता है। फीमर हड्डी के उपचार में, विशेष रूप से बूढ़े व्यक्तियों को, बहुत अधिक समय लगता है।
  • फीमर हड्डी के टूटने पर अगर संयुक्त अस्थिभंग हो जाए तो हालत और अधिक गंभीर हो जाती है।
  • फीमर हड्डी टूटने पर बहुत दर्द होता है। यह हड्डी टूटने के स्थान पर बहुत अधिक सूजन आ जाती है और पीड़ित व्यक्ति शॉक की स्थिति में आ जाता है। वह टांग, जिसकी फीमर हड्डी टूटी हो, दूसरी टांग से कुछ छोटी लगने लगती है और वह मुड़ जाती है। कभी-कभी पीड़ित व्यक्ति के लिए उस टांग को उठाना संभव ही नहीं हो पाता।
  • ऐसी स्थिति में प्राथमिक उपचारकर्ता को चाहिए कि वह पीड़ित व्यक्ति का शॉक के लिए भी उपचार करें। फिर चोट लगी जांघ को निष्क्रिय करने के लिए, उसे घुटने के नीचे तक पट्टी से दूसरी टांग के साथ, बांध देना चाहिए। पीड़ित के घुटने के नीचे पैड रख देना चाहिए।
  • यदि स्प्लिंट आसानी से उपलब्ध हो और उसको बांधने की सही विधि ज्ञात हो तो स्प्लिंट पर अच्छी तरह पैड रखकर उसे टांगों के बीच से लेकर पंजे तक रख दें। पैरों और टखनों को स्प्लिंट के साथ पट्टी से ’आठ की आकृति’ बनाते हुए बांध दें। इसके साथ ही एक लंबी स्प्लिंट पर पूरी लंबाई में पैड रखकर उसे बगल से लेकर पैरों तक रख दें। अब निम्न स्थानों पर स्प्लिंट के साथ चौड़ी पट्टियां बांध दें- छाती पर बगलों के नीचे, कूल्हे पर नितंबों के जोड़ों पर, दोनों जांघों पर एक पट्टी टूटी हड्डी से थोड़ा ऊपर तथा दूसरी पट्टी टूटी हड्डी से थोड़ी नीचे- दोनों पैरों, दोनों घुटनों और दोनों टखनों पर (आठ की आकृति बनाते हुए)।

घुटने की टोपी- किसी वस्तु से जोर से चोट लगने पर घुटने की टोपी टूट सकती है। कभी-कभी मांसपेशियों का बल पड़ने से भी वह दो टुकड़ों में टूट जाती है।

  • ऐसा होने पर टांग को बिना सहारे मोड़ना, उठाना तथा हिलाना संभव नहीं होता। इस हालत में प्रसारक (एक्सटेंसर) पेशी काम नहीं कर पाती और टांग बेकार हो जाती है। घुटने पर बहुत अधिक सूजन आ जाती है। कभी-कभी घुटने की टोपी के टूटे हुए टुकड़ों के बीच इतना अंतर आ जाता है कि उसे महसूस किया जा सके।
  • इस स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को पीठ के बल लिटा दें और उस टांग को, जिसके घुटने की टोपी टूट गई है, ऊपर उठाकर आरामदायक स्थिति में रख दें। ऐसा करने पर जांघों की मांसपेशियाँ ढीली हो जाएंगी और टूटी हुई हड्डी के ऊपरी भाग को ऊपर की ओर खींचेंगी।
  • घुटनों के बीच पट्टी बांधकर, चोट लगी टांग को जांघ से लेकर घुटनों तक, स्वस्थ टांग के साथ बांध दें। अब चोट लगी टांग के नीचे नितंब से लेकर एड़ी तक एक स्प्लिंट बांध दें। स्प्लिंट पर पैड रख लें। टखने के नीचे पैड रखकर उसे स्प्लिंट से कुछ ऊंचा कर दें।
  • टांग को स्प्लिंट के साथ तीन स्थानों पर बांधें- एक चौड़ी पट्टी से जांघ के ऊपरी भाग पर, दूसरी संकरी पट्टी से ’आठ की आकृति’ बनाते हुए टखऩे और पंजे पर तथा तीसरी संकरी पट्टी के मध्य भाग को घुटने की टूटी हुई टोपी के ऊपरी भाग पर रखकर, पट्टी को घुटनों के नीचे ले जाकर उसे टोपी के निचले भाग के ऊपर से लाकर घुटने के नीचे की ओर बांध दें।
  • पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल ले जाते समय भी चोट लगी टांग को ऊंचा ही रखें।

पिंडली की हड्डियां- पिंडली में दो प्रमुख हड्डियां होती हैं- फिबुला और टिबिया। चोट लगने पर इनमें से एक या दोनों हड्डियां टूट सकती हैं। फिबुला हड्डी के टूटने पर दर्द होता है, सूजन आ जाती हैं लेकिन कोई विकृति दिखाई नहीं देती, क्योंकि टिबिया से उसे सहारा मिलता रहता है। दोनों हड्डियां टूट जाने पर विकृति देखी जा सकती है।

  • चोट लगने के बाद टखने के आसपास सूजन आ जाए तो टखने की हड्डियां टूटने की भी आशंका होती है।
  • पिंडली की हड्डियां टूट जाने पर उस टांग को स्वस्थ टांग के साथ, जांघ से लेकर टखने तक, घुटनों और टखनों के बीच पैड रखकर, बांध दें। एक लंबी स्प्लिंट पर अच्छी तरह पैड रखकर उसे निचले अंगों के बीच जांघ के जोड़ से लेकर पंजे के नीचे तक रख दें। फिर पिंडली को, ज्यादा हिलाए बिना, इस स्प्लिंट पर रख दें। टखने और घुटने के स्थानों पर अतिरिक्त पैड रखकर पैरों और टखनों को पट्टी से, ’आठ की आकृति’ बनाते हुए, स्प्लिंट के साथ बांध दें। जांघों के ऊपरी भाग तथा घुटनों पर एक-एक चौड़ी पट्टी बांध दें। अंत में जहां की हड्डियां टूटी हो उस स्थान के ऊपर और नीचे एक-एक पट्टी बांध दें। टखने के पास की हड्डी टूटने पर पट्टी नहीं बांधनी चाहिए।

पैर के पंजे की हड्डियां-  दुर्घटना के दौरान पंजे के ऊपर किसी भारी वाहन का पहिया गुजरने या भारी वजन के नीचे पैर दब जाने से पैर की हड्डियां टूट जाती हैं। इस प्रकार की दुर्घटनाओं के बाद पैर में दर्द हो, सूजन आ जाए या उसमें ताकत महसूस न हो तो पैर की हड्डियां टूटने की पकी आशंका होती है।

  • पंजे में घाव भी हो तो पीड़ित व्यक्ति के जूते और मोजे उतार दें। उनके न उतर पाने की स्थिति में उन्हें काटकर निकाल दें। चोट लगे पंजे को स्वस्थ पैर के साथ बांध दें। पंजे, टखनों और घुटनों के बीच पैड रखकर उन्हें घुटनों के नीचे से बांध दें।
  • चोट लगे पैर के तलुए पर पंजे से लेकर एड़ी तक पैड रखकर स्प्लिंट बांध दें। अब चौड़ी पट्टी के मध्य भाग को चोट लगे पैर के ऊपर रखकर दोनों सिरों को टखने के पीछे से घुमाकर सामने की ओर लाकर तथा एक बार फिर टखने के पीछे की ओर ले जाकर बांध दें।
  • अगर पंजे की हड्डियां टूट गई हों और उनमें घाव नहीं हुआ हो तो पंजे को कुछ ऊपर उठा दें। ऐसा करने पर पीड़ित व्यक्ति को कुछ आराम जरूर मिलता है। इस अवस्था में जूते या मोजे उतारने की जरूरत नहीं है। अगली क्रियाएं उपरोल्लिखित प्रकार की करें।
  • अनेक व्यक्ति पैरों में चप्पल पहनते हैं या नगें पैर ही रहते हैं। उस हालत में पैर और पंजे की हड्डियां टूट जाने पर वे सभी क्रियाएं भी करें जो घाव लगे होने पर की जाती हैं।
  • पीड़ित व्यक्ति को अस्पताल ले जाते समय, हमेशा स्ट्रेचर पर लिटाकर ले जाएं और चोट लगे पैर को थोड़ा ऊंचा उठाकर रखें।

भुजा- भुजा की हड्डी, ह्यूमेरस का ऊपरी भाग टूट जाने पर बगल में रूमाल की गद्दी बनाकर रख लें और भुजा को धीरे से छाती के साथ बांध दें। कोहनी को मोड़कर हाथ को दूसरे कंधे पर रखकर उस पर तिकोनी स्लिंग बांध दें।

  • ह्यूमेरस का मध्य भाग टूटने पर मांसपेशियों के खिंचाव की वजह से भुजा छोटी हो जाती है। ऐसी स्थिति में भुजा को दो पट्टियों द्वारा, एक पट्टी को टूटी हड्डी के ऊपर रखकर और दूसरी पट्टी को उसके नीचे रखकर, छाती के साथ बांध दें तथा भुजा के आगे वाले भाग को स्लिंग से सहारा दे दें।
  • कोहनी के पास से भुजा टूटने पर पहले जांच कर लें कि कोहनी मुड़ सकती है या नहीं। कोहनी मुड़ सकती हो तो भुजा को छाती के साथ बांधकर अग्रभुजा को स्लिंग से सहारा दे दें। कोहनी न मुड़ सकने की दशा में पूरी भुजा को फैली हुई स्थिति में, शरीर के साथ पट्टी से चिपका दें।
  • ऊंची जगह से गिरते समय व्यक्ति अगर अपना हाथ फैला दे तो उसकी कोहनी और कलाई के बीच की भुजा के अग्रभाग की हड्डी टूट जाती है। ऐसी अवस्था में कलाई में भी बहुत दर्द होता है। अनेक बार हम समझ बैठते हैं कि दर्द का कारण कलाई में मोच है न कि हड्डी का टूट जाना। हड्डी टूट जाने पर बहुत अधिक सूजन और विरूपता आ जाती है।
  • इस हालत में चोट लगी भुजा की कोहनी को इतना मोड़ें कि भुजा समकोण बनाने लगे। अग्रभुजा को छाती के ऊपर इस प्रकार रखें कि अंगूठा ऊपर की ओर तथा हथेली छाती की ओर हो। अग्रभुजा के चारों ओर, कोहनी से लेकर हथेली तक, कोई अखबार या पत्रिका कलाई के इर्द-गिर्द, लपेटकर हथेली और कलाई पर ’आठ की आकृति’ में बांध दें। फिर भुजा को स्लिंग से सहारा दें।

निचले जबड़े की हड्डी टूटना- निचले जबड़े पर जोर से और सीधी चोट लगने पर उसकी हड्डियां टूट जाती हैं। अक्सर जबड़े की एक तरफ की ही हड्डी टूटती है  लेकिन कभी-कभी दोनों ओर की हड्डियां भी टूट जाती हैं। ज्यादातर अवस्थाओं में यह संयुक्त अस्थिभंग होता है जो बोलने या कोई वस्तु निगलने पर बढ़ जाता है।

  • इस अवस्था में व्यक्ति का चेहरा और निचला जबड़ा सूज जाता है, दांत टूट जाते हैं और दाँतों से किर्र-किर्र की आवाज निकलने लगती है। यह आवाज इतनी तेज होती है कि इसे पीड़ित व्यक्ति ही नहीं, प्राथमिक उपचार करने वाला व्यक्ति भी सुन सकता है।
  • जबड़ें की हड्डियां टूटने के दौरान जीभ पर भी चोट लग जाए तो वह उल्टकर पीछे गिर सकती है और वायुमार्ग को रोक सकती है। इसके काफी मात्रा में रक्तस्राव भी हो सकता है।
  • निचले जबड़े की हड्डियां टूट जाने पर पीड़ित व्यक्ति को बोलने न दें। अगर उसके दांत नकली हों तो उन्हें मुंह से निकाल दें। ध्यान रखें कि जीभ उलटकर वायुमार्ग में न फंस जाए। यह भी ध्यान रखें कि वायुमार्ग खुला रहे।
  • पीड़ित व्यक्ति को झुकाकर अपनी हथेली उसकी चिबुक पर रखकर निचले जबड़े को धीरे से ऊपर की ओर, ऊपरी जबड़े पर, दबाएं। इस क्रिया में ऊपरी जबड़ा स्प्लिंट की तरह कार्य करता है।
  • फिर चिबुक के नीचे संकरी पट्टी रखें। उसका एक सिरा सिर के ऊपर तक ले जाएं और फिर पट्टी के दूसरे सिरे के ऊपर से ले जाकर कान तक ले आएं। छोटे सिरे को माथे के आगे ले जाएं और बड़े सिरे को उल्टी दिशा में सिर के पीछे से लाकर कान के पास बांध दें।
  • यदि पीड़ित व्यक्ति को उल्टी आ रही हो तो पट्टी खोल दें और उसे उल्टी करने दें। इसके बाद फिर पट्टी बांध दें और उसे तुरंत अस्पताल ले जाएं। अस्पताल ले जाते समय नीचे बताई गई सावधानियां जरूर बरतें।
  • अगर पीड़ित बैठ सकता हो तो उसे अपना सिर आगे झुकाने के लिए कहें। इससे उसकी जीभ वायुमार्ग को बंद नहीं कर पाएगी। लेकिन अगर वह बैठने में असमर्थ हो और उसे स्ट्रेचर पर ही अस्पताल ले जाना जरूरी हो (संयुक्त अस्थिभंग हो जाने पर) तब उसे एक कंबल पर इस प्रकार लिटाएं कि उसका चेहरा नीचे की ओर रहे। फिर चार आदमी कंबल के चारों कोनों को पकड़कर उसे स्ट्रेचर पर उसी प्रकार स्थानांतरित करें जैसे रीढ़ की हड्डी टूटने वाले मरीज को करते हैं।
  • पीड़ित को स्ट्रेचर पर इस प्रकार लिटाएं कि उसका सिर स्ट्रेचर के कैनवस से बाहर रहे और उसके माथे को स्ट्रेचर के हैंडिलों के साथ बंधे झूले सदृश पट्टियों से सहारा दे दें। उसकी छाती के नीचे एक कंबल रख दें, जिससे उसका सिर आगे की ओर लटका रहे।

अंशमेखला का टूटना- यह हड्डी भी बहुत मजबूत होती है तथा अक्सर कम ही टूटती है। यह हड्डी अक्सर सीधी चोट से टूटती है। अंशमेखला जिस जगह टूटती है वह स्थान कुरूप हो जाता है तथा वहां दर्द भी होता है। इसका उपचार निम्नानुसार करना चाहिए।

     जिस ओर से अंशमेखला टूटी हो उस ओर वाली बगल के नीचे से एक चौड़ी पट्टी को दूसरी ओर के कंधे के ऊपर लाएं। फिर पट्टी के दोनों सिरों को कंधों पर से घुमाकर उस कंधे की ओर वाली बगल में लाकर गांठ बांध दें। इसके बाद पीड़ित बांह को चौड़ी या पतली पट्टी द्वारा गले से लटका लें।

हथेली तथा अंगुली की हड्डी टूटना- हथेली तथा अंगुलियों की हड्डियां किसी तरह कुचल जाने के कारण चोट लग जाने या झटका खा जाने के कारण टूट जाती है। ऐसा पीड़ित व्यक्ति डॉक्टर के पास खुद भी जा सकता है। लेकिन यदि डॉक्टर पास न हो तो निम्नलिखित प्राथमिक उपचार करने के बाद रोगी को डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

     पूरी हथेली की लम्बाई की एक चौड़ी खपच्ची लेकर उस पर कपड़ा लपेट़ दें या खपच्ची और हथेली के बीच कपड़े की एक गद्दी या रूई रखकर हथेली को खपच्ची पर सीधा रख दें। फिर एक तिकोनी पतली पट्टी को इस प्रकार रखें कि पतली पट्टी का मध्य भाग अंगुलियों पर रहे। इसके बाद उसके दोनों सिरों को एक-दूसरे के ऊपर विपरीत दिशा में ले जाते हुए कलाई के नीचे लाएं तथा एक-दो बार कलाई पर लपेटकर वहीं बांध दें।

पांव के तलुए तथा अंगुलियों की हड्डी का टूटना- पांव के तलुए तथा अंगुलियों की हड्डी भी चोट लगने, कुचलने या झटका खाने से टूट जाती हैं। इसके प्राथमिक उपचार में भी, हथेली की तरह ही तलुए के नीचे खपच्ची रखकर पट्टी बांधी जाती है। ऐसी टूट के समय अगर पीड़ित व्यक्ति जूते पहने हुए हो तो उन्हें पिछली सिलाई खोलकर निकाल देना चाहिए ताकि टूटी हड्डियों पर कोई दबाव न पड़े। पीड़ित व्यक्ति को चलने भी नहीं देना चाहिए।

टांग की हड्डी का टूटना- यह हड्डी भी सीधी चोट से टूटती है और टूटने पर अक्सर त्वचा के बाहर निकल आती है। इसके लिए निम्नलिखित प्राथमिक उपचार करें-

     पीड़ित टांग को सीधा फैला दें। फिर तलुए से घुटने तक की लम्बाई वाली दो पतली तथा चिकनी खपच्चियां या लकड़ी के टुकड़े लेकर उन्हें घुटने से तलुए तक दोनों बगलों में एक-एक लगा दें।

     दूसरी टांग को भी सीधा फैला देना चाहिए। इसके बाद किसी दूसरे व्यक्ति की सहायता से दोनों पांवों को फर्श पर एक दूसरे के बराबर रखकर खपच्चियों को स्थिर रखने के लिए निम्नानुसार पांच पट्टियां बांधनी चाहिए- पहली पट्टी घुटनों से कुछ ऊपर खपच्चिय़ों के सिरों पर बांधें। दूसरी चोट के स्थान से कुछ ऊपर तथा तीसरी चोट के स्थान से कुछ नीचे बांधें। इन तीन पट्टियों को पीड़ित टांग तथा दोनों खपच्चियों के चारों ओर बांधा जाता है। चौथी पट्टी को दोनों घुटनों तथा खपच्चियों के चारों ओर बांधें तथा पांचवीं पट्टी के मध्य भाग को दोनों टखनों के नीचे रखकर उनके दोनों सिरों को ऊपर ले जाएं। फिर दोनों हाथों के सिरों को बदलकर तलुओं की ओर ले जाकर बांध दें। यदि पांवों को पकड़ने के लिए कोई दूसरा सहायक न हो तो सबसे पहले इसी पट्टी को बांधना चाहिए। उक्त विधि से पांव को बांधने के बाद पीड़ित व्यक्ति को स्ट्रेचर पर लिटाकर डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।

जोड़ उतरना (Dislocation)- शरीर में जिन स्थानों पर दो या अधिक हड्डियां आपस में मिलती हैं, उन्हें ‘जोड़ वाला स्थान’ कहा जाता है। ये जोड़ तीन प्रकार के होते हैं-

  1. स्थिर- ये ऐसे जोड़ होते हैं जो हिल-डुल नहीं पाते जैसे- खोपड़ी की हड्डियों के जोड़।
  2. अस्थिर- ये सामान्य हरकत करने वाले जोड़ होते हैं जैसे- रीढ़ की हड्डियों के जोड़।
  3. चलायमान- ये कुछ दिशाओं में अच्छी तरह घूम जाने वाले जोड़ होते हैं जैसे- हाथ के अंगूठे तथा अंगुली, कलाई, कोहनी, कंधे, पांव के अंगूठे तथा अंगुली, टखने, घुटने तथा कूल्हे के जोड़।
  • चलायमान जोड़ों में घुटने, अंगुली तथा कलाई के जोड़, कूल्हे तथा कंधों के जोड़ों से बनावट में अलग होते हैं। कंधों तथा कूल्हों के जोड़ों में हड्डी का एक गेंदनुमा गोल सिरा, दूसरी हड्डी के गड्ढे में अटका सा रहता है। ऐसा ही जोड़ जबड़े का होता है।
  • किसी धक्के, झटके या चोट के कारण जब ये जोड़ अपने सही स्थान से हट जाते हैं और फलस्वरूप हड्डियों के जोड़ भी खुल जाते हैं, तब उस स्थिति को ‘जोड़ उतरना’ कहा जाता है।
  • वैसे तो अक्सर हर जोड़ के खुल जाने की सम्भावना हो सकती है, लेकिन फिर भी ज्यादातर कंधे के ऊपर, हंसुली की हड्डी का जोड़ ही ज्यादा उतरता हुआ देखा जाता है। जबड़े के जोड़ भी अधिक उतरते हैं।
  • छोटे बच्चों के शरीर में ये जोड़ बहुत ही नाजुक स्थिति में रहते हैं, इसलिए जब बच्चों को गलत तरीके से पकड़कर ऊपर की ओर उठाया जाता है तो उनकी हंसुली तथा बांह की हड्डी अक्सर उतर जाया करती है।
  • किसी जोड़ के उतर जाने पर उस जोड़ वाले तथा पास के भागों में दर्द होने लगता है। जोड़ वाले स्थान का आकार बदल जाता है और संधि स्थल का समीपवर्ती भाग सूजकर सख्त हो जाता है। इसके फलस्वरूप उस अंग को हिला-डुला पाना सम्भव नहीं होता और अगर हिलाया भी जाए तो बहुत ज्यादा दर्द होता है।

जोड़ उतरने पर उपचार- हंसुली, कंधे, कोहनी तथा कलाई के जोड़ खुलने पर हाथ की पट्टी बांधकर गले में लटका लेनी चाहिए, इससे रोगी को राहत मिलती है। दूसरे स्थानों के जोड़ खुल जाने पर रोगी को ऐसी स्थिति में बैठाना या लिटाना चाहिए, जिससे कि उसे आराम का अनुभव हो। जिस अंग का जोड़ उतरा हो, उस पर से सारे कपड़ों को उतार देना चाहिए तथा खुले हुए जोड़ वाले भाग पर बर्फ के पानी में भीगा हुआ कपड़ा रखना चाहिए।

  • अगर रोगी को ठण्डे पानी से कष्ट का अनुभव हो तो गर्म पानी से उसकी सिंकाई करनी चाहिए। रोगी व्यक्ति को गर्म चाय या दूध पिलाना चाहिए। बाकी उपायों द्वारा भी उसके शरीर को गर्म बनाए रखना चाहिए। इसके बाद रोगी को डॉक्टरी सहायता दिलानी चाहिए।
  • जबड़े का जोड़ उतर जाने पर सबसे पहले रोगी के मुंह में कपड़े की गद्दी या बड़ा ढक्कन इस तरह फंसाए कि वह उस स्थान से हटे नहीं। इसके बाद अपने दोनों अंगूठों को रोगी की निचली दाढ़ी पर टिकाकर जबड़े को नीचे तथा पीछे की ओर दबाएं। इसके साथ ही अंगुलियों द्वारा ठोड़ी को ऊपर उठाने की कोशिश करें। इस प्रकार जबड़ा अपने स्थान पर बैठ जाता है। जबड़े के बैठते ही मुंह एक झटके के साथ बन्द होता है। इसलिए ऐसे मौके पर अगर मुंह में गद्दी या ढक्कन नहीं होगा तो उपचारकर्त्ता के दोनों अंगूठे कुचलें जा सकते हैं।
  • जांघ का जोड़ उतर जाने पर वहां तख्ती बांध दी जाती है। यह तख्ती जांघ की हड्डी टूटने पर भी बांधी जाती है। इसमें पीड़ित को ज्यादा दर्द महसूस नहीं होता इसलिए जोड़ उतरने के दो-चार घण्टे बाद भी पीड़ित को डॉक्टर के पास ले जाया जा सकता है।
  • प्राथमिक चिकित्सक को जबड़े के अलावा बाकी स्थानों के जोड़ों को खुद बैठाने की कोशिश नहीं करनी चाहिए और न उस काम के लिए किसी नीम-हकीम की सहायता ही लेनी चाहिए।
  • जोड़ के ठीक तरह से बैठ जाने के बाद पीड़ित को काफी समय तक आराम कराना जरूरी है।
  • जिस अंग का जोड़ उतर गया है उसे बैठाने के बाद उस स्थान पर एक तख्ती बांध दी जाती है ताकि उसके कारण रोगी का जोड़ वाला अंग हिले-डुले नहीं। तख्ती को डॉक्टर की सलाह के बाद ही खोलना चाहिए। जल्दबाजी करने से जोड़ बार-बार और जल्दी-जल्दी खुलने लगते हैं।

Tags: Jod utarne par upchar, Taang ki haddi ka tootna, Nichle jabde ki haddi tootna, Hateli tatha aungli ki haddi tootna