Error message

  • User warning: The following theme is missing from the file system: global. For information about how to fix this, see the documentation page. in _drupal_trigger_error_with_delayed_logging() (line 1156 of /home/jkheakmr/public_html/hindi/includes/bootstrap.inc).
  • User warning: The following module is missing from the file system: mobilizer. For information about how to fix this, see the documentation page. in _drupal_trigger_error_with_delayed_logging() (line 1156 of /home/jkheakmr/public_html/hindi/includes/bootstrap.inc).
  • User warning: The following module is missing from the file system: global. For information about how to fix this, see the documentation page. in _drupal_trigger_error_with_delayed_logging() (line 1156 of /home/jkheakmr/public_html/hindi/includes/bootstrap.inc).

स्नायविक क्रियाओं को नियमित बनाना


स्नायविक क्रियाओं को नियमित बनाना


चिकित्सक के द्वारा इलाज :

परिचय-

          शरीर में स्नायविक प्रणाली की क्रिया ठीक उस प्रकार की होती है जिस प्रकार कोई नेटवर्क काम करता है। स्नायविक प्रणाली को तीन भागों में बांटा जा सकता है-

1. केन्द्रीय स्नायविक प्रणाली- इस प्रणाली के अंतर्गत मस्तिष्क का भाग आता है।

2. मेरूरज्जु या रीढ़ की हड्डी- यह कशेरूकाओं से घिरी रहती हैं।

3. परिसरीय स्नायविक प्रणाली- यह प्रणाली मस्तिष्क तथा रीढ़ की हड्डी से मिलकर बनी होती हैं तथा ये स्वयं संचालित होती हैं। परिसरीय स्नायविक प्रणाली मिश्रित प्रणाली प्रेरक तंत्रिकाओं को नियंत्रण में रखती है तथा प्रेरक तंत्रिकाएं अस्थिपंजर की मांसपेशियों तथा संवेदी तंत्रिकाओं को गतिशील बनाती हैं जिसके कारण शरीर में दर्द और सर्दी-गर्मी का अहसास होता है।

        इन प्रणालियों के अलावा एक संचालित प्रणाली भी है जो शरीर के उन सभी कार्य तथा अंगों के कार्यों पर नियंत्रण रखती है जिन पर संकल्प या इच्छाशक्ति का नियंत्रण नहीं होता है जैसे कि अन्तस्रावी प्रणाली परिभ्रमण तथा आंतरिक अंगों के क्रिया-कलाप। यह प्रणाली संवेदी तथा परासंवेदी उप प्रणालियों से मिलकर बनी होती हैं और एक-दूसरे पर नियंत्रण रखती है। संवेदी प्रणाली पाचनसंस्थान के कार्यो पर नियंत्रण रखती है तो परासंवेदी प्रणाली इसके कार्यों को उत्तेजित कर देती है। जब शरीर स्वस्थ होता है तो ये प्रणालियां सही तरीके से कार्य करती है। किसी भी रोग की स्थिति में दीर्घ स्नायविक तनाव से उत्तेजित हो मस्तिष्क केन्द्र से परिसरिय स्नायविक प्रणाली तक जाने वाले संवेक भेजता है जिसके कारण स्वत: संचालित प्रणाली का सन्तुलन अव्यवस्थित हो जाता है। ऐसा होने पर अंगों में खून की वाहिकाओं का परिभ्रमण रुक जाता है जिससे उदरीय अम्ल का ज्यादा स्राव होता है और जिसके कारण कई रोग उत्पन्न हो जाते है जैसे- पेट में दर्द तथा अल्सर रोग आदि।

         इन रोगों की स्थिति में मस्तिष्क क्षेत्र के आगे के भाग, कपाल तथा रीढ़ की हड्डी के दोनों ओर आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार किया जाए तो स्वत: स्नायविक प्रणाली व्यवस्थित (क्रिया ठीक हो जाती है।) हो जाती है। पियूषग्रंथि शुंडाकार पथ, प्रमस्तिष्क-प्रान्तस्था, अन्तश्चेतक, मस्तिष्क, पश्चकपाल (सिर के पीछे का भाग) तथा केन्द्रीय स्नायविक प्रणाली के अन्य तत्वों को व्यवस्थित करती है क्योंकि शुंडाकार पथ तथा अतिरिक्त शुंडाकार प्रणाली मुद्रा एवं गति पर नियन्त्रित रखती है और इसी कारण मांसपेशियां तनाव की स्थिति को उत्पन्न करके अव्यवस्था बना देती है जिसके कारण व्यक्ति को चलने-फिरने में परेशानी महसूस होती है इस अवस्था के कारण व्यक्ति को पर्किन्स रोग भी हो जाता है।

        जब मस्तिष्कीय रक्तस्राव (सिर से खून का बहना) होता है तो शुंडाकार पथ क्षतिग्रस्त हो जाता है। तब इसके विपरीत शरीर के कुछ भागों में लकवा रोग हो जाता है। स्नायविक प्रणाली के ऐसे दोषों को दूर करना बहुत कठिन कार्य है लेकिन यदि इनका उपचार आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से किया जाए तो काफी हद तक इस रोग से छुटकार मिल सकता है।

        पिरामिडिकल ट्रेक या शुंडाकार पथ (नली) में यदि कोई रुकावट होती है तो कुछ असामान्य प्रतिवर्त क्रियाएं उत्पन्न होती हैं।

स्वर्य संचलित स्नायविक प्रणाली की कार्य करने की गति-

 

संवेदी स्नायुओं में तनाव की स्थिति

परासंवेदी स्नायुओं में तनाव उत्पन्न

लारग्रन्थि

सघनता (मात्रा में कमी)

विरलता (मात्रा को बढ़ाना)

पलकें

विस्तार (फैलना)

संकुचन

नेत्रगोलक

बहि:सरण

संकुचन

अश्रुग्रन्थि (आंसू लाने वाली ग्रंथि)

स्राव का शमन

स्राव का उद्दीपन

श्वासनली व

श्वासप्रणाली

शिथिलता

संकुचन

रक्तचाप

बढ़ा हुआ

निम्न

परिहृदय धमनी

विस्तार

संकुचन

रक्तवाहिकाएं

संकुचन

विस्तार

हृदय

उत्तेजना (गति तेज)

दमन (गति में न्यूनता)

मूत्राशय

विस्तार (पेशाब का नष्ट होना)

संकुचन (पेशाब करने में उत्तेजना)

गुर्दो के ऊपर की मज्जा

स्राव का बढ़ना

 

पित्ताशय

शिथिलता

संकुचन

क्लोमग्रन्थि

स्राव में कमी

बढ़ोतरी

छोटी तथा बड़ी आंत

क्रिया का शमन

तेज क्रिया

उदर-क्रिया का स्राव

शमन

बढ़ना

इरेक्टर पिली मस्कल

संकुचन

 

स्वेदग्रंथियां

(पसीना लाने वाली ग्रंथियां)

स्राव की उत्तेजना

हल्के पसीने का स्राव होना

गर्भाशय

संकुचन (सिकुड़न)

शिथिलता

  • इस स्नायु प्रणाली के द्वारा रीढ़ की हड्डी तथा नाड़ियों और प्रमस्तिष्क का संचालन (नियंत्रण) होता है।
  • इस प्रणाली के द्वारा प्रमस्तिष्क, रीढ़ की हड्डी जो कि केन्द्रीय प्रणाली के अन्दर आती है तथा अन्तपार्श्विक नाड़िया, समविभाजक नाड़ी और शियाटिक नर्व आदि नियंत्रण में रहते हैं।

विकृतिजन्य चिन्ह शरीर में निम्नलिखित प्रकार के होते हैं-

1. चेडोक का चिन्ह- यह चिन्ह पैर के तलुवों के बाहरी किनारों पर होते हैं। डाक्टरों के हथोडे़ के हैण्डिल के समान किसी वस्तु से टखने के बाहरी जोड़ की तरफ थपथपाएं तो अंगूठे बाहर की ओर या फिर पीछे की ओर मुड़ जाते हैं। जब इस बिन्दु पर थपथपाना हो तो पैर की उंगुलियों को फैलाकर रखना चाहिए तथा अंगूठे को पीछे की ओर मोड़ना चाहिए।

2. बेबिन्स्की चिन्ह- पैर के तलुवों के बाहरी किनारे को डाक्टरों के हथोड़े जैसी किसी वस्तु से थपथपाएं या एड़ी से उंगलियों की ओर तथा आड़े रूप से पैर की गांठ की ओर थपथपाएं जिससे अंगूठा पीछे की ओर मुड़ जाता है तथा पैर की चारों उंगलियां पंखे के सामान बन जाती है।

3. गारडन चिन्ह- यह चिन्ह पिण्डली के पीछे की ओर होता है। जब पिण्डली को मजबूती से दबाते हैं तो अंगूठा पीछे की ओर मुड़ जाता है।

4. रोसोलिमो चिन्ह- यह चिन्ह अंगूठे से थोड़ा नीचे पैर के तलवे पर होता है जब इसे किसी वस्तु से दबाते हैं तो पैर की सारी उंगलियां नीचे की तरफ मुड़ जाती है।

5. ऑपेनहेम का चिन्ह- यह चिन्ह टांग के अगले भाग पर होता है तथा इस चिन्ह को जब घुटने से नीचे की ओर मजबूती से दबा देते हैं तो पैर का अंगूठा पीछे की ओर मुड़ जाता है।

6. स्चेफर का चिन्ह- यह चिन्ह कण्डरा पेशी पर होता हैं जब पेशी को मजबूती से दबाते हैं तो पैर का अंगूठा पीछे की ओर मुड़ जाता है।

स्वसंचालित स्नायु प्रणाली में परावर्तित क्रियाएं इस प्रकार हैं-

1. एस्चनेर का चमत्कार (एशचनर्स फेनोमेनन)-

  • जब हाथ की हथेलियों के द्वारा आंखों पर आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार दबाव देते हैं तो इसमें परावर्तित क्रिया उत्तेजित हो जाती हैं जो इसके बदले में विवर स्नायु के बीच के भाग की परावर्तित क्रियाओं को उत्तेजित करती हैं जिसके कारण नाड़ी-गति तथा रक्तचाप घट जाता है।
  • जब नाड़ी के चलने की गति एक मिनट में 10 से 15 बार होती है तो उसे सकारात्मक मानते हैं तथा यह विवर स्नायु में बढ़े हुए तनाव की भी सूचना देती है। आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा प्रणाली में आंखों पर 10 सेकेण्ड से कम समय तक हल्का-हल्का दबाव दिया जाएं तो स्वसंचालित स्नायु प्रणाली क्रिया में सुधार हो जाता है।

2. मैन्या-विवर की प्रतिवर्त क्रियाएं (कार्पटोड-सिनस-रिफलैकसिस)- आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा प्रणाली का प्रमस्तिश्कीय क्षेत्र में बहुत महत्वपूर्ण स्थान है। इसी कारण मैन्य-विवर के क्षेत्र की शारीरिक क्रियाओं को भी अच्छी प्रकार से समझना बहुत आवश्यक होता है। मैन्य-विवर का केन्द्र गर्दन के उस स्थान पर होता है जहां से मैन्य धमनी की शाखाएं मस्तिष्क में जाती हैं। इस जगह पर तंत्रिका ऊतकों का जाल और मैन्या अंग स्थित होता है तथा वह साइनस के स्नायु से जुड़ा रहता है। उदाहरण के लिए यदि रक्तचाप अधिक बढ़ जाए तो इस कारण रक्तवहिकाओं की दीवारें फैल जाती है और जिसके फलस्वरूप परावर्तित विस्फरण के कारण रक्तचाप घट जाता है व हृदय की गति मन्द हो जाती है। बाहरी प्रमस्तिश्कीय क्षेत्र का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा का बिन्दु 1 मैन्य विवर में स्थित रहता है। इस बिन्दु पर कभी भी ज्यादा देर तक दबाव नहीं देना चाहिए और न ही दोनों बिन्दुओं पर एक साथ दबाव देना चाहिए।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा और त्वचीय अंतरांगी परावर्तित क्रियाएं (शियातसु एण्ड कनटेनियोविसकेरल रिफलेक्स)-

       शरीर के आंतरिक अंगों में जब कोई रोग उत्पन्न होता है तो अंतगार्मी अंतरांगी संवेदशील स्नायु को उत्तेतिज करने पर रीढ़ के पिछले सिरों पर तथा उससे जुड़ी स्वसंचालित स्नायुओं पर क्रिया करते हैं या त्वचा की संवेदी स्नायु और पेशी-समूह पर क्रिया करके मस्तिष्क क्षेत्र तथा अत्यधिक मांसपेशियों में तनाव उत्पन्न कर जकड़न या दर्द पैदा कर देते हैं। यह दर्द कंधों, पैरों, कमर, पेट तथा छाती को किस प्रकार से प्रभावित करता है यह स्पष्ट रूप से नहीं कहा जा सकता है।

        स्नायु-तन्तु ऐसी परावर्तित क्रियाओं से सीधे शरीर की सतह में आर्गेनिक विसंगतियों (बीमारियां) को भेजते है तथा जिनमें सूत्रयुग्मन शामिल नहीं रहते हैं अगर यह सच्चाई है तो हो सकता है कि एसी. टी. कोलाइन या उससे साम्यता रखने वाला कोई तत्व रीढ़ की हड्डी के पिछले सिरों में स्रावित (तरल पदार्थ के रूप में बहना) होता है जो मांसपेशी के समूह से अंतरांगी संवेदी स्नायुओं से आपस में जुड़कर स्नायविक संवेगों को उत्तेजित कर देती है तथा ये संवेग इसके बदले में रीढ़ की हड्डी के भागों से जुड़ी संवेदी स्नायुओं को उत्तेजित करती हैं। इस धारणा के अनुसार अगर अति संवेदनशील या शरीर की सतह की मांसपेशियों के तनावग्रस्त भागों पर यदि आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से इलाज किया जाए तो सारी क्रिया उल्टी हो जाएगी। दूसरे शब्दों में शारीरिक सतह पर दबाव की शक्ति तथा समय अवधि के अनुसार आंतरिक अंगों की परावर्तित क्रियाए शुरू होकर, शरीर के विभिन्न रोगों का इलाज कर सकेगा।

         मेरूरज्जु स्नायु प्रणाली तथा अंतगार्मी अंतरांगी परावर्तित क्रियाओं का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से इलाज करने की स्थितियां-

रीढ़ की हड्डी में कई स्नायु प्रणाली होती हैं जो इस प्रकार हैं-

(1). ग्रीवा स्नायु- इसके आठ भाग होते हैं तथा प्रत्येक भागों का कई अंगों, कशेरूका ग्रंथियां तथा तंत्रिकाओं से सम्बन्ध होता हैं ये निम्नलिखित हैं-

1. श्वास प्रणाली, ग्रास नली, आंखे, फेफड़े तथा हृदय

2. थायरायड ग्रन्थि, हृदय, डायाफ्राम, कशेरुका धमनी, श्वास प्रणाली, ग्रासनली

3. हृदय, फेफड़े, डायाफ्राम कशेरुका-धमनी।

4. कशेरुका-धमनी, आंख, गला, अधोहनु के नीचे की ग्रंथियां।

5. कशेरुका-धमनी, स्वरयंत्र, जीभ के नीचे की ग्रन्थि।

6. थायरायड ग्रन्थि, डायफ्राम, वाहिका प्रेरक तंत्रिकाएं, कशेरुका-धमनी, श्वासप्रणाली, ग्रासनली।

7. कशेरुका-धमनी, हृदय, डायाफ्राम, कशेरुका धमनी तथा फेफड़े।

8. आंखे, फेफड़े, श्वास प्रणाली, श्वास नली तथा हृदय।

(2) वक्ष के स्नायु- इसके 12 भाग होते हैं तथा प्रत्येक भागों का कई अंगों, कशेरुका ग्रंथियां तथा तंत्रिकाओं से सम्बन्ध होता है-

1. आंख, कान, हृदय, फेफड़े, फुफ्फुसावरण, वाहिका प्रेरक तंत्रिकाएं, श्वास नलिकाएं।

2. वाहिका प्रेरक तंत्रिकाएं, पार्श्विक तंत्रिकाएं, फुफ्फुसावरण, हृदय तथा श्वास नलियां।

3. पार्श्विक स्नायु, हृदय, फेफडे़, फुफ्फुसावरण, यकृत, डायाफ्राम, श्वास नलियां।

4. पार्श्विक स्नायु, हृदय, फेफडे़, फुफ्फुसावरण, डायाफ्रम, श्वास प्रणाली तथा स्तन।

5. पार्श्विक स्नायु, स्तन, फुफ्फुसावरण, डायाफ्राम तथा यकृत।

6. फुफ्फुसावरण, पेट (उदर), स्तन, प्लीहा, पार्श्विक स्नायु, डायाफ्राम, यकृत।

7. पार्श्विक स्नायु, पेरिटेनियम, पेट, प्लीहा, पित्ताशय, यकृत तथा क्लोमग्रन्थि।

8. ार्श्विक स्नायु, पेरिटेनियम, पेट, प्लीहा, पित्त-नली, पित्ताशय, क्लोम ग्रन्थि तथा गुर्दे की ऊपर की ग्रंथियां।

9. पार्श्विक स्नायु, वाहिका प्रेरक स्नायु, गुर्दे के ऊपर की ग्रंथियां, क्लोमग्रन्थि तथा छोटी आंत

10. पार्श्विक स्नायु, पेरिटेनियम, क्लोमग्रन्थि, प्लीहा, पित्तनली, डायाफ्राम, मूत्रमार्ग, गुर्दे।

11. पेरिटेनियम, डायाफ्राम, क्लोमग्रन्थि, गुर्दे, मूत्रमार्ग तथा छोटी आंत।

12. पेरिटेनियम डायाफ्राम, गुर्दे, मूत्रमार्ग, बड़ी तथा छोटी आंत, एपेण्डिक्स।

(3). कटि स्नायु- इसके 5 भाग होते है तथा प्रत्येक भागों का कई अंगों, कशेरुका ग्रन्थियों तथा तंत्रिकाओं से सम्बन्ध हैं-

1. छोटी आंत, एपेण्डिक्स, गर्भाशय, डिंबाशय, फेलेपिन, ट्यूब, अण्डकोष, लिंग तथा मूत्राशय

2. छोटी तथा बड़ी आंत, गर्भाशय, एपेण्डिक्स, डिंबाशय, लिंग वीर्यस्राव नली।

3. फेलोपिन, फेलोपिन ट्यूब, गर्भाशय, प्रोस्टेट ग्रन्थि, वीर्यस्राव नली, अण्डकोष, लिंग तथा मूत्राशय।

4. प्रोस्टेटग्रन्थि, मूत्राशय, गर्भाशय, अवग्राहांत्र, गुदा तथा मलाशय।

5. प्रोस्टेट ग्रन्थि, मलाशय, अण्डकोष, गर्भाशय, अवग्रहांत्र तथा मूत्राशय।

(4). त्रिकास्थिज स्नायु- इसके 5 भाग होते हैं तथा प्रत्येक भागों का कई अंगों, कशेरुका ग्रन्थियों तथा तंत्रिकाओं से सम्बन्ध है-

1. गुदा, मूत्राशय, उत्थान, स्राव, मलाशय, योनि, गर्भाशय-ग्रीवा।

2. गुदा, मूत्राशय, उत्थान, स्राव, मलाशय, योनि, गर्भाशय-ग्रीवा।

3. गुदा, मूत्राशय, उत्थान, स्राव, गर्भाशय-ग्रीवा तथा योनि

4. गुदा, मूत्राशय, उत्थान, स्राव, मलाशय, योनि गर्भाशय-ग्रीवा।

5. मूत्राशय, गुदा, योनि, उत्थान, स्राव, गर्भाशय-ग्रीवा।

(5). गुदास्थिक स्नायु- इसका 1 भाग होता है तथा इसका कई अंगों, कशेरुका ग्रंथियां तथा तंत्रिकाओं से सम्बन्ध होता है-

1. गुदा क्षेत्र तथा गुदास्थिक।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से इलाज करने के लिए गर्दन के पिछले हिस्से के चार बिन्दु, कंधों के बीच के क्षेत्र के पांच बिन्दु, कंधे के नीचे से कमर के क्षेत्र के दस बिन्दु तथा त्रिकाकास्थि क्षेत्र के तीन बिन्दु को नियमित किया गया हैं। इन 31 बिन्दुओं पर दबाव देने से स्वसंचालित स्नायु प्रणाली में सामंजस्य स्थापित हो जाता है जिसके फलस्वरूप रोग ठीक हो जाते हैं।

Tags: Chedok ka chinh, Bebinski chinh, Rosolimo chinh, Kendriye snayvik parnali, Merurajju ya reed ki haddi, Parisariye snayevik parnali