सूर्य की रंगीन किरणों की प्रयोग विधियां


सूर्य की रंगीन किरणों की प्रयोग विधियां

Using​ process of sun rays


अग्नि-तत्व :
प्राकृतिक चिकित्सा के कुछ महत्वपूर्ण ऑर्टिकल्स :

Soory ki rangin kirano se sanan karane ke liye ek taap prakash yantr market men milata hai. is yantr ke bhitar nage baithkar rogi aasaani se rangin prakash ka sanan le sakata hai. सूर्य की रंगीन किरणों को-रोगों को दूर करने हेतु निम्नांकित सात विधियों का प्रयोग किया जाता है-

  1. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को रंगीन शीशी से गुजारकर प्रयोग में लाना।  
  2. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को जल में सम्पुटित करके काम में लाना।
  3. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को वायु के माध्यम से प्रयोग में लाना।
  4. सूर्य के प्रकाश की रंगीन-किरणों को तेल में उतारकर प्रयोग में लाना।
  5. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को मिश्री अथवा दूध-चीनी में भावित करके काम में लाना।
  6. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों से तप्त जल से भीगे कपडे़ की पट्टी लगाकर रोगों को दूर करना।
  7. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों से तप्त जल में सनी मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करके रोगों को दूर करना।

उपरोक्त सातों विधियों की संक्षेप में सारगर्भित जानकारी इस प्रकार है-

1. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को रंगीन शीशी से गुजारना :

          सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को रंगीन शीशी से गुजारने के लिए एक रंगीन शीशे को लेकर उसमें स्लेट की तरह लकड़ी की चौखटे लगवा लेनी चाहिए ताकि यह जल्दी से टूटे नहीं। जब किसी रोगी के रोग से ग्रस्त अंग पर किसी रंग की सूर्य किरण का प्रकाश डालना हो तो उसी रंग का शीशा लेकर धूप के पास बैठकर- शरीर के रोग से पीड़ित अंग पर शीशी को उसी भाग के बिल्कुल पास रखते हुए सूर्य की उसी रंग की किरणें पड़ने देनी चाहिए। सूर्य की रंगीन किरणों का स्नान हमेशा नंगे शरीर पर करना अधिक लाभकारी होता है। सूर्य किरण में यदि किसी रंग विशेष की किरण को सम्पूर्ण शरीर पर डालना हो तो इसके लिए ऐसा कमरा चुनना चाहिए जिसमें सूर्य का प्रकाश अच्छी तरह से आता हो तथा खिड़की में आवश्यकतानुसार रंगीन शीशा निकालने और लगाने की व्यवस्था होनी चाहिए। जिस रंग का सूर्य का प्रकाश शरीर पर डालने की आवश्यकता हो उस रंग के शीशे को सूर्य के सामने वाली खिड़की पर लगाकर बाकी सभी खिड़कियों और दरवाजों को बंद करना चाहिए ताकि हमारे इच्छित रंग के अतिरिक्त अन्य किसी भी प्रकार का रंग कमरें में न आने पाये। इस प्रकार के कमरे में रोगी को लिटाकर उसके पूरे शरीर को सूर्य की किसी भी रंगीन किरण का स्नान कराया जा सकता है। यदि कोई रोगी बुखार से पीड़ित है तो उसे नीले शीशे की कोठरी में बैठाकर सूर्य की नीली किरणों से कुछ देर तक नहलाने से बुखार कम हो जाता है। इसी प्रकार कई बार ऐसा करने से बुखार हमेशा के लिए नष्ट हो जाता है।

          सूर्य की रंगीन किरणों से स्नान करने के लिए एक ताप प्रकाश यंत्र मार्केट में मिलता है। इस यंत्र के भीतर नंगे बैठकर रोगी आसानी से रंगीन प्रकाश का स्नान ले सकता है। इस यंत्र द्वारा रोगी के किसी अंग विशेष को स्नान दिया जा सकता है। इस अवस्था में रोगी के यंत्र में लेटने के बाद किसी अंग विशेष को खुला रखकर शेष शरीर को किसी कपड़े से ढक देते हैं। इस यंत्र के प्रयोग से रोगी को सूर्य-ताप और सूर्य-प्रकाश दोनों के लाभ एक साथ प्राप्त होते हैं। यह प्रकाश यंत्र सन्दूक के समान आकृति का होता है। इसके चारों ओर अथवा किसी एक तरफ रंगीन शीशी को लगाने की जगह होती है।

विशेष :

          वर्षा के सीजन में कभी कभी-कभी सूर्य का प्रकाश नहीं प्राप्त होता है तो इसके विकल्प के रूप में एक ऐसी लालटेन लेनी चाहिए जो तीन ओर से बंद हो तथा एक ओर से खुली हो। उसमें रंगीन शीशे को लगाने और निकालने की जगह बनी होनी चाहिए तथा उसके बाहरी शीशे का ढक्कन गोल और उभरा हुआ होना चाहिए। इस लालटेन में जो दीपक रखा जाए उसमें तिल्ली या नारियल का तेल रखना चाहिए। लालटेन में बत्ती के पीछे रिफ्लेक्टर होना उत्तम होता है। जिस समय इस लालटेन से रोगी पर रंगीन प्रकाश डाला जाता है उस समय इस बात की विशेष सावधानी रखनी चाहिए कि दूसरा कोई भी प्रकाश उस स्थान पर नहीं आना चाहिए। रोगी के सिरहाने एक छोटी मेज अथवा स्टूल रखकर उस पर लालटेन रख देनी चाहिए और इच्छित रंग का प्रकाश रोगी के शरीर के ऊपर पड़ने देना चाहिए। इसी प्रकार किसी विशेष अंग पर भी रंगीन प्रकाश को डाला जा सकता है।

          लालटेन में यदि रंगीन शीशी को डालने और निकालने की जगह न हो तो शीशों को लालटेन की लौ के सामने किसी चीज के सहारे खड़ा करके भी काम निकाला जा सकता है। लाल, हरा, पीला, गहरा नीला, आसमानी तथा नारंगी रंग के शीशे ही इस कार्य हेतु विशेष रूप से उपयोग किये जाते हैं।

2. सूर्य की रंगीन किरणों का जल में सम्पुटित करना:

          सूर्य की सातों रंगीन किरणों को उन्हीं रंगों की बोतलों के माध्यम से जल में सम्पुटित करके चिकित्सा के लिए उपयोग में लाया जाता है। इसलिए इस कार्य हेतु रंगीन शीशे की बोतलें लेनी चाहिए और उनके रंग विशुद्ध होने चाहिए।

          नीली बोतल जितने गहरे रंग की होगी उससे बनाया हुआ जल उतना ही अधिक शांतिकारक, हल्का गर्म, पुष्ट तथा कब्ज करने वाला होगा। नीले रंग की बोतल जितनी अधिक फीकी रंग की होगी, उसमें से बनाया हुआ जल उतना ही कम प्रभाव वाला होगा। इसी प्रकार हरे रंग की बोतल जितने ही शुद्ध रंग की होगी, उसके जल में उतने ही अधिक गुण होंगे। पीली बोतल जितनी अधिक लाल रंग की होगी उसके जल में उतनी ही अधिक गर्मी होगी और जितना अधिक पीलापन उसमें होगा उसका जल उतना ही कम गर्मी वाला होगा। लाल रंग बहुत अधिक गर्म होता है। इस रंग की बोतल जितनी अधिक सुर्ख होगी उसका जल उतना ही प्रभावकारी होगा। यदि किसी रंग की शुद्ध बोतल न मिल सके तो सफेद रंग की बोतल पर इच्छित रंग का `सिलोफाइन´ कागज लपेटकर भी काम चलाया जा सकता है जिस रंग की बोतल में जल तैयार करना होता है उस बोतल को अन्दर और बाहर दोनों ओर से पूरी तरह से साफ कर लेते हैं। इसके बाद शुद्ध और साफ जल को कपड़े से छानकर बोतल को थोड़ा सा खाली रखकर बोतल को भर देते हैं। इसके बाद उसी रंग के शीशे का ढक्कन अथवा कार्क लगाकर बोतल को साफ कपडे़ से खूब पोंछकर एक लकड़ी की पटिया, मेज या तिपाई पर ऐसी जगह रखना चाहिए जहां पर सुबह 10 बजे से शाम 5 बजे तक उस पर धूप पड़ती रहे। दिन भर बोतल को धूप में रखने के बाद शाम को 5 बजे के बाद जब बोतल के खाली भाग में भाप के बिन्दु दिखाई पड़े तो समझना चाहिए कि पानी में औषधीय गुण आ गए हैं। उस वक्त बोतल को उठाकर किसी लकड़ी की अलमारी पर रख देना चाहिए। इसके बाद आवश्यकतानुसार इस जल का उपयोग कर सकते हैं।

नोट :

          सूर्य किरणों द्वारा तप्त बोतल को कभी भी जमीन पर नहीं रखना चाहिए। अन्यथा इस जल के सभी गुण पृथ्वी में उतर जाएंगे, इसी प्रकार चन्द्रमा, तारों तथा दीपक आदि का प्रकाश भी इस जल पर नहीं पड़ना चाहिए। क्योंकि ऐसा होने से भी इस जल के औषधीय गुण समाप्त हो जाते हैं। जब तक जल गर्म हो तब तक उसको चिकित्सा के लिए उपयोग नहीं करना चाहिए। विभिन्न रंगों की बोतलों में जल को तैयार करने के लिए धूप में रखते समय और उसके बाद भी बोतलों को एक साथ नहीं रखना चाहिए। क्योंकि विभिन्न रंगों की अलग-अलग प्रतिक्रिया होती है।

          यदि सूर्य द्वारा तप्त जल को सफेद रंग की बोतल में रखते हैं तो इसमें औषधीय गुण केवल 24 घंटे तक ही रहते हैं और उसी रंग की बोतल में रखने से वह जल 72 घंटे तक उपयोग में लाया जा सकता है। यह जल पीने और मालिश करने अर्थात दोनों ही कामों में आता है। यह जल पीने के लिए छोटे बच्चों को आधा चम्मच तथा बड़ों के लिए दो चम्मच से लेकर 20 मिलीलीटर तक की मात्रा में दिया जा सकता है।

          सूर्य किरणों द्वारा तप्त (गर्म) जल को एक दिन में औषधि के रूप में 3 बार से लेकर 8 बार तक दिया जा सकता है। इसकी मात्रा रोगी की शारीरिक स्थिति और प्रकृति पर निर्भर करती है।

          सूर्य तप्त जल से भीगे कपड़े की पट्टी, साधारण जल से भीगे कपड़े की पट्टी से अधिक प्रभावकारी होती है। इसी प्रकार जल से सनी गीली मिट्टी की पट्टी साधारण जल की पट्टी से अधिक लाभकारी होती है।

3. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को वायु के माध्यम से काम में लाना-

          जल से भरी रंगीन बोतलों की तरह ही केवल खाली रंगील बोतलों में खूब कड़ी डाट लगाकर और उन्हें धूप में रखकर पानी के स्थान पर उसमें उपस्थिति हवा को नासिका द्वारा रोगी शरीर के अन्दर पहुंचाकर भी रोगों को दूर किया जा सकता है। हवा से भरी रंगीन बोतलों को केवल एक घंटे तक ही धूप में रखने से बोतलों में व्याप्त हवा में औषधीय गुण आ जाते हैं। इसके अतिरिक्त खाली बोतलों को धूप में रखने के वहीं नियम होते हैं जो जल से भरी हुई बोतलों को रखने में होते हैं।

          रंगीन बोतलों में औषधीय गुणों से युक्त हवा को नाक या मुंह द्वारा रोगी को श्वास के साथ खिंचवाकर रोगी को रोग से मुक्त किया जा सकता है जैसे- पीले रंग की 5-6 बोतलों की हवा को सूर्य किरणों द्वारा तप्त करने के बाद बोतल को एक हाथ में लेकर और दूसरे हाथ से कार्क (ढक्कन) हटाकर जब रोगी का दाहिना स्वर चलता हो उसी समय रोगी की नाक के दाहिने छिद्र से लगाकर बोतल की हवा गहरी सांस के साथ अन्दर की ओर खिंचवानी चाहिए इसके बाद बोतल के कार्क (ढक्कन) को बंद कर देना चाहिए। इस प्रकार की खाली बोतल की हवा को एक दिन में 5-6 बार रोगी को सांस लेना चाहिए। बोतल की हवा को नाक के दाहिनी छिद्र से ही खींचकर कुछ देर तक उसे भीतर रोककर रखना चाहिए।

          इस प्रकार के उपचार से रोगी के सभी प्रकार के पेट के रोग नष्ट हो जाते हैं। पीले रंग की बोतल के समान ही सभी रंगों की खाली बोतलों की वायु से रोगी का उपचार किया जा सकता है।

          कब्ज से पीड़ित व्यक्ति को पीली बोतल की हवा को मुंह से खींचना चाहिए। पेट के रोगों जैसे पेट दर्द, पेट की गड़गड़ाहट, यकृत वृद्धि तथा पसली आदि में केवल नाक से तथा दमा, पेट की गैस, स्त्रियों का मासिक विकार, और फेफडे़ के रोग आदि विकारों में नाक और मुंह दोनों से हवा खींचनी चाहिए। इसी प्रकार खांसी और हिचकी में भी गहरी नीली बोतल की हवा को मुंह के द्वारा खींचना चाहिए तथा सर्दी और अनिद्रा में नाक के द्वारा खाली बोतल की हवा को लेना चाहिए। लाल रंग के बोतल की हवा को केवल सन्निपात के रोगी जिसका शरीर ठंडा पड़ गया हो, नाड़ी बंद हो रही हो को ही सुंघाना चाहिए, जिससे वह होश में आ जाएगा। इस रंग की खाली बोतल की हवा अन्य रोगियों को नहीं सुंघानी चाहिए क्योंकि यह उसके लिए हानिकारक हो सकती है।

4. सूर्य के प्रकाश की रंगीन- किरणों को तेल में उतारकर प्रयोग में लाना-

          जिस प्रकार सूर्य की रंगीन किरणों को जल में भावित (चार्ज) किया जाता है। ठीक उसी प्रकार से तेल को भी भावित करते हैं। इसमें केवल इतना अंतर होता है कि जल को धूप में रखने के बाद यह केवल 8 घंटों में ही औषधीय गुणों से युक्त हो जाता है। परन्तु तेल को तैयार में करने गर्मी के मौसम में लगभग 40 दिन और सर्दियों के मौसम में लगभग 60 दिन लगते हैं। आमतौर पर सरसों या जैतून के तेल को ही सूर्य की किरणों द्वारा तप्त किया जाता है। परन्तु वात रोगों में उपयोग हेतु तिल या तीसी तेल का उपयोग अधिक लाभकारी होता है।

          हरी बोतलों का तप्त तेल त्वचा सम्बंधी रोगों में अधिक लाभकारी होता है। इस तेल को सिर में लगाने से मानसिक गर्मी शांत होती है। इस तेल को बालों में लगाने से सफेद हुए बाल भी काले हो जाते हैं। हमारे सिर के पिछले हिस्से में इस तेल को लगाने से स्वप्नदोष और अन्य धातु सम्बंधी रोग नष्ट हो जाते हैं। उपदंश में यह तेल अधिक लाभकारी होता है। इसी प्रकार अन्य रंगों की बोतलों में सूर्य तप्त किया हुआ तेल उन रंगों के अनुसार विभिन्न रोगों में उपयोग किया जाता है।

5. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों को मिश्री अथवा दूध-चीनी में भावित करके काम में लाना।

          सूर्य तप्त मिश्री और शक्कर या दूध, शर्करा की होमियोपैथिक गोलियों का उपयोग उस समय किया जाता है जब बरसात के कारण सूर्य किरणों के द्वारा जल तैयार नहीं हो पाता है। अप्रैल महीने से लेकर जून तक मिश्री आदि में सूर्य की रंगीन किरणों की शक्ति को भावित करने की अधिक सुविधा रहती है अत: उन दिनों में सभी प्रकार रंगीन बोतलों को लेकर उन्हें साफ करके उसमें पिसी हुई मिश्री, शक्कर या दुग्ध-शर्करा की गोलियों को मिलाकर धूप में रखना चाहिए। शक्कर या मिश्री को तीन महीने तक धूप में रखने से इसमें औषधीय गुण आ जाते हैं।

6. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों से तप्त जल से भीगे कपडे़ की पट्टी लगाकर रोगों को दूर करना -:

          शरीर में किसी रंग की कमी होने के कारण रोग होने पर यदि पूरे शरीर पर या अन्य किसी अंग पर प्राकृतिक चिकित्सा विज्ञान के अनुसार- गीले कपड़े की पट्टी लगाने की आवश्यकता हो तो उसके अनुसार- भीगे कपडे़ की पट्टी लगाने की आवश्यकता हो तो उस समय कपड़े की पट्टी के स्थान पर उसी रंग की किरणों से तप्त जल से भिगोकर पट्टी देने से आश्चर्यजनक लाभ मिलता है। जैसे-

          लगभग सभी प्रकार के बुखार के उपचार के लिए रोगी के पूरे शरीर पर भीगी चादर की लपेट या केवल पेड़ू पर भीगे कपड़े की पट्टी का प्रयोग किया जाता है जो बुखार में लाभकारी होता है। इसलिए चादर या पेड़ू पर लगाई जाने वाली पट्टी को साधारण जल से न भिगोकर आसमानी रंग की बोतल में सूर्य तप्त जल से भिगोकर पट्टी लगानी चाहिए तो बुखार में दोगुना लाभ शीघ्र ही प्राप्त होता है।

7. सूर्य के प्रकाश की रंगीन किरणों से तप्त जल से गीली मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करके रोगों को दूर करना -

          सूर्य की रंगीन किरणों से तप्त गीली मिट्टी की पट्टी का प्रयोग करने से शीघ्र तथा अधिक लाभ मिलता है।