समाधि

Yog ka athwan ang Samadhi. Jab vyakti dharana v dhyan ka abhyas poorn kar leta hai tab vah Samadhi ke abhyas ke yogy banata hai. Samadhi ke liye vyakti ke man men kisi bhi prakar ke bahari vichar nahi hone chahiye tatha vyakti ka man aantarik aatma men lin hona chahiye.

समाधि


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परिचय-

          योग का आठवां अंग समाधि है। जब व्यक्ति धारणा ध्यान का अभ्यास पूर्ण कर लेता है तब वह समाधि के अभ्यास के योग्य बनता है। समाधि के लिए व्यक्ति के मन में किसी भी प्रकार के बाहरी विचार नहीं होने चाहिए तथा व्यक्ति का मन आंतरिक आत्मा में लीन होना चाहिए। इसलिए समाधि से पहले ध्यान के अभ्यास को बताया गया है। ध्यान से ही चित (मन) विचार शून्य हो जाने की अवस्था में ही समाधि घटित होती है। ध्यान के बाद व्यक्ति के विचार सामान्य जीवन से ऊपर उठ जाते हैं और वह केवल ईश्वर की दिव्य शक्ति के बारे में ही विचार करता है। ध्यान में जाने के बाद मन में उत्पन्न होने वाली ऐसी अवस्था ही समाधि है। समाधि की अवस्था में व्यक्ति अपने मन को इस तरह अंतर आत्मा में लगा लेता है कि उसके द्वारा कोई भी बाहर प्रतिक्रिया नहीं होती तथा व्यक्ति समाधि में जाकर ईश्वर का ध्यान करते हुए उसी में लीन हो जाता है। वास्तव में समाधि से पहले की जाने वाली धारणा की प्राप्ति में ही व्यक्ति विचार शून्य हो जाता है और बेहोशी को प्राप्त करता है। धारणा के अभ्यास में सफलता प्राप्त करने के बाद ही ध्यान का अभ्यास किया जाता है और ध्यान के अभ्यास में मन को परमात्मा में लीन करने में सफलता प्राप्त करने के बाद व्यक्ति समाधि में पहुंचता है। समाधि में व्यक्ति वैसे ही ईश्वर मय हो जाता है जैसे लोहा आग में जलकर आगमय हो जाता है। समाधि की अवस्था में व्यक्ति आनन्दमय हो जाता है, उसके शरीर पर सूर्य की तरह तेज आ जाता है। समाधि में लीन होने के बाद व्यक्ति को कुछ भी याद नहीं रहता- मैं कौन हूँ? कहां से आया हूँ? उसे संसार का कुछ भी ज्ञान नहीं रहता। समाधि में लीन होने के बाद व्यक्ति को केवल ईश्वर का ही ज्ञान रहता है। ऐसे व्यक्ति के सामने न कोई छोटा होता है, न कोई बड़ा होता, न अमीर और न गरीब होता है, उसकी दृष्टि में सभी समान है। समाधि प्राप्त व्यक्ति का व्यवहार सामान्य व्यक्ति से अलग हो जाता है, वह सभी में ईश्वर को ही देखता है और उसकी दृष्टि में ईश्वर ही सत्य होता है।

समाधि का अर्थ-

  • समाधि में सफलता प्राप्त करने से कुण्डलिनी शक्ति जागृत हो जाती है। कुण्डलिनी शक्ति शरीर में नाभि के पास सूर्य चक्र में स्थित होती है, जो योगाभ्यास से जागृत होकर सुषुम्ना से होते हुए मस्तिष्क में पहुंचती है। समाधि के द्वारा कुण्डलिनी शक्ति के साथ सभी चक्र जागृत हो जाते हैं। समाधि शरीर की अंतरंग प्रक्रिया है। शरीर के अंतरंग साधन जब सधते हैं तो एकाग्रता की शक्ति प्राप्त होती है।
  • मानव शरीर में अनेक प्रकार की क्रियाएं होती हैं जिन्हें हम नहीं देखते लेकिन फिर भी वे अपना कार्य सामान्य रूप से करती रहती हैं। शरीर की आंतरिक या बाहरी सभी क्रियाएं हमारे द्वारा ही संपन्न होती हैं, परन्तु उसके बारे में हमें ज्ञात नहीं होता, जैसे- भोजन के बाद हमारी जानकारी के बिना ही उसका पाचन हो जाता है। हमारे शरीर में अनेकों नसें-नाड़ियां हैं जो बिना हमारी जानकारी के ही अपने कार्यों को करती रहती हैं। ये सभी क्रियाएं हमारे द्वारा ही संचालित होती हैं लेकिन फिर भी हमें उस कार्य का ज्ञान नहीं होता। साधना में इतनी शक्ति होती है कि योग के अभ्यास के द्वारा हृदय की गति को भी रोक सकता है एवं शरीर की पाचनक्रिया को भी अपने वश में कर सकता है। अत: हम जो कार्य करते हैं, उनकी 2 अवस्था होती हैं- ज्ञानावस्था और अज्ञानावस्था।

ज्ञानावस्था-

          जब शरीर के द्वारा किसी कार्य को करने का अनुभव हो या जानकारी हो वह ज्ञानावस्था कहलाती है।

अज्ञानावस्था-

          अज्ञानावस्था में शरीर के द्वारा होने वाले कार्य का पता नहीं चलता।

          शरीर के द्वारा कार्य करने वाली इन दोनों अवस्थाओं के अतिरिक्त एक तीसरी अवस्था भी होती है जिसे अहंभाव कहते हैं। मनुष्य के अन्दर अहंभाव दोनों ही अवस्थाओं में रहता है, चाहे वह ज्ञानावस्था में हो या अज्ञानावस्था में। मन हमेशा अर्थात सोते-जागते अपना कार्य करता रहता है। मन कभी नहीं रुकता अहंभाव रहे या न रहे। मन के द्वारा ज्ञानातीत अवस्था में ही अपनी अंतर आत्मा में लीन हो जाना समाधि कहलाता है। नींद ज्ञानावस्था की साधारण अवस्था है और समाधि ज्ञान की उच्चावस्था है।

           अज्ञानवस्था में मनुष्य अपने क्रिया-कलापों को बन्द कर जिस अवस्था में सोता है, वैसे ही जागता है। ज्ञानातीत अवस्था के बाद समाधि से उठने पर मनुष्य अहंभाव से पूर्ण होकर उठता है। समाधि से उठने पर मनुष्य के अज्ञान व अभाव खत्म हो जाते हैं और वह आलौकिक व दिव्य शक्ति का ज्ञान प्राप्त कर भगवान में लीन हो जाता है। अर्थात समाधि जीवन की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति बाहरी वस्तुओं से मन को हटाकर अंतर आत्मा में लीन होकर ईश्वर का दर्शन करता है।

          परमात्मा का अस्तित्व तर्कातीत है। तर्क द्वारा ईश्वर को प्राप्त नहीं किया जा सकता। अतीन्द्रिय ज्ञान युक्ति से परे हैं। ज्ञानतीत अवस्था में उपलब्धि समाधि है। योग के द्वारा ही समाधि प्राप्त की जा सकती है। अतीन्द्रिय अवस्था में पहुंचने के लिए वैज्ञानिक उपाय किये जाते हैं। अतीन्द्रिय ज्ञान प्राप्त करने का सामर्थ्य सबमें है। वे योगी जिन्होनें साधना द्वारा उच्चता को प्राप्त किया था, वे भी हमारे-आपके समान मनुष्य ही थे। ज्ञान का लाभ किताबों के अध्ययन से नहीं बल्कि प्रत्यक्ष कर्म करके प्राप्त होता है। ईश्वर ज्ञान प्राप्त करने के लिए कुण्डलिनी शक्ति का जागरण आवश्यक है और कुण्डलिनी जागरण के लिए योग साधना करनी होगी एवं प्रत्याहार और धारणा की प्राप्ति के बाद ध्यान करना होगा। ध्यान शरीर के बाहर या भीतर मन को एक स्थान पर केन्द्रित करने को कहते हैं। ध्यानावस्था में ध्यान शक्ति इतनी तीव्र हो जाती है कि मन बाहरी वस्तुओं को भूलकर अंतर आत्मा में ही पूर्ण रूप से लीन हो जाता है। इसी को समाधि कहते हैं।

          ध्यान करने पर जब मन स्थूल वस्तु पर केन्द्रित हो जाए, तब मन को सूक्ष्म पर केन्द्रित करना चाहिए और फिर अतिसूक्ष्म पर मन को केन्द्रित करना चाहिए। मन को जब निर्विकार पर केन्द्रित करने और उसमें ही ध्यान लगाने में सफलता मिल जाती है, तब समाधि की प्राप्ति होती है। समाधि में लीन होने वाले योगी को अनेक प्रकार के दिव्य ज्योति और आलौकिक शक्तियों का ज्ञान प्राप्त होता है।

समाधि क्या है?

          समाधि योग का सबसे अन्तिम रूप है। समाधि की प्राप्ति तब होती है, जब व्यक्ति सभी योग साधनाओं को करने के बाद साधना, ध्यान में लीन होने लगता है और मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर अंतर आत्मा में लीन करने योग्य बना लेता है। तब व्यक्ति ध्यान करते-करते आत्मा में लीन होकर समाधि को प्राप्त करता है। जो व्यक्ति समाधि को प्राप्त करता है उसे स्पर्श, रस, गंध, रूप एवं शब्द इन 5 विषयों की इच्छा नहीं रहती तथा उसे भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, मान-अपमान तथा सुख-दु:ख आदि किसी की अनुभूति नहीं होती। 

तदेवार्थ मात्र निर्भासं स्वरूप शून्यमिव समाधि-

          अर्थात ध्यान का अभ्यास करते-करते जब साधक ऐसी स्थिति में पहुंच जाता है कि उसे स्वयं का ज्ञान नहीं रह जाता और केवल ध्येय मात्र रह जाता है, तो उस अवस्था को समाधि कहते हैं।

          जब समाधि की अवस्था में सभी इन्द्रियां मन में लीन हो जाती हैं, तो उन इन्द्रियों का विषयों से लगाव समाप्त हो जाता है। उस समय उसके लिए न कोई अपना होता है और न ही पराया। उसका स्वभाव निर्मल व सभी के प्रति समान भाव का होता है।

न गंध न रसं रूपं न च स्पर्श न नि:स्वनम्।

नात्मानं न परस्यं च योगी युक्त: समाधिना।।

          अर्थात जो व्यक्ति समाधि में लीन हो जाता है, उसे रस, गंध, रूप, स्पर्श, शब्द इन 5 विषयों का ज्ञान नहीं रह जाता है। उसे अपना-पराया, मान-अपमान आदि की कोई चिंता नहीं रह जाती है।

सलिलै सैन्धवं यद्धत्साम्यं भजति योगत:

तथात्मन सोरक्यं समाधिरमि धीयते।।

          अर्थात समाधि के बारे में योग में कहा गया है कि जिस तरह नमक पानी में मिलने से अपना पहले वाला रूप त्यागकर पानी में गलकर पानी के रूप में परिवर्तित हो जाता है। उसी तरह समाधि में मन को बाहरी वस्तुओं से हटाकर मन और आत्मा को एक किया जाता है। आत्मा और मन के चिंतन के उस रूप को ही समाधि कहते हैं। समाधि में लीन होने से आत्मा और परमात्मा का मिलन होता है। मन और आत्मा को परमात्मा में लीन करने वाले इस एकता को समाधि कहते हैं।

          योगशास्त्र में समाधि के बारे में कहा गया है कि समाधि में बैठे व्यक्ति को न अस्त्र काट सकता है, न शस्त्र छेद सकता है, उसे न कोई पशु-पक्षी तथा न विषैले जीव खत्म कर सकते हैं। समाधि में लीन व्यक्ति पर किसी मंत्र-तंत्र आदि का असर नहीं होता तथा उस पर किसी प्रकार की वासना का भी कोई प्रभाव नहीं पड़ता।

          समाधि में जाने से पहले कुछ यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा एवं ध्यान इन 7 कर्मो को करना चाहिए। इन सभी कर्मो को किये बिना समाधि नहीं करनी चाहिए।

          ध्यान को पूर्ण रूप से करने के बाद ही समाधि धारण की जा सकती है क्योंकि ध्यान में व्यक्ति अपनी इन्द्रियों को बाहरी वस्तुओं से हटाकर आत्मा में लीन करने का प्रयास करता है और तब तक व्यक्ति ध्यान अवस्था में रहता है जब तक व्यक्ति अपने मन और इन्द्रियों को अंतर ध्यान में लीन नहीं कर लेता। इसमें सफलता मिलने पर व्यक्ति द्वारा किया जाने वाला ध्यान ही समाधि में परिवर्तित हो जाता है।

           जब पूर्ण रूप से सांस पर नियंत्रण हो जाता है और मन स्थिर व सन्तुलित हो जाता है, तब यह समाधि की स्थिति कहलाती है। समाधि में मनुष्य को अपने जीवन के अस्तित्व का अनुभव होता है।

धारणा पभ्चनाड़ी भिघ्यनिं च षटि नाड़ीभि:।

दिनद्वादश केन स्यात्स समाधि प्राण संयामात।।

यत्सर्व द्वन्द्वायोरैक्सं जीवात्मा परमात्मानो:।

समस्त नष्ट संकल्प: समाधि सामिधी यते।।

          अर्थात प्राणवायु को 5 सेकेंड तक रोककर रखना ´धारणा´ है, 60 सेकेंड तक मन को किसी विषय पर केन्द्रित करना ´ध्यान´ है और 12 दिनों तक प्राणों का निरंतर संयम करना समाधि है। सभी जीवात्मा-परमात्मा को एक मानकार सभी संकल्पों को नष्ट करते हुए साधक ध्येय में लीन हो जाए, उसी अवस्था को´समाधि´कहते हैं।

समाधि के प्रकार-

          समाधि को अलग-अलग ग्रंथों व योगशास्त्रों में अनेक प्रकार का बताया गया है। समाधि के बारे में महर्षि पतांजलि ने अपने योगशास्त्र में मुख्य 2 प्रकार बताए हैं- सम्प्रज्ञात समाधि और असम्प्रज्ञात समाधि। परंतु भक्ति सागर में समाधि के 3 प्रकार बताए गए हैं।

सम्प्रज्ञात समाधि-

          वैराग्य द्वारा योगी सांसारिक वस्तुओं (भौतिक वस्तु) के विषयों में दोष निकालकर उनसे अपने आप को अलग कर लेता है और चित्त या मन से उसकी इच्छा को त्याग देता है, जिससे मन एकाग्र होता है और समाधि को धारण करता है। यह सम्प्रज्ञात समाधि कहलाता है। 

अस्प्रज्ञात समाधि- 

          इसमें व्यक्ति को कुछ भान या ज्ञान नहीं रहता। मन जिसका ध्यान कर रहा होता है उसी में उसका मन लीन रहता है (तदाकार वृत्ति बनी रहती है)। उसके अतिरिक्त किसी दूसरी ओर उसका मन नहीं जाता।

सम्प्रज्ञात समाधि को 4 भागों में बांटा गया है-

वितर्कानुगत समाधि-

          सूर्य, चन्द्र, ग्रह, राम, कृष्ण आदि मूर्तियों, किसी स्थूल वस्तु या प्राकृतिक पंचभूतों की अर्चना करते-करते मन को उसी में लीन कर लेना वितर्कानुगत समाधि कहलाता है।

विचारानुगत समाधि- 

          स्थूल पदार्थों पर मन को एकाग्र करने के बाद छोटे पदार्थ, छोटे रूप, रस, गन्ध, शब्द आदि भावनात्मक विचारों के माध्यम से जो समाधि होती है, वह विचारानुगत अथवा सविचार समाधि कहलाती है।

आनन्दानुगत समाधि-

        आनन्दानुगत समाधि में विचार भी शून्य हो जाते हैं और केवल आनन्द का ही अनुभव रह जाता है।  

अस्मितानुगत समाधि-

          अस्मित अहंकार को कहते हैं। इस प्रकार की समाधि में आनन्द भी नष्ट हो जाता है। इसमें अपनेपन की ही भावनाएं रह जाती हैं बाकी सभी भाव मिट जाते हैं। इसे अस्मित समाधि कहते हैं। इसमें केवल अहंकार ही रहता है। पतांजलि इस समाधि को सबसे उच्च समाधि मानते हैं।

भक्ति सागर में 3 प्रकार की समाधि का वर्णन बताया गया है।

  • भक्ति समाधि
  • योग समाधि
  • ज्ञान समाधि

भक्ति समाधि-  

          इस समाधि में व्यक्ति किसी देवी-देवता की आराधना भक्ति में एकाग्रचित्त होकर उसमें अपने मन को लीन कर लेता है। इसकी साधना से ऐसी अवस्था बन आती है कि व्यक्ति को भगवान के अलावा दूसरा कुछ भी दिखाई नहीं देता। समाधि की इस अवस्था में साधक अपने आप का ध्यान करना भूल जाता है।

योग समाधि-

          इस समाधि में साधक योग के आसन, प्राणायाम आदि की सहायता से षटकर्म चक्रों का भेदनकर मन व ध्यान को शून्य चक्र (सहस्त्रार) में ले जाता है। जब शून्य चक्र में ध्यान करते-करते व्यक्ति स्वयं का तथा ध्यान करने की क्षमता को भी त्याग देता है, वह अवस्था व्यक्ति की समाधि कहलाती है।

ज्ञान समाधि-

          ज्ञान समाधि में व्यक्ति अपने मन को एक ही विचार धारा पर केन्द्रित करता है। उसके अनुसार संसार में ब्रहा (ईश्वर) के अलावा दूसरा कुछ भी नहीं है। संसार में जो भी है और जो कुछ भी हो रहा है, वह सभी ब्रहा (भगवान) का ही एक रूप है। इसलिए साधक संसार को त्यागकर ब्रहा (भगवान) में लीन हो जाता है। यह समाधि के एकत्ववाद के दर्शन पर आधारित है।

समाधि का महत्त्व-

         योग साधना में योग के आठ अंगों को बताया गया है, जिसमें सबसे अंतिम अंग समाधि है। योग के 7 अंगों की साधना करने के बाद ध्यान में लीन होने योग्य अपने मन को बनाकर समाधि को प्राप्त किया जाता है। समाधि ही एक ऐसी अवस्था है जिस अवस्था को पाने के बाद व्यक्ति इस मायारूपी संसार को जान सकता है। ´गीता´ में परमत्व (परमात्मा) के बारे में कहा गया है कि परमात्मा का न आदि है, न ही अंत है, न कोई अवलम्ब है और आश्रय भी नहीं है। परमात्मा जगत प्रपंच से पृथक, निराकार और विशुद्ध है अर्थात परमात्मा की न कोई शुरुआत है, न कहीं अंत (खत्म), न वे कहीं उपस्थित हैं और न कहीं वे रहते हैं। वे इस दुनिया के दु:खमय जीवन से अलग बिना आकार के और बिल्कुल शुद्ध रूप में रहते हैं। परमात्मा के इस गुण को जो साधक या व्यक्ति जान लेता है। वह योग का सब कुछ जानने वाला होता है। अत: समाधि की स्थिति में व्यक्ति अंत, अवलम्ब, प्रपंच से रहित और विशुद्ध आश्रय और आकार से हीन तत्त्व को जान लेता है अर्थात परमात्मा को जान लेता है।

          निराधन्त निरालम्ब निषप्रपमंच निरामयम।

          निराश्रय निराकारं तत्वं जानाति योगवति।

          अर्थात समाधि में लीन योगी आदि और अंत से दूर अवलम्ब और प्रपंच से दूर, विशुद्ध आश्रय और आकार से हीन तत्व को जान लेता है।

          इस प्रकार समाधि में लीन योगी परमात्मा के बारे में जानने के बाद संसार में और कुछ जानना शेष नहीं रह जाता। भगवान श्रीकृष्ण ने गीता में कहा है- 

सर्वभूत स्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मिनि।

ईक्षते योगयुक्तात्मा सर्वत्र समदर्शन।

     अर्थात योग साधना को जानने वाले व्यक्ति सभी वस्तुओं में आत्मा का निवास मानते हैं। उन्हें संसार की वास्तविकता का ज्ञान हो जाता है। जिसके बाद उस साधक या व्यक्ति में सब को समान रूप से देखने वाला विचार आ जाते हैं।

     समाधि में व्यक्ति संसार की भौतिक वस्तुओं को त्यागकर हमेशा के लिए सत्यस्वरूप ब्रहा में स्थिति हो जाता है, जो ब्रहा स्वरूप ही बन जाता है। भगवान शंकराचार्य के अनुसार-

समाहिता ये प्रविलाप्य ब्रह्मं।

श्रोत्रादि चेत: स्वयहं चिदात्मनि।

त एव मुक्ता भवपाशबन्धे।

निन्यें तु पारोक्ष्यकथामिध्यामिन:।।

          अर्थात जो लोग अपनी इन्द्रियों को समेटकर सांसारिक वस्तुओं का मोह त्यागकर मन से अहंकार को निकालकर इन्द्रियों समेत मन को आत्मा में लीनकर समाधि धारण करते हैं, वे इस सांसारिक बंधनों से मुक्त होते हैं। परन्तु जो केवल ब्रह्म ज्ञान की बातें करते हैं तथा किसी साधना को नहीं करते वे कभी इन सांसारिक बंधनों से मुक्ति नहीं पाते।