शॉक की स्थिति


शॉक की स्थिति

SHOCK


प्राथमिक चिकित्सा :

परिचय-

          अगर किसी दुर्घटना आदि के कारण व्यक्ति के शरीर में गंभीर, गहरे घाव लग जाते हैं तो उसके साथ ही एक और समस्या पैदा हो जाती है, जो प्राथमिक उपचारकर्ता के लिए एक चुनौती के समान होती है। यह समस्या है ‘शॉक’ की स्थिति। इस समस्या पर काबू पाना काफी मुश्किल होता है। इसलिए इससे निपटने के लिए पहले से ही तैयार रहना चाहिए।

          ‘शॉक’ लगना को आमतौर से ‘बिजली का झटका’ लगने से जोड़ा जाता है। यह सही है कि बिजली की नंगी तार के संपर्क में आने से भी शॉक की स्थिति पैदा हो जाती है लेकिन शॉक उन दुर्घटनाओं के कारण भी पैदा होता है जिनका बिजली से कोई संबंध नहीं होता है। असल में “शरीर की सब क्रियाओं में डिप्रेशन आ जाने की स्थिति को शॉक कहा जाता है। इसका संबंध शरीर की रक्तवाहक प्रणाली से है, सिर्फ दिल से नहीं।”

          शॉक की स्थिति को अच्छी तरह समझने और उस स्थिति में प्राथमिक चिकित्सा देने के लिए शरीर के रक्त परिसंचरण तंत्र को समझना जरूरी है। रक्त परिसंचरण तंत्र के तीन प्रमुख अंग होते हैं-

  • हृदय रक्त को शरीर के हर अंग में पहुंचाने के लिए अत्यंत सुचारू पंप का कार्य करता है।
  • केशिकाओं, धमनियों और शिराओं की वह व्यवस्था, जिसके माध्यम से रक्त शरीर के अलग-अलग अंगों तक पहुंचता है।
  • स्वयं रक्त।

          रक्त-परिसंचरण तंत्र का प्रमुख कार्य विभिन्न ऊतकों को ऑक्सीजन और पोषक पदार्थ पहुँचाना और उनसे बेकार पदार्थों को वापस लाना है। पोषक पदार्थों और बेकार पदार्थो के बीच विनिमय केशिकाओं में होता है। केशिकाएं सबसे छोटी रक्त वाहिकाएं होती हैं। रक्त के सामान्य परिसंचरण के दौरान रक्त धमनियों में से दाब के साथ प्रवाहित होता है। यह दाब ही ‘रक्तदाब’ या ‘रक्तचाप’ कहलाता है।

     इस प्रकार रक्तदाब रक्त द्वारा रक्त वाहिकाओं की दीवारों पर डाला जाने वाला दाब है। असल में रक्तदाब अनेक कारकों पर निर्भर होता है, जिनमें से प्रमुख कारक निम्नलिखित है-

  • दिल की पंपिंग क्षमता,
  • वाहिकामय क्षेत्र (वैस्कुलर बैड) का आकार,
  • धमनियों की चौड़ाई,
  • मांसपेशीय तान (मस्कुलर टोन) और वाहिकाओं की दीवारों का लचीलापन,
  • परिसंचरण तंत्र को भरने के लिए रक्त की मात्रा।

          इन कारकों में से अगर कोई भी एक कारक समुचित रूप से कार्य नहीं करता तो इसके परिणाम गंभीर हो सकते हैं। यदि हृदय अपना कार्य समुचित रूप से नहीं कर पाता तो दिल का दौरा पड़ सकता है। बहुत अधिक रक्तस्राव हो जाने पर परिसंचरण तंत्र में रक्त की कमी हो सकती है। इससे पीड़ित के जीवन को खतरा पैदा हो सकता है। जब स्वयं रक्तवाहिकाओं के आकार या कार्यवाही में गड़बड़ पैदा हो जाती है तो शॉक की स्थिति पैदा हो जाती है। इसीलिए कभी-कभी शॉक को ‘परिसरीय परिसंचरण पात’ (पेरीफरल सरकुलेटरी फेलियर) भी कहते हैं।

          शॉक की स्थिति पैदा होने पर शरीर के अलग-अलग ऊतकों को पर्याप्त मात्रा में रक्त नहीं मिल पाता। शुरुआत में हमारे शरीर के अनावश्यक अंगों की रक्तवाहिकाएं अपने-आप सिकुड़ जाती हैं और दूसरी ओर महत्त्वपूर्ण अंगों की रक्तवाहिकाएं फैल जाती हैं। इसके बाद भी अगर हालात में सुधार नहीं हो पाता तब रक्त उन अंगों में, जहां वाहिकाएं सिकुड़ गई थीं, इकट्ठा होने लगता है। इसके साथ ही ऑक्सीजन की कमी के कारण वाहिकाओं की दीवारें कमजोर हो जाने के कारण रक्त का प्लाज्मा वाहिकाओं में से रिसने लगता है, जिससे शरीर में परिसंचरित होने वाले रक्त की मात्रा में कमी आने लगती है और वह अधिक गाढ़ा होने लगता है, अधिक अम्लीय हो जाता है और उसमें अनेक हानिकारक पदार्थ पैदा होने लगते हैं। इसके साथ ही अधिक कार्य करने, रक्त की कम मात्रा प्राप्त होने तथा हृदय-पेशियों को प्राप्त होने वाले पोषक पदार्थो की मात्रा में कमी हो जाने के फलस्वरूप दिल के धड़कने की गति धीमी पड़ने लगती हैं। इसके परिणाम बहुत भयंकर होते हैं। रक्त परिसंचरण में बाधा आ जाती है और पीड़ित बेहोश होने लगता है।

          शॉक से पीड़ित व्यक्ति की हालत उपचार के अभाव में लगातार बिगड़ती चली जाती है। कभी-कभी पीड़ित समुचित उपचार के बाद भी पूरी तरह स्वस्थ नहीं हो पाता। कभी-कभी उसके अंग बेकार हो जाते हैं और कितने ही उपचार के बाद भी पहले जैसी स्थिति में नहीं आ पाते। आखिर में पीड़ित की मृत्यु भी हो सकती है।

कारण- शॉक अनेक कारणों से पैदा हो सकता है लेकिन संक्रमण होने पर स्थिति और गंभीर हो जाती है। शरीर में द्रवों, प्लाज्मा या रक्त की कमी कुछ मिनटों में ही शॉक कि स्थिति पैदा कर देती है। यह कमी चाहे शरीर में आंतरिक रक्तस्राव से पैदा हुई हो या बाहरी रक्तस्राव से। वैसे दुर्घटनाओं में गंभीर चोट लग जाने या अधिक मात्रा में रक्तस्राव हो जाने से अक्सर ही शॉक की स्थिति पैदा हो जाती है। लेकिन कभी-कभी बहुत मामूली महसूस होने वाले कारणों से भी शॉक की स्थिति पैदा हो सकती है।

     शरीर के किसी अंग के बुरी तरह जल जाने पर अक्सर ही शॉक की स्थिति पैदा हो सकती है क्योंकि जले अंग और उसके नीचे के कोमल ऊतकों के द्रव बड़ी मात्रा में बाहर निकल जाते हैं।

     कभी-कभी पेट में भयंकर गड़बड़ी हो जाने और पथरी आदि के कारण तथा गुर्दों में असहनीय दर्द उठने के फलस्वरूप भी पीड़ित शॉक की स्थिति में आ जाता है। सामान्य तौर पर शरीर के किसी भी अंग में होने वाला तेज दर्द शॉक को बढ़ावा देता है। जरूरत से अधिक इंसुलिन की मात्रा लेने पर या कुछ टॉक्सिन या बाह्य प्रोटीन शरीर के अंदर पहुंच जाने पर भी शॉक की स्थिति पैदा हो सकती है।

बाह्य लक्षण- शॉक से पीड़ित होने पर व्यक्ति को शुरुआत में कमजोरी महसूस होती है और उसे मूर्च्छा आने लगती है। वह चक्कर आने की शिकायत करता है उसे उल्टियां आ सकती हैं। उसे प्यास लगने लगती है और वह बार-बार पानी मांगता है। शॉक की स्थिति को पहचानने का यह एक महत्त्वपूर्ण लक्षण है। पहले शॉक से पीड़ित व्यक्ति की त्वचा पीली दिखाई देती है लेकिन बाद में राख के रंग की हो जाती है। छूने पर वह ठंडी महसूस होती है और पसीना आने के कारण चिपचिपी हो जाती है।

          शॉक से पीड़ित व्यक्ति बेचैनी, घबराहट और कंपन की शिकायत करता है। शॉक की स्थिति लंबे समय तक रहने पर मस्तिष्क की सोचने की क्षमता धीरे-धीरे कम होने लगती है, जो समय के साथ बढ़ती जाती है। अंत में पीड़ित पूरी तरह बेहोश हो जाता है। उसकी आंखों की पुतलियां फैल जाती हैं। इस स्थिति में भी हृदय मस्तिष्क की रक्त सप्लाई को समुचित बनाए रखने की कोशिश करता है जिसके कारण शरीर के दूसरे अंगों को रक्त की समुचित मात्रा नहीं मिल पाती।

         हृदय द्वारा रक्त परिसंचरण में सुधार करने के असफल प्रयत्नों से उसकी धड़कन की गति बहुत बढ़ जाती है। नब्ज की गति भी 70-80 प्रति मिनट से बढ़कर 160 तक पहुंच सकती है। लेकिन नब्ज में रक्त की मात्रा कम होने के कारण वह बहुत कम हो जाती है। इसी कारण कभी-कभी कलाई पर नब्ज का पता नहीं चल पाता।

         रक्त की मात्रा कम हो जाने के कारण दिल धड़कने की आवाज भी धीमी पड़ने लगती है। रक्तदाब (ब्लडप्रेशर) गिरकर लगभग 65 मिलीमीटर तक हो जाता है। अगर पीड़ित का रक्तदाब (ब्लडप्रेशर)  काफी समय तक 65 मिलीमीटर या उससे कम रहे तो मस्तिष्क तथा दूसरे अंगों में ऑक्सीजन की कमी से होने वाले दुष्परिणाम प्रकट होने लगते हैं। मस्तिष्क को स्थायी हानि पहुंच सकती है, जो बाद में कितने ही उपचार के बाद भी दूर नहीं हो पाती। कभी-कभी पीड़ित की मृत्यु भी हो जाती है।

        ऊपर दी गई स्थिति को रोकने के लिए पीड़ित का शरीर खुद भी कोशिश करता है। पीड़ित अधिक-से-अधिक मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण करने की कोशिश करने लगता है, जिससे उसकी सांस तेज और गहरी होने लगती है। पीड़ित का मुंह खुल जाता है और वह हांफने लगता है। हालत बिगड़ने पर उसकी हांफने की गति भी बढ़ने लगती है और ऐसा लगता है मानो वह किसी भी हालत में अधिक-से-अधिक वायु ग्रहण करना चाहता है। लेकिन यह स्थिति बहुत चिंताजनक और आने वाली मृत्यु की सूचक होती है।

        अत्यधिक रक्तस्राव के फलस्वरूप शॉक की स्थिति पैदा होने पर लगभग ऐसे ही लक्षण उत्पन्न होते हैं। रक्तस्राव के कारण होने वाली रक्त की कमी का मुकाबला करने के लिए वाहिकाएं सिकुड़ जाती हैं जिससे पीड़ित की त्वचा, होंठ, नाखून और पलकें पीली पड़ जाती हैं। लेकिन नाड़ी की गति और रक्तदाब (ब्लडप्रेशर) में कोई अंतर नहीं आता। इस स्थिति में मस्तिष्क को होने वाली रक्त की सप्लाई में भी कोई कमी नहीं आती। इसलिए वह स्वाभाविक रूप से कार्य करता रहता है और पीड़ित होश में ही रहता है। लेकिन रक्तस्राव बंद न होने पर पीड़ित की हालत बिगड़ने लगती है, नब्ज की गति बढ़ जाती है और रक्तदाब (ब्लडप्रेशर) गिरने लगता है। पीड़ित अधिक-से-अधिक मात्रा में ऑक्सीजन ग्रहण करने की कोशिश में हांफने लगता है। इसलिए पीड़ित कुछ समय तक सुस्त पड़ने की बजाय उत्तेजित अवस्था में रहता है।

     शरीर से कितनी मात्रा में रक्त निकल जाने पर शॉक की स्थिति पैदा होगी, यह पीड़ित व्यक्ति पर निर्भर करता है। पर सामान्यतः एक से दो लीटर के बीच रक्त निकल जाने पर ऐसा हो जाता है। यह भी जरूरी नहीं कि रक्तस्राव बाहरी हो। शरीर के किसी अंदरूनी अंग में चोट लगने के कारण होने वाले आंतरिक रक्तस्राव के कारण भी शॉक की स्थिति पैदा हो सकती है। इस प्रकार दुर्घटना-ग्रस्त व्यक्ति रक्तस्राव के किसी बाह्य संकेत के बिना भी, रक्त की कमी के कारण मर सकता है।

उपचार- प्राथमिक उपचारकर्ता को सबसे पहले यह जांच कर लेनी चाहिए कि पीड़ित की बिगड़ती अवस्था का कारण शॉक ही है या कुछ और। कभी-कभी तीव्र हृदय-पात (हार्ट-फेलियर) के फलस्वरूप भी पीड़ित की दशा ऐसी ही हो जाती है।

         पीड़ित को थोड़ा ध्यान से देखने पर, प्राथमिक उपचारकर्ता को वास्तविकता का पता आसानी से चल सकता है। ऐसा करना बहुत जरूरी होता है  क्योंकि दोनों स्थितियों के लिए दिए जानेवाले प्राथमिक उपचार एकदम अलग हैं। इसके साथ ही, तीव्र हृदय-पात से पीड़ित व्यक्ति को शॉक का या शॉक से पीड़ित व्यक्ति को हृदय-पात की प्राथमिक उपचार देने से उसकी हालत सुधरने की बजाय निश्चित रूप से बिगड़ सकती है।

          हृदय-पात परिसरीय परिसंचरण से नहीं बल्कि खुद दिल में गड़बड़ी होने के कारण पैदा होता है। हृदय-पात का सबसे साफ बाह्य लक्षण रक्ताधिक्य (कंजेशन) है। ऐसा होने पर रक्त परिसंचरण में रुकावट पैदा होने लगती है, जिसके फलस्वरूप शिराओं और कोशिकाओं में रक्त जमा होने लगता है।

          हृदय-पात में त्वचा पीली न होकर नीली हो जाती है, शिराएं उभर आती हैं और त्वचा के नीचे शरीर की अंतः कोशिका स्थलों में असामान्य रूप से द्रव जमा होने लगता है। इस दशा में त्वचा को अंगुली से दबाने पर उसमें गड्ढा पड़ जाता है।

          हृदय-पात की स्थिति में नब्ज के अनियमित हो जाने की संभावना होती है। फेफड़ों में अधिक मात्रा में रक्त जमा हो जाने के कारण द्रव वायुनली में जमा होने लगता है और पीड़ित द्वारा सांस लेने पर घड़घड़ाहट की आवाज उत्पन्न होती है।

          प्राथमिक उपचार का उद्देश्य है, शॉक की स्थिति पैदा न होने देने की कोशिश करना और अगर ऐसी स्थिति उत्पन्न हो जाए तो उसका तुरंत ही उपचार करना।

          अगर किसी घायल व्यक्ति की दशा शॉक के फलस्वरूप बिगड़ने लगे तो घाव से पहले, शॉक का प्राथमिक उपचार किया जाना चाहिए। लेकिन जब रक्तस्राव बहुत तेजी से हो रहा हो, तो पहले उसे रोकने की कोशिश करनी चाहिए। उपचार करते समय दिल की धड़कन बंद हो जाने और सांस में रूकावट की ओर सबसे पहले ध्यान देना जरूरी है।

          ठंडा मौसम होने और पीड़ित को ठंड लग जाने का खतरा होने पर उसे लिटाकर गर्मी पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए। उसके कपड़े गीले हो गए हों तो उन्हें उतार दें। पीड़ित के शरीर को कंबल इत्यादि गर्म कपड़ों से ढक दें। साथ ही उसके नीचे भी कोई कपड़ा (कंबल) बिछा दें। लेकिन ऐसा करते समय पीड़ित व्यक्ति को धीरे से, बिना झटके के, उठाएं। उसे पर्याप्त मात्रा में गर्मी पहुंचाने के लिए कंबलों के बीच अखबार बिछाया जा सकता है।

          पीड़ित को गर्मी पहुंचाते समय इस बात का ध्यान रखना बहुत जरूरी है कि उसे कभी भी गर्म पानी की थैली न दें। उसे आग के पास भी न ले जाएं। रक्त परिसंचरण की अव्यवस्था के कारण उसके अंग बहुत जल्दी जल सकते हैं। यहां इस बारे में एक बात पर ध्यान देना और जरूरी है कि पीड़ित व्यक्ति के लिए अधिक गर्माहट तथा किसी अंग की मालिश उसकी स्थिति को और ज्यादा बिगाड़ सकती है।

         अगर शॉक से पीड़ित व्यक्ति निगलने की स्थिति में हो तो उसे एक-दो घूंट पानी, चाय, कॉफी या नारियल का पानी दिया जा सकता है। लेकिन उसे किसी भी हालत में एल्कोहल न दें और न ही उसे जबरदस्ती कुछ पिलाएं। चाय या कॉफी देने से पीड़ित को गर्मी मिलने के साथ-साथ उसके शरीर में तरल पदार्थो की कमी की पूर्ति भी हो जाती है। उसकी छाती या पेट पर चोट लगी होने पर उसे कुछ भी पीने या खाने को न दें, क्योंकि इस दशा में उसका ऑपरेशन करने की जरूरत पड़ सकती है।

         पीड़ित के शरीर से अधिक रक्त बह जाने के कारण (उसके मस्तिष्क को होने वाली रक्त की सप्लाई में कमी हो जाने की आशंका होने पर) उसे बैठने या खड़े न होने दें। उसे लिटाकर, उसके पैरों को थोड़ा-सा ऊंचा कर दें। पैरों को ऊंचा करने के लिए, उसकी चापपाई या स्ट्रेचर को पैरों की ओर से थोड़ा ऊपर उठाने से भी काम चल सकता है।

         पीड़ित के घावों की पीड़ा उसकी बेचैनी को और अधिक बढ़ा देती है। इसके कारण शॉक की स्थिति बिगड़ सकती है। इसलिए उसकी पीड़ा कम करने के उपाय भी करने चाहिए। उसके घावों की मरहम-पट्टी करें। यदि उसकी कोई हड्डी टूट गई हो, तो उसका भी प्राथमिक उपचार करें। पीड़ित को पीड़ाहारी दवाइयां दी जा सकती है।

         उक्त उपचार करने के बाद, शॉक से पीड़ित व्यक्ति को जल्द से जल्द अस्पताल या चिकित्सक के पास ले जाना चाहिए, क्योंकि इस दौरान उसके शरीर में रक्त की कमी के बुरे प्रभाव उत्पन्न होने लगते हैं। उनके उपचार के लिए पीड़ित को रक्त चढ़ाने की जरूरत पड़ सकती है और यह कार्य प्राथमिक चिकित्सक नहीं कर सकता। इसे कुशल चिकित्सक ही कर सकता है। शॉक से पीड़ित व्यक्ति को ग्लूकोज का घोल चढ़ाने या ऑक्सीजन देने की भी जरूरत पड़ सकती है।

बिजली का झटका- बिजली का झटका लगने से भी शॉक की स्थिति उत्पन्न हो जाती है। आप जानते हैं कि बिजली का झटका जाने या अनजाने उस तार या वस्तु के संपर्क में आ जाने से लगता है, जिससे बिजली की धारा लीक हो रही हो। बिजली के घरेलू उपकरण, जैसे-प्रेस, हीटर इत्यादि में अनेक बार अर्थ के तार समुचित रूप से नहीं लगे होते। उनके संपर्क में आने पर अक्सर ही झटका लग जाता है।

          हमें झटका उसी समय लगता है जब बिजली की धारा हमारे शरीर में से प्रवाहित होकर जमीन (अर्थ) में पहुंच जाती है। झटके का प्रभाव नम परिस्थितियों में अधिक भंयकर और घातक हो सकता है। इसी प्रकार छाती में से प्रवाहित होने वाली हल्की धारा भी पैरों में से प्रवाहित होने वाली तेज धारा से कहीं अधिक नुकसानदायक हो सकती है।

          बिजली के झटके के परिणामस्वरूप शारीरिक अंग जल सकते हैं। झटके की तेजी के अनुसार जलने के घाव ऊपरी अथवा गहरे हो सकते हैं। तेज झटके के प्रभाव स्वरूप दिल घातक रूप से शक्तिहीन हो सकता है। श्वसन तंत्र की मांसपेशियों के शक्तिहीन हो जाने के फलस्वरूप श्वसन क्रिया अचानक रुक सकती है लेकिन सांस रुक जाने के बाद भी दिल अपना कार्य जारी रख सकता है।

         बिजली के झटका लगने पर सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति को उस स्थिति से दूर कर देना चाहिए जिसमें उसे झटका लगा हो या लग रहा हो। यदि वह अभी भी उस तार या उपकरण के संपर्क में हो जिससे उसे झटका लगा है, तो स्विच बंद करके या लाइन काटकर अथवा लकड़ी, रबर जैसी किसी कुचालक वस्तु की मदद से मरीज को तार या उपकरण से अलग कर देना चाहिए। ऐसा करते समय प्राथमिक उपचारकर्ता को खुद रबड़ के सोलवाले जूते पहन लेने चाहिए या लकड़ी के किसी सूखे पट्टे पर खड़ा हो जाना चाहिए नहीं तो उसे भी बिजली का झटका लग सकता है।

          बिजली के झटके के फलस्वरूप उत्पन्न शॉक की स्थिति में अगर पीड़ित सामान्य तरीके से सांस नहीं ले पा रहा हो या उसके हृदय की धड़कन बंद हो गई हो, तो सबसे पहले उसे कृत्रिम सांस देने की क्रिया शुरू करें और उसके दिल की धड़कन को दुबारा चालू करें। साथ ही उसकी छाती की मालिश भी करें। ये कार्य पीड़ित के हृदय की धड़कन और सांस सामान्य हो जाने तक या पीड़ित को चिकित्सक के पास पहुंचाने तक जारी रखें।

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