वात रोग (सन्धि वात)


वात रोग (सन्धि वात)

(RHEUMATISM)


परिचय :-

          गांठ को संस्कृत में ग्रंथि कहते हैं और हडि्डयों के जोड़ों को सन्धि कहते हैं। छोटे जोड़ों या छोटी गांठों की ग्रंथियों के दर्द को ग्रंथिवात या गठिया कहते हैं। हडि्डयों के बड़े जोड़ में दर्द होता है तो उसे सन्धिवात कहते हैं। अगर मांसपेशियों में दर्द हो तो उसे पेशिवात कहते हैं। ग्रंथिवात या गठिया अधिकतर भोग-विलास, अधिक मांस का सेवन करने एवं शराब का अधिक सेवन करने से होता है। इस रोग का मुख्य कारण है जोड़ों, गांठों, ग्रंथियों व छोटी संधियों में युरिक ऐसिड जमा होना। वात रोग दो प्रकार का होता है- सन्धिवात और पेशिवात।

सन्धिवात :-

          सन्धिवात रोग को 2 भाग में बांटा गया है- बच्चों का सन्धिवात तथा युवाओं का सन्धि वात। बच्चों का सन्धिवात जल्दी ठीक हो जाता है जिससे यह रोग पुराना नहीं होता। युवाओं का सन्धिवात दो प्रकार का होता है- नए और पुराने सन्धित वात। इस रोग में जोड़ों, गांठों तथा मांसपेशियों में दर्द होने की शिकायत होती है।

विभिन्न प्रकार का वात रोग :-

1. बच्चों का सन्धिवात

2. नए सन्धि वात

3. पुराना सन्धि वात

4. पेशीवात

5. गोनोरिया के कारण वात रोग

6. सिफिलिस के कारण वात रोग

विभिन्न औषधी से रोग का उपचार

1. बेलाडोना :-

  • बच्चों के सन्धिवात के ऐसे लक्षण जिसमें दर्द अचानक ही उठता है और फिर अपने आप समाप्त हो जाता है। इस तरह के सन्धिवात में सूजन आ जाती है, रोग गस्त अंग लाल व गर्म हो जाता है, उस पर जलन होती तथा छूने से दर्द होता है। हरकत करने से दर्द बढ़ता है। ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया या स्पाइजेलिया औषधि का प्रयोग करना उचित होता है। लेकिन इन लक्षणों के साथ यदि रोगी को तेज आवाज सूनने से परेशानी होती है, नींबू खाने के इच्छा होती है और नींबू खाने से रोग में आराम मिलता है, सिर गीला होने या बाल कटवाने से रोग बढ़ जाता है और यह दर्द कभी-कभी पूरे शरीर में फैल जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को बेलाडोना औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।
  • इस औषधि का विशेष प्रभाव रक्तरस वाली श्लैष्मिक झिल्लियों पर पड़ता है। रक्तरस वाली श्लैष्मिक झिल्लियां जहां-जहां होती है वहां-वहां जोड़ों में रक्तरस जमा होकर सूजन आ जाती है। ऐसे में सूजन वाले स्थान पर हरकत से दर्द होता है और रोगी को प्यास अधिक लगती है। ऐसे लक्षणों में ब्रायोनिया औषधि की 30 शक्ति देनी चाहिए। इस औषधि का प्रयोग प्लुरिसी या अन्य किसी अंगों के सन्धि रोग में भी किया जाता है।

2. ऐकोनाइट :-  ठंड लगने या ठंडी हवा के कारण सन्धिवात का तेज आक्रमण हुआ हो, बुखार 105 डिग्री तक पहुंच गया हो और बुखार के साथ त्वचा खुश्क हो गई हो, प्यास अधिक लगती हो, गाल लाल हो गया हो, पेशियों में तीर लगने की तरह दर्द होता हो एवं अंग सुन्न पड़ गए हों। ऐसे लक्षणों से पीड़ित बच्चे को ऐकोनाइट औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराना चाहिए। अगर वात रोग का हृदय पर आक्रमण हो, छाती पर भारीपन महसूस हो, नाड़ी कठोर और उछलती हुई हो, हृदय में बेचैनी के साथ धड़कन बढ़ गई हो, बेचैनी हो और रात को रोग बढ़ता हो तो इस तरह के लक्षणों में ऐकोनाइट औषधि का प्रयोग किया जाता है।

3. रस-टॉक्स :-

  • बच्चों के सन्धिवात रोग के ऐसे लक्षण जिसमें दर्द चलने-फिरने से कम होता है। दर्द होने के बाद भी रोगी हरतक करता रहता है। सन्धिवात के ऐसे लक्षणों में रस-टॉक्स औषधि का प्रयोग किया जाता है। यदि सन्धिवात में लंगड़ाने और हरकत से दर्द कम होता और बैठे रहने से कष्ट होता है तो रस-टॉक्स औषधि का प्रयोग करना हितकारी होता है। यदि सन्धिवात में बैठे रहने के बाद उठने पर दर्द होता है, सर्दी लगने, ठंडी हवा एवं हाथ-पैर, मुंह या नहाने से कष्ट बढ़ता है, इस रोग के कारण गर्दन मुड़ नहीं पाता या गर्दन अकड़ जाता है, ऐसे लक्षणों में रस-टॉक्स औषधि ही लेनी चाहिए।
  • रस-टॉक्स औषधि का सेवन उस रोगी को कराना चाहिए जिसके रोग के लक्षणों में हरकत करने और बरसात के कारण से वृद्धि होती है। इसमें डलकेमारा औषधि भी दिया जा सकता है।

4. कैमोमिला :-

  • अगर बच्चा सन्धिवात के दर्द से पीड़ित है और दर्द रात के समय बढ़ता है विशेषकर रात के शुरुआती समय में जिसके कारण बच्चा सो नहीं पाता और रोता रहता है। दर्द वाला स्थान सुन्न हो जाता है, अंगों में झटके लगने की तरह दर्द होता है, नींद नहीं आती, दर्द बिल्कु बर्दाश्त के बाहर हो जाता है जिसके कारण बच्चे को गोद में लेकर या ऐसे ही घूमाना पड़ता है। ऐसे लक्षणों में बच्चे को कैमोमिला औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराना चाहिए।
  • रोगी को दर्द बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता है, वह बदमिजाजी (चिड़चिड़ा) हो जाता है एवं गलत शब्दों का प्रयोग करता है। ऐसे लक्षणों में भी इस औषधि का सेवन करना लाभकारी होता है।

5. लीडम :- बच्चे को वात रोग के कारण से दर्द होता है और वह गर्म प्रकृति का हो, दर्द ठंड से शांत न हो, रात को बिस्तर की गर्मी से दर्द बढ़ गया हो जिसके कारण वह अंगों को ढकना नहीं चाहता हो। ऐसे बच्चों के इस रोग को ठीक करने लिए लीडम औषधि का सेवन कराना हितकारी होता है।

6. मर्क-सौल :- बच्चे को सन्धिवात रोग होने के साथ बदबूदार पसीना आता है और बच्चे को अधिक सर्दी या गर्मी दोनों ही बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता। रात को और बिस्तर की गर्मी से रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है। पसीना आता है परन्तु उससे आराम नहीं मिलता। ऐसे लक्षणों में बच्चे को मर्क-सौल औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।

7. सिमिसिफ्यूगा (ऐक्टि-रेसिमोसा) :-  पेशीवात रोग में यह औषधि विशेष रूप से प्रयोग की जाती है। गर्दन का वात रोग होने पर गर्दन अकड़ जाती है जिससे वह मुंड़ नहीं पाती। वात रोग के लक्षण दूर होने पर मानसिक लक्षण उत्पन्न होने लगते हैं। मानसिक रूप से कुछ करने या सोचने की शक्ति कम हो जाती है। ऐसे वात रोग के लक्षणों में सिमिसिफ्यूगा औषधि की 3 शक्ति का सेवन कराना हितकारी होता है। यदि रोगी ठंडी प्रकृति का हो और ठंड लगने या सीलन से रोग बढ़ता हो तो उसे यह औषधि देनी चाहिए।

8. पल्सेटिला :- यदि वात रोग का ऐसा दर्द जो एक अंग से दूसरे अंग तक घुमता रहता है। जोड़ों के पास ऐसा दर्द महसूस होता है जैसेकि जोड़ों के पास मोच आ गई हो, जोड़ सूज गए हों व लाल हो गई हो। रीढ़ की हड्डी और अन्य अंगों में दर्द होता है जो आराम करने से बढ़ता है और धीरे-धीरे इधर-उधर टहलने से कम होता है। बरसात या पैर गीले करने से दर्द बढ़ जाता है। गर्म कमरे में जाने से कष्ट बढ़ जाते हैं और ठंड से आराम मिलता है। इस तरह के लक्षणों में पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना लाभदायक होता है। इन लक्षणों के साथ यदि बच्चे में चिड़चिड़ापन, प्यास अधिक लगना एवं ऐसे खाने की चीजों की इच्छा करना जिसे वह ठीक से पचा नहीं पाता है। ऐसे लक्षण होने पर भी उसे पल्सेटिला औषधि का सेवन करना चाहिए।

9. मैगेनम :-  वात रोग में यदि घुटने की हड्डी में दर्द होता है। दर्द इतना तेज होता है कि रोगी को हल्का छुना भी बर्दाश्त नहीं होता है एवं त्वचा पर हाथ लगाते ही रोगी दर्द के मारे तड़प उठता है। अस्थि-परिवेष्टन एवं अस्थियों में तेज दर्द होता है। वात रोग का दर्द अंगों में घुमता रहता है, रोगग्रस्त अंगों को छुना सहन नहीं होता, शारीरिक हलचल एवं रात को कष्ट बढ़ जाता है। रोगी अपने शरीर का भार एडियों पर रखकर चल नहीं पाता इसलिए वह पंजों के बल चलने की कोशिश करता रहता है। वात दर्द में लेटने से आराम मिलता है। इस तरह के लक्षणों वाले वात के दर्द में मैगेनम औषधि की 3 से 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

10. नैट्रम-फॉस :-

  • यह औषधि वात रोग को ठीक करने के लिए सबसे उपयोगी होती है। पेशियां अकड़ गई हो, अंग भारी हो गए हों एवं दाईं कलाई व घुटने रोगग्रस्त हो गए हों तो नैट्रम-फॉस औषधि की 6x मात्रा का सेवन करना चाहिए। यह औषधि बच्चे के वात रोग में भी लाभकारी है। नए वात रोग में इस औषधि के सेवन करने से कुछ दिनों में आराम मिल जाता है।
  • अस्थि-परिवेष्टन और शारीरिक तंतुओं पर होने वाले किसी भी प्रकार के वात रोग में नैट्रम-फॉस औषधि का प्रयोग किया जा सकता है। यदि अम्लत्व के कारण खाना न पचता हो एवं खट्टी व बदबूदार डकारें आती हो तो भी इस औषधि का सेवन करना लाभदायक होता है।

11. नेजा :-  यदि कोई बच्चा वात प्रकृति का हो और उसकी मांसपेशियां कांपती हो एवं हृदय के अन्य परेशानी भी हो तो उसे नेजा औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन कराना चाहिए। यह औषधि उन बच्चों के वात रोग में भी लाभकारी है जिनमें हृदय रोग के हल्के लक्षण दिखाई पड़ते हैं। कंधों के बीच में दर्द के साथ हृदय के रोग हो तो उपचार के लिए इस औषधि का उपयोग करना लाभदायक होता है। अगर बच्चा वात रोग से पीड़ित हो और सोने पर गला खुश्क हो जाए तो उसे नेजा औषधि की 6 या 30 शक्ति देनी चाहिए।

12. कैलमिया :- यदि वात रोग में चलने-फिरने से दर्द बढ़ता है और दर्द नीचे से ऊपर की ओर फैलता है। दर्द कंधों, बाहों, उंगुलियों एवं जांघों से होते हुए टांगों तक फैल जाता है। स्नायुओं में तीर लगने या छुरा भोकने की तरह दर्द होता है। दर्द अपना स्थान हर समय बदलता रहता है और दर्द अचानक शुरू होता है और अचानक ही समाप्त हो जाता है। ऐसा दर्द जो शुरू होता है और अंत में हृदय को प्रभावित करता है जिससे हृदय की धड़कन बढ़ जाती है, धड़कन इतनी तेज होती है की उसकी आवाज सुनाई देने के साथ हृदय के पास कंपन होते हुए देखा जा सकता है। कभी-कभी हृदय की धड़कन कम हो जाती है। इन लक्षणों में से कोई भी लक्षण हो तो कैलमिया औषधि के मूलार्क या 6 शक्ति का सेवन कराना लाभकारी होता है। इस औषधि के प्रयोग से वात रोग के अन्य दर्द में भी आराम मिलता है।

13. आराम-मेट :- यदि वात रोग का दर्द हर समय अपना स्थान बदलता हो, दर्द एक जोड़ से दूसरे जोड़ तक घुमता हुआ अंत में हृदय में जाकर रुक जाता हो। दर्द के कारण रोगी लेट न पाता हो और आगे की ओर झुककर बैठने से दर्द में आराम मिलता हो। इस रोग में गले की नसें धक-धक करती हुई महसूस होती है। रोगी का चेहरा नीला, बदरंग हो जाता है, वह हांपने लगता है, सांस लेने में कठिनाई होती, मुंह खोलकर सांस लेता है, मुंह से हल्की आवाजें निकलती रहती है, अधिक पसीना आता है एवं टांगें व पैर सूज जाते हैं। वात रोग के साथ उत्पन्न इन लक्षणों में ऑरम-मेट औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी होता है।

14. स्पाइजेलिया :-

  • वात रोग के साथ हृदय रोग होने पर इस औषधि का प्रयोग किया जाता है। हृदय की धड़कन इतनी तेज हो जाती है कि धड़कन की आवाज साफ सुनाई देती है एवं उसका कंपन साफ दिखाई देता है। हृदय में दर्द होने के कारण रोगी बाईं करवट सो नहीं पाता और दाईं करवट सोने पर भी सिर ऊंचा करके सोना पड़ता है। छाती में दर्द रहने के कारण रोगी चुप-चाप बिना हिले-डुले लेटा रहता है। छाती में ऐसा दर्द होता है जैसे छुरा भोंक दिया हो। हृदय में इतना तेज दर्द होता है कि उसे बर्दाश्त करना मुश्किल हो जाता है। हृदय में गर्म सुई चुभोने की तरह दर्द होता है या गर्म तार भोंकने की तरह दर्द होता है। ऐसे दर्द में रोगी को स्पाइजेलिया औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन कराने से आराम मिलता है।
  • यदि इस तरह के लक्षण किसी ऐसे रोगी में है जो शीत प्रकृति का हो और उसका रोग इन कारणों से बढ़ता हो जैसे- ठंडी या नमी को बिल्कुल बर्दाश्त न कर पाना, झुक न सकना, हिल-डुल न सकना, तेज आवाज या शोर को बिल्कुल बर्दाश्त न कर पाना एवं नोकदार चीजों से डरना आदि। इस तरह के वात रोग के साथ उत्पन्न हृदय के दर्द व अन्य लक्षणों में स्पाइजेलिया औषधि की 6 या 30 शक्ति का उपयोग करना अधिक लाभदायक होता है।

15. पैरोटिडीनम :- वैसे तो इस औषधि का प्रयोग बहुमूत्र रोग में किया जाता है परन्तु कभी-कभी इसका प्रयोग जोड़ों के दर्द को ठीक करने के लिए भी किया जाता है। यदि कोई रोगी वात रोग से पीड़ित है और उसमें बहुमूत्र रोग के लक्षण भी है तो उसे पैरोटिडीनम औषधि की 30 शक्ति दी जाती है। इस औषधि का सेवन 6-6 घंटों के अंतर पर करना चाहिए।

16. युवावस्था के नए सन्धिवात या सन्धिवात ज्वर :- वात रोग के नई अवस्था में सूजन होती है, बुखार होता है, जोड़ों में दर्द होता है और रोगी में बेचैनी के लक्षण दिखाई देते हैं।

17. मर्क-सौल :- वात रोग में जोड़ों का सूज जाना, दर्द होना, अधिक पसीना आना और पसीना से कष्टों का बढ़ना आदि लक्षण रोगी में दिखाई पड़ते हैं। अधिक मात्रा में बदबूदार पसीना आता है, कभी-कभी चिकना बदबूदार पसीना आता है, मुंह से बदबू आती है, प्यास अधिक लगती है, रात को रोग के लक्षणों में वृद्धि होती है, एवं रोगग्रस्त अंगों में ठंड महसूस होने के साथ दर्द होता है, बिस्तर में लेटते ही दर्द बढ़ जाता है। हृदय के परिवेष्टन में किसी प्रकार की समस्या हो सकती है, जिस अंग में वात का दर्द होता है उसमें ठंडी हवा सी चलती हुई महसूस होती है। इस तरह के लक्षणों में मर्क-सौल औषधि की 30 शक्ति प्रयोग किया जाता है।

18. सल्फर :- अगर वात रोग के दर्द में ऐकोनाइट औषधि का सेवन करने के बाद रोग में लक्षण में रात के समय में या गर्मी से हो, दिन के 11 बजे के आस-पास रोगी को पेट धंसा हुआ अनुभव होता हो तो ऐसे लक्षणों में रोगी को सल्फर औषधि की 30 शक्ति हर 3 से 4 घंटे के अंतर पर सेवन करना चाहिए। इस औषधि के प्रयोग से रोग के लक्षणों में कमी होते दिखाई दें तो औषधि का सेवन बंद कर दें।

19. ऐकोनाइट :- सर्दी लगने या सूखी हवा लगने से जोड़ों में सूजन आ गई हो, तेज दर्द होता हो, अंगों में कीड़े चलने की तरह अनुभव होता हो, सुन्नपन महसूस होता हो, असहनीय दर्द होता हो, तेज बुखार हो, सूजन वाली जगह गहरे चमकदार लाल रंग के हो गए हो, छुना बिल्कुल बर्दाश्त नहीं होता एवं रात को कष्ट बढ़ने लगते हैं। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ऐकोनाइट औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराना लाभदायक होता है।

20. ब्रायोनिया :-

  • अगर ऐकोनाइट औषधि का सेवन करने के बाद भी जोड़ों का दर्द हल्की सी हरतक करने से बढ़ जाएं, रोगी हिलते ही कराह उठे, शांत पड़े रहने से आराम मिले, रोगी किसी से बात नहीं करना चाहता, ठंडा पसंद करता है, मल काले रंग का आता है, कब्ज रहती है, पसीना आता है और पसीने से आराम मिलता है, सूई चुभने की तरह दर्द होता है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी को ब्रायोनिया औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराएं। यह औषधि वात रोग में सही क्रिया करके रोग को ठीक करती है।
  • यह औषधि फेफड़ों के परिवेष्टन, हृदय परिवेष्टन एवं मस्तिष्क परिवेष्टन पर विशेष रूप से क्रिया करती है और रक्तस्राव होने एवं हरकत से दर्द बढ़ने आदि को दूर करती है।

21. कैलकेरिया कार्ब :- अगर सिर गर्म हो, सिर पर पसीना आए, हाथ-पैर में चिपचिपा पसीना आए, सुबह 3 बजे रोगी पसीना से बिल्कुल तर हो, स्नान करने, पानी में काम करने तथा हरकत करने से रोग बढ़ता हो तो उसे कैलकेरिया कार्ब औषधि की 30 शक्ति से उपचार करना चाहिए।

22. रस-टॉक्स :- अगर रोगी बेचैन रहता है, शांत बैठने से दर्द होता है और बैठने से उठने पर भी दर्द होता है परन्तु चलने-फिरने से दर्द में कुछ आराम मिलता है। सर्दी, बरसात से कष्ट बढ़ने लगते हैं, शरीर की पेशियों में दर्द रहता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी के लिए रस-टॉक्स औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना हितकारी होता है। बरसात के कारण दर्द बढ़ने पर कॉस्टिकम, रोडोडेन्ड्रमन, डलकेमारा आदि औषधि का सेवन करने से ये लक्षण दूर होते हैं।

23. ऐक्टिया रेसिमोसा (सिमिसिफ्यूगा) :-  यदि वात रोग में पीठ, गर्दन के पीछे एवं आंखों में दर्द हो। जोड़ों में दर्द हो, सूज जाए एवं गर्म हो जाए। मांसपेशियों में दर्द हो और रोगी अपने जीवन से निराश हो तो उसे ऐक्टिया रेसिमोसा औषधि की 3 शक्ति का सेवन कराना चाहिए। यह औषधि रोगी के आत्मविश्वास को बढ़ाती है और दर्द आदि को दूर करके रोग को ठीक करती है।

24. स्टेल्लेरिया मीडिया :- वात रोग का ऐसा दर्द जो शरीर के सभी अंगों में घुमता रहता है। शरीर के किसी भी अंग में बेंधने की तरह दर्द होता है, जोड़ कड़े हो जाते हैं और जोड़ को हिलाने व छुने से दर्द होता। उंगुलियों के जोड़ों में सूजन आ जाती है। इस रोग में दर्द पीठ, गुर्दे के ऊपरी भाग, नितम्ब, जांघ, कंधे एवं बाहों में घुमता रहता है। वात रोग के ऐसे दर्द को ठीक करने के लिए स्टेल्लेरिया मीडिया औषधि की 2x मात्रा का सेवन हर 2 घंटे के अंतर पर करना चाहिए।

25. नक्स-वोमिका :- यदि वात के दर्द के साथ पूरे शरीर में जलन हो विशेषकर चेहरा गर्म व लाल हो जाता है। शरीर गर्म होने के बाद भी रोगी को ठंड लगती है या रोगी को कभी ठंडी लगती है और कभी गर्मी लगती है। शाम को बुखार आता है जो सुबह के समय बढ़ जाता है। पीठ के दर्द में रोगी लेट-लेटे करवट नहीं ले पाता, करवट लेने के लिए रोगी पहले उठकर बैठता है और फिर करवट बदलता है। वात रोग के इस तरह का आक्रमण विशेष रूप से बड़े जोड़ों और पेशियों पर होता है। दर्द के कारण रोगी हिल-डुल नहीं सकता है, ठंड बर्दाश्त नहीं होता, गर्मी अच्छा लगता है और रोगी का स्वभाव चिड़चिड़ा हो जाता है। ऐसे लक्षणों में नक्स-वोमिका औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है।

26. पल्सेटिला :- यदि वात रोग में दर्द घुटनों, गिट्टों, हाथ-पैर के छोटे जोडों में होता है और दर्द अपना स्थान बदलता रहता है। दर्द कभी तेज होता है और कभी कम। गर्म प्रकृति वाले रोगी में दर्द जितना बढ़ता है उतना ही सर्दी लगती है। इस रोग में रोगी कपड़ा ओढ़ना पसंद नहीं करता है एवं उसे ठंडा पानी व ठंडी खुली हवा अच्छी लगती है। रोगी का स्वभाव बदलता रहता है, वह कभी हंसता है और कभी रोता है। रोगी का चेहरा सूख जाता है और प्यास अधिक लगती है। इस तरह के लक्षणों से पीड़ित रोगी के लिए पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का उपयोग करना लाभकारी होता है।

27. कैलमिया और लीडम :- अगर वात रोग में बांया हाथ सुन्न हो गया हो और उसमें कुछ रेंगने की तरह अनुभव हो, कोहनी से आगे की स्नायु में दर्द हो, तर्जनी उंगुली में दर्द हो, दर्द कूल्हों से शुरू होकर घुटने और पैर तक फैलता हो। दर्द अचानक अपना स्थान बदलता हो। रोगी को बुखार नहीं होता परन्तु हृदय के रोग से इसका सम्बंध होता है। इस तरह वात रोग के लक्षणों में कैलमिया और लीडम औषधि का उपयोग करना चाहिए।

28. आर्सेनिक :- वात रोग से पीड़ित रोगी को गर्मी अच्छी लगती है क्योंकि गर्मी से उसे आराम मिलता है। वात का दर्द नियमित समय पर आता है और फिर अपने आप चला जाता है। दर्द हमेशा अपने निश्चित समय पर ही उत्पन्न होता है। आधी रात के समय दर्द तेज हो जाता है। रोगी शारीरिक व मानसिक रूप से बेचैन रहता है। रोगी में घबराहट और शक्तिहीनता के लक्षण भी दिखाई देते हैं। इस तरह के वात रोग के लक्षणों में रोगी को आर्सेनिक औषधि की 30 या 200 शक्ति का सेवन कराना हितकारी होता है।

29. बेनजोइक ऐसिड :- अगर रोगी के पेशाब से घोड़े के पेशाब की तरह बदबू आती हो तो उसे बेनजोइक ऐसिड औषधि की 3 से 6 शक्ति का सेवन करना चाहिए। इस औषधि की क्रिया बदबू को दूर करने में लाभकारी है।

30. लैक कैनाइनम :- जोड़ों का ऐसा दर्द जो हमेशा अपना स्थान बदलता रहता है। दर्द दाएं गिट्टे से बाएं और बाएं गिट्टे से दाएं गिट्टे तक आता जाता रहता है। इस तरह के वात दर्द को दूर करने के लिए लैक-कैनाइनम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना हितकारी होता है।

31. युवाओं का जीर्ण (पुराना) सन्धिवात :- वात रोग में यदि जोड़ें में सूजन न हो, रोगी को बुखार न हो, जोड़ों में दर्द रहता हो और दर्द बराबर बना रहता हो तो उसे पुराने सन्धिवात रोग कहते हैं। वात रोग को पुराना होने से रोकने के लिए नए वात रोग के समय ही सूजन को कड़े होने से रोकना चाहिए। इसके लिए रोगी को व्यायाम करना चाहिए, हिलते-डुलते और कार्य करते रहना चाहिए। सूजन को गर्म रखना चाहिए और हो सके तो उस पर मलहम लगना चाहिए। कैपसिकम औषधि के टिंचर तथा ग्लिसरीन को बराबर भाग में लेकर दिन में 3 बार सूजन पर लगभग 15 मिनट तक मलने से दर्द व सूजन दूर हो जाती है।

32. मेडोराइनम :- गोनोरिया के कारण नए या पुराने सन्धिवात उत्पन्न होने पर जोड़ों में या पेशियों में दर्द हो और दर्द दिन में बढ़ जाता हो व रात को कम होता हो। एक साथ कई जोड़ों में दर्द उत्पन्न होता हो और अंत में एक जोड़ पर दर्द रुक जाता हो। दर्द के साथ सूजन हो जो कठोर हो गया हो। हाथ-पैर में जलन होती हो और गर्मी और जलन के कारण रोगी पैरों को बिस्तर से बाहर निकाल कर रखना चाहता हो। ऐसे सन्धिवात के रोग में मेडोराइनम औषधि की 200 शक्ति से उपचार करना हितकारी होता है।

33. कारसिनोसीन :- पुराने सन्धिवात के रोग में नोसोड्स देने से लाभ मिलता है। इस औषधि का सेवन हर 10 दिनों पर करने से पुराने सन्धिवात रोग में लाभ होता है।

34. ट्यूबर्क्युलीनम (बैसीलीनम) :- यदि किसी को सन्धिवात रोग उसके परिवार के माता-पिता या किसी अन्य लोगों के द्वारा हुआ हो तो उसे ठीक करने के लिए ट्युबर्क्युलीनम (बैसीलीनम) औषधि की 200 शक्ति का सेवन करना चाहिए।

35. थूजा :- एड़ियों में दर्द हो, घुटनों के जोड़ों में दर्द हो और रात को अधिक पसीना आता हो। शरीर से बदबू-दार व दाग लगने वाला पसीना आता हो। पूरी रात पसीना आता रहता है केवल 2 से 3 बजे के बीच पसीना आना बंद होता है। इस तरह के लक्षणों में रोगी को थूजा औषधि देनी चाहिए। यदि शरीर के केवल खुल हुए अंगों में पसीना आता हो और ढके हुए अंगों में पसीना न आता हो तो भी इस औषधि का प्रयोग करना उपयोगी है। यदि रोगी को चलते हुए ऐसा महसूस होता है जैसेकि पूरा शरीर कड़ा हो गया है और यदि चले तो अंग टूटकर गिर जाएगें।

आयोडम :-

          जोड़ इतने कड़े हो जाते हैं कि हिला-डुला भी नहीं जा सकता। जोड़ों के आस-पास के तंतु मोटे तथा कड़े हो जाते हैं। रात को जोड़ों तथा हड्डियों में दर्द होता है। गोनोरिया के कारण पुराना संन्धिवात हो जाता है। हाथ-पैर ठंडा हो जाता है, पैरों से जलनयुक्त पसीना आता है। इस तरह के सन्धिवात रोग के लक्षणों में आयोडम औषधि की 3 शक्ति का सेवन करना चाहिए।

1. कैलि-आयोडाइड :-  रात को हड्डियों में तेज दर्द हो विशेषकर घुटने के नीचे की हड्डी में। यदि रोगी कूल्हें में दर्द होने के कारण लंगड़ाकर चलता हो तो ऐसे रोगी के इस रोग को ठीक करने के लिए कैलि-आयोडाइड औषधि की 30 शक्ति का उपयोग हर 4 घंटे के अंतर पर करना चाहिए। यह औषधि शियाटिका के दर्द में भी उपयोगी है। यदि रोगी को दर्द रात के समय में बढ़ जाता हो और जिसके कारण करवट लेकर सोना भी मुश्किल हो जाता हो तो ऐसे दर्द को दूर करने के लिए भी इस औषधि का सेवन करना लाभदायक होता है।

2. बरबरिस :-  कंधों, बाहों, हाथों, उंगुलियों, टांगों व पैरों आदि के पुराने सन्धिवात में बर्बेरिस औषधि की 6 शक्ति का प्रयोग किया जाता है। उंगुलियों के नाखून के नीचे ऐसा दर्द होता है जिसमें उंगुलियों के जोड़ों में सूजन आ जाती है। ऐसे दर्द में इस औषधि का सेवन करने से दर्द में आराम मिलता है। इस औषधि का प्रयोग सन्धिवात रोग के साथ पेशाब के रोग होने पर भी किया जाता है।

3. कैलि-बाईक्रोम :- सन्धिवात का ऐसा दर्द जो हमेशा एक स्थान पर टीक कर नहीं रहता है बल्कि बार-बार अपना स्थान बदलता रहता है। दर्द हड्डियों के साथ चलता-फिरता है। इस तरह के दर्द को ठीक करने के लिए कैलि-बाईक्रोम औषधि की 3x या 30 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है। यह औषधि सिफिलिस के कारण होने वाले पुराने सन्धिवात रोग में भी लाभकारी होता है।

4. कॉलोफाइलम :-  हाथ-पैर की उंगुलियों के जोड़ों में दर्द होने पर कॉलोफाइलम औषधि की 3 शक्ति का उपयोग किया जाता है। कलाई के जोड़ों का दर्द और हाथ बंद करते हुए पोरों में दर्द होने पर भी इस औषधि का प्रयोग करने से लाभ मिलता है।

5. कोलचिकम :-  बाएं हाथ के नीचे तथा दाएं अस्थि-फलक के नीचे के कोन में दर्द होता है। गर्मियों में काटने की तरह दर्द होता है और सर्दियों में सुई चुभने की तरह दर्द होता है। गर्मी में सर्दियों के अपेक्षा कम दर्द होता है। सर्दी के मौसम में तथा रात के समय रोग बढ़ जाता है। भोजन के गंध से या भोजन को देखकर ही रोगी का जी मिचलाने लगता है एवं रोगी रसोई के गंध को भी बर्दाश्त नहीं कर पाता। इस तरह के लक्षणों में कोलचिकम औषधि की 3 शक्ति का सेवन करने से रोग ठीक होता है। यदि इस औषधि का प्रयोग हृदय के रोग में करना हो तो इसकी 30 या 200 शक्ति का प्रयोग करें।

6. लाइकोपोडियम :-  वात रोग का ऐसा दर्द जो दाईं से बाईं की तरफ फैलता है। इस तरह के दर्द में लाइकोपोडियम औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से दर्द में आराम मिलता है।

7. चिनिनम सल्फर या कैलकेरिया फॉस :-

  • सन्धिवात रोग होने के बाद रोगी में आई कमजोरी को दूर करने के लिए इन दोनों औषधियों का प्रयोग किया जाता है। कमजोरी को दूर करने के लिए चिनिनम सल्फर 3x या कैलकेरिया फॉस 3x का सेवन करना चाहिए।
  • युवाओं के सन्धिवात रोग को ठीक करने के लिए प्रयोग ली जाने वाली औषधियों के अतिरिक्त कुछ अन्य औषधि जिनका बीच-बीच में प्रयोग करने से अधिक लाभ मिलता है वे इस प्रकार हैं- सल्फर, कैलकेरिया कार्ब, ब्रायोनिया, बेनजोइक ऐसिड, मर्क-सौल, रोडोडेन्ड्र, डलकेमारा या कैलि-बाईक्रोम आदि।

पेशी वात (मस्कुलर रिहयूमेटिसम) :-

1. ऐकोनाइट :- सर्दी लगने के कारण गर्दन अकड़ जाए तो ऐकोनाइट औषधि की 30 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है। यह औषधि पेशियों पर सही क्रिया करके अकड़न को दूर करती है।

2. मैक्रोटीन :- अगर मांसपेशियों में तेज दर्द हो तो मैक्रोटीन औषधि की 6x का सेवन 0.12 ग्राम के मात्रा में करें। इसके प्रयोग से पेशी के दर्द में आराम मिलता है।

3. आर्निका :- यदि मांसपेशियों में तेज दर्द के साथ अकड़न आ गई हो तो आर्निका औषधि की 1m शक्ति का उपयोग करें।

4. मर्क-सौल :- पीठ में रगड़ लग जाने की तरह दर्द होता है और शरीर शिथिल एवं कमजोर महसूस होता है। शरीर में कंपन होती है और दर्द सोने के समय बढ़ जाता है। ऐसे लक्षणों में रोगी को मर्क-सौल औषधि की 6 या 30 शक्ति का सेवन करना चाहिए।

गोनोरिया के कारण वात रोग उत्पन्न होना (गोनोर्रिया रिहयूमेटिसम) :-

1. मैडोराइनम :- अगर गोनोरिया में दवाइयों का प्रयोग करने से रोग दब जाने के कारण वात रोग हुआ हो तो मैडोराइनम औषधि की 200 शक्ति का सेवन करें। ध्यान रखें कि इस औषधि के प्रयोग से दबे हुए गोनोरिया रोग पहले उत्पन्न होगा और फिर गोनोरिया एवं वात रोग ठीक होगा।

2. मर्क-सौल :- यदि ऐकोनाइट औषधि सेवन करने के बाद जोड़ों में दर्द हुआ हो और पसीना आता हो एवं गोनोरिया का स्राव होता हो तो ऐसे वात रोग में मर्क-सौल औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से रोग ठीक होता है।

3. ऐकोनाइट :- अगर तेज दर्द हो, बुखार हो, बेचैनी हो और रोगी अधिक परेशान रहता हो तो उसे ऐकोनाइट औषधि लेनी चाहिए।

4. अर्जेन्टम-नाइट्रिकम :- गोनोरिया रोग से वात रोग होने पर जोड़ों में सूजन आ गई हो जिससे दर्द होता हो, पेट में गैस बनती हो एवं पेट का अन्य रोग उत्पन्न हो गया हो तो ऐसे लक्षणों को दूर करने के लिए अर्जेन्टम-नाइट्रिकम औषधि की 3 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।

5. सार्सापैरिला :- पेशाब करने के बाद तेज दर्द होने के लक्षण में सार्सापैरिला औषधि की 6 शक्ति का सेवन करना लाभकारी होता है।

6. पल्सेटिला :-  गोनोरिया दब जाने के कारण जोड़ों में दर्द हो और दर्द हमेशा चलता-फिरता रहता हो तो पल्सेटिला औषधि की 30 शक्ति का सेवन करने से दर्द में आराम मिलता है।

7. थूजा :- यदि गोनोरिया के कारण वात रोग हुआ हो और वह अन्य औषधियों से जल्दी से ठीक न हो तो उस औषधि के साथ थूजा औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग बीच-बीच में करना चाहिए। इस औषधि का प्रयोग 8-8 घंटे के अंतर पर करना चाहिए। इसके प्रयोग से यदि साइकोसिस दोष के कारण लाभ न हो रहा हो तो वह दोष दूर होकर रोग ठीक हो जाता है।

8. सल्फर :-

  • अगर रोगी को त्वचा का रोग हो और यह सोरा दोष के कारण उत्पन्न हुआ हो तथा कई प्रकार की औषधियों से उपचार करने के बाद भी लाभ न मिल रहा हो तो बीच-बीच में सल्फर औषधि की 30 शक्ति का प्रयोग करना चाहिए।
  • ध्यान रखें कि रोग को ठीक करने के लिए आप जिस औषधि का प्रयोग कर रहें हैं उस औषधि को देने से दो दिन पहले और दो दिन बाद अन्य औषधि न लें।

उपदंश के कारण उपत्पन्न वात रोग (सिफिलिटिक रिहयूमेटिसम) :-

1. स्टिल्लिजिया :-  अस्थि-परिवेष्टन में दर्द अगर वात रोग के कारण हो तो उसे स्टिल्लिजिया औषधि की 1 शक्ति का सेवन 6-6 घंटे के अंतर पर करें। यदि रोगी को सिफिलिस (उपदंश) हुआ हो तथा गले की ग्रंथियां बढ़ी हुई हो तो उपचार के लिए इस औषधि की 1 शक्ति का प्रयोग करना लाभकारी है।

2. कैलि-आयोडाइड :-  उपदंश के कारण या पारा औषधि का सेवन करने के कारण यदि अस्थि-परिवेष्टन की हड्डियों की ऊपरी परत में दर्द हो तो रोगी को कैलि आयोडाइड औषधि की 30 शक्ति हर 6-6 घंटे के अंतर पर सेवन करना चाहिए।

3. सिफिलीनम (लुएटिकम) :- यदि वात का दर्द शाम से सुबह तक बना रहता हो तो ऐसे में सिफिलीनम औषधि की 200 शक्ति दिन में 3 से 4 बार सेवन करने से दर्द में आराम मिलता है।

4. कैलि-बाईक्रोम :- अगर हड्डियों पर सूजन आ जाए तो उपचार के लिए कैलि-आईक्रोम औषधि की 3x या 30 शक्ति का सेवन करें। इसके सेवन से सूजन दूर होती है और दर्द से आराम मिलता है।

5. ऑरम-मेट :- अगर रोगी में उपदंश से सम्बंधित लक्षण हो, वह अधिक हताश व निराश रहता हो एवं रोग के लक्षण शाम से सुबह तक बढ़ा रहता हो तो ऐसे लक्षणों में रोगी को मर्क-सौल औषधि दें। यदि इससे लाभ न हो तो ऑरम मेट औषधि की 30 शक्ति का सेवन कराएं।

6. फाइटोलैक्का :- फाइटोलैक्का औषधि का प्रयोग वात रोग के साथ हड्डियों में सूजन आ जाने पर किया जाता है। इस औषधि का प्रयोग 3 शक्ति के रूप में सेवन करने से लाभ मिलता है।

वात रोग में सर्दी-गर्मी के लक्षणों के आधार पर औषधियों से उपचार :-

  • यदि गर्मी से वात रोग बढ़ता हो तो इन औषधियों को लेना उचित होता है जैसे- ब्रायोनिया, पल्स, थूजा, लीडम, फॉस तथा फाइटो आदि।
  • अगर गर्मी से आराम मिलता हो तो ऐसे में आर्स, लाइको, मर्क, कॉस्टि, कोलचि, कोलोसि, नक्स, रस या सल्फर आदि औषधियों में से कोई भी औषधि का सेवन कर सकते हैं।
  • वात रोग यदि तर मौसम, ठंडी हवा या सर्दी लगने से बढ़ता हो तो पल्सेटिला या लीडम औषधि का सेवन करना लाभदायक होता है।
  • अगर ठंड से वात रोग में आराम मिलता हो तो कॉस्टिकम, हिपर, ऐकोनाइट, ब्रायो या नक्स आदि औषधि का सेवन करना चाहिए।
  • सूखी ठंडी हवा या सर्दी से वात रोग का दर्द या अन्य लक्षण बढ़ते हों तो इन औषधियों का प्रयोग करें- कॉस्टि, हिपर, ऐसरम, ब्रायो, कैलि-कार्ब व नक्स आदि।
  • अगर वात रोग में नमी से आराम मिलता हो और गर्मी से दर्द बढ़ता हो तो कॉस्टि, हिपर, ऐसरम, ब्रायो, कैलि-कार्ब, स्पंजिया नक्स या सीपिया आदि औषधियों में से कोई भी औषधि प्रयोग किया जा सकता है।
  • यदि वात रोग तर से बढ़ता हो तो पल्स या वेरेट्रम औषधि का उपयोग करना चाहिए।
  • यदि तर या गर्मी से दर्द में आराम मिलता हो तो कॉस्टिकम, हिपर या नक्स औषधि का प्रयोग करना उचित होता है।
  • वात रोग का दर्द चलने-फिरने या अन्य शारीरिक हलचल से बढ़ता हो तो कैमोमिला, रस टॉक्स, डल्के, रोडो, पल्स औषधियों में से कोई भी औषधि प्रयोग किया जा सकता है।
  • यदि चलने-फिरने से वात रोग में दर्द हो तो ऐसे दर्द के लक्षणों को ठीक करने के लिए कैलमिया, लैक-कैन, पल्स या कैलि-वाई आदि औषधि का उपयोग करना चाहिए।
  • वात रोग में यदि दर्द हो और रोगग्रस्त अंग सुन्न पड़ गए हो तो इन औषधियों का प्रयोग किया जाता है- ऐकोनाइट, कैमोमिला या पल्सेटिला आदि।
  • यदि तेज व कड़े आवाज सूनने से कष्ट बढ़ता हो तो उसे आर्निका, बेल, लीडम, नक्स, ब्रायोनिया, हिपर या रस टाक्स औषधियों में से कोई एक औषधि का उपयोग किया जा सकता है।
  • वात रोग का दर्द यदि छूने से बढ़ता है तो ऐसे दर्द को ठीक करने के लिए इन औषधियों का प्रयोग किया जा सकता है- बेल, ब्रायो, आर्निका, कैमे, कोलचि, मेडो, नक्स, हिपर, लीडम, पल्स, रोडो या रस-टॉक्स औषधि आदि।

औषधियों से रोग का उपचार करने के साथ ही कुछ परहेज :-

1. यदि मौसम परिवर्तन के कारण वात रोग बढ़ता हो या कम होता हो तो निम्न औषधियों का उपयोग न करें- रैननक्युलस, बल्ब, डलकेमारा, नक्स-मौस, रोडो, रस-टॉक्स, ट्युबर्क्यू तथा साइलीशिया आदि।

2. यदि बरसात या तर मौसम में वात रोग के लक्षणों में वृद्धि न हो तो इन औषधियों का प्रयोग न करें- केलकेरिया, मर्क-सौल, नैट्रम-सल्फ और रूटा आदि।

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