वसा का चयापचय


वसा का चयापचय

(Metabolism of fat)


        वसाएं पाचन नली में पहुंचते ही लाइपेज और अग्न्याशय रस द्वारा वसीय अम्लों (fatty acids) और ग्लिसरॉल (glycerol) में विघटित हो जाती है। ये पदार्थ छोटी आंत में मौजूद अंकुरों (villi) से अवशोषित होकर उनके अंदर स्थित लसीका वाहिकाओं या लैक्टीयल्स (lacteals) में पहुंचकर उनकी लसीका में मिल जाते हैं। यहां से ये लिम्फेटिक तन्त्र की थॉरेसिक वाहिका (thoracic duct) द्वारा रक्त-प्रवाह में पहुंच जाते हैं और फिर पोर्टल शिरा द्वारा जिगर में पहुंच जाते हैं। रक्त में परिसंचरित वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल शरीर की हर कोशिका में पहुंच जाते हैं और अंगों तथा ग्रंथियों द्वारा शक्ति प्रदान करने में तथा उनके कुछ स्रावों के संश्लेषण में उपयोग हो जाते हैं। जिगर में पहुंचे कुछ वसीय अम्ल और ग्लिसरॉल ऊर्जा तथा ऊष्मा प्रदान करने में प्रयोग कर लिए जाते हैं तथा बाकी का जिगर में ऑक्सीकरण होकर विसंतृप्तिकरण (desaturation) हो जाता है।

     विसंतृप्त (डीसेचुरेटेड) वसा अंतःऊतकों में जमा हो जाता है। ऊतकों में ऑक्सीकरण-प्रक्रिया होती है, जिसके फलस्वरूप ऊर्जा तथा ऊष्मा पैदा होती है और कार्बन डाइऑक्साइड एवं जल पैदा होते हैं। ऊर्जा शारीरिक कार्यों को करने में उपयोग होती है, ऊष्मा शरीर के तापमान को सामान्य बनाए रखती है, कार्बन डाइऑक्साइड और जल फेफड़ों, त्वचा और गुर्दों द्वारा शरीर से बाहर निकल जाते हैं। वसा का बाकी भाग (जिसकी शरीर के लिए तुरंत जरूरत नहीं पड़ती), वसीय ऊतकों के रूप में त्वचा के नीचे जमा हो जाता है।

     वसा युक्त भोजन के अलावा अगर प्रोटीन और कार्बोहाइड्रेट्स को शरीर की जरूरत से अधिक मात्रा में लिया जाता है तो इनसे भी वसा का संश्लेषण होकर यह वसीय ऊतकों में जमा हो जाती है।

     वसा के अंतर्वर्ती चयापचय की क्रिया में ग्लिसरॉल आसानी से ग्लाइकोजन में बदल जाता है तथा वसीय अम्ल का ऑक्सीकरण हो जाता है। इसके फलस्वरूप पैदा हुई कार्बन डाइऑक्साइड और जल बेकार पदार्थों के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यदि ऑक्सीकरण पूरा न हुआ हो तो कीटोन बॉडीज (Ketone bodies) बनती हैं, जिनमें एसीटोएसीटिक एसिड (Acetoacetic acid), बीटा-हाइड्रॉक्सीब्यूटाइरिक एसिड (B-hydroxybutyric acid) और एसीटोन (acetone) मौजूद रहते हैं। कीटोनबॉडीज के बनने की प्रक्रिया को कीटोजेनेसिस (Ketogenesis) कहा जाता है। ये कीटोनबॉडीज भी सांस और मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाती है। चयापचय के लिए कार्बोहाइड्रेट्स की पूरी मात्रा उपलब्ध न होने पर (जैसे उपवास रखने पर) अथवा अधिक वसा युक्त भोजन ग्रहण करने पर, वसा का चयापचय बढ़ जाता है, जिसके फलस्वरूप कीटोन बॉडीज अधिक मात्रा में बनकर रक्त में जमा हो जाती है। इस अवस्था को कीटोनमयता या कीटोसिस (Ketosis) कहा जाता है। इस रोग में व्यक्ति की मृत्यु भी हो सकती है।