रक्त पित्त


रक्त पित्त

(HAEMOPTYSIS)


परिचय:

          यह हमारे गलत खान-पान और कार्य के कारण भी हो जाता है। रक्तपित्त यानी खूनी पित्त में शरीर गर्म हो जाता है और रक्तपित्त नाक, गुदा, मूत्रद्वार और योनि आदि जगह से बाहर आता है।

विभिन्न भाषाओं में नाम:

हिन्दी                    रक्तपित्त।
अंग्रेजी                        हेमोरेजिक हिजीज।
अरबी                    रक्तपित्त।
बंगाली                        रक्तपित्त।
गुजराती                  रक्तपित्त।
कन्नड़                        रक्थारियवुडू।
मलयालम                 रक्तपित्तम्।
मराठी                    रक्तपित्त।
तमिल                         पुलंगलिलरथ्य कशीव।

कारण:

          यह रोग पित्त की गर्मी से होता है। इसके बढ़ जाने पर रक्त बहना शुरू होता है। धूप, मेहनत शोक, कहीं रास्ते पर जाना, मैथुन, तेज गर्म क्षार पदार्थों का खाना या खट्टे व चरपरे पदार्थ का ज्यादा सेवन करने आदि से रक्तपित्त का रोग हो जाता है।

         यह रोग विटामिन “सी” की कमी से होता है। इस रोग की प्रारिम्भक अवस्था में शरीर एवं मन की शक्ति क्षीण हो जाती है अर्थात् रोगी का शरीर निर्बल, असमर्थ, मंद तथा पीला-सा दिखाई देता है। थोड़े-से परिश्रम से ही सांस फूल जाती है। मनुष्य में सक्रियता के स्थान पर निष्क्रियता आ जाती है। रोग के कुछ प्रकट रूप में होने पर टांगों की त्वचा पर रोमकूपों के आसपास आवरण के नीचे से रक्तस्राव होने (खून बहने) लगता है। बालों के चारों ओर त्वचा के नीचे छोटे-छोटे लाल चकत्ते निकलते हैं फिर धड़ की त्वचा पर भी रोमकूपों के आस-पास ऐसे बड़े-बड़े चकत्ते निकलते हैं। त्वचा देखने में खुश्क, खुरदुरी तथा शुष्क लगती है। दूसरे शब्दों में-अति किरेटिनता हो जाता है। मसूढ़े पहले ही सूजे हुए होते हैं और इनसे खून निकलने लगता है बाद में रोग बढ़ने पर टांगों की मांसपेशियां विशेषत: प्रसारक पेशियों से रक्तस्राव होकर उनमें वेदनायुक्त तथा स्पर्शाक्षम ग्रंथियां बन जाती हैं। हृदय मांस से भी स्राव होकर हृदय शूल का रोग हो सकता है। नासिका आदि से खुला रक्तस्राव भी हो सकता है। हडि्डयों की कमजोरी और पूयस्राव भी बहुधा विटामिन “सी” की कमी से होता है। कच्चा आलू रक्तपित्त को दूर करता है।

लक्षण:

           मुंह, नाक, गुदा, लिंग, योनि से खून का निकलना रक्तपित्त हो सकता है।

भोजन तथा परहेज:

          पुराने चावल, सांठी के चावल, जौ, चना, मूंग, मसूर, मोठ, अरहर, गाय और बकरी का दूध-घी, भैस का घी, परवल, पुराना पेठा, ताड़फल, अनार, आंवला, नारियल की गिरी, सिंघाड़े, कसेरू, कैथ, तरबूज, शहद, ईख, मिश्री, दाख, खीलों का सत्तू, ठंडा पानी, लवा, बत्तख, बटेर, बगुला, सफेद तीतर, खरगोश, चिंगट मछली और मेढक जैसे ठंडे जीव का मांस, झरने का पानी, चन्दनादि का लेप की हुई स्त्रियों का आलिंगन तथा चांदनी आदि का प्रयोग खूनी पित्त से पीड़ित रोगी कर सकता है।

          ज्यादा मेहनत, परेशानी, कुश्ती, धूप में चलना, मलमूत्र को रोकना, धूम्रपान, मैथुन और क्रोध ये काम नहीं करने हैं। सेम, बैंगन, सरसों, तिल, उड़द, कुल्थी, दूध, दही, शराब, पान, आलू, उड़द की दाल, लालमिर्च, सरसों का तेल, गुड़, खटाई, कुएं का पानी, विरुद्ध भोजन, मछली, दस्तावर (दस्त लाने वाले पदार्थ खाने) अथवा रूखे पदार्थ आदि का इस्तेमाल नहीं करना चाहिए क्योंकि यह रोगी के लिए नुकसानदायक होता है। नोट: रात में जागना, स्नान, ज्यादा बोलना और धूप में ज्यादा न बैठे।

विभिन्न औषधियों से उपचार-

1. लाल फिटकरी: लाल फिटकरी को अच्छी तरह से पीसकर 10 ग्राम को शीशी में रख लें। 1 ग्राम चूर्ण को 3 ग्राम चीनी में मिलाकर फांक के रूप में लेकर तुरंत दूध पी लें। यह रक्त पित्त में खून चाहे कही से भी गिर रहा हो तो बंद कर देगा। इसके अलावा स्फटिक चूर्ण बहुत रोगों में फायदा करता है।

2. फिटकरी: एक चौथाई ग्राम फिटकरी को एक चम्मच चीनी में मिलाकर या दोनों को एक साथ पानी में घोलकर रोज 2 से 3 बार रोगी को पिलाने से रक्तपित्त की शिकायते दूर हो जाती हैं।

3. लाख: पीपल की लाख लेकर पीसकर पाउडर बनाकर रख लें। फिर 1 ग्राम पाउडर को शहद के साथ 2-3 बार चाटने से खून की उल्टी बंद हो जाती है।

4. फाहूदाना: फाहूदाना, लाजवन्ती बीज, तालमखाना, मूसली बराबर-बराबर 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर चूर्ण कर लें। सबके बराबर 20 ग्राम मिश्री मिला दें। 6 ग्राम को खुराक के रूप में घी के साथ खाकर ऊपर से दूध को पी जायें। इससे रक्त का बहना बंद होता है और धातु (वीर्य) भी बढ़ता है।

5. चंदन-

  • चंदन, धनिया, सौंफ, गुरिज, पित्तपापड़ा 10-10 ग्राम लेकर कूट लें और लगभग 2 लीटर पानी में पकायें जब 250 मिलीलीटर शेष रह जाये तब उतारकर 50 ग्राम मिश्री मिलाकर पीने से रक्तपित्त दूर हो जाता है। कम से कम 2-3 बार जरूर इसका प्रयोग अवश्य करें।
  • सफेद चंदन का बुरादा 125 ग्राम, आधा लीटर गुलाबजल में 12 घंटे तक भिगोयें, बाद में हल्की आंच पर पकायें। थोड़ा पानी बचने पर उतारकर छान लें और मिश्री मिलाकर आधा लीटर का शर्बत बना लें और सुबह-शाम 20 से 40 ग्राम तक पीने से खूनी पित्त के रोगी को सेवन करायें जल्द ही लाभ होगा।

6. चौलाई की जड़: चौलाई की जड़ की छाल 20 ग्राम या चौलाई के पत्ते पेड़ सहित 20 ग्राम को पीसकर पानी से छान लें। 250 मिलीलीटर पानी में चीनी डालकर 2-3 बार पीने से हर तरह के बहते हुए खून को रोकता है।

7. बांस: कफ से खून आने की शिकायत में बांस के कोमल पत्तों का चूर्ण 1 ग्राम की मात्रा में दिन में 2 बार खुराक के रूप में सेवन करने से रोगी को खूनी पित्त में आराम मिलता है।

8. छोटी माई: छोटी माई का चूर्ण 2 से 4 ग्राम सुबह-शाम खाने से खून की उल्टी यानी रक्तपित्त दूर होती है।

9. बड़ी माई: बड़ी माई का चूर्ण 2 से 4 ग्राम सुबह-शाम पानी के साथ लेने से खून की उल्टी ठीक हो जाती है।

10. पतंग: पतंग (बक) का काढ़ा खाने से फेफड़े से बहने वाला खून ठीक हो जाता है।

11. तारपीन: मुंह से खून बहने पर तारपीन का तेल 3 से 10 बून्द खाने और सूंघने से लाभ होता है।

12. दालचीनी: मुंह या फेफड़ों से बहने वाले खून में दालचीनी के काढ़े का रोज प्रयोग करने से खूनी पित्त में लाभ होता है।

13. जटामांसी: आधा से एक ग्राम जटामांसी का चूर्ण नौसादर के साथ सुबह-शाम लेने से रक्तपित्त और रक्तवमन (खूनी उल्टी) ठीक हो जाती है।

14. गम्भारी: गम्भारी फल के बीच का हिस्सा 1 से 3 ग्राम को शहद के साथ सुबह-शाम खाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

15. वनउड़द: वनउड़द 2 से 4 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से रक्तपित्त यानी खूनी पित्त ठीक हो जाती है।

16. कचनार:

  • रक्तपित्त में कचनार के फूलों का चूर्ण 1 से 2 ग्राम सुबह-शाम चटाने से रोगी को लाभ होता है, साथ में कचनार का साग भी खिलाया जाता है।
  • कचनार के सूखे फूलों का चूर्ण एक चम्मच शहद के साथ 3 बार सेवन करने से और फूलों की सब्जी खाने से शरीर में से खून गिरने की सारी बिमारियां दूर होती हैं।
  • मुंह से खून आने पर कचनार के पत्तों का रस 6 मिलीलीटर की मात्रा में पीयें।

17. वेदमुश्क:

  • वेदमुश्क की छाल का काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर की मात्रा में रोज 2-3 खुराकों को रोगी को खिलाने से मुंह से रक्त का गिरना ठीक हो जाता है।
  • वेदमुश्क के कांटों की राख खिलाने से भी खून का बहना रुक जाता है।

18. पटेरा: पटेरा के फूल या जड़ 3 से 6 ग्राम को पीसकर और घोंटकर पीने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

19. सरफोंका: सरफोंका की जड़ 3 से 6 ग्राम चावल के पानी के साथ सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।

20. चुरनहार: चुरनहार के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल और पत्ती) का रस 40 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम खाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

21. मकोय: मकोय का रस 10 से 20 मिलीलीटर की मात्रा में रोगी को सुबह-शाम खिलाने से मुंह से होने वाली खूनी उल्टी समाप्त हो जाती है।

22. बान्दा: बान्दा के फूल का रस 10 से 20 मिलीलीटर को सुबह-शाम खाने से पित्त ठीक हो जाता है।

23. केसर: केसर का चूर्ण एक चौथाई ग्राम से 2 ग्राम तक की मात्रा में सुबह-शाम मिश्री के शर्बत में मिलाकर पीने से रक्त की उल्टी ठीक हो जाती है।

24. सेंवार: सेंवार के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का रस 10 से 20 मिलीलीटर मिश्री के साथ सुबह-शाम खाने से रोगी को खूनी पित्त यानी रक्त पित्त में लाभ होता है।

25. अर्जुन की छाल: रक्तपित्त या खून की उल्टी में अर्जुन छाल का चूर्ण 1 से 10 ग्राम को दूध में पकाकर खाने से आराम आता है और रक्त की वाहिनियों में रक्त जमने लगता है और बाहर नहीं निकलता है।

26. धौरा (धववृक्ष): धौरा का गोंद लगभग 1 ग्राम या छाल का काढ़ा 50 से 100 मिलीलीटर सुबह-शाम खाने से लाभ होता है और रक्तपित्त मिट जाता है।

27. शमी (छोंकर): शमी के पेड़ की छाल का काढ़ा 40 ग्राम की मात्रा में सुबह-शाम खाने से रक्तपित्त की शिकायत समाप्त हो जाती है।

28. आम: अगर आंत्र से खून बहे जोकि उल्टी के रूप में निकल रहा हो तो आम के पेड़ की छाल का काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से खून का बहना बंद हो जाता है।

29. अमरा: अमरा के फल का रस 10 से 20 मिलीलीटर को खुराक के रूप में सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

30. केला:

  • केले के फूलों की सब्जी रक्तपित्त में लाभकारी होती है।
  • केले के फल का रस 20 से 40 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त ठीक हो जाता है।

31. कैथ: कैथ का फल लगभग बेल की तरह होता है। इस फल के गूदे का सेवन करने से रक्त पित्त में लाभ होता है।

32. मुनक्का: मुनक्का को खाने से रक्तपित्त में काफी फायदा मिलता है।

33. सुलेमानी खजूर: रक्तपित्त में सुलेमानी खजूर को रोज खाना चाहिए।

34. छुहारा: 2 से 4 छुहारों को मिश्री के साथ लेकर दूध में डालकर अच्छी तरह से उबालें फिर इसमें से गुठली को हटाकर खायें और ऊपर से दूध को पीयें। इससे खूनी पित्त से पीड़ित रोगी को बीमारी में लाभ होता है।

35. कमरख: रक्तपित्त में कमरख फल का शर्बत बनाकर सुबह-शाम पिलाने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

36. कोकम: कोकम फल का शर्बत सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त में फायदेमंद होता है।

37. सफेद मरसा: सफेद मरसा का साग खाने से या इसके बीज को भूनकर खाने से रक्तपित्त कम होता है।

38. लाल मरसा: लाल मरसा भी रक्तपित्त को शांत करती है। इसका साग भी खाया जाता है बीज भी भूनकर खाते हैं।

39. बड़ी लोणा: बड़ी लोणा का रस 10 से 20 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से सभी तरह के रक्तपित्त में लाभ होता है।

40. अंजबार: खूनी पित्त में अंजबार का काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर सुबह-शाम लेने से लाभ होता है।

41. रूदन्ती: रूदन्ती के फल का चूर्ण 3 से 6 ग्राम रोगी को सुबह-शाम खिलाने से खूनी पित्त में लाभ मिलता है।

42. लाल जड़ी: लाल जड़ी का काढ़ा 20 से 40 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त यानी खूनी पित्त ठीक हो जाता है।

43. शरीफा: रक्तपित्त यानी खूनी पित्त में शरीफा के फल को खाने से या शरीफा के फल का शर्बत सुबह-शाम पीने से लाभ मिलता है।

44. हत्थाजोरी: हत्थाजोरी के पंचांग (जड़, तना, फल, फूल, पत्ती) का रस 40 से 80 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त यानी खूनी पित्त और रक्त की उल्टी ठीक हो जाती है।

45. दूब:

  • रक्तपित्त के रोग में दूब का रस, अनार के फूलों का रस, गोबर और घोड़े की लीद का रस मिलाकर पीने से खून का बहना बंद हो जाता है।
  • दूब का 30 मिलीलीटर रस लेने से ही रक्तपित्त में आराम आता है साथ ही यह खूनी बवासीर और टी.बी. के रोगी का बहने वाला खून भी रुक जाता है।

46. आंवला:

  • नाक से खून बहने पर आंवलों को घी में भूनकर और कांजी को पीसकर माथे पर लगाने से रोगी को आराम मिलता है।
  • पहले सिर के बाल मुड़वा दें या बिलकुल छोटे करा लें। फिर आंवले को पानी के साथ पीसकर पूरे सिर पर लेप लगा लें इससे नाक से बहने वाला खून बंद हो जाता है।

47. गाय का गोबर: नाक से खून बहने पर गाय का सूखा गोबर सिर पर रखने से खून का गिरना बंद हो जाता है।

48. अडूसा:

  • अडूसे के काढ़े में शहद और मिश्री मिलाकर पीने से रक्तपित्त में तुरंत फायदा आता है।
  • अड़ूसा के पत्तों का चूर्ण 1 से 2 ग्राम सुबह-शाम देने से लाभ होता है।
  • ताजे हरे अडूसे के पत्तों का रस निकालकर 10-20 मिलीलीटर रस में शहद तथा खांड मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से भयंकर रक्तपित्त शांत हो जाता है।
  • अडूसा का 10-20 मिलीलीटर रस, तालीस के पत्ते का 2 ग्राम चूर्ण और शहद मिलाकर सुबह-शाम पीने से कफ विकार, पित्त विकार, तमक ‘वास, स्वरभेद और रक्तपित्त का नाश होता है।
  • अडूसे की जड़, मुनक्का, हरड़ इन तीनों को समभाग चूर्ण मिलाकर 20 ग्राम लेकर 400 मिलीलीटर पानी में पकायें। चौथाई भाग शेष रह जाने पर उस क्वाथ यानी काढ़े में खांड और शहद डालकर पीने से खांसी, श्वांस तथा रक्तपित्त रोग शांत होते हैं।

49. रसौत: खून से संबधी बीमारी के लक्षण खत्म करने के लिए छोटी-छोटी बराबर-बराबर गोलियां बनाकर खिलाने से बच्चों को लाभ होता है।

50. खरबूजा: खरबूजे के बीजों को कूटकर 12 घण्टे पानी में भिगोयें, फिर इसमें सौंफ की जड़, कासनी की जड़ मिलाकर मिश्री डाल लें और शर्बत बनायें। इसके सेवन से रक्तपित्त में लाभ होता है।

51. पीली मिट्टी: पीली मिट्टी से बने बर्तनों को सूंघने से भी नाक से बहने वाला खून बंद हो जाता है।

52. गाय का घी: सिर को मुड़वाकर यानी गंजे करके ताजे घी से हर हफ्ते मालिश करने से नाक से खून का बहना बंद हो जाता है।

53. धान: 14 से 20 ग्राम धान के लावों को शहद के साथ दिन में 2-3 बार देने से रक्तपित में लाभ मिलता है।

54. मुलेठी (मुलहठी):

  • मुलेठी, नागरमोथा, इन्द्रजौ और मैनफल आदि को समान मात्रा में लेकर चूर्ण करें, फिर एक चम्मच चूर्ण को शहद के साथ मिलाकर दिन में 3 से 4 बार सेवन करने से रक्तपित जन्य वमन (खूनी पित) मिटती है।
  • मुलहठी के 4 ग्राम चूर्ण को दूध या घी के साथ रोज सुबह-शाम खायें। इससे खून की उल्टी दूर होती है।
  • 3 से 5 ग्राम मुलेठी का नियमित सुबह-शाम प्रयोग करने से रक्तपित्त शांत हो जाती है, रक्त विकार और रक्ताल्पता यानी खून की कमी (एनिमिया) मिटती है।

55. दूध: गाय के दूध में 5 गुना पानी मिलाकर पानी जलने तक उबालकर ठंडा करके पीने से रक्तपित दूर होता है।

56. गिलोय:

  • 10-10 ग्राम की मात्रा में मुलेठी, गिलोय और मुनक्का को लेकर 500 मिलीलीटर पानी में उबालकर काढ़ा बनाएं। इस काढ़े को 1 कप रोजाना 2-3 बार पीने से रक्तपित (खूनी पित्त) के रोग में लाभ मिलता है।
  • खाना खाने के बाद गिलोय का काढ़ा 1-1 कप पानी में मिलाकर सुबह-शाम लेने से खूनी पित्त में लाभ होता है।

57. लाल कचनार: इसके सूखे फूलों के 2 से 5 ग्राम चूर्ण को 1 चम्मच शहद के साथ दिन में तीन बार चाटने से रक्तपित्त मिटता है।

58. गोखरू:

  • गोखरू के फलों का दूध 100-200 मिलीलीटर सुबह-शाम पीने से रक्तपित्त में आराम आता है।
  • गोखरू और शतावर-कुल 20 ग्राम, दूध 160 मिलीलीटर इन सबको मिलाकर आग पर पकायें सिर्फ दूध रह जाने पर छानकर रोगी को पिला दें। इससे रक्तपित्त में लाभ होता है।

59. कपूर:

  • गुलाब जल में थोड़ा-सा कपूर पीसकर नाक में टपकाएं।
  • घाव या चोट पर-घाव में कपूर को लगाने से लाभ होगा।

60. गूलर:

  • पके हुए गूलर, गुड़ या शहद के साथ खाने अथवा गूलर की जड़ को घिसकर चीनी के साथ खाने से लाभ होता है।
  • हर प्रकार के रक्तपित्त में गूलर की छाल 5 से 10 ग्राम उसका फल 2 से 4, क्षीर 10 से 20 मिलीलीटर लेने से लाभ होता है।

61. अमलतास:

  • अमलतास के फल के बीच के भाग को अधिक मात्रा में लगभग 25 से 50 ग्राम को 20 ग्राम शहद और शर्करा के साथ सुबह-शाम देने से रक्तपित्त में लाभप्रद है।
  • अमलतास और आंवले का काढ़ा करें और शहद और शक्कर मिलाकर रोगी को पिलाने से दस्त होकर रक्तपित्त बंद हो जाती है।

62. खजूर: खजूर के पाउडर के साथ शहद को खाने से रक्तपित्त में लाभ मिलता है।

63. सेमल: 1-2 ग्राम फूलों का चूर्ण शहद के साथ दिन में 2 बार दें।

64. नींबू:

  • नींबू को निचोड़कर बने शर्बत 2 से 3 बार पीने से रक्त का बहना बंद हो जाता है।
  • नींबू के 20 मिलीलीटर रस में चीनी मिलाकर रोजाना सेवन करने से खूनी-पित्त में लाभ मिलता है।

65. शतावर:

  • शतावर और गोखरू की जड़ 20 ग्राम, बकरी का दूध 160 मिलीलीटर और पानी 1 लीटर इन सबको बराबर मिलाकर आग पर गर्म करें और थोड़ा बचने पर छानकर रोगी को पिला दें इससे योनि से खून का बहना बंद हो जाता है।

66. बिजौरा नींबू: बिजौरा नींबू की जड़ और इसके फूलों का चूर्ण बराबर-बराबर मात्रा में लेकर चावल की माण्ड के साथ सेवन करने से खूनी पित्त में लाभ होता है।

67. पीपल:

  • 10 ग्राम पीपल के पत्तों का रस 6 मिलीलीटर हीरा बोल (एक प्रकार का गोंद) में 2 गुनी मात्रा में शहद को मिलाकर पिलाने से हृदय के अन्दर रुका हुआ खून मिट जाता है।
  • पीपल के चूर्ण और मिश्री को बराबर मात्रा में मिलाकर 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार ठंडे पानी से लेने पर कुछ ही दिनों में खूनी पित्त में लाभ होता है।

68. नीम:

  • नीम के पत्तों को 10 ग्राम पीसकर पानी के साथ लुग्दी बनाकर सेवन करने से खूनी पित्त में लाभ होता है।
  • नीम के पत्तों के रस और अडूसा के पत्तों के रस 20-20 मिलीलीटर में थोड़ा शहद मिलाकर दिन में दो बार सेवन से लाभ पहुंचता है।

69. परवल: कड़वे परवल चरपरे और गर्म होते हैं। परवल रक्तपित्त, वायु, कफ, खांसी, खुजली, कुष्ठरोग, रक्तविकार (खून के रोग), बुखार और दाह (जलन) नाशक होते हैं। इसके गर्भ का चूर्ण लगभग 20-25 ग्राम को इलायची, लौंग आदि के साथ देने से रोगी को आराम होगा।

70. अनार: लगभग 7-14 मिलीलीटर अनार के फलों का रस सुबह-शाम लेने से रक्तपित्त में लाभ मिलता है।

71. अंगूर:

  • किशमिश 10 ग्राम, दूध 150 मिलीलीटर, पानी आधा लीटर तीनों को हल्की आंच पर पकायें। जब यह 150 मिलीलीटर शेष रह जाए तो इसमें थोड़ी मिश्री मिलाकर पिलाना चाहिए।
  • मुनक्का, मुलेठी, गिलोय 10-10 ग्राम लेकर जौकूट कर 500 मिलीलीटर जल में अश्टमांश का क्वाथ बनाकर रोगी को सेवन करायें।
  • मुनक्का 10 ग्राम, गूलर की जड़ 10 ग्राम, धमासा 10 ग्राम लेकर, जौ कूट कर अष्टमांश का काढ़ा सिद्ध कर सेवन करने से रक्तपित्त, जलन, प्यास तथा कफ के साथ खांसने पर रक्त निकलना आदि विकार शीघ्र दूर हो जाते हैं।
  • अंगूर के 50-100 मिलीलीटर रस में 10 ग्राम घी और 20 ग्राम खांड मिलाकर पीने से रक्तपित्त दूर होता है।
  • मुनक्का और पके पके गूलर का फल बराबर-बराबर लेकर पीसकर शहद के साथ सुबह-शाम चटावें।
  • मुनक्का 10 ग्राम, हरड़ 10 ग्राम को पानी के साथ पीस लें, फिर इसे 6 ग्राम लेकर तक बकरी के दूध के साथ पिलायें। इससे रक्तपित्त में लाभ मिलता है।

72. नागरमोथा: नागरमोथा, सिंघाड़ा, धान का लावा, खजूर, कमल और केसर आदि को बराबर भाग में लेकर पीस लें, बाद में 3 ग्राम चूर्ण की मात्रा में शहद के साथ 1 दिन में 3 से 4 बार प्रयोग करना रोगी के लिए लाभदायक होता है।

73. इलायची: सुबह बासी मुंह निराहार रहकर 2 इलायची प्रतिदिन चबाएं इसके बाद ऊपर से दूध या पानी पियें। इससे रक्तपित्त में लाभ मिलता है।

74. बरगद:

  • बरगद के कोमल 3-6 ग्राम पत्तों को दूध में पीसकर दिन में 3 बार पीने से लाभ होता है।
  • कोपलों या पत्तों को 10 से 20 ग्राम तक पीसकर लुगदी में शहद और शक्कर मिलाकर खाने से रक्त पित्त में फायदा होता है।

75. अरबी: अरबी के पत्तों का साग रक्तपित्त के रोगी के लिए लाभकारी है।

76. तेजपात: नाक, मुंह, मल व मूत्र किसी भी रास्ते रक्त निकलने पर ठंडा पानी 1 गिलास में 1 चम्मच पिसा हुआ तेजपात मिलाकर हर 3 घण्टे के बाद से सेवन करने से रक्तस्राव बंद हो जाता है।

77. अर्जुन: अर्जुन की 2 चम्मच छाल को रातभर पानी में भिगोकर रखें, सुबह उसको मसल-छानकार या उसको उबालकर उसका काढ़ा पीने से रक्तपित्त में लाभ होता है।

78. त्रिफला (हरड़, बहेड़ा और आंवला): हरड़, बहेड़ा, आंवला तथा अमलतास के 20 मिलीलीटर काढ़े में शहद और खांड मिलाकर पीने से रक्तपित्त, दाह (जलन) तथा दर्द शांत होता है।

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