रक्तस्राव होना


रक्तस्राव होना

BLEEDING


प्राथमिक चिकित्सा :

परिचय-

          किसी तरह की दुर्घटना आदि में अगर शरीर का कोई अंग कट-फट जाता है तो उस अंग में से काफी मात्रा में खून का स्राव होता है। ऐसे में यदि पीड़ित व्यक्ति की सांस ठीक से चल रही हो और दिल की धड़कन भी सही तरह से चल रही हो तो प्राथमिक उपचार करने वाले को सबसे पहले दुर्घटना-ग्रस्त अंग से निकल रहे खून को बंद करने का प्रबंध करना चाहिए क्योंकि अगर खून ज्यादा मात्रा में निकल जाएगा तो खून की कमी के कारण पीड़ित व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। ऐसे में व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देना जरूरी होता है।

घाव के कारण खून बहने पर-

  • किसी तरह की चोट आदि लग जाने के कारण जब शरीर का कोई अंग कट-फट जाता है तो उस अंग पर घाव बन जाता है और उस घाव से खून निकलने लगता है। यदि उस समय खून के स्राव को जल्दी से बंद नहीं किया जाता तो उस घाव से कीटाणु शरीर में चले जाते हैं और इंफैक्शन पैदा कर देते हैं। घाव बाहर से कितना भी बड़ा हो उससे उतनी हानि नहीं होती जितनी की किसी घाव के गहरा हो जाने से होती है। इसलिए चाकू, छुरी, गोली आदि लगने पर होने वाला घाव गंभीर हो सकता है क्योंकि इनसे गहरा घाव बनता है। इन चीजों से खून की नली पूरी तरह से कट जाती है इसलिए इनके द्वारा हुए घावों से खून अधिक मात्रा में निकलता है।
  • जब व्यक्ति किसी भी स्थान पर दुर्घटना-ग्रस्त होता है तो उसके आस-पास कीटाणु उपस्थित होते हैं जो एकदम से घाव को संक्रमित नहीं करते लेकिन कुछ समय बाद वह कीटाणु घाव के अंदर पहुंचकर अपनी संख्या में वृद्धि करने लगते हैं और कुछ ही समय में घाव को संक्रमित कर देते हैं। अगर कीटाणुओं की संख्या को बढ़ने से नहीं रोका जाता तो वह खून में प्रवेश करके खून को जहरीला बना देते हैं। इससे पीड़ित व्यक्ति को सेप्टिसीमिया हो जाता है। अगर घाव कील या सड़क पर पड़ी हुई किसी लोहे की चीज से हुआ हो तो व्यक्ति को टिटेनस होने का खतरा रहता है। इसलिए किसी भी तरह की लोहे की चीज से चोट आदि लग जाने पर डॉक्टर से तुरंत टिटेनस टॉक्साइड का टीका लगवाना चाहिए।
  • घाव से होने वाले खून का स्राव धमनियों, शिराओं या कोशिकाओं के कटने के कारण होता है। कभी-कभी यह तीनों कारणों के मिले-जुले प्रभाव के कारण होता है।
  • धमनियों से निकलने वाला खून चटकीले लाल रंग का होता है। यह खून रुक-रुककर, झटके से निकलता है क्योंकि इसका संबंध दिल की धड़कन से होता है। घाव की भीतरी गहराई से बहने वाले खून की मात्रा आमतौर पर अधिक होती है और ऐसी स्थिति में अगर घाव से खून का बहना न रोका जाए तो व्यक्ति की हालत बहुत ज्यादा गंभीर हो सकती है।
  • अगर किसी दुर्घटना आदि के कारण व्यक्ति के शरीर से एक से डेढ़ लीटर तक खून निकल जाता है तो भी वह व्यक्ति जीवित रह सकता है। किसी बड़ी धमनी के कट जाने से इतना खून शरीर से तुरंत ही निकल जाता है। नस के कटने पर गहरे-लाल रंग का खून बिना रुके लगातार निकलता रहता है। केशिकाओं के कटने से खून बहता नहीं है बल्कि शरीर से रिसता हुआ महसूस होता है। धमनियों से निकलने वाले रक्तस्राव की अपेक्षा शिराओं और केशिकाएं से निकलने वाला रक्तस्राव कम हानिकारक होता है।

उपचार-

          खून को बहने से रोकने के लिए अपनाए जाने वाले प्राथमिक उपचार स्राव की गंभीरता और उस स्थिति में उपलब्ध सामग्री पर निर्भर करते हैं-

  • यदि पीड़ित व्यक्ति की पीठ में चोट नहीं लगी हो या उसकी रीढ़ की हड्डी को कोई नुकसान नहीं पहुंचा हो तो उसे किसी सख्त सतह पर पीठ के बल लिटा दें। इससे पीड़ित के बेहोश होने की आशंका कम हो जाएगी और उसके दूसरे अंगों की जांच करने में सुविधा होगी।
  • जांच के दौरान अगर कोई बाहरी घाव न दिखाई पड़े लेकिन पीड़ित व्यक्ति शॉक की स्थिति में हो तो उसके शरीर के हर अंग की जांच एक बार फिर से कर लेनी चाहिए। पीड़ित व्यक्ति के किसी अंग पर सूजन आ जाने या त्वचा का रंग गुलाबी हो जाने पर उसके शरीर में अंदरूनी खून का स्राव होने की संभावना हो सकती है।

          ऐसी स्थिति में प्राथमिक उपचार का मकसद किसी भी तरह पीड़ित व्यक्ति की हालत को और अधिक बिगड़ने से रोकना होता है। इसके अलावा घाव को साफ करने और आगे बताए गए तरीकों से पीड़ित व्यक्ति को प्राथमिक उपचार देना चाहिए-

घाव को साफ करना-

  • प्राथमिक उपचार करने वाले व्यक्ति के लिए सबसे पहले यह जरूरी है कि पीड़ित व्यक्ति का उपचार करने से पहले वह अपने हाथों को अच्छी तरह साबुन से धो लें लेकिन पोंछे नहीं क्योंकि  जिस कपड़े या तौलियें से वह हाथ पोंछेगा हो सकता है कि उसमें बैक्टेरिया या जीवाणु हो।
  • घाव को साफ करने के लिए पानी और साबुन का इस्तेमाल करना ही सबसे अच्छा रहता है। इस दौरान इस्तेमाल किया जाने वाला पानी साफ और पीने वाला होना चाहिए और उसमें कोई एंटीसेप्टिक दवा न मिली होनी चाहिए क्योंकि कई बार ये दवाइयां हानिकारक प्रभाव डालती है और रोगी की पीड़ा को बढ़ सकती है। कुछ व्यक्ति इन दवाओं के प्रति संवेदनशील होते हैं ऐसे में उन्हे इनसे एलर्जी हो सकती है।  
  • घाव के आसपास से धूल, मिट्टी आदि को हटाने के लिए काफी सारे पानी से धोना चाहिए। इस काम के लिए नल आदि का बहता हुआ पानी अच्छा रहता है। यदि घाव में कांच के टुकड़े, कंकड़ जैसी वस्तुएं भी फंसी हुई हो तो उन्हे हाथ से खींचकर निकाल दें। फिर घाव को दुबारा पानी से धो दें। अगर घाव में रक्त का कोई थक्का बन गया हो तो उसे छेड़ें नहीं क्योंकि इससे रुका हुआ खून फिर से खून बहना शुरु हो सकता है।
  • घाव को अच्छी तरह से साफ करने के बाद उसे निर्जर्मित गॉज से पोंछें। अगर गॉज उपलब्ध न हो तो साफ रुमाल या धोती आदि का उपयोग किया जा सकता है। लेकिन रूमाल या धोती साफ, धुली हुई और मुलायम होनी चाहिए। घाव आदि को साफ करने के बाद उस स्थान पर पट्टी बांध दें और पीड़ित को तुरंत अस्पताल ले जाएं।
  • बड़े घावों पर कोई एंटीसेप्टिक न लगाएं क्योंकि वह घाव द्वारा अवशोषित होकर प्रतिक्रिया कर सकता है।

रक्तस्राव रोकना-

  • पीड़ित व्यक्ति को ऐसी स्थिति में लिटा या बैठा दें जिससे उसे कुछ आराम महसूस हो। संभव हो तो जिस अंग से खून निकल रहा हो उस अंग को ऊपर उठा दें ताकि खून का निकलना कम हो सके। लेकिन ऐसा करने से पहले यह जरूर देख लें कि उस अंग की हड्डी न टूटी हो। हड्डी टूटी हो तो उसे बिल्कुल न छेड़ें क्योंकि ऐसा करने से घायल अंग को अधिक हानि पहुंच सकती है।
  • यदि धमनी के कटने से खून बह रहा हो तो उसे जल्दी से जल्दी रोकना बहुत जरूरी होता है। इसके लिए सीधे घाव पर निर्जर्मित गॉज या साफ रुमाल रखकर हथेली से दबाएं। आमतौर पर 2 से 5 मिनट तक रुमाल रखकर दबाने से खून निकलना बंद हो जाता है। ध्यान रखें कि खून को रोकने के लिए डाला जाने वाला दबाव बहुत अधिक न हो अन्यथा शरीर के दूसरे अंगों को होने वाली खून की सप्लाई में बाधा आ सकती है।           
  • गर्दन, जांघ, ऊपरी भुजा जैसे अंगों की धमनियों से होने वाला रक्तस्राव अधिक मात्रा में होता है। ऐसे रक्तस्राव को तुरंत रोकने के लिए घाव के अंदर अंगुली डालकर, कटी हुई धमनी पर, दबाव डाला जा सकता है। इससे खून बहना तो जल्दी बंद हो जाता है लेकिन संक्रमण होने का खतरा बढ़ जाता है।
  • अगर रक्तस्राव को रोकने के लिए रूमाल या पट्टी न मिले तो घाव में अंगुली डालकर खून को बहने से रोका जा सकता है लेकिन ऐसा आपातकालीन स्थिति में ही किया जा सकता है।
  • नस कट जाने पर निकलने वाला खून गाढ़े लाल रंग का होता है और लगातार बहता रहता है। यह दशा धमनी के रक्तस्राव की अपेक्षा कम गंभीर होती है। फिर भी इसका उपचार जल्दी ही किया जाना चाहिए। चोट लगे अंग को ऊंचा उठा देने से इस प्रकार का रक्तस्राव होना  काफी कम हो जाता है। चोट पर गॉज रखकर उसे हथेली से कम से कम 2 मिनट तक और ज्यादा से ज्यादा 5 मिनट तक दबाएं। अगर फिर भी खून न रुके तो घाव पर कसकर पट्टी बांध दें।
  • अगर खरोंच लगने के कारण खून रिस रहा हो तो उस पर कपड़ा रखकर कुछ मिनट दबाने से और फिर पट्टी बांधने से खून रिसना बंद हो जाता है। इस प्रकार का रक्तस्राव होना कोई खतरे की बात नहीं है क्योंकि खरोंच से निकलने वाला खून कुछ समय बाद थक्का बनकर खून के स्राव को रोक देता है।
  • सिर्फ हीमोफीलिया जैसे रोग से पीड़ित कुछ व्यक्ति में ही खरोंच से निकलने वाला खून काफी देर तक रिसता रहता है। ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को जल्दी से जल्दी डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए।
  • हिमोफीलिया एक वंशानुगत रोग है जिसके कारण रोगी के खून में थक्के नहीं बनते। एक बात और है कि हीमोफीलिया केवल पुरुषों में होता है, स्त्रियों में नहीं।

आंतरिक रक्तस्राव-

         कई बार दुर्घटना-ग्रस्त व्यक्ति के शरीर के ऊपर चोट का कोई निशान दिखाई नहीं देता लेकिन उसके शरीर के अंदरूनी अंगों में चोट लगने के कारण खून का स्राव हो रहा होता है। ऐसे में पीड़ित व्यक्ति के शारीरिक लक्षणों को देखकर अंदरूनी रक्तस्राव के होने का पता लगाया जा सकता है।

इसके लिए निम्नलिखित तरीके से प्राथमिक उपचार करना चाहिए-

  • अंदरूनी रक्तस्राव का प्राथमिक उपचार करने के लिए सबसे पहले पीडित व्यक्ति को पीठ के बल सीधा लिटा दें। उसके पैरों को तकिया आदि लगाकर ऊंचा कर दें।
  • पीड़ित व्यक्ति को बिल्कुल शांत रखें और बिल्कुल हिलने-डुलने न दें। इसके साथ ही उसका मनोबल भी बढ़ाते रहें।
  • पीडित व्यक्ति के शरीर को पतले कंबल या कपड़े से गर्म रखने की कोशिश करें। पीड़ित व्यक्ति को गर्म रखने के लिए छाती या पेट पर गर्म पानी की थैली का प्रयोग भूलकर भी न करें।
  • प्राथमिक उपचार करने के बाद पीड़ित को तुरंत अस्पताल पहुंचाए लेकिन ध्यान रखें कि गाड़ी आदि में ले जाते समय उसे धक्के या झटके आदि न लगे।

नोट-

          पीड़ित व्यक्ति को खाने-पीने के लिए कुछ न दें क्योंकि हालत अधिक गंभीर होने पर उसका ऑप्रेशन करना पड़ सकता है और उस समय खाद्य पदार्थों से कठिनाई पैदा हो सकती है।

छाती की चोट के कारण खून का स्राव होना-

  • अगर छाती पर किसी तरह की चोट लगती है तो उसका असर हृदय, फेफड़ों, पसलियों आदि पर पड़ता है। ऐसी स्थिति में छाती पर चोट का निशान तो दिखाई नहीं देता लेकिन अंदरूनी अंगों को हानि होती है जैसे- हड्डी टूट जाना, धमनी या नस का फट जाना आदि। शरीर के अंदरूनी अंगों में इस तरह की हानि होने से शरीर की कार्य-प्रणाली में बाधा उत्पन्न होती है। ऐसा होने पर घायल व्यक्ति को भयंकर पीड़ा होती है तथा सांस लेने में कठिनाई पैदा होती है। हृदय और फेफड़े जैसे अंगों को हानि पहुंचने से घायल की हालत बहुत नाजुक हो सकती है और यदि जल्दी ही उपचार न किया जाए तो घायल व्यक्ति की मौत भी हो सकती है। इसीलिए छाती की अंदरूनी चोट से पीड़ित व्यक्ति को तुरंत डॉक्टर के पास ले जाएं।
  • छाती पर चोट लग जाने के कारण अंदरूनी रक्तस्राव का प्राथमिक उपचार करने के लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति के कपड़ों को ढीला कर दें ताकि उसे हवा मिल सके। उसे बिल्कुल भी हिलने-डुलने न दें। पीड़ित व्यक्ति को शांत रखने की कोशिश करें तथा चाय, कॉफी आदि न दें। लेकिन पीड़ित बर्फ के टुकड़े चूसने के लिए दिए जा सकते हैं। ऐसे व्यक्ति को अस्पताल ले जाते समय बहुत सावधानी बरतने की जरूरत होती है।           
  • कई बार कार आदि चलाते समय तेजी से ब्रेक लगाने या छाती के बल गिरने से छाती पर गंभीर रूप से चोट लगती है। ऐसे में उसकी छाती की पसलियां टूट सकती हैं या उसकी गर्दन पर एकाएक बहुत जोर से झटका लगने पर गर्दन के स्नायु और मांसपेशियां फट सकती है।
  • ऐसी स्थिति में पीड़ित व्यक्ति को बहुत बेचैनी महसूस होती है, उसे सांस लेने और छोड़ने में परेशानी होती है। सांस बाहर छोड़ने में परेशानी होने के कारण शरीर से कार्बन डाईऑक्साइड बाहर नहीं निकल पाता जिससे पीड़ित का चेहरा नीला पड़ जाता है। पसलियों और छाती की परतों की हड्डियां टूटने से उनकी मजबूती समाप्त हो जाती है। इसके साथ ही ऐसी क्रियाएं होने लगती है जो सामान्य व्यक्ति की शारीरिक क्रियाओं से बिल्कुल अलग होती है जैसे- पीड़ित व्यक्ति सांस लेता है तो उसकी छाती अंदर की ओर सिकुड़ने लगती है और सांस छोड़ता है तो छाती बाहर ही ओर फैलने लगती है। इस स्थिति में जल्दी ही उपचार किया जाना चाहिए अन्यथा पीड़ित को सांस लेने में रुकावट आ सकती है और उसके शरीर के अलग-अलग अंगों में ऑक्सीजन पहुंचने में भी बाधा आ सकती है।

    ऐसी अवस्था में रोगी की हालत बिगड़ने से पहले उसके सारे कपड़ों को ढीला कर दें और उसकी छाती की चोट का निम्नलिखित प्रकार से प्राथमिक उपचार करें-  

  • इसके लिए सबसे पहले पीड़ित व्यक्ति की छाती पर पैड रखें तथा उसकी एक भुजा के आगे वाले भाग और हाथ को उस पर रखकर सिप्लट बांध दें।
  • अगर पीड़ित की छाती पर चाकू या छुरी जैसी वस्तु से घाव लगा हो तो उसके शरीर का रंग तुरंत ही नीला पड़ने लगता है। सांस लेने पर आवाज आती है और सांस छोड़ने पर रक्त से सने झाग निकलते हैं। कभी-कभी रोगी के थूक के साथ खून भी आता है।
  • ऐसी स्थिति में घाव को बंद करना जरूरी होता है ताकि हवा छाती में न प्रवेश हो सके। इसके लिए घाव के किनारों को भींचकर आपस में मिला दें और उन्हें उस समय तक पकड़े रहें जब तक पैड तैयार नहीं हो जाते हैं।
  • फिर घाव को निर्जर्मित ड्रेसिंग से भर दें और उस पर रूई की मोटी तक रखकर कसकर पट्टी बांध दें या चिपकने वाला प्लास्टर लगा दें।

Tags: Ghav ke karan khoon behna, Khoon ko kaise roken, Chati ki chot ke karan raktsrav hona, Aantrik raktsrav