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मूत्रण


मूत्रण (मूत्रत्याग)

(Micturition or Urination)


      मूत्राशय खाली होने वाली क्रिया को ‘मूत्रण’ कहा जाता है। आम भाषा में इसे ‘मूत्र त्याग’ (urination) भी कहते हैं। रोजाना कोशिका गुच्छों (Glomeruli) से होकर लगभग 150 से 180 लीटर जल फिल्टर होता है। इसमें से सिर्फ 1.5 लीटर जल मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकलता है और बाकी, लगभग 99 प्रतिशत जल का पुनरवशोषण हो जाता है।

      मूत्र गुर्दों से निकलकर, मूत्र नलियों (ureters) से होता हुआ मूत्राशय में लगातार आता रहता है। मूत्राशय की धारिता (capacity) लगभग 600 से 800 मिलीलीटर होती है लेकिन मूत्राशय कभी-कभार ही पूर्ण रूप से भरता है। हर 10 से 20 सेकण्ड के अंतराल पर मूत्र नलियों की पेशीय परत में पैदा होने वाली क्रमाकुंचन तरंगे मूत्र को वृक्कीय (गुर्दे) श्रोणि (renal pelvis) से फुहारों के रूप में थोड़ा-थोड़ा मूत्राशय में पहुंचाती रहती है। जब मूत्राशय में लगभग 300 मिलीलीटर मूत्र जमा हो जाता है तो इससे मूत्राशय की भित्तियों के फैल जाने (तनाव) से उनमें मौजूद पेल्विक तंत्रिका के संवेदी तंत्रिकांत उत्तेजित हो उठते हैं। ये तनावग्राही तंत्रिकांत (stretch receptors) आवेगों को स्पाइनल कॉर्ड (सुषुम्ना) के सैक्रल क्षेत्र में पहुंचाते हैं, जहां पैरासिम्पेथेटिक न्यूरोंस उत्तेजित हो जाते हैं और तंत्रिका आवेग मस्तिष्क के उच्च केंद्रों (brain stem or cerebral cortex) तक पहुंचते हैं जिससे मूत्र त्याग करने की इच्छा पैदा होती है। जैसे ही संवेदी आवेगों की संख्या और बारम्बारता बढ़ती है, प्रेरक आवेग प्रतिवर्त क्रिया के रूप में मूत्राशय की डीट्रसर पेशी (detrusor muscle) का संकुचन तथा आतंरिक संकोचिनी पेशी का शिथिलन कर देते हैं, इससे आतंरिक मूत्रमार्गीय छिद्र खुल जाता है लेकिन बाह्य संकोचिनी पेशी का शिथिल होना अर्थात बाह्य मूत्रमार्गीय छिद्र का खुलना इच्छा पर निर्भर करता है। इससे मूत्र को इच्छित समय तक रोका जा सकता है। जैसे ही बाह्य संकोचिनी पेशी शिथिल होती है, मूत्राशय खाली होने लगता है और मूत्र शरीर से बाहर निकल जाता है। इस क्रिया में सांस के रोकने से डायाफ्राम पर तथा उदर-भित्तियों के संकुचन से मूत्राशय पर दबाव पड़ता है, जिससे उसे खाली होने में मदद मिलती है। जैसे ही मूत्र त्याग होना बंद होता है वैसे ही बाह्य संकोचिनी पेशी तथा श्रोणि तल की पेशियों में शक्तिशाली संकुचन होते हैं। स्त्रियों में, मूत्रमार्ग से मूत्र का शरीर से निष्कासन गुरुत्वाकर्षण के द्वारा होता है परंतु पुरुषों में मूत्र की अंतिम बूंदों का निष्कासन बल्वोकैवरनोसस पेशी (Bulbocavernosus muscle) के ऐच्छिक संकुचनों द्वारा होता है।

     शिशुओं में मस्तिष्क के उच्चतर केंद्रों का विकास नहीं हो पाता है, इसलिए उनका बाह्य संकोचिनी के ऐच्छिक पेशी तंतुओं पर नियंत्रण नहीं होता अर्थात बाह्य मूत्रमार्गीय छिद्र का खुलना इच्छित नहीं होता। शिशुओं में मूत्रत्याग मेरुदण्डीय प्रतिवर्त क्रिया (spinal reflex action) के द्वारा होता है जो मूत्र से भर जाने पर मूत्राशय के फैलने से शुरु होता है। पैरासिम्पैथेटिक न्यूरॉन्स मूत्राशय को संकुचित करते हैं और बाह्य संकोचिनी के ऐच्छिक पेशी तंतु शिथिल हो जाते हैं। इसके फलस्वरूप मूत्राशय से मूत्र अपने आप निष्कासित हो जाता है। जैसे-जैसे शिशु की आयु बढ़ती है वैसे-वैसे मस्तिष्क का विकास होता जाता है, जिससे बाह्य संकोचिनी के एच्छिक पेशी तंतुओं पर नियंत्रण बढ़ता जाता है और फिर मूत्रण की क्रिया इच्छित हो जाती है। 

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