मूत्र


मूत्र
(Urine)


मूत्र की मात्रा (Volume of Urine)- बर्हिकोशिकीय तरलों (रक्त सहित) की समुचित परासरणी सांद्रता (osmotic concentration) को बनाए रखने के लिए, व्यर्थ पदार्थों को शरीर से बाहर करने के लिए तथा गुर्दों की क्रियाशीलता को सही बनाए रखने के लिए रोजाना कम-से-कम 450 मिलीलीटर मूत्र बाहर निकलना जरूरी है। एक स्वस्थ व्यक्ति सामान्य शारीरिक क्रियाशीलता तथा जल ग्रहण करने पर रोजाना 1000 से 1800 मिलीलीटर मूत्र का त्याग करता है।

     त्यागे हुए मूत्र की मात्रा जल अंतर्ग्रहण (water intake), भोजन, बाह्य तापक्रम, हॉर्मोंनल और एन्जाइमेटिक क्रियाओं, ब्लड प्रेशर, मूत्रल औषधियों (diuretics) तथा भावावेगी दशाओं (emotional states) द्वारा प्रभावित हो सकता है। पसीना अधिक आने पर, दस्त या उल्टियां अधिक आने पर, ज्यादा शारीरिक श्रम करने आदि से मूत्र की मात्रा घट जाती है।

     मूत्र की मात्रा तथा सांद्रता का नियमन एंटिडाइयूरेटिक हॉर्मोन (ADH), एल्डोस्टेरोन (Aldosterone) हॉर्मोन तथा रेनिन (renin) नामक एन्जाइस द्वारा भी होता है। पिट्यूटरी ग्रंथि से स्रावित होने वाला ADH संग्राही नलिकाओं  (collecting ducts) की भित्तियों की प्रवेश्यता (permeability) को नियंत्रित करता है। शरीर में जल की कमी (dehydration) होने पर, ADH का अधिक मात्रा में स्राव होता है, जिससे मूत्र कम मात्रा में शरीर से बाहर निकलता है। शरीर में जल की अधिकता (overhydration) होने पर ADH का कम मात्रा में स्राव होता है तथा मूत्र अधिक मात्रा में शरीर से बाहर निकलने लगता है। एड्रिनल ग्रंथि के कॉर्टेक्स से स्रावित होने वाला एल्डोस्टोरोन (aldosterone) हॉर्मोन गुर्दों से सोडियम के पुनरवशोषण को बढ़ाता है जिससे मूत्र में सोडियम की मात्रा कम हो जाती है।

     वृक्कीय (गुर्दे) परिसंचरण में रक्त-दाब के बढ़ जाने से गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्पन्द-क्रिया दर में वृद्धि होती है जिसके फलस्वरूप मूत्र की मात्रा बढ़ जाती है। इसके विपरीत रक्त-दाब के ज्यादा घट जाने पर निस्पन्दन क्रिया में रुकावट पहुंचती है और मूत्र की मात्रा घट जाती है।

     वृक्कीय (गुर्दे) कोशिकाओं के तरल में परासरणी दाब (osmotic pressure) अधिक होने पर जल फिल्टर (छनना) नहीं हो पाता जिससे मूत्र की मात्रा घट जाती है।

विसर्जित होने वाले मूत्र की मात्रा सक्रिय कोशिका गुच्छों (active glomeruli) की संख्या और उनकी कार्यक्षमता, कोशिका गुच्छीय निस्यन्दक कला तथा वृक्कीय (गुर्दे) नलिकाओं की अवस्था पर भी निर्भर करता है।

     कुछ विशेष उत्तेजक खाद्य पदार्थ जैसे- सरसों, मिर्च, चाय, कॉफी तथा एल्कोहल और अधिक मात्रा में विटामिन ‘सी’ के सेवन से मूत्र ज्यादा पैदा होता है। इसके विपरीत निकोटिन मूत्र के उत्पादन को कम कर देता है जिससे सोते समय मूत्र बनना कम हो जाता है। यही कारण है कि हम रात में सोते समय डिस्टर्ब नहीं होते हैं।