मुद्रा द्वारा चिकित्सा

Mudraon dwara vibhinn prakar ke rogon ka ilaj kiya ja sakata hai jaise:- adhe sir ka dard, aamashya ki jalan aur soojn, aamashy ka ghav, patale dast ya atisar.


मुद्राओं द्वारा चिकित्सा


आधे सिर का दर्द    |    आमाशय की जलन और सूजन    |    आमाशय का घाव (अल्सर)    |    अनार्तव ऋतुरोध    |    पतले दस्त या अतिसार    |   बेहोशी, मानसिक तनाव    |     ब्रांकियल अस्थमा    |    एक्यूट ब्रोंकाइटिस    |     एलर्जी    |    उच्च रक्त चाप (हाई ब्लडप्रेशर)    |    हृदयशूल (दिल का दर्द)    |    जोड़ों का दर्द,   गठिया    |    कामला, पीलिया, पांडु    |    खांसी    |    खून आंत के दस्त (अमीबिक पेचिश)    |    निम्न रक्तचाप (लो ब्लडप्रेशर)    |    मधुमेह (शूगर)    |    मासिकधर्म का कष्ट से आना    |    मासिक धर्म की अनियमितता    |    कब्ज    |    मुद्रा चिकित्सा    |    मूत्राशय की सूजन    |    यकृत वृद्धि (जिगर का बढ़ना)    |    वायुगैस (अफारा)    |    टायफाइड, आंत्रिक ज्वर    |    सन्निपात    |    स्नायविक दुर्बलता    |    सर्दी-जुकाम    |    पसली का दर्द या पसली का चलना    |    श्वेत प्रदर और स्वप्नदोष    |    पेट दर्द या मरोड़

मनुष्य का शरीर सिर्फ हडि्डयों और मांस का ढांचा नहीं है, बल्कि ज्ञान को दर्शाने का एक बहुत ही अच्छा जरिया है। उसमें रमा आत्म-तत्व अनावृत होकर ही ईश्वर बन सकता है। जो ज्ञान पूरी तरह अनावृत हो जाता है, उसे ही ईश्वर कहते हैं। जो अणु स्कन्ध में है, वही शरीर में है। शरीर में कोई सा भी तत्व बढ़ जाने या कम हो जाने पर उसके अंदर रोग पैदा होने लगते हैं। रोग को बढ़ने से रोकने के लिए ही मुद्राओं को किया जाता है। मुद्राओं को करने से तत्वों के बिगड़ने से होने वाले रोग समाप्त हो जाते हैं।

          शरीर के अंदर रुका हुआ विकार ही रोग कहलाता है। शरीर जब इस विकार को अपने अंदर से बाहर निकालने की कोशिश करता है तब इसे रोग का नाम दिया जाता है। मनुष्य के शरीर की रचना ही इस तरह से की गई है कि उसके अंदर कोई भी खराब तत्व ज्यादा लंबे समय तक नहीं रुक सकता।

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