मालिश का महत्त्व


मालिश का महत्त्व

Importance of massaging


परिचय-

        हर चीज जो किसी भी व्यक्ति के शरीर के लिए लाभकारी होती है उसका व्यक्ति के जीवन में खास महत्त्व होता है। ऐसे ही मालिश का मनुष्य के जीवन में विशेष महत्त्व होता है क्योंकि जब बच्चे का जन्म होता है तो दूसरे ही दिन से उसकी मालिश होनी शुरू हो जाती है। बच्चे को थपकी देकर सुलाया जाता है, सहलाया जाता है, ताकि तेजी से उसका विकास हो सके। आम लोगों का मत है कि इससे बच्चा हष्ट-पुष्ट (शक्तिशाली) होता है और उसकी हडि्डयां मजबूत तथा मांसपेशियां सशक्त होती हैं। यह ऐसी पद्धति है, जिसे कोई सिखाता नहीं है, बल्कि यह काफी लम्बे समय से चली आ रही है।

मालिश के महत्त्व को और तरह से स्पष्ट करने के लिए कुछ एक उदाहरण लिये जा सकते हैं-

        जैसे पक्षी अण्डा देने के बाद उसे तब तक अपने शरीर की गर्मी से सहलाता रहता है जब तक कि बच्चा अण्डे से बाहर निकल न जाए और बच्चे के निकलने के बाद भी पक्षी अपने पंखों से उसके शरीर की मालिश करते हैं, जिससे उसमें जीवन का संचार तेजी से होता है। उनके लिए गति ही जीवन होती है, जो उसकी मां से उसे जन्म लेते ही मिलनी आरम्भ हो जाती है।

        घोड़े के बारे में सभी को पता है कि वह सारा दिन अपने मालिक के लिए बहुत अधिक परिश्रम करता है, तब शाम को उसका मालिक उसकी मालिश करके उसकी दिनभर की थकान दूर कर देता है। फिर वह उसे मिट्टी में लिटाने के लिए मैदान में ले जाता है, जहां घोड़ा मिट्टी में रगड़ खाता है तथा आनन्द की प्राप्ति करता है। अगर घोड़े की मालिश उसके मालिक द्वारा न की जाए तथा न ही मिट्टी में लेटने का अवसर दिया जाए, तो कुछ ही दिनों में वह बीमार पड़ जाएगा, कमजोर हो जाएगा, चाहे उसे कितनी ही अच्छी खुराक क्यों न दी जा रही हो। इसी प्रकार, सभी जानवर किसी-न-किसी रूप में अपने शरीर की मालिश करते हैं। इसके अलावा रोते बच्चे को उसकी मां का स्नेह-स्पर्श सारे दुखों से छुटकारा दिलाता है और वह हर प्रकार से निडर होकर खुद को सुरक्षित समझकर प्रसन्न हो जाता है। अगर आपको किसी से अपना काम कराना है तो उसे प्यार से अपने पास बुलाइए, उसकी पीठ पर हाथ फेरिए और अपने कार्य विशेष के लिए प्रयोग कीजिए।

        आजकल खेलकूद की प्रतियोगिताएं होती रहती हैं। सामूहिक कार्यक्रमों का भी आयोजन किया जाता है। इन कार्यक्रमों में भाग लेने वाले को अगर शाबाशी दे दी जाए, जीतने वाले की पीठ ठोंक दी जाए तो उसकी थकान दूर हो जाती है। उसका उत्साह बढ़ जाता है और वह दोगुने वेग से काम करने लगता है तथा बढ़-चढ़कर प्रतियोगिताओं में भाग लेने लगता है। यह सब मालिश का ही एक रूप है, जो प्राचीन समय से चली आ रही है। न इसके लिए विधान बनाया गया है और न ही ग्रंथों द्वारा इसकी उपयोगिता सिद्ध की गई है। दरअसल यह मानव की स्वाभाविक प्रकृति का नतीजा है।

        मनुष्य को जिस प्रकार अपने शरीर की रक्षा के लिए भोजन की आवश्यकता होती है, उसी प्रकार जीवन को सही ढंग से चलाने के लिए, उत्साहपूर्वक जीवन व्यतीत करने के लिए, स्वस्थ रहने के लिए तथा लम्बी आयु के लिए मालिश की आवश्यकता होती है, जो जाने-अनजाने मनुष्य को मिलती रहती है।

यदि मनुष्य मालिश का उपयोग न करे तो उसके जीवन में कोई उत्साह नहीं रहता। उसमें हीन-भावना पैदा हो जाती है। वह जीवन में असफल होकर रोगी हो सकता है तथा जल्दी मृत्यु को भी प्राप्त हो सकता है।

        अक्सर हमें आए दिन आत्महत्या की घटनाएं सुनने को मिलती रहती हैं। कुछ व्यक्ति पागल भी हो जाते हैं। उनकी नाड़ी की कमजोरी और बुद्धि मन्द हो जाती है। वास्तव में मनुष्य की इन सब बीमारियों का कारण किसी-न-किसी रूप से मालिश का न मिलना ही होता है।

        इन्हीं बातों को ध्यान में रखते हुए अनेक विद्वानों ने मालिश के गुण बताये हैं और मालिश के नए-नए तरीके खोजकर चिकित्सा का निर्माण किया है।

आयुर्वेद के ग्रंथों में भी मालिश के प्रयोगों और इसके ढंगों का उल्लेख है, जिनका वर्णन किया जाता है-

  • गाड़ी के पहियों में तेल डालने के बाद चाहे जितना भी भार क्यों न हो, वे मजबूत बनकर उसे आसानी से सहन कर लेते हैं। इसी प्रकार तेल की मालिश से भी व्यक्ति शक्तिशाली बनता है, उसका शरीर मजबूत हो जाता है और वात सम्बंधी कोई भी बीमारी उसे घेर नहीं सकती। जब शरीर इस तरह स्वस्थ रहता है, तब उसे कितनी भी मेहनत क्यों न करनी पड़े, उसे थकान महसूस नहीं होती। उसमें सहन शक्ति आ जाती है। इसके अलावा खाल में एक प्रकार का तेज और लचीलापन भी आ जाता है।

        सबसे अधिक स्पर्शज्ञान त्वचा में होता है क्योंकि वायु सदैव त्वचा को स्पर्श करती रहती है। `अभ्यंग स्नान´  के स्पर्श से त्वचा की शक्ति बढ़ती है, इसलिए मनुष्य को रोजाना अपने शरीर की मालिश करानी चाहिए। इससे मनुष्य मजबूत और सहनशील बनता है। मालिश कराने के बाद मनुष्य कितनी भी मेहनत करे, उसे परेशानी का अहसास नहीं होता। अत: हर मनुष्य को नियामित रूप से `अभ्यंग स्नान´ करना चाहिए। हमारे देश के आंध्र प्रदेश राज्य में `अभ्यंगस्नान´ की प्रथा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। इसको परिभाषित करने के लिए अनेक प्रकार के श्लोक और उनके अर्थ बताए गए हैं।

पहला- कहने का अभिप्राय यह है कि शरीर की मालिश, श्रमनाशक, धातुओं को पुष्ट करने वाली, नींद और सुख देने वाली, सांस, त्वचा और खून को निर्मल करने वाली और वात व कफ को समाप्त करने वाली होती है।

दूसरा- हमेशा शरीर पर तेल मलने से वात रोग दूर होते हैं, सभी अंग पुष्ट होते हैं, दृष्टि गरुड़ के समान हो जाती है, निद्रा और सुख मिलता है, बुढ़ापा दूर होता है। शरीर में शक्ति उत्पन्न होती है और रंग स्वर्ण के समान तेजयुक्त हो जाता है।

तीसरा- पांवों में तेल मलना निद्राजनक, आंखों के लिए लाभदायक और पांवों के रोगों को दूर करने वाला है। आंखों के दोनों छिद्रों में जो दो शिराएं हैं, वे दोनों पांवों सें लगी हुई होती हैं। अत: पांवों में तेल की मालिश आंखों के लिए लाभकारी होती है। अत: आंखों का सुख चाहने वाले मनुष्य को सदैव पांवों में तेल की मालिश करनी चाहिए।

चौथा- शरीर पर तेल मलकर जल में स्नान करने से शरीर में बल की बढोत्तरी होती है।

पांचवा- कफ-ग्रस्त और अजीर्ण (भोजन का न पचना) रोग के रोगी को अपने शरीर पर तेल आदि की मालिश नहीं करनी चाहिए।

छठा- शरीर में इस प्रकार तेल की मालिश करें, जिससे बालों की जड़ों में, रोमकूपों में तथा शिराओं में तेल पहुंच सके।

        आयुर्वेद की ही भांति सुश्रुत, मदनपाल, निघंटु चक्रपाणि, दत्तकृत्त संग्रह और वाग्भट्ट आदि अनेक ग्रंथों में मालिश का विशेष रूप से उल्लेख मिलता है।

        मानव के लिए मालिश कितनी आवश्यक है, इसके बारे में बताई गई परिभाषाओं से स्पष्ट हो जाता है। यह संजीवनी का काम करती है। मालिश द्वारा हम अपनी मांसपेशियों को शिथिल करते हैं और रक्त के दौरे को बढ़ाते हैं। जिससे शरीर में उत्पन्न विकार शिराओं द्वारा फेफड़ों में आकर ऑक्सीजन के सम्पर्क से शरीर से बाहर निकलता है। इस प्रकार से हमारा शरीर विभिन्न प्रकार की बीमारीयों से दूर होकर अपने आप स्वस्थ बना रहता है। टूटे हुए पुराने कोषाणुओं की जगह नए कोषाणु आ जाते हैं। पुराने कोषाणुओं को भोजन मिलता रहता है। बीमारी को नष्ट करने वाली शक्ति का विकास होता है। मालिश के निरन्तर प्रयोग से यौवन, सुडौलता और सुन्दरता में बढ़ोत्तरी होती है तथा आयु लम्बी होती है।

        मनुष्य के शरीर में 519 पेशियां होती हैं जो मनुष्य को कार्य करने, इधर-उधर मुड़ने, बैठने-उठने, फैलने और सिकुड़ने में सहायता करती हैं। शरीर की मांसपेशियां जितनी ढीली और स्वस्थ होंगी किसी भी काम को करने में उतनी ही आसानी होगी जैसे- मांसपेशियों के कारण मनुष्य कठिन व्यायाम, मल्ल-युद्ध, पर्वतारोहण और कार्य भी बड़ी सुगमता से कर सकता है। यदि इन पेशियों के हिसाब से तथा इनके ज्ञान पर आधारित अनुभवों से शरीर की मालिश की जाए तो हमें मालिश का पूरा-पूरा लाभ मिल सकता है।

        अस्वस्थ पेशियों से शरीर का अंग-संचालन सम्भव नहीं क्योंकि पेशियां शरीर के अवयव हैं। यदि पेशियों का पूर्ण ध्यान न रखा जाए और इन्हें पूरी खुराक न दी जाए तो ये पेशियां अस्वस्थ हो जाएंगी। जिससे शरीर में झुर्रियां पड़ जाएंगी और शरीर के कार्य करने की कार्यक्षमता और योग्यता कम हो जाएगी। शरीर में अकड़ाहट और आलस्य भर जाएगा। इसलिए हम सहज ही अनुमान लगा सकते हैं कि पेशियों की हमारे शरीर में कितनी आवश्यकता है।

        आज का युग मशीनी युग के नाम से जाना जाता है। हर व्यक्ति बड़ी तेजी से भाग-दौड़ में लगा रहता है। ऐसे में शरीर का पूरा ध्यान नहीं रखा जाता। हर मनुष्य का आज यही लक्ष्य है कि मेरे पास धन-दौलत, सुख, ऐश्वर्य, मोटरगाड़ी, मकान आदि सुविधाएं मौजूद हों इसके लिए वह भागता रहता है और अपने शरीर के स्वास्थ्य पर कोई ध्यान नहीं देता। आज संसार में स्वास्थ्य की नजर से मानव कितना कमजोर हो गया है, यह हम सब जानते हैं। दिन-प्रतिदिन रोगों की संख्या बढ़ती जा रही है, नए-नए अस्पताल और क्लीनिक खुलते जा रहे हैं। कीड़े-मकोड़ों की भांति रोगी अस्पतालों तथा चिकित्सालयों में भरे पड़े हैं। असंख्य रोगों पर विजय प्राप्त करने के लिए विज्ञान ने बहुत प्रगति की है। इस समय करोड़ों दवाईयों का आविष्कार हो चुका है और हो रहा है परन्तु मानव फिर भी अनेक प्रकार के रोगों से पीड़ित है।

        इन सबका कारण यह है कि आज हम सब जरूरी बातों को भूलकर काम कर रहे हैं। यदि पेड़ की जड़ों को पानी न देकर उसके तनों और पत्तों को पानी दिया जाए तो पेड़ बिल्कुल भी हरा नहीं रह सकता, वह कुछ ही समय में सूख जाएगा। इस प्रकार हम भी अपने शरीर रूपी पेड़ की जड़ों को पानी न देकर उसके तनों तथा पत्तों की तरफ ध्यान दे रहे हैं। शरीर की जड़ों को पानी देने का अभिप्राय यह है कि हम अपने रहन-सहन, खान-पान आदि पर पूरा ध्यान दें, जो कि हम बिल्कुल नहीं करते। आज यदि हम रोग से पीड़ित हो जाते है, तो तुरन्त दवाई का सहारा लेते हैं और रोग को अपने अन्दर ही दबा लेते हैं। यही रोग समय-समय पर अन्य रोगों को बढ़ावा देते रहते हैं।

        आजकल हमारे जीवन में दिखावा इतना बढ़ गया है। सुबह देर से उठना तथा उठते ही चाय पीने की गंदी आदत हमारे अन्दर प्रवेश कर चुकी है। यह आदत हमारे स्वास्थ्य को अधिक हानि पहुंचाती है तथा हमें रोगी बनाती है। सुबह उठते ही चाय पीने से हमारी भूख और प्यास दोनों खत्म हो जाती है। रात-भर सोते रहने से शरीर में गर्मी और खुश्की पैदा होती है और पाचन-तंत्र में भी बहुत गर्मी आ जाती है। सुबह ठण्डा पानी पीने से जहां अन्दर की गर्मी शान्त होती है, वहीं पाचन-तंत्र धुलकर और निर्मल होकर फिर से काम करने के लिए तैयार हो जाता है। इससे शरीर में नई चेतना का विकास होता है। आंखों की रोशनी में बढ़ोत्तरी होती है तथा अधिक पेशाब आकर शरीर की बीमारियां बाहर निकल जाती हैं। साथ ही मल की निकासी भी होती है, जिससे हमारा पेट ठीक रहता है। पाचक रस अधिक निकलता है और भूख भी बढ़ती है।

        इतना सब कुछ होने के बाद भी हम किसी भी चीजों पर ध्यान नहीं देते और यह सोचकर सन्तुष्ट हो जाते हैं कि यदि कोई रोग हो गया तो डॉक्टर तो है ही दवाई खाकर कुछ ही देर में ठीक हो जाएंगे।

        मनुष्य के स्वास्थ्य के प्रति ध्यान न देने के कारण आजकल व्यायाम करने की आदत प्राय: लुप्त होती जा रही है। हम खुली हवा तथा धूप को अपनी त्वचा से स्पर्श ही नहीं होने देते। हमेशा अपने शरीर को तंग व अधिक कपड़ों से ढककर रखते हैं। सुबह की स्वच्छ हवा, खुली धूप, प्रतिदिन व्यायाम और ढीले व कम कपड़ों का लाभ उठाते ही नहीं हैं। इन सब बातों का वास्तविक लाभ और आनन्द वही लेता है, जो अपनी दिनचर्या में इन्हें स्थान देता है।

        अपने शरीर की सफाई आदि का भी हम कोई खास ध्यान नहीं रखते। देर से उठने की आदत तो है ही, ऊपर से उठते ही काम पर या स्कूल-कॉलेज जाने की जल्दी लग जाती है। जल्दी-जल्दी स्नान किया या हाथ-मुंह ही धो लिए, दांत साफ या नहीं किए, जल्दी से तैयार हुए, जल्दी नाश्ता या भोजन किया और भाग निकले। क्या इस प्रकार की भाग-दौड़ में हम रोगों से बच सकते हैं यदि हां, तो ऐसा सोचना अपने आपको धोखा देने के अलावा और कुछ नहीं है।

        आधुनिक युग में मनुष्य पैसे के लिए लगातार भाग-दौड़ में लगा हुआ है जिसे देखकर हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि विज्ञान चाहे कितनी भी उन्नति क्यों न कर लें, चाहे संजीवनी बूटी जैसा चमत्कार करने वाली किसी दवाई की खोज ही क्यों न कर लें, परन्तु वह फिर भी मानव को पूर्णरूप से स्वस्थ नहीं कर सकती है।

        रात को अधिकांश लोग बन्द कमरों में सोते हैं और सोते हुए कुछ लोग अपना मुंह भी ढक लेते हैं, जिससे सोते रहने तक बदबू वाली हवा हमारे फेफड़ों में जाती रहती है और हमारे रक्त यानी खून में बीमारी पैदा हो जाती है। दिन में भी हम लोग लम्बी और गहरी सांस नहीं लेते। सर्दी-गर्मी तथा वायु से डरकर हम दूर भागते हैं जिस कारण हम दिन-प्रतिदिन कमजोर होते जा रहे हैं। यानी अपने शरीर को स्वस्थ रखने के एक भी नियम पर हम नहीं चलते। जब स्वास्थ्य बिगड़ जाता है तो हम स्वास्थ्य लाभ पाने के लिए कभी इस डॉक्टर के पास, कभी उस डॉक्टर के पास भागते हैं। जब कोई लाभ नहीं होता तो अपने भाग्य को कोसकर रोने बैठ जाते हैं, लेकिन इन सब बातों से मानव का कोई भला नहीं हो सकता।

        भोजन हमारे जीवन में कितना उपयोगी है, यह सब जानते हैं, परन्तु आजकल हमारा भोजन भी गलत ढंग का बनता है। जो भोजन हमें जीवन देने वाला है तथा जो हमारे कार्य करने की क्षमता को बढ़ाता है, वही भोजन आज हमारी शक्ति को नष्ट करके हमें रोगी बना रहा है। आंकड़ों से पता चलता है कि जितने रोग और मौतें विश्व में गलत खान-पान के कारण हो रही हैं, उतनी भुखमरी से नहीं होती है। वर्तमान समय में मानव केवल जीभ के स्वाद के पीछे पागल हुए जा रहा है। चाहे हमारे पेट में जगह हो या न हो, शरीर को भोजन की आवश्यकता हो या न हो, खाने का समय हो या न हो, जहां कुछ चमकदार मिठाइयां या कोई अन्य पदार्थ दिखाई दिए नहीं कि पेट में ठूंसना शुरू कर देते हैं। बिना भूख के खाते हैं। भोजन को तलकर, भूनकर और अन्य बेढंगे तरीके से बनाकर खाते हैं। इससे शरीर में रोग विकार उत्पन्न नहीं होंगे तो क्या होंगे।

        विज्ञान ने भी हमारे भोजन में विटामिन तथा खनिज लवणों के होने की अनिवार्यता का अनुभव किया है और इस पर बल भी दिया है, परन्तु हम अपने भोजन में इन सब तत्वों को नष्ट करके खाते हैं। डॉक्टर भी भोजन तथा उसके तत्वों को ध्यान में न रखकर केवल दवाइयों के प्रयोग पर अधिक बल देते है। जबकि डॉक्टरों को चाहिए कि वे अपने रोगियों को अधिक दवाई देने के स्थान पर भोजन से अनिवार्य तत्त्वों को ग्रहण करने की सलाह दें। उन्हें चाहिए कि रोगियों को हरी सब्जियां व फलों के रसों के सेवन पर बल दें। डॉक्टरों पर देश के स्वास्थ्य की रक्षा का भार है, अत: उन्हें इस ओर अवश्य ध्यान देना चाहिए। तभी मनुष्य के स्वास्थ्य में सुधार आ सकेगा तथा मानव समाज सुखी हो सकेगा। यह बात पूरी तरह से सच है कि जब तक हम स्वास्थ्य ठीक रखने के सरल नियमों का पालन नहीं करेंगे तब तक हम रोगों से छुटकारा नहीं पा सकते हैं।

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