मानव शरीर संरचना के आधारभूत घटक

Manav sharir sanrachana ke mool ghatak jaise koshika, ootak manspeshiyan, asthibandh, asthi, upasthi, jiwan vigyan uar rasayan ka sakshipt vivaran

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मानव शरीर संरचना के आधारभूत घटक


मानव शरीर संरचना के मूल घटक जैसे कोशिका, ऊतक मांसपेशियां, अस्थिबंध, अस्थि, उपास्थि, जीवन विज्ञान, और रसायन का संक्षिप्त विवरण :-

कोशिका या सेल्स :

          कोशिका मानव शरीर की सबसे छोटी इकाई है। ये विभिन्न प्रकार और आकार की होती है। आकार और प्रकार के अनुसार इनका व्यास 0.0000075 मिलीमीटर से 0.1 मिलीमीटर तक होता है। ये कोशिकाएं नंगी आंखों से नहीं देखी जा सकती लेकिन ये सूक्ष्मदर्शी यंत्र द्वारा देखी जा सकती है। इनका आकार, चपटे धागे के समान या ईंट के समान होता है। इन सूक्ष्म कोशिकाओं में संचार व्यवस्था, ऊर्जा उत्पादक केन्द्र, आनुवांशिकी व्यवस्था, यातायात व्यवस्था, प्रोटीन निर्माण व्यवस्था आदि का समावेश है। ये बहुत छोटी, जटिल जीवंत है। कोशिकाओं के निम्न 3 प्रमुख भाग है:-

आवरण (परत):-

          कोशिका का आवरण एक झिल्ली के समान होता हैं और 3/10,000,000 इंच मोटा होता है। इस आवरण को प्लाज्मा मेम्ब्रन कहते हैं। आवरण के अंदर `साइटोप्लाज्म´ जैली जैसा द्रव्य पदार्थ होता है। ये झिल्ली इतनी नाजुक होते हुए भी कोशिका के अंदर के द्रव को सुरक्षित रखती ही है साथ-साथ ये एक प्रकार के कवच का काम भी करती है जो अंदर कुछ विशेष प्रकार के द्रव्यो को ही जाने देती है बाकी सभी को बाहर रोक देती है इसलिए यह आवरण एक चालाक प्रहरी की तरह सदा काम करता है। यह आवरण सूचनाओं के आदान-प्रदान और आवागमन का माध्यम भी है। आवरण की बाहरी सतह पर स्थित प्रोटीन के कुछ प्रमाण कुछ अन्य प्रकार के परमाणु के संग्राहक होते हैं यानी कुछ विशेष प्रकार के परमाणु संग्राहक प्रोटीन परमाणुओ से बंध को प्राप्त करते हैं। उदाहरण के लिए अत:स्रावी ग्रंथियों से निकले कुछ हारमोन्स झिल्ली पर स्थित संग्राहक परमाणु से बंध प्राप्त करते हैं। फिर ये कोशिकाएं अपनी कार्यशैली में बदलाव लाती है। आवरण झिल्ली में दूसरी कोशिकाओं को पहचान करने की क्षमता होती है। सतह पर उपस्थित प्रोटीन गुणात्मक पहचान में सहायक होते हैं। अंग प्रत्यारोपण में टिशू कल्चर के माध्यम से उपरोक्त तथ्य का उपयोग होता है।

जीवंत द्रव्य पदार्थ (साइटोप्लाज्म):- यह द्रव जैली जैसा अपारदर्शी पर रंगहीन नाभिक और आवरण झिल्ली के बीच में होता है। इसमें कई बहुत छोटे आर्गनैली या सूक्ष्मांग रहते हैं। इन्हे नंगी आंखो से नहीं देखा जा सकता है। इन्हें इलेक्ट्रान सूक्ष्मदर्शी यंत्र से कई हजार गुणा बड़ा करके ही देखा जा सकता है। प्रत्येक आर्गनैली के भिन्न-भिन्न काम होते हैं। कुछ प्रोटीन परमाणु के यातायात के काम आते हैं जो कि सतह को चिकना बनाते हैं। कुछ एन्जाइम्स पाचक तत्व और प्रोटीन का निर्माण करते हैं जो कुछ आर्गनैली कोशिकाओं को जीवित रखने में सहायक होते हैं।

माइटोकांड्रिया नामक आर्गनैली ऊर्जा बनाने का काम करती है। इसके अंदर होने वाली जटिल रासायनिक क्रिया से एक ऐसा पदार्थ उत्पन्न होता है जो उत्पन्न ऊर्जा को जमा कर लेता है। जिसका नाम एडिनोसीन ट्राइफास्फेट है जो प्राणों की ऊर्जा का स्रोत है इसलिए माइटोकांड्रिया को कोशिकाओं का पावर हाऊस कहा जाता है। इसकी सतह पर पाये जाने वाले एन्जाइम रासायनिक उत्प्रेरक आक्सीजन के माध्यम से ग्लूकोज, पोषक तत्व और ऊर्जा पैदा करते हैं।

नाभिक (न्यूक्लियस) या केन्द्रक:-

सूक्ष्मदर्शी यंत्र से देखने पर कोशिका के नाभिक (न्यूक्लियस) की संरचना काफी सरल प्रतीत होती है। वह कोशिका केन्द्र में एक सूक्ष्म गेंद की तरह होती है। नाभिक एक केन्द्रीय आवरण के अंदर स्थित हैं। आवरण के अंदर `न्यूक्लियोप्लाज्म´ नाम का विशेष द्रव्य रहता है। नाभिक जटिल और गम्भीर कार्य करता है। यह साइटोप्लाज्म में विद्यमान प्रत्येक आर्गनैली को और कोशिका की पुन: उत्पति को नियंत्रित करता है।

न्यूकिलयोपलाज्म के दो विशेष घटक:-न्यूक्लियोलस और क्रोमैटिन क्रमश: निम्न कार्यो से विशेष महत्वपूर्ण है।

1. प्रोटीन के निर्माण हेतु राइबोसोम्स का उत्पादन करते हैं जो आवरण झिल्ली से बाहर साइटोप्लाजम में प्रोटीन निर्माण करते हैं।

2. क्रोमैटिन की संरचना धागे जैसी होती है जो प्रोटीन और अनुवांशिकी द्रव्य डी. एन. ए. (डिऑक्सीराइबो न्यूक्लीक एसिड) से होती है। यह डी.एन. ए अनुवांशिक पदार्थ है जो कि लिंग निर्धारण शरीर संस्थान निमार्ण यह तक कि चमड़ी और बालों के रंग तक के लिए उत्तरदायी होता है। डी.एन.ए. में आवश्यक अनुवांशिकी सूचनाएं होती है।

कोशिकाओं का विभाजन:- मानव कोशिकाओं का पुननिर्माण और उनकी संरचनना में वृद्धि एक विशेष विधि द्वारा होती है जिसे `माईटोसिस´ कहते है। प्रक्रिया में एक कोशिका दो भागों मे विभाजित हो जाती है और अनुवांशिकी विशेषताऐं प्रतिलिपि की तरह स्थानांतरित हो जाती है। यह स्थानांतरण प्रोटीन के निर्माण से संबंधित होता है। प्रोटीन के निर्माण में डी. एन. ए. और आर.एन.ए. ये दो नाभिक अम्लाणु उत्तरदायी होते है। विभाजन की यह क्रिया जीवन भर चलती रहती है।

बहुकोशिकीय मानव शरीर का निर्माण मां के गर्भ में ही होता है। जहां एक कोशिकीय शुक्राणु डिम्बाणु से निषेचित होकर क्रमश: विभाजित होता रहता है और यें प्रक्रिया तब तक चलती है जब तक मानव शरीर का पूरा निर्माण नही हो जाता है। निषेचित डिम्बाणु में संग्रहित असंख्य अनुवांशिकी सूचनाओं का स्थानांतर ज्यों का त्यों सभी कोशिकाओं में प्रतिलिपि की भांति हो जाता है। कोशिका के अंदर विद्यमान डी.एन.ए अणु में ग्लुकोज, क्षार और फास्फेट की बहुत कम मात्रांए होती है। प्रत्येक डी.एन.ए की संरचना हेलीकल स्प्रिंग या लचीली एवं कुण्डलाकार होती है जिसमें युगल क्षारीर अणु के दो-तीन गुणसूत्र होते है। क्षारीय युगलों का एक अनुक्रम होता है जो कि अनुवांशिकी विशेषताएं निर्धारित करते है। जिसे जीन कहते है।

जीन में क्षारीर युगलों का गुणसूत्र (क्रोमोसम) में विशेष क्रम : -प्रत्येक जीन विशेष प्रकार के प्रोटीन की संरचना का निर्देश करता है। मानव कोशिका शरीर की प्रत्येक कोशिका में 46 गुणसूत्र होते है। नाभिक डी.एन.ए संपूर्ण हैं। अनवांशिकी  सूचनाएं संवेदित कर प्रस्तुत करता है। जिन्हे `जीनोम´ कहते है। इससे तीन लाख क्षारीय युगल 23 युगल गुण-सुत्रों में अलग-अलग व्यवस्थित होते है जो कि माता-पिता से प्राप्त होते है।

यह बहुत सोचने वाली बात है कि मानव शरीर की प्रत्येक कोशिका में विशाल अनुवांशिकी सूचनाओं के कारण कोई भी दो व्यक्ति एक जैसे नही होते है। अनुवांशिक संहिता सूचनाओं का यह विशाल भंडार `जीनेटिक कोड´ कहलाता है। यही सूचना संहिता प्रोटीन को नियंत्रित करती है, किण्वक यानी एन्जाइम उत्पन्न करती है। एन्जाइम ही कोशिकाओ में रासायनिक क्रिया सुसाध्य करते है। कोशिकाओं की यह रसायनिक प्रक्रिया उनकी संरचना, कार्य और अनुवांशिकी निर्धारित करती है। आर.एन.ए के परमाणु में एक ही पंक्ति रहती है। यह आर.एन.ए. और डी.एन.ए. की सूचनाओं के आधार पर नई कोशिका को मूल रूप प्रदान करता है। गर्भावस्था में आरम्भ हुई कोशिका विभाजन की क्रिया जीवन भर चलती रहती है। एक ओर लाखों की संख्या में जीर्ण कोशिकाएं नष्ट होती रहती है तो दूसरी ओर विभाजन की प्रक्रिया द्वारा नई कोशिकाओं के द्वारा प्रतिपूर्ति होती है। ये सभी नई नई कोशिकाऐं अपनी जनन कोशिका की प्रतिकृति होती है।

अपवाद:-

1. शरीर के विभिन्न अंगों में विभिन्न प्रकार की कोशिकाऐं जन्म से मृत्यु के दौरान अपना अपना निर्धारित कार्य करती है, जीवित कोशिकाओं के पोषक हेतु आक्सीजन, पानी, पोषक तत्व और उचित तापमान आदि आवश्यक होते हैं जिनकी पूर्ति वे अन्य कोशिकाओं से करती है। उदाहरण के लिए पाचनतंत्र की कोशिकाएं भोजन का शोषण करती हैं, फेफड़ों की कोशिकाएं ऑक्सीजन ग्रहण करती हैं। इस प्रकार सह अस्तित्व के सिद्धांत का पालन करती हुई अपना निर्धारित कार्य करती हैं।

2. मस्तिष्क की कोशिकाओं को न्यूरोन कहते हैं। जीर्णशीर्ण न्यूरोन मृत होते रहते है परंतु उनकी प्रतिपूर्ति नहीं होती है।

ऊतक:- एक समान संरचना वाली कोशिकाओं का समूह ऊतक (टिशू) कहलाता है। इन्हीं ऊतकों से विभिन्न अंगों और शरीर का निर्माण होता है। मुख्य रूप से ये निम्न प्रकार के होते हैं:-

आच्छादक ऊतक (इपिथिलील टिशु):-

1. ये बाहरी और भीतरी सतहों को आच्छादित करते है। इन ऊतकों की कोशिकाओं के बीच नगण्य निर्जीव पदार्थ होता है या बिल्कुल भी नही होता हैं ये विभिन्न आकार के होते जैसे चादर के आकार के, झिल्ली के आकार के, बहुत कोमल, अंगूर के गुच्छो के आकार के, चपटे, आदि। ये ऊतक कीटाणुओं से, दाह उत्पन्न करने वाले पदार्थो से, चोट आदि से संरक्षण प्रदान करते है। त्वचा सर्वाधिक मोटी आच्छादक  ऊतक है। इनके दो भाग है:-

2. कठोर वाह्रा त्वचा (इपिडरमिस)

3. कोमल आंतरिक त्वचा (डरमिस)

शरीर के रोग आंतरिक त्वचा से बाहर आते है। फुफ्फुसो के श्वास प्रकोष्ठ के ऊतक अति नरम अस्तर की तरह होते है। भोजन नाल के ऊतक अस्तर मोटे होते है, उन्हे खमीर, श्लेष्म आदि का श्राव करना होता हैं गुर्दे के ऊतकों को छानने का (फिल्टनेशन) कार्य करना होता है। इसलिए वे झिल्ली के आकार के होते है।

संयोजन  ऊतक (कनेक्टिव टिशू):- ये ऊतक जैसा कि नाम से ही पता चलता है, अन्य सभी  उत्तकों को और अंदर के अंगों को एक साथ जोड़कर रखते है और उन्हें आकार प्रदान करते है। ये पूरे शरीर में पाये जाते हैं और अन्य ऊतको की अपेक्षा उनकी संख्या अधिक होती है और विविधता भी होती है। ये ऊतक त्वचा में, आवरण झिल्ली मे, मांसपेशिओं में, अस्थियों में, नाड़ियों में और सभी अंदर के अंगों में पाये जाते है। कुछ संयोजी ऊतक कागज जैसे पतले भी होते है, मजबूत, कठोर और रस्सी जैसे, ठोस अस्थि और द्रव रक्त रूप में भी पाये जाते है। ये जोड़ने का काम तो करते है (उदाहरण के लिए अस्थियों और मांसपेशिओं को जोड़ना) तो भी मुख्यत: शरीर के अन्य  ऊतकों को आधार भी प्रदान करते है। चर्बी को संग्रहित करना और आधारीय ऊताको का पोषण भी करते है। कंडरा (टेन्डन) अस्थि बन्ध (लिगामेन्ट्स) नामक संयोजी ऊतक विशिष्ट कार्य करने वाले अन्य ऊतको के लिए गतिशीलता प्रदान करने में सहायक होते है। कोशिकाएं और नाड़ियां संयोजी ऊतकों के लिए गतिशीलता प्रदान करने में सहायक होते है।

तंत्रिकाआं के ऊतक (नर्वस टिशू):-तंत्रिका ऊतक निम्न दो कार्यो के लिए उत्तरदायी होते है।

1. शरीर के विभिन्न अंगों की शीघ्रता से सूचना प्रसारण करना।

2. शरीर के क्रियाकलापों को नियंत्रण

3. तंत्रीय ऊतकों में दो प्रकार की कोशिकाएं होती है इनमें से एक कोशिका इकाई को न्यूरोन कहते है जो कि प्रणाली में कार्यरत या चालक इकाईयां है और दूसरी कोशिका इकाई न्यूरोग्लिया कहलाती है ये न्यूरान को आधार प्रदान करती है और संयोजन करती है। न्यूरोनस के तीन भाग होते है:

4. डेन्ड्राइट्स जो एक या एक से अधिक होते है और नाड़ी का आवेग कोशिका के ढांचे की ओर भेजते है।

5. एक्सोन-जो कि एक ही होता है और आवेग (इम्पल्स) को ढांचे से बाहर की ओर प्रसारण करता है।

6. केन्द्रीय ढांचा

मांशपेशियों के ऊतक (मसल टिशू):- मानव शरीर में लगभग आधा भाग मांसपेशियां होती है। ये ऊतक मुलायम होते है। मांसपेशीय ऊतक तीन प्रकार के होते है।

1. चिकनी (आंत्र) मांसपेशियां

2. हृदय मांसपेशिया

3. कंकाली मांसपेशियां

कंकाली मांसपेशियां:- हाथ, पैर, धड़ की कंकाली मांसपेशियां ऐच्छिक मांसपेशियां कहलाती है। इनकी कोशिकाएं धागों के समान ताने-बाने जैसी व्यवस्थित रहती है और अस्थियों के संपर्क में रहती है जब वे सिकुड़ती है तो अंगों को ऐच्छिक और नियंत्रित संचालन होता है।

हृदय की मांसपेशियां:- ये मांसपेशियां अनैच्छिक मांसपेशियां कहलाती है। हृदय की दीवार इन्हीं से बनी हुई होती हैं। इन मांसपेशियों के नियमित किंतु स्व-प्रेरित संकुचन से हृदय धड़कता है। इन मांसपेशीय ऊतकों की संरचना लंबी बारीक धागों जैसी कोशिकाओं से होती है और प्रत्येक ताने जैसी कोशिका में केवल एक नाभिक होता है। इनकी संकुचन क्रिया के लिए ऊर्जा, मांसपेशियों में संग्रहित ग्लाइकोजन से ही मिलती है। जो कि शर्करा रूप से परिवर्तित हो जाता है।

निर्बाध (चिकनी/आन्त्र): इन्हें निर्बाध या चिकनी मांसपेशी इसलिए कहते है कि उनमें अन्य मांसपेशियों की तरह धारियां नही होती हैं ये आन्तों, रक्तवाहिनयों, गर्भाशय आदि में होती है। इनका नियंत्रण अनैच्छिक या स्वप्रेरित होता है। इनके संकुचन की गति होती है। इनका कार्य शांति से होता रहता है। ये भोजन को भोजन नाल में अपनें आप आगें संकुचन से बढ़ाती रहती है और रक्तवाहिनी का व्यास भी नियंत्रित करती है।

मांसपेशीय ऊतको की कोशिकाएं शरीर अंगों के संचालन की उत्तरदायी है। अपेक्षाकृत, इनमें संकुचन अधिक होता है। क्षतिग्रस्त मांसपेशियों का संकुचन धीमा हो जाता है और उन्हें स्वस्थ होने में समय लगता हैं। लम्बे समय तक की निष्क्रियता मांसपेशी को भी निष्क्रिय बना देती है जिसे व्यायाम आदि से दुबारा सक्रिय किया जा सकता है। जब शरीर के बहुत से अंग किसी कार्य को सामूहिक रूप से सम्पन्न करते हैं तो इन अंगों के समूह को संस्थान या तंत्र (System)  कहते है।

संस्थान या तंत्र

1. पाचन संस्थान (Digestive System)

2. श्वसन संस्थान (Respiratory System)

3. रक्त परिसंचरण संस्थान (Blood Circulatory System)

4. स्नायु संस्थान (Nervous System)

6. मांसपेशीय संस्थान (Muscular System)

7. जनन संस्थान (Reproductive System)

8. स्त्री के जननांग (Female Reproductive Organs)

9. पुरुष के जननांग (Male Reproductive Organs or Genitalia)

10. अस्थि संस्थान या कंकाल तंत्र (Skeletal System)

11. लसीका संस्थान (Lymphatic System)

12. मूत्रीय संस्थान (Urinary System)

ज्ञानेद्रियां

1. आंखे (Eyes) या दृश्येद्रियाँ

2. कान (Ears) या श्रवणेद्रियाँ

3. नाक (Nose) या घ्राणेद्रियां

4. जीभ (Tongue) या स्वादेन्द्रिय

5. त्वचा (Skin) या स्पेर्शेद्रिय

ग्रंथियां

1. पीयूष ग्रंथि या पिटयुटरी ग्रंथि (Pituitary Gland)

2. अवटु ग्रंथि (Thyroid Gland)

3. परावटु ग्रंथियाँ (Parathyroid Glands)

4. थाइमस ग्रंथि (Thymus Gland)

5. एड्रीनल या सुप्रारीनल ग्रंथियां (Adrenal or Supranenal Glands)

6. अग्न्याशय में लैगरेहैन्स की द्वीपिकायें sa (Islets of langerhans in the pancreas)

7. प्लीहा या तिल्ली (Spleen)

8. पीनियल ग्रंथि अथवा पीनियल पिण्ड (Pineal Gland or Pineal Body)

9. लिंग ग्रंथियां या जनन ग्रंथियां (Sex Glans or Gonads)

10. चयापचय (Metabolism)

11. पग एवं हथेली संरचना (Structure of Foot and Palm)