भूमिका (Introduction of jkhealthworld.com)


भूमिका

 INTRODUCTION OF JKHEALTHWORLD.COM


वर्तमान समय के इस मंहगाई के युग में आम आदमी के लिए छोटी-छोटी बीमारियों का इलाज कराना भी बहुत मंहगा होता जा रहा है। इसलिए आम आदमी को सस्ती और घरेलू औषधियों से अपना इलाज कराना चाहिए। jkhealthworld.com में जितने भी रोगों के इलाज की जानकारी विभिन्न चिकित्सा पद्धतियों द्वारा दी गयी है वह हजारों वर्षों से हमारे देश तथा अन्य देशों में प्रयोग की जाती रही हैं। आधुनिक चिकित्सक भी इसके गुणों को स्वीकार कर चुके हैं।

आधुनिक चिकित्सा विज्ञान  (एलोपैथ)  यह कहता है कि डेंगू मच्छर से बचने के लिए अपने पूरे घर में केमिकलों को छिड़कें जोकि हमारे शरीर पर साइड-एफेक्ट डालते हैं। आयुर्वेद विज्ञान यह कहता है कि पेट को हमेशा साफ रखें तथा अपने शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को बनाये रखें ताकि मच्छर काटे तो भी हमारे शरीर पर कोई असर न हो। इसके लिए वातावरण को शुद्ध करना जरूरी है और वातावरण को शुद्ध करने के लिए नीम की पत्तियों को जलाएं जिससे सांस के द्वारा वातावरण से हम शुद्ध ऑक्सीजन प्राप्त कर सकते हैं। इससे हमारे शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता अर्थात रोगों से लड़ने की शक्ति बढ़ती है और शरीर पुष्ट होता है। होम्योपैथिक के जनक हैनीमैन के अनुसार हमें अपने शरीर को ठंड से बचाना चाहिए और शरीर को गर्म रखना चाहिए। इससे हमारा शरीर रोगों से सुरक्षित रहता है।  

हम दवाई खाकर बीमार नहीं पड़ते हैं,  बल्कि गलत खान-पान व रहन-सहन के कारण बीमार होते हैं। ऐसी अवस्था में हमको चाहिए कि हम अपने खान-पान और मौसम के अनुसार रहन-सहन में सुधार करके विभिन्न प्रकार की बीमारियों से बचने के लिए शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ायें। अगर हम एक छोटी सी गोली,  इंजेक्शन,  कैप्सूल,  चूर्ण,  अवलेह तथा जड़ी-बूटी आदि का सेवन करके स्वस्थ हो सकते हैं तो उसका गलत तरीके से उपयोग करने से भयंकर रोगों से पीड़ित भी हो सकते हैं। इसलिए हमारा अनुरोध है कि यदि आप किसी रोग से ग्रस्त हैं तो आपको अपना इलाज किसी योग्य, अनुभवी चिकित्सक से ही कराना चाहिए।

हमारे भारत में प्राचीन समय से लेकर आज के समय तक हमेशा मानव कल्याण के लिए चिकित्सा विज्ञान का अधिक से अधिक और बेहतर प्रयोग करने की कोशिश की गई है। चिकित्सा विज्ञान मानव के साथ-साथ पैदा हुआ है और मानव के साथ ही विकसित हुआ है। यदि हम चिकित्सा प्रणालियों के बारे में बतायें तो केवल शुरुआती दौर में दो प्रकार की चिकित्सा प्रणालियां प्रचलित रही थी।

पहली- सिद्ध चिकित्सा और  दूसरी- आयुर्वेद चिकित्सा। भारत के प्राचीन ॠषि-मुनियों और विशेषज्ञों ने अपने में से किसी एक को चिकित्सा विज्ञान का जनक मानने की अपेक्षा सृष्टिकर्ता को ही चिकित्सा विज्ञान का जनक माना है।

‘सिद्ध औषधि विज्ञान’ भारत के दक्षिण भाग में उत्पन्न हुआ है। इसके प्रवर्तक भगवान शिव शंकर माने जाते हैं जिन्होंने सिद्ध-औषधि विज्ञान का ज्ञान अपनी धर्मपत्नी पार्वती को दिया। उन्होंने आगे नन्दीदेव को सौंपा और नन्दीदेव ने सिद्धों को प्रदान किया। इन्हें शैव सम्प्रदाय और सिद्ध सम्प्रदाय भी कहा जाता है।

‘सिद्ध’ शब्द ‘सिद्धि’ से निकला है जिसका अर्थ होता है किसी वस्तु की प्राप्ति यानि उपलब्धि। सिद्ध वे व्यक्ति थे जिन्होंने चिकित्सा विज्ञान, औषधि-विज्ञान, योग-साधना और तप में सफलता अर्थात सिद्धि प्राप्त की थी। ये सिद्धियां  8  प्रकार की होती थी जिन्हें वे योग-साधना और तप के द्वारा प्राप्त करते थे। अणिमा,  महिमा,  गरिमा,  लघिमा,  प्राप्ति,  प्राकम्प,  ईशित्व, वशित्व)। इन्होंने अपने ध्यान और समाधिस्थ होकर जो ज्ञान मानसिक-शक्ति द्वारा पाया उसे उन्होंने अपने शिष्यों को दिया और उनके शिष्यों ने न केवल उसे सुरक्षित रखा बल्कि उसका प्रचार-प्रसार भी किया।

इन सिद्धों की संख्या 18 मानी जाती है जिन्होंने समय-समय पर सिद्ध-औषध विज्ञान के क्षेत्र में समाज को काफी अच्छा ज्ञान दिया है इनके नाम निम्नलिखित हैं­- तिरूमूलर,  पुण्णकीशर, पुलस्तियर,  पूनैक्कण्णर, इडैक्काडर,  भोगर,  पुलिगै ईशर,  करूपूरार,  कोड् कणवर, कलिंगी, चट्टैनादर,अझगण्णी, अगप्पै, पाम्बाट्टी, तेरैयर, कुदंबै।

तमिल भाषा और सिद्ध औषध-ज्ञान’ का श्रेय अगस्त्य मुनि को दिया जाता है। अगस्त्य मुनि को तमिल संस्कृति का जनक माना जाता है। अनुभवियों के अनुसार भगवान शंकर ने तमिल भाषा के प्रचार का कार्य अगस्त्य मुनि को और संस्कृत भाषा के प्रचार का कार्य पाणिनी मुनि को दिया था। पाणिनी मुनि ने ही सबसे पहले संस्कृत की व्याकरण की रचना की थी। सिद्ध चिकित्सा विज्ञान के मूलभूत सिद्धान्तों में यह देखा गया है कि मानव 5 ज्ञानेन्द्रियों के द्वारा भिन्न-भिन्न रूपों में बाहरी संसार से अनेक प्रकार का ज्ञान अर्जित करता है।

मानव शरीर को बनाने में भौतिक,  रासायनिक और सृष्टि में पाए जाने वाले सभी द्रव्यों या घटक,  तत्व, पंचमहाभूतों के मेल का ही प्रयोग किया जाता है। इसलिए मानव शरीर में त्रिदोष (वात, पित्त और कफ) आदि पाए जाते हैं। इन दोषों की रचना भी इन्हीं पंचभूतों के संयोग से हुई है जैसे- वात दोष में आकाश महाभूत, पित्त दोष में अग्नि महाभूत और कफ दोष में जल और पृथ्वी महाभूत मुख्य रूप से पाए जाते हैं। शरीर में इनके संतुलन की कमी से अनेक प्रकार की बीमारियां पैदा हो जाती हैं। वायु के चलते-मूत्राशय या बस्ति प्रदेश (यूरिनरी ब्लेडर), श्रोणि प्रदेश (पेलेविक रिजीयन)  गुर्दों का निचला भाग, आंतें, जंघा, टांगे और हड्डियों में वात दोष मुख्य रूप से रहता है। पित्त दोष-पसीना, लसीका,  रक्त,  आमाशय में तथा कफ दोष से छाती के रोग, सिर के रोग, हड्डियों के जोड़ों के रोग होते हैं। यह आमाशय के ऊपर वाले भाग और शरीर के वसा ऊतकों में पाया जाता है।

आयुर्वेद चिकित्सा और सिद्ध चिकित्सा प्रणाली में अन्तर है। सिद्ध चिकित्सा औषधि विज्ञान में जड़ी-बूटियों के अलावा पारा,  गंधक,  तांबा,  संखिया,  लोहा और विभिन्न प्रकार के धातु तथा खनिज पदार्थों का प्रयोग किया जाता है। आयुर्वेद चिकित्सा विज्ञान में ज्यादा जड़ी-बूटियां हैं। प्राचीन आयुर्वेद ग्रन्थ ‘चरक संहिता’ की रचना प्रथम शताब्दी  के उत्तरार्ध में और वाग्भट के ‘अष्टांगहदय’ की रचना सातवीं शताब्दी में हुई मानी जाती है। इन ग्रंथों में ज्यादातर जड़ी-बूटियां हैं और कुछ एक में सोना-चांदी-लौह आदि धातुओं का चिकित्सा प्रयोग भी होता है।

 ‘आयुर्वेद औषध विज्ञान’ उत्तर भारत में प्रचलित हुआ था और इसके जनक सृष्टिकर्ता ब्रह्मा थे। ब्रह्मा ने यह ज्ञान प्रजापति को दिया। प्रजापति ने अश्विनी कुमारों को, अश्विनी कुमारों ने इन्द्र और इन्द्र ने काशिराज दिवोदास धन्वन्तरि को दिया। इसके बाद सुश्रुत,  औषधेनव,  वैतरण औरभ्र,  पौष्कलावत,  करवीर्य,  गोरपुर,  रक्षित आदि शिष्यों ने इस ज्ञान को प्राप्त किया। यह परम्परा ब्रह्म या आर्य सम्प्रदाय (ऋषि परम्परा)  कहलाया।

आयुर्वेद की दो धाराएं हैं। कार्य चिकित्सा और शल्य चिकित्सा। प्रथम कार्य चिकित्सा आत्रेय के नाम से और दूसरा धान्वन्तरि के नाम से प्रसिद्ध है। प्रत्येक सम्प्रदाय के आचार्यों ने अनेक ग्रन्थों की रचना की। आज उपलब्ध ग्रंथों में चरकसंहिता आत्रेय सम्प्रदाय (स्कूल ऑफ फिजिशियन)  का और सुश्रुत संहिता धान्वन्तर सम्प्रदाय (स्कूल ऑफ सर्जन)  का प्रधान ग्रंथ है।

आज संसार में इंसानों से ज्यादा संख्या रोगों की हैं। वर्तमान के कुछ सालों में ही विभिन्न प्रकार के रोगों की चिकित्सा के लिए अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर व्यापक प्रयास हुए हैं तथा दिन-प्रतिदिन चिकित्सा के अधिक से अधिक अत्याधुनिक प्रयास किए जा रहे हैं। लेकिन इन सबके बावजूद भी रोगी और उनके रोगों की संख्या में कोई कमी नहीं आ रही है।

इसमें बिल्कुल भी संदेह नहीं है कि वर्तमान समय में विज्ञान के क्षेत्र में अधिक विकास होने के कारण चिकित्सा के क्षेत्र में भी बहुत अधिक उन्नति हुई है। लेकिन अभी भी बहुत से रोग असाध्य बने हुए हैं। कभी-कभी रोग का कारण मालूम होने के बाद भी कई औषधियां प्रभावकारी सिद्ध नहीं होती हैं। इसके अतिरिक्त कुछ औषधियां इतनी अधिक मंहगी होती हैं कि आम आदमी उन्हें खरीद ही नहीं सकता है। ऐसी स्थिति में मन में एक विचार आता है कि क्या औषधियों के अलावा कोई सहज प्राकृतिक उपाय नहीं है जिसकी सहायता से सभी प्रकार के रोगों की चिकित्सा की जा सके।

प्राचीन महर्षियों अर्थात साधु-सन्तों ने प्राकृतिक नियमों के अनुरूप जीवन जीने के महत्व को समझा जिसके परिणामस्वरूप उनके जीवन में शांति, एकरूपता तथा धैर्य का वास हुआ और तभी वे जीवन के ऊंचे उद्देश्यों को प्राप्त करने में सफल हो सके। उन्होंने शुद्ध हवा एवं सामान्य आहार का सेवन करने तथा प्रकृति द्वारा प्रदान किये हुए वातावरण के महत्व को समझा जिससे उनके विचार तथा भावनाएं भी शुद्ध बनी और वे जीवनभर निरोगी रहे।

होम्योपैथिक- होम्योपैथिक के अविष्कारक महात्मा “हैनीमैन” ने अपना कैरियर एलोपैथिक से ही शुरू किया था। एलोपैथिक को पहले “मेडिशन ऑफ सिस्टम” के नाम से जाना जाता था। (एलोपैथिक का नाम ‘महात्मा हैनीमैन’ ने ही दिया था,  जो बाद में सभी चिकित्सकों ने स्वीकार किया)  परन्तु एलोपैथिक से पूर्ण रूप से संतुष्ट न होने के कारण महात्मा हैनीमैन ने इस पैथी को छोड़कर अपने अनुभव और ज्ञान में बढ़ोत्तरी के लिए एक मेडिकल लाईब्ररी के केयर टेकर की नौकरी स्वीकार की।

 उसके बाद उन्होंने होम्योपैथिक दवाइयों का अविष्कार और निर्माण किया और रोगों से पीड़ित रोगियों को रोग से मुक्त किया। उनका मानना था कि शरीर को नियंत्रण और संचालित करने वाली आत्मा बहुत ही सूक्ष्म होती है तथा हमारे शरीर में रोगों के होने का कारण भी बहुत सूक्ष्म होता है।

एक्यूप्रेशर-   एक्यूप्रेशर एक ऐसी ही प्राकृतिक चिकित्सा है जिसकी सहायता से सारे रोगों का इलाज आसानी से किया जा सकता है। एक्यूप्रेशर पद्धति के अनुसार अनेक प्रकार के रोग बिना दवा के ही दूर किये जा सकते हैं क्योंकि रोगी के रोग को नष्ट करने की प्राकृतिक शक्ति उनके शरीर में ही मौजूद रहती है।

एक्यूप्रेशर चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसका प्रभाव चामत्कारिक रूप से होता है। इससे पुराने से पुराने रोग कुछ ही समय में ठीक किये जाते हैं। इससे रोगी बिना किसी खर्च के घर बैठे अपने रोग का इलाज कर सकते हैं। इस पद्धति से रोग का उपचार करने से किसी भी प्रकार की हानि होने की आशंका नहीं होती है।

चुम्बक्तव- इस बात का अंदाजा लगाना बहुत मुश्किल है कि हमारे पूर्वजों ने धरती के चुम्बकत्व और संसार की अन्य दिव्य शक्तियों तथा जीवन और रोगों पर उनके प्रभाव का कैसे पता लगाया। आयुर्वेद में आधारित “अथर्वेद” में ऐसे कई श्लोक हैं जिनमें चुम्बकों को रोगों को रोकने के काम में लाया जाता है।

वर्तमान समय में भारत में हजारों चिकित्सक चुम्बकों द्वारा ऐसे कई रोगों का इलाज करने में सफलता प्राप्त कर चुके हैं जो रोगियों को अपंग बना देते हैं। हमारे देश के विभिन्न स्थानों में कई रोग उपचारक कैम्पों को स्थापित किया गया है जिनमें चुम्बक द्वारा हजारों लोगों का इलाज किया जाता है।

नेचर थेरेपी- जल, पृथ्वी, वायु, आकाश, अग्नि पांचों तत्वों में सबसे पहला और लाभकारी तत्व आकाश तत्व होता है। इस तत्व को `शून्य´ भी कहा जाता है। जिस तरह से भगवान निराकार लेकिन बिल्कुल सत्य है उसी तरह से आकाश तत्व भी निराकार लेकिन सत्य है। आकाश तत्व आत्मिक, मानसिक और शारीरिक तीनों तरह के स्वास्थ्य को अच्छा बनाने वाला होता है। ये सच है कि अगर आकाश तत्व का जन्म न हुआ होता तो न तो हम सांस ही ले सकते है और न ही हमारी स्थिति और अस्तित्व ही होता। शेष चारों तत्वों का आधार भी आकाश तत्व ही होता है।

आकाश ब्रह्माण्ड का आधार भी होता है। इस तत्व को प्राप्त करने का एक प्रबल साधन उपवास है। वैसे भी रोजाना भूख से थोड़ा सा कम खाकर हम इस कीमती और उपकारी तत्व को पाकर सुख शांति के भागी बन सकते हैं।

आकाश, पृथ्वी, जल, वायु और अग्नि पांचों तत्वों में से वायु सबसे जरूरी दूसरा तत्व है। जल जीवन है और वायु प्राणियों का प्राण है। अगर हमें 1 मिनट तक भी वायु न मिले तो हमारा दिल घबराने लगता है। अगर काफी देर तक वायु न मिले तो हमारे प्राण भी निकल सकते हैं। इसलिए वायु मनुष्य के जीने के लिए बहुत जरूरी है। हम रोजाना जितना भोजन करते हैं और पानी पीते हैं, उससे लगभग 7 गुना वायु लेते हैं। ऑक्सीजन वायु शरीर के अंदर जाते ही फेफड़ों के द्वारा खून में मिल जाती है। ऑक्सीजन गंदे, नीले खून को साफ करके उसे साफ और लाल कर देती है। नीले गंदे खून से कार्बन डाइऑक्साइड निकलती है जो नाइट्रोजन वायु और भाप आदि के साथ अंदर से बाहर निकलती रहती है।

जल कहीं भी बहुत ही आसानी से उपलब्ध हो जाता है। जल की चिकित्सीय शक्तियों की या तो उपेक्षा की जाती है या उसके बारे में अधिकांश लोगों को जानकारी नहीं होती है। आपातकालीन परिस्थितियों में जल का अधिक किया जाता है।

योग- योग का वर्णन कई ग्रंथों, उपनिषदों, पुराणों व गीता में किया गया है। सभी योगग्रंथों में योग के अलग-अलग रास्ते बताये गये हैं, परन्तु सभी योग का एक ही लक्ष्य है- शरीर और मन को स्वस्थ व शांत बनाना। योग साधना सभी व्यक्तियों के लिए वैसे ही जरूरी है जैसे- भोजन, पानी व हवा। योग क्रिया केवल योगियों के लिए है, ऐसा सोचना अज्ञानता है। योगग्रंथों में योग के 8 अंगों का वर्णन किया गया है- यम, नियम, आसन, प्राणायाम, प्रत्याहार, धारणा, ध्यान और समाधि। इन यौगिक क्रियाओं में योगियों के लिए केवल ध्यान की अंतिम अवस्था और समाधि ही है। अन्य सभी क्रियाओं का अभ्यास कोई भी व्यक्ति कर सकता है, क्योंकि योग में आसन का अभ्यास शरीर को स्वस्थ बनाने के लिए बनाया गया है।

सूर्य चिकित्सा- किसी भी प्राणी के जीवन की रक्षा करने वाली सारी ताकतों का असली स्रोत सूर्य ही है। अगर सूर्य न हो तो कोई भी प्राणी एक पल भी ज़िंदा नहीं रह सकता। जीवन में सूर्य की किरणों का भी बहुत ज्यादा महत्व है। जब सूर्य की किरणें किसी भी मनुष्य के शरीर पर पड़ती हैं तो उसके बड़े से बड़े रोग दूर हो जाते हैं। सूर्य की किरणों से शरीर में रोगों को पैदा करने वाले कीटाणु नष्ट हो जाते हैं। सूर्य का असर हर मनुष्य के शरीर और मन पर बहुत ज्यादा पड़ता है। चिकित्सकों का कहना है कि सूर्य की किरणों के सेवन से हर प्रकार के रोगों को दूर किया जा सकता है।

विश्व में सभी देशों के वैज्ञानिक, अनेक रोगों के इलाज के लिए विशेष रूप से ऐसे रोगों के लिए जिनका इलाज किसी प्रचलित चिकित्सा प्रणाली से नहीं हो पाता है, एक ऐसी चिकित्सा प्रणाली की खोज कर रहे हैं जो अपने आपमें बिल्कुल आसान हो तथा जिसका एक सुनिश्चित प्रभाव हो। अब उनका ध्यान चिकित्सा के कृत्रिम और अमानवीय तरीकों से हटकर और अधिक प्राकृतिक तरीकों को अपनाने की ओर बढ़ता जा रहा है। इसलिए अनेक बीमारियों के इलाज के लिए चुम्बक चिकित्सा जैसी विभिन्न चिकित्सा प्रणालियों का अविष्कार और विकास किया जा रहा है।

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति जड़ी-बूटियों और वनौषधियों पर आधारित है। प्राचीनकाल में ऋषि-मुनियों ने अनेक वर्षों तक गहरे जंगलों,  पर्वतों पर रहकर वहां की वनौषधियों पर वर्षों तक परीक्षण करके आयुर्वेद चिकित्सा का निर्माण किया तथा विभिन्न रोगों की उत्पत्ति और उनके निवारण के लिए विभिन्न प्रकार की औषधियों की गुणवत्ता का परीक्षण करने के बाद जनसाधारण को इसकी जानकारी प्रदान की।

हम जानते हैं कि सभी मनुष्यों की प्रकृति एक समान नहीं होती है। इस कारण एक ही दवा समान रूप से सभी रोगियों पर कार्य नहीं करती। इसी कारण से एक रोग पर विभिन्न प्रकार की चिकित्सा दी गई है। उनका प्रयोग रोगी की प्रकृति, गुण तथा वहां की जलवायु आदि के अनुरूप किया जाना उचित होता है।

इस संसार में शायद ही कोई ऐसा व्यक्ति होगा जो यह कह सके कि उसे कोई रोग नहीं है और वह पूरी तरह से स्वस्थ है। वास्तव में आज की भागदौड़ भरी जिंदगी, आधुनिकता का अंधानुकरण तथा फास्ट फूड के साथ जीवन व्यतीत करने की शैली ने व्यक्ति के शरीर को रोगों का घर बना दिया है जो समय-समय पर अपना प्रकोप दिखाते हैं। रोगों से पीड़ित होने पर वह चिकित्सक के पास इलाज के लिए जाता है जो मंहगी चिकित्सा द्वारा उसके रोग को तुरंत ही दबा देते हैं। इसके अन्य दुष्प्रभाव भी देखने को मिलते हैं। जबकि प्रकृति में स्वयं इतनी ताकत होती है कि वह सभी रोगों को नष्ट कर देती है।

आयुर्वेद- प्राचीन ऋषियों के अनुसार जिस शास्त्र में आयु के हित,  अहित, रोग, निदान और व्याधि-शमन का उल्लेख किया गया हो,  उसे ‘आयुर्वेद’ के नाम से पुकारा जाता है। आयुर्वेदिक चिकित्सा पद्धति में मृत्यु को छोड़कर सभी प्रकार के रोगों की चिकित्सा संभव है। यदि कहीं किसी रोग में असफलता मिलती है तो वैद्य या चिकित्सक में कोई कमी है जो चिकित्सा कर रहे हैं। आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति अपने आपमें पूर्ण है।

 ‘आयुर्वेद’ दो शब्दों से मिलकर बना है, आयु अर्थात जीवन और वेद अर्थात- शास्त्र। इस प्रकार आयुर्वेद का अभिप्राय यह हुआ कि शरीर, इन्द्रिय, मन और आत्मा के मेल को ‘आयु’ कहते हैं। सामान्य शब्दों में कहने का मतलब है कि जब तक मनुष्य के शरीर में इंद्रियां काम करती रहती हैं, मन कार्यरत रहता है और आत्मा प्राणों को बचाये रखती है तब तक मनुष्य जीता है।

हमारे देश में आयुर्वेद चिकित्सा का जनमानस पर इतना गहरा असर है कि यवनों से लेकर अंग्रेजों के शासनकाल में भी लोग इस पर से अपना विश्वास खो नहीं सके जबकि शासन की ओर से इस पद्धति को समाप्त करने के हर संभव प्रयास किये गये। हमारे देश के सुदूरवर्ती ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी लोग केवल जड़ी-बूटियों पर ही आश्रित रहते हैं।

कहा जाता है कि किसी भी प्रकार के ज्ञान को गुप्त रखने से वह लुप्त होता जाता है और प्रकाश में लाने से आकाश तक पहुंच जाता है। कहने का आशय यह है कि हमने जो भी कुछ जानकारी हासिल की है, यदि हम उस ज्ञान को दूसरे तक नहीं पहुंचायेंगे तो हमारे साथ-साथ वह ज्ञान भी लुप्त हो जाएगा।

किसी भी प्रकार के रोग की चिकित्सा के लिए जिस भी नुस्खे का प्रयोग किया जाए तो यह अनुमान लगाना चाहिए कि इस योग से रोगी को लाभ है या हानि है। हानि होने की स्थिति में उस दवा के प्रतिकूल यानि उल्टी दवा देनी चाहिए, अर्थात यदि गर्म दवा दी गई है तो लाभ न होने पर ठंडी दवा देनी चाहिए। यदि ठंडी दवा दी गई है और लाभ न हुआ हो तो गर्म दवा देनी चाहिए।

किसी भी रोग की चिकित्सा करना तथा कलापूर्ण (दक्षतापूर्ण)  चिकित्सा करना दोनों ही अलग-अलग होते हैं। चिकित्सा करने के अन्तर्गत यदि कोई रोगी सिर दर्द से पीड़ित है तो डॉक्टर उसे सिरदर्द नाशक औषधि देकर उसकी चिकित्सा कर देते हैं। जबकि कलापूर्ण (दक्षतपूर्ण) चिकित्सा करना इससे अलग होता है जैसेकि सिर दर्द से पीड़ित कोई रोगी हमारे पास आया है तो रोगी को केवल सिर दर्द की दवा न देकर आपका कर्तव्य है कि सिर दर्द होने का कारण क्या हो सकता है, इसके बारे में जानें।

यदि कब्ज हो, तो जिगर की भी स्थिति देखनी चाहिए। यदि ये सामान्य है तो खून की कमी, किसी प्रकार का बुखार, किसी ग्रंथि की जलन, रक्तचाप की स्थिति, निंद्रा आदि की जानकारी लेते हुए मूल रोग की चिकित्सा करनी चाहिए। यह चिकित्सा दक्षतापूर्ण चिकित्सा के अंतर्गत आती है। इससे रोगी को स्थायी लाभ मिलता है।

प्रकृति का नियम है कि कोई भी प्राणी जन्म लेने के बाद-रोग और मृत्यु की छाया से नहीं बच सकता है। संसार के सभी जीवधारियों के लिए “मृत्यु” एक अनिवार्य आयाम है। परन्तु ऐसा नहीं है कि केवल मानव ही रोगों से ग्रस्त होता है। कभी-कभी पालतू पशुओं को भी रोग हो जाते हैं। परन्तु वन पशु-पक्षी तथा कीट-पतंगे आदि रोगों से हमेशा मुक्त रहते हैं। समय आने पर वे मृत्यु को प्राप्त होते हैं परन्तु वे किसी भी प्रकार के रोगों से ग्रस्त नहीं होते हैं। चूंकि ये सभी प्रकृति पर निर्भर होते हैं, इसलिए प्रकृति उन्हें निरोगी बनाये रखती है। इसके विपरीत पृथ्वी का सबसे बुद्धिमान माना जाने वाला प्राणी “मनुष्य” हमेशा पर्यावरण से छेड़छाड़ करने में लगा रहता है,  अतः प्रतिक्रिया-स्वरूप उसे प्रकृति के प्रकोप का शिकार होना पड़ता है।

जीवन भगवान की दी जाने वाले सबसे खूबसूरत देन है और निरोगी रहना सबसे बड़ा वरदान। निरोगी रहने के लिए जरूरी है पौष्टिक भोजन। ऐसा भोजन स्वस्थ जीवन जीने का आधार होता है। यदि हम भोजन में सुधार करके संयमपूर्ण जीवन व्यतीत करते रहें तो सौ साल तक आसानी से जी सकते हैं। “गीता” में भी कहा गया है कि सात्विक (प्राकृतिक) आहार और आवश्यकता से कम खाने से उम्र में वृद्धि होती है। हमेशा हल्का पेट भोजन करना चाहिए।

 हमारा भोजन कितना भी स्वादिष्ट हो उसे अच्छी तरह से चबा-चबाकर खाना चाहिए। व्यक्ति अधिक खाकर जल्दी मरता है और कम मात्रा में भोजन करने से दीर्घायु होता है। हमेशा हंसते रहने से व्यक्ति स्वस्थ रहता है। परहेज तथा पथ्य ठीक न होने पर कोई भी दवा अनुकूल प्रभाव नहीं करती है। व्यक्ति का स्वास्थ्य और सुंदरता आवश्यकतानुसार भोजन करने से बनी रहती है। हमारी दिनचर्या प्रकृति के जितने अधिक नजदीक होगी। हम उतने ही स्वस्थ और दीर्घायु होंगे।

प्राकृतिक चिकित्सा में सात्विक भोजन का सेवन किया जाता है। प्राकृतिक चिकित्सकों के दृष्टिकोण से भोजन ही औषधि है तथा औषधि ही भोजन है। प्राकृतिक भोजन हमारे शरीर की आंतरिक प्रतिरोध क्षमता को इतना अधिक बढ़ा देता है कि वह सभी प्रकार के संक्रामक रोगों से लड़ने में सक्षम होता जाता है। इससे हमारा शरीर रोगों से मुक्त रहता है।

योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा आज के तनावपूर्ण अप्राकृतिक जीवन में वर्तमान युग की सबसे बड़ी आवश्यकता बनती जा रही है। हमारे स्वास्थ्य का अभिप्राय केवल इतना ही नहीं है कि हम शारीरिक और मानसिक पीड़ा से मुक्त रहे, बल्कि उत्साह एवं स्फूर्ति से हमारी जीवनी-शक्ति इतनी सशक्त और मजबूत हो कि हममें दृढ़ता, आत्मनिर्भरता, सहजबुद्धि, स्वयं की निर्णय शक्ति तथा जीवन जीने का उद्देश्य भी होना चाहिए।

प्राकृतिक चिकित्सा प्रणाली का केवल एक ही लक्ष्य है- शरीर की विभिन्न बीमारियों की रोकथाम। इस उद्देश्य की प्राप्ति के लिए वह रोगी की स्वतः उपचार करने वाली शक्तियों का सहारा लेती है ताकि रोगों का मुकाबला करने वाले तत्वों को विकसित किया जा सके। यद्यपि हम विभिन्न तकनीकों द्वारा ब्रह्माण्ड के अनेक रहस्यों के बारे में जानकारी प्राप्त कर चुके हैं, फिर भी मानव शरीर के बहुत से क्षेत्रों को केवल कुछ स्वास्थ्य विशेषज्ञ ही समझ पाते हैं।

 जिस प्रकार से कस्तूरी हिरन अपने पेट के अंदर की कस्तूरी की सुगंध पाकर उसे ढूंढ़ने के लिए भागता रहता है जबकि कस्तूरी उसके पेट के अन्दर ही होती है। ठीक उसी प्रकार इस समय मानव की स्थिति है। प्रकृति के द्वारा प्रदान किये गये शरीर को स्वस्थ रखने की शक्ति हमारे शरीर के अंदर ही है और हम बाहर भटक रहे हैं जिसका परिणाम यह हुआ कि विज्ञान के शिखर पर पहुंच जाने पर भी मानव का स्वास्थ्य लगातार गिरता जा रहा है। प्रकृति ने हमारे शरीर की रचना इस प्रकार की है कि यदि वह रोगग्रस्त हो जाता है तो उसकी चिकित्सा उसी तत्व द्वारा करने से वह रोगमुक्त भी हो जाता है।

इसमें कुछ संदेह नहीं है कि आज के वैज्ञानिक युग में प्रत्येक क्षेत्र में अभूतपूर्व उन्नति हुई है। किन्तु यह सत्य है कि वैज्ञानिकों ने किसी क्षेत्र में चाहे जितनी भी प्रगति कर ली हो लेकिन वह ईश्वर के द्वारा निर्मित इस ब्रह्मण्ड के बारे में सम्पूर्ण जानकारी प्राप्त नहीं कर पाया है। “यह अटल सत्य है और सदा रहेगा।” यही बात चिकित्सा के क्षेत्र में भी कही जा सकती है। कोई भी चिकित्सा पद्धति सम्पूर्ण रोगों के निदान में शतप्रतिशत सफल सिद्ध नहीं हुई है। उदाहरणार्थ यदि ऐसा होता तो आज विश्व में रोगों की संख्या बढ़ने के स्थान पर कम हो गई होती।

इसके पीछे एक प्रमुख कारण यह है कि रोगों में दी जाने वाली प्रमुख औषधियों के सेवन से रोग ठीक होने की बजाय दब जाते हैं और कुछ समय बाद गंभीर रूप में उभरकर सामने आ जाते हैं। इसके अलावा जो औषधियां रोगों के निवारण हेतु सफल सिद्ध हुई हैं उन औषधियों के अधिक मूल्यवान होने के कारण आम आदमी उस औषधि को नहीं खरीद पाता है। इस कारण मन में विचार आना स्वाभाविक है कि क्या बिना औषधि के सेवन किए, सहज, सरल, और सुलभ अन्य कोई चिकित्सा पद्धति ऐसी नहीं है, जिससे सारे रोग बिना किसी साइड इफेक्ट के ठीक किये जा सकते हों। निःसंदेह हमारी प्राचीन प्राकृतिक चिकित्सा पद्धति ऐसी ही एक पद्धति है जिससे सभी रोग ठीक किये जा सकते हैं।

हमने (jkhealthworld.com) में प्राकृतिक आहार-विहार को विशेष महत्व दिया है। आज का विज्ञान चाहे जितनी नई-नई दवाओं को खोज लें, मगर जब तक आहार-विहार और सात्विक आहार को मानव जीवन में प्राथमिकता नहीं दी जाएगी तब तक मानव का शरीर विभिन्न प्रकार के नये-नये रोगों से ग्रस्त होता रहेगा। वर्तमान समय में कैंसर और एड्स जैसे रोगों से मानव समाज बुरी तरह से त्रस्त है यदि उसने अपने आहार-विहार में समय रहते परिवर्तन नहीं किया तो उससे उत्पन्न दुष्प्रभावों को उसे भुगतना ही पड़ेगा।

व्यक्ति अपने जीवन में स्वास्थ्य की अच्छी आदतें डालकर अच्छा पौष्टिक भोजन लेकर और समुचित व्यायामों के माध्यम से अनेक बीमारियों से बचा रह सकता है लेकिन ये सभी सावधानियां बरतने के बावजूद जब व्यक्ति रोगों से पीड़ित हो जाता है, तब प्राकृतिक चिकित्सा और योग के सिद्धांतों को अपनाकर ही इनका उपचार करना बेहतर होता है। प्राकृतिक चिकित्सा की सबसे महत्वपूर्ण उपयोगिता यह है कि इस चिकित्सा पद्धति में किसी भी प्रकार की औषधि की आवश्यकता नहीं होती है। इसलिए प्राकृतिक चिकित्सा में किसी भी प्रकार के दुष्परिणाम की आशंका नहीं होती है।

वर्तमान समय में जनसाधारण की जागरुकता दिन-प्रतिदिन स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जा रही है। लोगों में विभिन्न रोगों के कारण, लक्षण और उस रोग की चिकित्सा को जानने की अधिक उत्सुकता रहती है। लोगों की यह उत्सुकता इसलिए हुई कि बीमारियों से बचाव करना, उनके इलाज की अपेक्षा कहीं अधिक और आसान होता है।

मानव शरीर में बीमारियां अपने आप नहीं आती हैं बल्कि इन्हें वर्षो की उपेक्षा, अज्ञानता, पोषण संबंधी गलत आदतें तथा जीवनशैली जन्म देती हैं। जहां तक रोगियों का संबंध है, ये तीन प्रकार के होते हैं। पहले वे जो अपने स्वास्थ्य की जिम्मेदारी स्वयं लेने की बजाय दवाइयों तथा डॉक्टरों पर निर्भर रहते हैं। दूसरे प्रकार के रोगी वे होते हैं जो स्वास्थ्य की जिम्मेदारी संभालते हैं, किंतु उनमें प्राकृतिक चिकित्सा से ठीक होने के लिए धैर्य और विश्वास की कमी होती है। तीसरे प्रकार के रोगी वे होते हैं जिन्हें प्राकृतिक चिकित्सा में दृढ़विश्वास होता है तथा वे मजबूत संकल्प के साथ हानिरहित प्राकृतिक जीवन जीने के उत्सुक होते हैं।

बीमार होने पर रोगी की चिकित्सा करने की अपेक्षा यह बेहतर होता है कि सबसे पहले बीमारी का कारण तथा उससे बचने के उपायों को जान लेना चाहिए। रोगी को रोग के इलाज के समय धैर्य तथा अनुशासन रखना चाहिए। अच्छा स्वास्थ्य प्राप्त करना हर व्यक्ति का जन्मसिद्ध अधिकार होता है। रोगों की चिकित्सा करना केवल उन व्यक्तियों तक ही नहीं सीमित होता है जो इनकी चिकित्सा करते हैं। हममें से प्रत्येक व्यक्तियों के अंदर एक चिकित्सक होता है जिसको जागृत करने की आवश्यकता होती है। ऐसा तभी संभव हो सकता है जब हम प्रकृति में विश्वास करके प्रकृति के नियमों को अपनायेंगे।

अदृश्य शक्तियां जो संसार के कण-कण में मौजूद हैं परन्तु हमें दिखाई नहीं देती हैं जैसे लकड़ी में अग्नि, दूध में घी, एक छोटे से बीज में विशाल वृक्ष। यदि इनका वैज्ञानिक विश्लेषण किया जाए तो इन चीजों का कहीं कोई पता नहीं चल सकता है। रोजाना लाखों-करोड़ों जीवों और मनुष्यों की मृत्यु हो रही है, ऐसी कौन सी चीज है जिसके शरीर से अलग होते ही शरीर मृत हो जाता है, अभी भी वैज्ञानिकों के पास इस बात का कोई भी आधार नहीं है।

हमारी आंखों के देखने और कानों की सुनने की एक निश्चित सीमा होती है। एक सीमा के बाद हमें दिखाई पड़ना और सुनाई देना बंद हो जाता है। यदि हमारे देखने और सुनने की सीमा अनंत हो तो हमारा जीना भी असंभव हो जाएगा। ऐसी स्थिति में उन चीजों को भी देखना पड़ेगा जो मनुष्य की सहन शक्ति से बाहर है तथा आवाजें तो इतनी अधिक होगी कि या तो हम बहरे अथवा पागल हो जाएंगे, क्योंकि शब्दों की कोई भी सीमा नहीं होती है। शब्द ब्रह्म है, इनकी मृत्यु कभी भी नहीं होती है। हजारों-लाखों सालों से बोले गये शब्द आज भी वायुमंडल में विद्यमान हैं, इन्हीं आवाजों को वर्तमान समय में वैज्ञानिक पकड़ने की कोशिश कर रहे हैं।  

शब्दों में अनंत शक्ति होती है। इसी के आधार पर ॠषि-मुनियों ने मंत्रों की रचना की है जिसका प्रभाव राकेट की स्पीड से हजारों-लाखों गुना तेज होता है। परन्तु यह सभी अदृश्य होता है। मनुष्य के शरीर की रचना तथा उसका एक-एक अंग अपने आपमें अदभुत है। मनुष्य के शरीर के मस्तिष्क की रचना आश्चर्य से भरी हुई है। प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक में जितने भी अविष्कार और खोजें हुई हैं वे सब इस जटिल मस्तिष्क की एक झलक भर है।

स्वास्थ्य ही शरीर की प्राकृतिक स्थिति होती है तथा शरीर की सूक्ष्मतम इकाई या भाग तथा उनकी क्रियाओं का एकमात्र जैविक उद्देश्य होता है कि हम अपने स्वास्थ्य को हमेशा अच्छा बनाये रखें। वर्तमान समय में आधुनिक चिकित्सा प्रणाली बीमारियों और उनके उपचारों का विज्ञान मात्र नजर आती है जबकि योग स्वास्थ्य का विज्ञान सिद्ध होता है। इसके तौर-तरीके किसी भी प्रकार की स्थिति में स्वास्थ्य, जीवनी-शक्ति तथा यौवन को बनाए रखते हैं। इसके साथ ही यह शरीर और मस्तिष्क के संतुलन को बनाए रखते हैं ।

वर्तमान समय में हम तीव्र परिवर्तनशील युग के क्षण भंगुर चरण में रह रहे हैं इसलिए आज जो हम सीखते हैं वही दूसरे दिन पुराना पड़ जाता है। इसके अतिरिक्त प्रत्येक व्यक्ति अनियोजित तरीकों से इस भौतिक संसार में किसी काल्पनिक बड़ी उपलब्धि को हासिल करने के लिए भाग-दौड़ कर रहा है। इस प्रक्रिया में कभी-कभी हमें कुछ प्राप्त तो हो जाता है लेकिन हम अपने वास्तविक स्वरूप को खो बैठते हैं। अंत में जब हम अपनी उपलब्धि का आंकलन करते हैं तो अनुभव करते हैं कि उस “भ्रामक उपलब्धि” के लिए हमने अपनी मानसिक शांति, शारीरिक स्वास्थ्य की तथा आध्यात्मिक रूप में भारी कीमत अदा की है।

आधुनिक समाज में ज्यादातर स्त्री-पुरुष ऐसे विभिन्न असाध्य रोगों से ग्रस्त हैं जिनका हमारे पूर्वज नाम तक नहीं जानते थे। आज के हमारे समाज में जंक फूड और साफ्टवेयर की भांति तनाव भी स्थाई स्थान पा चुका है। शरीर और मस्तिष्क पर इसका बहुत विपरीत प्रभाव पड़ता है। तनाव के उत्पन्न होने का कारण अपनी क्षमता से ज्यादा और कभी न पूरी हो पाने वाली इच्छाएं होती हैं।

प्रत्येक व्यक्ति को अपने स्वास्थ्य के प्रति जागृत रहना चाहिए जिससे वह अपने शरीर को स्वस्थ और सक्रिय, मस्तिष्क को शांत और स्वयं को पर्यावरण के प्रभाव से सुरक्षित रख सके।

स्वस्थ तन में ही स्वस्थ मन होता है और स्वस्थ मन में ही स्वस्थ विचार आते हैं। स्वस्थ विचारों से आत्मतुष्टि मिलती है और आत्मसंतुष्टि से ही सुख और शांति प्राप्त होती है।

हमारा शरीर पंचतत्वों  (पृथ्वी, अग्नि, जल, वायु और आकाश) से मिलकर बना है और मृत्यु के बाद इन्हीं पंचतत्वों में विलीन हो जाता है। शरीर में विकार भी इन्हीं पंचतत्वों के न्यूनाधिक  (कम और अधिक) होने और परस्पर असामंजस्य के कारण होते हैं। रोगग्रस्त होने पर हम जल्द से जल्द ठीक होना चाहते हैं। इस प्रयास में हम अधिकतर ऐलोपैथी चिकित्सा पद्धति इस्तेमाल करते हैं। जिससे शरीर तुरंत स्वास्थ्य लाभ का अनुभव तो करता है परन्तु इसके साइड इफेक्ट लाभ से कहीं अधिक हो जाते हैं। यहीं नहीं, बल्कि इस पद्धति से रोग को जड़ से समाप्त करना भी कठिन होता है। स्थायी रूप से स्वास्थ्य लाभ के लिए आवश्यक है कि प्रकृति के द्वारा प्रदान किये गये इस शरीर को प्राकृतिक चिकित्सा द्वारा ही रोगमुक्त किया जाए।

एलौपैथी चिकित्सा अपनी विशेषताओं के कारण सर्वमान्य है। यह घातक रोगों और शल्य चिकित्सा में भी सबसे आगे है, लेकिन यह अनेक सामान्य रोगों को जड़ से नहीं मिटा पाती है बल्कि उन्हें अस्थायी तौर पर दबा देती है। कभी-कभी इन दवाओं का तेज “साइड इफेक्ट” भी घातक साबित होता है। इसमें रोग बार-बार उभरते रहते हैं। जबकि आयुर्वेदिक चिकित्सा रोगों को जड़-मूल से नष्ट करने की क्षमता रखती है। इससे व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्ति भी बढ़ती है। इसी के कारण दुनिया भर के लोग आयुर्वेद चिकित्सा को अपना रहे हैं।

आयुर्वेदिक चिकित्सा को देश ही नहीं, बल्कि पूरे विश्व भर में मान्यता मिल रही है। दिन-प्रतिदिन इस क्षेत्र में नई-नई खोजें और अविष्कार हो रहे हैं। प्राकृतिक चिकित्सा भी इसी की सहचरी होती है। जड़ी-बूटियों, फल-सब्जी तथा अनाज मसालों द्वारा चिकित्सा की असरकारक और गुणकारी विधियों की गिनती भी इसी में की जाती है। यह सभी घरेलू इलाज के अन्तर्गत मान्य होते हैं तथा हानिरहित, स्वास्थ्य और शक्तिवर्द्धक हैं। ये विधियां सही मायनों में व्यक्ति की रोग प्रतिरोधक शक्तियों को बढ़ाती हैं तथा उपचार में एक तरह से उसकी भरपूर सहायता करती है। जब कभी भी व्यक्ति के क्रियाकलापों के कारण अथवा प्राकृतिक परिवर्तन के कारण पंचतत्वों का संतुलन बिगड़ जाता है, तो यही अवस्था रोग कहलाती है।

घरेलू चिकित्सा में रोगों का इलाज प्राकृतिक तरीके से किया जाता है। यह चिकित्सा हमारी प्रकृति के अनुकूल इसलिए पड़ती है क्योंकि व्यक्ति स्वयं प्रकृति का अंश है जो तत्व प्रकृति में विद्यमान होते हैं। वे ही तत्व उस प्रकृति में जन्म लेने वाले जीवधारियों में अवश्य विद्यमान होते हैं। अतः प्राकृतिक तत्व निःसंदेह ही व्यक्ति के शरीर के लिए अधिक लाभकारी होते हैं।

प्रकृति का कोई भी पदार्थ अनावश्यक नहीं होता है। प्रत्येक पदार्थ में गुण-दोष अवश्य पाये जाते हैं। इन गुण दोष वाले पदार्थों को आवश्यकतानुसार ग्रहण करना ही उपचार होता है।
घरेलू चिकित्सा में प्रकृति द्वारा प्रदान की गयी वनस्पतियों के अलावा अन्य प्राकृतिक संसाधनों का भी उपयोग किया जाता है। धूप या प्रकाश, चंद्रमा की चांदनी, वायु, मिट्टी, जल, विभिन्न प्रकार के रत्न तथा चुम्बक आदि प्राकृतिक साधन भी घरेलू चिकित्सा के सफल माध्यम होते हैं।

  प्राकृतिक चिकित्सा प्रकृति का एक दिव्य ज्ञान है। पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों के अतिरिक्त अब तक अनेक प्रकार की वैकल्पिक चिकित्सा पद्धतियां भी चल पड़ी हैं। परन्तु किसी भी चिकित्सा प्रणाली की तुलना आज भी प्राकृतिक चिकित्सा के साथ नहीं की जा सकती है। वास्तव में यह प्रकृति द्वारा मनुष्यों को दिया गया एक दिव्य वरदान है। केवल जल,  मिट्टी,  वायु,  सूर्य, पोषण और उपवास से किसी भी रोग का उपचार किया जा सकता है। 

योगासन और प्राणायाम ऐसी शारीरिक और आध्यात्मिक क्रियाएं हैं जिससे सभी प्रकार के कष्ट दूर हो जाते हैं और जीवन में भरपूर सुख-शांति मिल जाती है। यह सामान्य तथा असाध्य रोगों से शरीर को मुक्त करते हैं तथा इनका आध्यात्मिक प्रभाव चित्त को शांत और सहज बना देता है। इतना सब होने पर मनुष्य निश्चय ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य प्राप्त कर लेता है।   

आधुनिक युग में मनुष्य विभिन्न रोगों से ग्रस्त है। वह यदि अपने रोग के उपचार के लिए भी योग की तरफ आकर्षित होता है और अपने रोग को ठीक कर पाता है तो उसकी श्रद्धा योग की तरफ हो जाएगी। इससे मानसिक विकास तथा आध्यात्मिक सुख की प्राप्ति होती है।

यदि कोई व्यक्ति योग को केवल रोगों के उपचार के लिए अपनाएगा तो उसे संपूर्ण लाभ नहीं मिलेगा क्योंकि योग कोई औषधि तो है नहीं बल्कि यह जीवन जीने की, स्वस्थ रहने की, आनंदित रहने की एक कला है। इसे नियमित रूप से अपनाने से ही हमें लाभ प्राप्त होगा।

रोगों को दूर करने के लिए मालिश का भी उपयोग किया जाता है। तेल की मालिश,  सूखी मालिश,  सर्वाधिक उपयुक्त होती है। तेलों में शुद्ध सरसों का तेल सर्वाधिक उपयुक्त होता है। मालिश के बाद धूप सेवन और फिर स्नान करना बहुत लाभकारी होता है।

आयुर्वेद मानव स्वास्थ्य संरक्षण और संवर्द्धन का मार्ग प्रशस्त करने वाला जीवन विज्ञान है। इसमें केवल रोग एवं औषधियों का विवरण ही नहीं है बल्कि स्वास्थ्य संरक्षण और संवर्धन के सार्वभौमिक सिद्धांत के तथ्य और अनुभव निहित हैं। आज सामान्य नागरिक भी आयुर्वेद के स्वास्थ्य, दिनचर्या, ऋतुचर्या, आहार-विधि तथा स्वास्थ्य संरक्षण एवं संवर्धन के सिद्धांतों तथा औषधियों के बारे में सामान्य ज्ञान प्राप्त करने का इच्छुक है ताकि सामान्य रोगों की चिकित्सा और स्वास्थ्य के स्तर को बढ़ाया जा सके।

आयुर्वेद की अंतरात्मा और आंतरिक गरिमा पर नजर डालने पर ज्ञात होता है कि यह भारत की संस्कृति, सभ्यता और परंपरा के साथ पूर्ण रूप  से ओतप्रोत है तथा चिकित्सा और स्वास्थ्य रक्षा में बेजोड़ है। यह किसी भी तरह से आश्चर्य की बात नहीं है कि आज भी आधुनिक चिकित्सा विज्ञान की चकाचौंध और विशाल उपलब्धियों के बावजूद भी “आयुर्वेद” ग्रामीणों, आदिवासियों और सुदूर इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए एकमात्र चिकित्सा है।

वर्तमान समय में मानव स्वास्थ्य संरक्षण के लिए आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की अधिक आवश्यकता है। विश्व के चिकित्सक,  चिकित्सा वैज्ञानिक, शिक्षण संस्थाएं, बड़े-बड़े अनुसंधान केन्द्र तथा संस्थाएं आयुर्वेद की महत्ता को स्वीकार करते हैं और इसके विभिन्न विषयों के अध्ययन और अनुसंधान की गतिविधियों में तत्पर रहते हैं। केवल चिकित्सा जगत के नहीं बल्कि सामान्य आम नागरिक भी आयुर्वेदिक औषधियों की सामान्य जानकारी प्राप्त करके प्रायः होने वाली साधारण बीमारियों तथा उनका सरल उपचार जानने के इच्छुक होते हैं।

यह निर्विवाद सिद्ध हो चुका है कि   भारतीय चिकित्सा पद्धति बहुत ही प्राचीन है। जिस प्रकार सृष्टि के प्रारम्भ से ही वेदों को ईश्वर द्वारा प्रदत्त माना जाता है, उसी प्रकार सृष्टि के आरंभ में जब ऋतुओं का समन्वय हुआ तभी से प्रकृति का वरदान मानी गई इन जड़ी-बूटियों की उत्पत्ति भी हुई मानी जाती है। प्राचीन काल से ही ऋषि-मुनियों ने इन पर शोध करके इनके जन्म स्थल, आकृति, गुण तथा प्रभाव आदि के बारे में जानकारी दी है।    

आयुर्वेद चिकित्सा पद्धति की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इसकी उपचार विधियां न केवल अमीरों के लिए बल्कि गरीब से गरीब लोगों के लिए भी उपयोगी होती हैं। आयुर्वेद में विभिन्न रोगों की चिकित्सा में प्रयुक्त सामग्री प्रत्येक मौसम में तथा प्रत्येक स्थानों पर आसानी से उपलब्ध हो जाती है।

समय की कमी और आलसी होने के कारण लोग एक निश्चित समय पर आहार का सेवन, सोना, विश्राम करना आदि नहीं कर पाते हैं। लोगों की कोई एक निश्चित दिनचर्या नहीं बन पाती है। इस कारण प्रायः लोग शारीरिक और मानसिक रूप से रोगग्रस्त हो जाते हैं। हमें अपने को स्वस्थ बनाये रखने के लिए आवश्यक है कि प्रातः सूर्योदय होने से से पहले उठकर कुछ देर तक सैर, व्यायाम, आसन और प्राणायाम अपनी आवश्यकतानुसार करना चाहिए। स्नान करने के बाद ही भोजन करना चाहिए। भोजन को अच्छी तरह से चबाकर खाना चाहिए। दांतों का काम आंतों पर नहीं छोड़ना चाहिए। रात्रि में भोजन करने के दो घंटे के बाद सोना चाहिए।

प्राचीन काल से लेकर वर्तमान समय तक रोगों के उपचार के लिए जितनी भी चिकित्सा पद्धतियों का उपयोग किया गया है, उन सभी में आयुर्वेद का स्थान सबसे ऊपर है। जहां आधुनिक चिकित्सा पद्धति “एलोपैथिक” रोगों को केवल दबा देता है। वहीं आयुर्वेद चिकित्सा शरीर को शोधित कर भविष्य में आने वाले रोगों से लड़ने की शक्ति प्रदान करता है।

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