बच्चो के रोगों का इलाज

बच्चों को होने वाले रोग


परिचय-

          बच्चों को कई प्रकार के रोग हो सकते हैं। ये रोग जन्मजात भी हो सकते हैं या किसी संक्रमण के कारण हो सकते हैं। इन रोगों का उपचार आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा किया जा सकता हैं।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा बच्चों के जो रोग ठीक किये जा सकते हैं वे इस प्रकार हैं-

1. पैरों का टेढ़ापन होना (जेनुवेरूम)

        यह रोग बच्चों को पीठ के बल लेटने के कारण हो जाता हैं। जब रोगी बच्चा खड़ा होता है तो उसकी टांगें टेढ़ी दिखने लगती है तथा उसे चलने-फिरने में परेशानी होने लगती है। इस रोग के कारण रोगी बच्चे के पैर धनुष की तरह बाहर की ओर मुड़ जाते हैं, पैर का ऊपरी हिस्सा बाहर की तरफ तथा पैर का निचला भाग अन्दर की ओर मुड़ जाता है। इस रोग के कारण पैर की एड़ियां आपस में मिल जाती है। लेकिन इस रोग में पैरों का पंजा आपस में नहीं मिल पाता हैं। यह रोग तीन वर्ष के आयु के बच्चों को अधिक होता है।

        यह रोग उन बच्चों को अधिक होता है जिन्हें समय से पहले ही जबरदस्ती खड़ा होना सिखाया जाता है। जब बच्चों की हडि्डयां सही समय पर विकसित भी नहीं हो पाती है उस समय बच्चे को जबरदस्ती खड़ा होना सिखाने के कारण उसकी हडि्डयां टेढ़ी होने लगती हैं, जिसके कारण वे इस रोग का शिकार हो जाते हैं। इस रोग के उदाहरण- रिकेट्स तथा मांसपेशियों का अकुंचन।

बच्चों के इन रोगों का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा  से उपचार-

       इस रोग का उपचार करने के लिए रोगी को कमर के बल लिटाकर उसके पार्श्विक फेमोरल क्षेत्र (जांघ का क्षेत्र) जहां पर दस बिन्दु होते हैं तथा पाश्र्व क्रूरल क्षेत्र में (घुटने से नीचे का क्षेत्र) छ: बिन्दुएं होती हैं। इन बिन्दुओं पर दबाव दिया जाता है। इस प्रकार की क्रिया को एक पैर को दूसरे पैर के पास लाने के लिए किया जाता है। रोगी के पैरों पर इन बिन्दुओं को देखने के लिए चित्र को ध्यानपूर्वक देखिये और फिर रोगी का इलाज कीजिए।

         रोगी के दाएं भाग के बिन्दुओं पर दबाव देने के लिए बाईं करवट की ओर लिटाकर अर्थात पार्श्विक स्थिति में लिटाकर पैर के निचले भाग को सहारा देकर, चिकित्सक को चाहिए कि रोगी का पैर ऊपर की ओर उठाकर तथा दूसरे हाथ से जांघ के ऊपर के बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

        अब रोगी को पीठ के बल लिटाकर उसके बाद चिकित्सक को चाहिए कि रोगी के पैरों को चित्र के अनुसार पकड़कर बारी-बारी से नीचे की ओर खींचे। इस प्रकार से दबाव देने से रोगी कुछ ही दिनों में इस रोग से पूरी तरह से ठीक हो जाता है।

2. जन्मजात मायोजेनिक टोर्टीकोलिस-

        बच्चा जब गर्भाशय के अन्दर भ्रूण की सामान्य स्थिति में रहता हैं तो उसकी गर्दन सिकुड़ी हुई रहती है तथा मस्तिष्क नीचे की ओर छाती पर मुड़ा रहता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

          जब बच्चा गर्भाशय के अन्दर असामान्य स्थिति में होता है तो बच्चे का चेहरा गर्भाशय द्वार की ओर होता है जैसा कि चित्र में दिखाया गया है। इस स्थिति में जब बच्चा जन्म लेता है तो उस समय बच्चे के कान तथा चेहरे की मांसपेशियों के दाएं तथा बाएं भाग पर दबाव पड़ता है। जिसके कारण वहां की मांसपेशियां फट जाती है और जिसके कारण प्रभावित मांसपेशियों का वह भाग कड़ा हो जाता है और जिसके कारण मस्तिष्क की मांसपेशी छोटी पड़ जाती हैं और मस्तिष्क का वह भाग नीचे की ओर झुक जाता है। ऐसी स्थिति में इलाज करना बहुत जरूरी होता है क्योंकि इस कारण से बच्चे में कई प्रकार के रोग उत्पन्न हो सकते है जैसे- बेहरापन, मस्तिष्क का कुछ भाग चपटा होना तथा मस्तिष्क का कमजोर होना आदि।

बच्चों के इन रोगों का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा  से उपचार-

          बच्चे के रोग ग्रस्त अंग के कडे़पन को जानने के लिए चिकित्सक को चाहिए की रोगी को पेट के बल लिटा दें तथा उसकी तर्जनी और बीच की उंगलियों से मस्तिष्क से मेस्टायड प्रोसेस तक कान की मांसपेशी को हल्के से थपथपाएं।

(आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार इलाज करने के लिए मस्तिष्क के कड़े भाग को ढूढ़ने का चित्र)

          जब रोगी के मस्तिष्क के कड़े भाग का पता चल जाए तो चिकित्सक को चाहिए कि अपनी दोनों उंगलियों से कड़े भाग पर थोड़ी-थोड़ी देर के अन्तराल पर तरल दबाव दें जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

(आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार करने के लिए मस्तिष्क के कड़े भाग पर तरल दबाव देने का चित्र)

          मस्तिष्क के कडे़पन को पूरी तरह से ठीक करने के लिए चिकित्सक को रोगी के कान के पास के क्षेत्र को पकड़कर उसके मस्तिष्क को स्वस्थ भाग की ओर घुमाएं तथा फिर मस्तिष्क को दुबारा से पहली वाली स्थिति में लाएं। जैसा कि चित्र में दिखाया गया है।

(आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार करने के लिए मस्तिष्क को पकड़कर घुमाने का चित्र)

          नवजात शिशुओं में इस रोग का उपचार अत्यन्त आसान होता है। इस रोग का उपचार किसी अच्छे चिकित्सक के द्वारा ही कराना चाहिए क्योंकि उनकों सही तरीके से दबाव देने का अनुभव होता है और वे इस रोग का उपचार सही तरीके से कर सकते हैं।

3. जन्मजात विस्थापित कूल्हे का जोड़-

        गर्भाशय के अन्दर भ्रूण की टांगे असामान्य स्थिति में होने के कारण कूल्हे के जोड़ में रोग उत्पन्न हो जाता है। इस रोग के परिणाम स्वरूप फेमूर हड्डी का ऊपरी भाग अपने स्थान से हट जाता है। जब बच्चा जन्म लेता है तो उस समय फेमूर का ऊपरी सिरा लेब्रम से दूर हट जाता है। इस स्थिति में यदि जोड़ सामान्य भी नज़र आता है, फिर भी कभी न कभी कूल्हे का जोड़ अपने स्थान से हट जाता है जिसके कारण रोगी को बहुत तेज दर्द तथा चलने में परेशानी होती है। इस रोग के कारण रोगी अपने शरीर को एक भाग की ओर झुकाकर चलने लगता है। यह रोग लड़कियों को अधिक होता है लेकिन यह रोग शरीर के एक ही भाग में होता है। शरीर के दोनों कूल्हों के भाग में कभी-कभी ही ऐसा रोग देखने को मिलता है क्योंकि इस रोग के कारण फेमूर के ऊपरी भाग का सिरा, बाहर की ओर खिसक जाता है। इसलिए दोनों पैरों में से जो पैर इस रोग से प्रभावित होता है। वह पैर कुछ दूसरे पैर से छोटा हो जाता है।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा इन रोगों का उपचार-

        इस रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को पेट के बल लिटाकर उसके कूल्हे के जोड़ के आस-पास दबाव देना चाहिए जिससे उसके कूल्हे की मांसपेशियां लचीली बन सके।

        रोगी को पीठ के बल लिटाकर चिकित्सक को रोगी के कूल्हे के पास ग्रेटर ट्रोचेंटर को थपथपाकर हड्डी टूटने की सही जगह का पता लगाना चाहिए जब हड्डी के टूटे भाग का पता लग जाए तो चिकित्सक को चाहिए कि अपने दाएं हाथ की हथेली के बीच के भाग को वहां पर रखे जहां पर हड्डी टूटी है। फिर रोगी के घुटने को मोड़ने के लिए कहना चाहिए तथा इसके बाद कूल्हे के जोड़ को 45 डिग्री का कोण बनाते हुए बाएं हाथ की हथेली को सहारा देने के लिए पृष्ठा क्रूरल भाग पर रखना चाहिए।

(आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार पैर के ग्रेटर ट्रोचेटर फेमूर, एसेटावलम तथा घुटने की संधि के मोड़ का चित्र)

          इसके बाद चिकित्सक अपने दाएं हाथ की हथेली से रोगी के स्तन को दबाते हुए पैर के ग्रेटर ट्रोचेंटर भाग को एसेटावलम भाग की ओर खींचते है। जब फेमूर का ऊपरी भाग एसाटावल तक खींच जाएं तब पार्श्विक क्षेत्र पर दबाव देना चाहिए।

        अब चिकित्सक को अपने दाईं हथेली से रोगी के ऊपरी भाग को छोड़कर अपने दाएं हाथ की हथेली को पैर क्रूरल भाग पर रखकर बाएं हाथ से घुटने को बाहर की ओर मोड़ते हैं जिसके कारण फेमूर का ऊपरी सिरा अन्दर की ओर घूमता है। इसके बाद फेमूर का सिरा पकड़कर एसाटावलम की ओर वापस लाना चाहिए। 

        जब चिकित्सक रोगी के फेमूर क्षेत्र (घुटने के नीचे का भाग) के ऊपरी सिरे को घुमाता है। उस समय यदि कोई ध्वनि (आवाज) सुनाई नहीं देती है तो इसका मतलब यह होता है कि जोड़ ठीक हो गया है लेकिन उपचार करने के बाद सावधानी बरतनी चाहिए क्योंकि जोड़ के इस सिरे की मांसपेशियां कमजोर होती है। जिसके कारण से जोड़ अपनी स्थान से दुबारा खिसक सकता है। जब जोड़ ठीक हो जाए तब भी कुछ दिनों तक उपचार करते रहना चाहिए।

4. जेनु वेलगुम-

        इस रोग के कारण बच्चों की टांगों का ऊपरी भाग अन्दर की ओर मुड़ जाता है तथा टांग का निचला भाग भी बाहर की ओर मुड़ जाता हैं। इस रोग के कारण पैर के पंजे आपस में जुड़ (अपास में एक दूसरे से मिल) जाते हैं। लेकिन एड़िया नहीं सटती हैं।

       इस रोग के होने के निम्नलिखित कारण हो सकते हैं जो इस प्रकार हैं- हडि्डयों का असामान्य रूप से विकसित होना, मांसपेशियों का सिकुड़ना, रिकेट्स रोग या पैर के हडि्डयों से सम्बन्धित कोई जन्मजात रोग या फिर पोलियो रोग।

बच्चो के जेनु वेलगुम रोग का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार-

          इस रोग का उपचार करने के लिए रोगी को पीठ के बल लिटा देना चाहिए। फिर रोगी के पैरों को घुटने से बाहर की ओर मोड़कर पैर के मध्य फेमूर क्षेत्र (जांघ से लेकर घुटने तक का भाग) के दस बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए। फिर इसके बाद रोगी के पैर के पृष्ठ क्रूरल (घुटने से एड़ी तक का क्षेत्र) क्षेत्र के 6 बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए।

        इसके बाद रोगी को पार्श्विक (बाएं करवट लेकर लिटाना) स्थिति में लिटाकर रोगी की टांग के मध्य फेमूर क्षेत्र (जांघ से घुटने तक का क्षेत्र) को एक हाथ से पकड़कर ऊपर की ओर तथा दूसरे हाथ से पार्श्विक क्रूरल क्षेत्र (घुटने से ऐड़ी तक का क्षेत्र) की ओर खींचते हैं। इस प्रकार से उपचार कई बार करना चाहिए। दोनों पैरों का उपचार भी ठीक इसी प्रकार से किया जा सकता है।

 5. रीढ़ की हड्डी का एक ओर खींच जाना-

        यह रोग प्राय: लड़कियों को 11 वर्ष की उम्र से लेकर 18 वर्ष की उम्र तक अर्थात बचपन से जवानी के बीच के समय में होता हैं क्योंकि उस समय लड़कियों के शरीर का शारीरिक विकास होता है। जब यह रोग ज्यादा गंभीर हो जाता है तो उनके शरीर की रीढ़ की हडि्डयां कुछ तिरछी हो जाती है। इस रोग से पीड़ित रोगी आपने धड़ को शरीर के आगे की ओर झुका लेता है।          

          जब इस रोग की शुरूआत होती है उसी समय इसका उपचार करना आसान होता है। इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी को पौष्टिक भोजन का सेवन करना चाहिए तथा इसके साथ-साथ व्यायाम भी प्रतिदिन करना चाहिए।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा इस रोग का उपचार-

       रीढ़ की हड्डी एक ओर खिंच जाने पर रोगी का उपचार करते समय उसे सीधा या सैजा की मुद्रा में बैठाना चाहिए और फिर उसके ग्रीवा क्षेत्र (गर्दन के भाग), मेरू-मज्जा (सिर के पीछे गर्दन की हड्डी का भाग) तथा पश्चकपाल क्षेत्र (सिर के पीछे का भाग) पर दबाव देना चाहिए। इसके बाद रोगी के शरीर के दाएं-बाएं स्कंधफलक के क्षेत्रों (गर्दन के पास का क्षेत्र) पर बारी-बारी से अंगूठे के द्वारा दबाव देना चाहिए फिर रोगी की कलाइयों को पकड़कर उसके हाथ को ऊपर की ओर उठाना चाहिए। इसके बाद रोगी के धड़ को पीछे की ओर मोड़ना चाहिए।

          इस रोग का उपचार करने के लिए रोगी को प्रतिदिन व्यायाम करना चाहिए। प्रतिदिन 5 से 10 मिनट तक व्यायम करने से रोग जल्दी ठीक हो जाता है।

6. क्लब फुट-

         यह रोग बच्चों में जन्मजात होने वाली तीसरी बीमारी है। इस रोग के कारण जन्म के समय में बच्चों का पैर अन्दर की ओर मुड़ जाता है तथा पैर में ऐंठन सी होने लगती है। पैर का तलुवा अन्दर की ओर मुड़ जाता है। यह रोग मांसपेशियों में पक्षाघात (लकवा) रोग के कारण होता है और यह रोग किसी सदमे या पोलियों के रोग हो जाने के कारण भी हो सकता है।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा  द्वारा इस रोग का उपचार-

          इस रोग से पीड़ित रोगी का उपचार करने के लिए उसके पैर के पंजे को हाथ से पकड़कर बाहर की ओर घुमाते हैं।

        इस रोग को ठीक करने के लिए रोगी के टखने के पार्श्विक भाग (टखने के पास का क्षेत्र) पर दबाव देना चाहिए तथा पंजे के पृष्ठ भाग (पंजे के पीछे का भाग) पर तथा पैर की छोटी उंगली के पृष्ठ (छोटी उंगली के पीछे का भाग) भाग पर दबाव देना चाहिए। इसके बाद रोगी के पैर के पार्श्विक क्रूलर क्षेत्र (घुटने से एड़ी तक का क्षेत्र) पर जो 6 बिन्दु है उन सभी बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए।

   कुछ खास थेरेपियां

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