प्राथमिक चिकित्सा

Manav jiwan anek tarah ki ghatanon aur durghatanon se bhara hua hai. Yah durghatan chhoti sib hi ho sakat hai aur jyada bhayanak bhi. Kahi bhi ho sakat hai jaise gharon men baithe baithe hi koee bhi durghatana ho sakati hai aur sadak par chalate-chalate bhi koee durghatan ho sakati hai.

प्राथमिक चिकित्सा


परिचय-

          मानव जीवन अनेक तरह की घटनाओं और दुर्घटनाओं से भरा हुआ है। यह दुर्घटना छोटी सी भी हो सकती है और ज्यादा भयानक भी। कहीं भी हो सकती है जैसे- घरों में बैठे-बैठे ही कोई भी दुर्घटना हो सकती है और सड़क पर चलते-चलते भी कोई दुर्घटना हो सकती है।

प्राथमिक चिकित्सा के लिए जरूरी सामान-

  • थोड़ी सी साफ रुई और थोड़ा साफ कपड़ा।
  • चिपकाने वाला बैण्ड-एड।
  • थोड़ी सी तिरछी और लंबी सी पटि्टयां।
  • थोड़ी सी दर्द को कम करने वाली गोलियां
  • थोड़ी सी शराब
  • अरण्डी का तेल।
  • गिल्सरीन और वैसलीन
  • बोरिक एसिड, बोरिक ओइंटमेंट, स्पिरिट, डैटोल या सैवलान, पोटाशियम परमेगनेट, टिंचर, आयोडीन, बरनोल, चोट या घाव पर लगाने वाली दवाएं और पोटली के लिए अलसी।
  • 1 छोटी कैंची, 1 चाकू और थोडी सी सेफ्टी पिन।
  • 1 चम्मच पानी और 1 छोटा गिलास, दवा पिलाने के लिए

सावधानी-

          दवा की हर शीशी, डिब्बी और पुड़िया के ऊपर दवा का नाम लिखना चाहिए ताकि कोई गलत दवा न ले लें। खाने वाली दवाएं और लगाने वाली दवाएं अलग-अलग रखनी चाहिए।

प्राथमिक चिकित्सक के काम-

        एक प्राथमिक चिकित्सक को सबसे पहले पूरी तरह से चिकित्सा के बारे मे जानकारी होनी चाहिए। सामान्य जानकारी के साथ-साथ पट्टी आदि बांधने-खोलने के बारे में भी कुछ व्यावहारिक प्रशिक्षण जरूरी है। चिकित्सा के बारे में पूरी जानकारी होने पर ही वह पता कर सकेगा कि लगी हुई चोट साधारण है या गम्भीर है और रोगी का ध्यान किस तरह रखना है।

चिकित्सा-

1. अगर आपको प्राथमिक चिकित्सा की थोड़ी सी जानकारी है तो रोगी के पास के दूसरे लोगों को दूर हटाकर बिल्कुल शान्त दिमाग से तुरन्त चिकित्सा में लग जाइए। जाहिर है जब रोगी को चोट लगी होगी तो उसके आसपास के लोग घबरा रहे होंगे पर आप बिल्कुल नहीं घबराइए क्योंकि अगर आप घबरा गई तो चिकित्सा गलत भी हो सकती है।

2. दुर्घटना होने पर सबसे पहले घायल व्यक्ति को आराम से पलंग पर लिटा दीजिए। फिर तुरन्त पानी मंगाकर रोगी को हल्का सा सहारा देकर थोड़ा-थोड़ा सा पानी उसके मुंह में डालें। अगर वो होश में नहीं हो तो उसके मुंह पर पानी के छींटे मारिये। अगर घायल व्यक्ति की सांस रुक रही हो तो उसका सिर ऊंचा करिये। फिर भी अगर उसे सांस लेने में परेशानी हो रही हो तो उसकी जीभ को पकड़कर बाहर खींचिए और सिर को एक तरफ कर दीजिए ताकि वह व्यक्ति ठीक से सांस ले सके।

3. अगर घायल व्यक्ति को सिर्फ छोटी-मोटी खरोंच या चोट लगी हो तो उस चोट को साफ करके घर पर ही रखी हुई कोई सी मलहम लगा दें। उसके बाद डॉक्टर के पास जाकर `टिटनेस´ का इंजैक्शन लगवा लें ताकि `इन्फैक्शन´ फैलने का खतरा न रहे। अगर चमड़ी कट-फट गई हो तो पानी में कीटाणु मारने वाली दवा मिलाकर उसमें रुई को भिगोकर उससे साफ करके पट्टी बांध दीजिए और फिर जल्दी से डॉक्टर के पास जाकर टांके लगवा लें। टांके लगवाने में देर करने से 6 घंटे के बाद `इन्फैक्शन´ होने की संभावना बढ़ जाती है।

4. अगर घायल व्यक्ति के घाव या चोट से खून बह रहा हो तो सबसे पहले उस खून को रोकने का इन्तजाम करना बहुत जरूरी है। इसके लिए किसी साफ कपड़े या रुमाल से चोट की पास की जगह पर दबाव डालकर खून का बहना रोक दीजिए। अगर खून कुछ ज्यादा ही बह रहा हो तो कपड़े को बहुत कसकर बांध देने से खून को बहने से रोका जा सकता है। एक बात ध्यान रखें कि इसके तुरन्त बाद रोगी को जल्द से जल्द डॉक्टर के पास ले जाना जरूरी है क्योंकि खून रोकने की यह क्रिया 45 मिनट से ज्यादा करते रहने से चोट लगा हुआ अंग सदा के लिए बेकार हो सकता है।

5. घाव चाहे कैसा भी हो छोटा या बड़ा उसे बिल्कुल भी खुला नहीं छोड़ना चाहिए। आजकल बाजार में बहुत सी तरह की घाव पर लगाने वाली पटि्टयां मिल जाती हैं, उनको तुरन्त घाव पर लगा लेना चाहिए। ज्यादा गहरे घाव को हो सके तो खुद ही साफ करके और ढककर ही डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

6. काफी बार दुर्घटना होने के बाद लगने वाली चोट ऊपर से तो दिखाई नहीं देती है पर अन्दर से बहुत ज्यादा गम्भीर होती है और उस अंग में बहुत ज्यादा दर्द और जलन होती है तो ऐसी चोटों में भी लापरवाही करना ठीक नहीं है जितना जल्दी हो सके डॉक्टर के पास जाना चाहिए।

7. अगर चोट लगने के कारण हड्डी अपनी जगह से खिसक गई हो तो बड़ी ही सावधानी से उसे वापस अपनी जगह पर लाने की कोशिश करें। परन्तु अगर लगे कि हड़डी टूटी हुई है और घायल व्यक्ति दर्द को सहन नहीं कर पा रहा है तो खुद कुछ न करके उस स्थान को लकड़ियों का सहारा देकर तिकोनी पटि्टयों से बांध दें और रोगी को तुरन्त ही अस्पताल ले जाएं।

8. अगर दुर्घटना की वजह से घायल व्यक्ति को दिमागी चोट पहुंची हो तो उसे गर्म दूध, चाय और उसे थोड़ी सी शराब दे दें ताकि उत्तेजना पाकर रोगी खुद ताकत पा सके।

9. अगर किसी व्यक्ति ने जहर खा लिया है तो तुरन्त पता लगा लेना चाहिए कि वह कौन सा जहर था उसे निकालने की पूरी तरह कोशिश कीजिए। घायल व्यक्ति को सोने नहीं देना चाहिए और बेहोश होने पर तुरन्त डॉक्टर के पास पहुंच जाना चाहिए।

सावधानी-

         ऊपर दी गई हर प्रकार की चिकित्सा के लिए जिस जगह पर दुर्घटना हुई हो उस स्थान पर मिलने वाली चीजों से ही अपना काम चलाइए। क्योंकि दुर्घटना के बाद बाजार से सामान या दवाएं मंगाने का समय नहीं होता है। ज्यादा गम्भीर दुर्घटना होने पर पहले तो आप घायल व्यक्ति की चिकित्सा में तुरन्त जुट जाएं और साथ में ही किसी दूसरे व्यक्ति को डॉक्टर को बुलाने या एंबुलैंस को फोन करने को भेज दें।

  • पैर के तलुवे के घाव पर पट्टी बांधना।
  • पैर की चोट पर पट्टी बांधने का तरीका।
  • घुटने की चोट पर पट्टी बांधने का तरीका।
  • सीने पर पट्टी बांधने का तरीका।

प्रमुख दुर्घटना-

1. जलना या झुलसना-

  • अक्सर औरतों के रसोई में काम करते हुए कपड़ों में आग लग जाती है। ऐसे समय में मदद के लिए भागते रहना ठीक नहीं है क्योंकि भागने से हवा लगने के कारण आग की लपटें और बढ़ जाती है। ऐसी स्थिति में आग को बुझाना और मुश्किल हो जाता है। आग लगे हुए व्यक्ति को तुरन्त ही कोई कंबल या मोटी चादर लपेटते हुए फर्श पर लुढ़काना चाहिए। अगर चादर या कंबल न मिले तो आग लगे हुए व्यक्ति को वैसे ही जमीन पर लुढ़काने से आग की लपटें जल्दी बुझ जाती है। नहीं तो भागने से आग की लपटे बालों में भी लग सकती है। आग के बुझ जाने के बाद सबसे पहले शरीर पर से जले हुए कपड़ों को हटाइए। अगर जलने की वजह से कपड़े शरीर से ही चिपक गए हैं तो उन्हे नारियल के तेल में भिगोकर उतारना चाहिए। इसके बाद सदमे और जलन की चिकित्सा करें और फिर रोगी को डॉक्टर के पास ले जाएं।
  • गर्म पानी, गर्म दूध, चाय या गर्म घी के ऊपर गिरने से त्वचा जलती नहीं बल्कि झुलस जाती है। इसका इलाज घर पर ही किया जा सकता है। नमक को थोड़े से पानी में घोलकर तुरन्त गाढ़ा सा लेप बना लें। इस लेप को झुलसी हुई त्वचा पर करने से आराम मिलता है और छाले नहीं पड़ते। बरनोल या बोरिक मलहम लगाने से भी लाभ होता है। अगर छाले पड़ गए हों तो बोरिक एसिड मिलाकर नारियल का तेल लगा लें।

2. बिजली का करंट लगना-

  • घरों में कभी-कभी बिजली से चलने वाले सामानों में करंट आ जाने से या बरसात के मौसम में कूलर आदि में करंट आ जाने से जोर का झटका लगता है या व्यक्ति उससे चिपक जाता है। घरों में वैसे भी आजकल बहुत सा काम बिजली के उपकरणों से होने लगा है। इससे करंट लगने का खतरा ओर भी बढ़ गया है। अगर करंट लगने पर व्यक्ति का तुरन्त ही ना उपचार कराया जाए तो उसकी मृत्यु हो सकती है। अगर कोई व्यक्ति बिजली के किसी तार आदि से चिपक जाए तो तुरन्त ही मेन स्विच बन्द करके हाथ में लकड़ी की छड़ी या रबड़ की कोई चीज लपेटकर खुद भी लकड़ी के पट्टे, मेज आदि पर खड़े होकर चिपके हुए व्यक्ति को अलग कर लें। बाद मे उसकी हालत के अनुसार उसकी चिकित्सा करें या सदमे का इलाज करवाएं।
  • सदमा चाहे कैसा भी हो बिजली के झटके का, दुर्घटना का या किसी दुख के समाचार का इन सबके लक्षण है- चेहरा पीला पड़ना, होंठ पीले पड़ना, माथे पर पसीने की बूंदे नजर आना, शरीर ठण्डा पड़ना, नब्ज कभी कमी कभी तेज चलना, ज्यादा प्यास लगना या उल्टी आना और बेहोशी आना। ऐसे मे रोगी को आराम से लिटाना चाहिए। उसके शरीर को गर्म रखने की कोशिश करें, गर्म दूध या चाय में बहुत सारी चीनी डालकर और उसमे थोड़ी सी शराब मिलाकर रोगी को पिलाएं। रोगी की पेंट को ढीली कर दें और कमीज के बटन खोल दें तथा पैरों के पास गर्म पानी की बोतल रख दें। बेहोशी को दूर करने के लिए अपने मुंह से रोगी को सांस दें ताकि डॉक्टर के आने तक आपकी सांसों की मदद से वह जीवित रहें।

3. लू लगना- गर्मी के दिनों में ज्यादा लू लगने के कारण रोगी का सिर घूम जाता है, आंख की पुतली सिकुड़ जाती है, बार-बार प्यास लगती है, नब्ज एकदम तेज हो जाती है और बेहोशी छाने लगती है। ऐसे समय में रोगी को किसी ठण्डे स्थान पर ले जाना चाहिए। उसके ऊपर के कपड़े उतारकर उसके सिर, गले और रीढ़ पर बर्फ का ठण्डा पानी डालें। फिर रोगी को आराम करने दें। इसके बाद रोगी को पीने के लिए आम का जूस या नींबू की शिकंजी दे दें। कभी-कभी लू लगने पर बहुत तेज बुखार भी हो सकता है।

3. बेहोशी आना-

  • अचानक कोई डरावनी चीज देखने से या बहुत ज्यादा गर्मी लगने के कारण बेहोशी आ सकती है। कभी-कभी दिमाग पर चोट लगने से, दिमाग पर ज्यादा बोझ पड़ने से या खून की नली के फटने के कारण भी व्यक्ति बेहोश हो सकता है। जहर खाने से, मिर्गी आने से या हिस्टीरिया के रोगों में भी बेहोशी आ जाती है। बेहोशी आने पर रोगी को खुली हवा में लिटाना चाहिए। उसके कपड़े ढीलें करके सिर और मुंह पर ठण्डे पानी के छींटे मारने चाहिए। अगर उसके हाथ-पैर ठण्डे पड़ गए हो तो उन्हे कंबल से ढक देना चाहिए। अगर मुंह पीला पड़ जाए तो उसका सिर नीचे की तरफ रखना चाहिए और मुंह लाल हो तो सिर को ऊंचा करना चाहिए। बेहोशी टूटने पर रोगी को गर्म-गर्म दूध या चाय पिलानी चाहिए।
  • हिस्टीरिया के रोगी को खुली जगह में लिटाकर उसके कपड़े ढीले कर दें और उसे एमोनिया सुंघाए। मिर्गी का दौरा किसी भी समय और कहीं पर भी आ सकता है। इस रोग में रोगी बेहोश होकर जमीन पर गिर जाता है, उसका पूरा शरीर अकड़ जाता है, दांत भिंच जाते हैं। वह हाथ-पैरों को पटकता रहता है और उसकी सांस हल्की पड़ जाती है तथा मुंह से झाग निकलने लगते हैं। हिस्टीरिया के दौरे और मिर्गी के दौरे में यह मुख्य अन्तर है कि हिस्टीरिया के दौरे में पहले दिल घबराता है और फिर रोगी सुरक्षित जगह पर जाकर लेट जाता है जबकि मिर्गी का दौरा अचानक पड़ने से रोगी की सुरक्षा को खतरा रहता है। इसलिए मिर्गी के रोगी को आग से, पानी से दूर रखना चाहिए और कहीं भी सड़क पर या सफर में अकेले नहीं भेजना चाहिए। अगर वह अकेला बाहर जाए तो उसके पर्स में घर का फोन नंबर या पता लिखकर डाल देना चाहिए। मिर्गी के दौरे में रोगी को बिल्कुल सीधा लिटाकर हवा करें और एमोनिया सुंघाए। उसका मुंह खोलकर दोनों जबड़ों के बीच में पेन आदि फंसा दें ताकि वह अपनी जीभ न काट पाए। कुछ देर बाद रोगी अपने आप ही खड़ा हो जाएगा।

4. पानी में डूबना- अगर कोई व्यक्ति पानी में डूब रहा हो तो उसको बचाने के बाद सबसे पहले ये देखना चाहिए कि वह व्यक्ति पानी के अन्दर कितनी देर तक रहा और उसकी हालत क्या है? अगर पानी से निकालने के बाद वह बेहोश है और उसके पेट के अन्दर पानी भर गया है तो उसके नाक-गले और मुंह को साफ करके उसे उल्टा लिटा दें ताकि पेट मे भरा हुआ पानी जितना निकल सकता है, निकल जाएं, फिर उसके गीले कपड़े उतारकर पेट के बल उल्टा लिटा दें और पेट के नीचे हाथ डालकर बीच से उठाएं ताकि बाकी पानी भी निकल जाए। इस समय में रोगी के लिए एक-एक पल बहुत कीमती होता है, इसलिए सारा काम जल्दी-जल्दी करना चाहिए। पानी निकलने के बाद रोगी को तुरन्त ही मुंह से सांस देनी चाहिए।

कृत्रिम सांस देने की विधि-

रोगी को कृत्रिम सांस 2 प्रकार से दी जाती है-

पहली विधि-

          सबसे पहले रोगी को उल्टा लिटाकर उसके सिर को 1 तरफ घुमा दें। फिर उसके दोनों हाथों को सिर के आगे की ओर जमीन पर फैला दें। उसकी जीभ को बाहर निकाल दें। खुद रोगी की बगल में घुटनों के बल उस तरफ बैठें, जिस तरफ उसका मुंह किया गया हो। अपने दोनों हाथों को रोगी की कमर पर रख दें और उसकी बाजुओं को सीधा और सख्त करके हाथों पर अपने शरीर का दबाव डालें। इससे रोगी के डायफ्राम पर दबाव पड़ने से फेफड़ों की हवा बाहर निकल जाएंगी। फिर धीरे-धीरे हाथ ढीले करें ताकि डायफ्राम अपनी जगह पर आ जाए और सांस अदंर भरें। इस क्रिया को 1 मिनट के अन्दर लगभग 12 बार तब तक चालू रखें जब तक कि स्वाभाविक दबाव चालू न हो जाए। सांस चालू हो जाने पर हाथ-पैरो में गर्मी पहुंचाने की कोशिश करें।

दूसरी विधि-

          रोगी को पीठ के बल बिल्कुल सीधा लिटाएं। उसके कंधों के नीचे तकिया रखकर कंधे को ऊंचा और सिर को थोड़ा सा नीचा रखें। फिर रोगी की जीभ को बाहर निकालें, दूसरे व्यक्ति को रूमाल से जीभ पकड़ने को कहिए। खुद रोगी के सिर के पीछे घुटनों के बल बैठ जाएं और रोगी की कलाइयों को पकड़कर अपनी ओर खींच लें। कलाइयों को खींचते समय कोहनियां जमीन के करीब ही रहनी चाहिए। फिर हाथों को मोड़कर नीचे पेट की ओर लाएं और सीने के अगल-बगल हाथों और कोहनियों को दबाएं। इस क्रिया को तब तक करें जब तक कि स्वाभाविक सांस चालू न हो जाए।

6. गले मे कुछ अटक जाना- अक्सर बच्चे खेलते-खेलते अपने मुंह में कुछ डाल लेते हैं जैसे- पैसे, बटन आदि जिनकी वजह से उनकी सांस रुकने लगती है। ऐसी हालत में बच्चे को उल्टा लटकाकर पीठ पर जोर की थपकी दें ताकि उसके गले में अटकी हुई चीज बाहर निकल जाए। अगर बच्चा बटन, सिक्का आदि निगल जाए तो उसे जुलाब दें दे ताकि वह चीज मल के साथ बाहर निकल जाए। अगर निगली हुई चीज नुकीली है तो वह आंतों में फंसकर नुकसान पहुंचा सकती है। तब बच्चे को ज्यादा मात्रा में केले या गाढ़ी खीर खिलाएं जिससे कि वह वस्तु आसानी से फिसलकर मल के साथ बाहर निकल जाए। अगर बच्चे की हालत ज्यादा गम्भीर हो तो उसे तुरन्त डॉक्टर के ले पास जाएं।

7. आंख, नाक या कान मे कुछ घुस जाना-  

  • अगर किसी की नाक के अन्दर कुछ फंस जाए तो मुंह को बन्द करके जोर से छींक मारें। अगर वो चीज ना निकले तो नाक में कोई चीज डालकर छींक मारने की कोशिश करें। अगर ऐसे भी वो चीज बाहर ना निकले तो डॉक्टर को दिखाएं। अगर कान में मच्छर आदि घुस जाए तो कड़वे तेल की थोड़ी सी गर्म बूंदे डालें। अगर इस तरह कान साफ न हो तो तुरन्त डॉक्टर के पास जाएं।
  • आंख में कंकड़, मच्छर आदि घुसते ही तुरन्त सिर को नीचा करके बार-बार अपनी पलकें झपकाती रहें जिससे कि वह चीज आंख मे से बाहर आ जाए। ऐसे समय में आंखों को मसलना नहीं चाहिए नहीं तो परेशानी हो सकती है। एक साफ रूमाल के कोने को गिल्सरीन मे भिगोकर उसकी मदद से आंख में से हल्के से निकाल दें। आंखों में पानी के छींटे देने या पानी में रखकर आंखों को बार-बार खोलने और बन्द करने से भी आंख में अटकी हुई चीज बाहर निकल जाती है।

8. जहर खा लेना- जहर कई तरह के होते हैं- असर की दृष्टि से इसको 4 भागों में बांटा जा सकता है-

  • जलाने वाले जहर- गंधक का अम्ल, कार्बालिक एसिड, कास्टिक सोड़ा आदि शरीर के अन्दर पहुंचकर शरीर को जला देते हैं। इसमे गले और मुंह में बहुत तेज जलन होती है, बहुत तेज दर्द होता है। उल्टी भी हो सकती है। सांस लेने में कठिनाई के साथ रोगी कोमा में चला जाता है।
  • नींद लाने वाले जहर- नींद की गोलियां, अफीम आदि खाने से पहले नींद आती है और फिर गहरी बेहोशी छा जाती है। व्यक्ति की आंख की पुतली सिकुड़ जाती है और नाड़ी सुस्त पड़ जाती है।
  • नाड़ी जहर- शराब, क्लोरोफार्म, धतूरा, भांग आदि इस्तेमाल करने से पहले तो व्यक्ति अपने आप ही खुद से बोलता रहता है और फिर उस पर गहरी बेहोशी छा जाती है। इन चीजों के इस्तेमाल से आंखों की पुतलियां सिकुड़ती नहीं है बल्कि फैल जाती है।
  • जहरीला भोजन- खाने-पीने की चीजों में मिलावट होना, सड़ा हुआ भोजन, जहरीले जन्तुओं के द्वारा खाया गया भोजन, भोजन में स्फोटिक जहर पैदा करता है। यह जहर जलाता तो नहीं है लेकिन मुंह, गले और पेट में जलन जरूर पैदा कर देता है। रोगी को पेट में पीड़ा के साथ उल्टी-दस्त होने लगते हैं।
  • प्राथमिक चिकित्सा करने वाले चिकित्सक को सबसे पहले ये पता लगाना चाहिए कि उसने कौन सा जहर खाया है? या अंजाने में जहर खा लेने पर रोगी के लक्षण क्या है? रोगी में नजर आने वाले लक्षणों से, मुंह से निकलती हुई बदबू से, जहर से जले स्थानों की जांच करने से, रोगी की आंख की पुतली के सिकुड़ने से या फैलने से जहर की पहचान हो सकती है। जहर के बारे में पता लगते ही तुरन्त डॉक्टर को बुलाना चाहिए। जब तक डॉक्टर आए तब तक रोगी को जहर के असर से बचाने के लिए निम्नलिखित उपाय कर सकते हैं-
  • अगर जहर खा लेने के कारण व्यक्ति के मुंह, गला और होंठ न जले हों तो गुनगुने पानी में दो बड़े चम्मच नमक डालकर उसे 2-2 मिनट के बाद तब तक पिलाना चाहिए जब तक कि उसे उल्टी न हो जाए।
  • अगर जहर से शरीर जल रहा हो तो रोगी को उल्टी नहीं करानी चाहिए। रोगी के गले पर बाहर किसी गर्म चीज से सिकाई करें। गर्म घी या गर्म माण्ड या पैराफीन पिलाने से जहर का असर कम होता है और रोगी को दर्द और कमजोरी में आराम मिलता है।
  • अगर जहर अम्ल (कैमिकल) वाला है तो रोगी को जल्दी से क्षार वाली चीजें पिलाएं जैसे- चूने का पानी, मैग्नेशिया या पानी में खड़िया मिट्टी या चाक घोलकर। अगर यह पता न लगें कि जहर अम्ल का है या क्षार का तो रोगी को बहुत सारा ठण्डा पानी या दूध पिला दें।
  • अगर रोगी ने नींद लाने वाला जहर खा लिया हो तो उसे किसी भी तरह से सोने न दें। पहले उसे उल्टी करा दें और फिर उसे जगाए रखने के लिए तेज कॉफी पिला दें।
  • अगर जहर खाए हुए व्यक्ति का शरीर अकड़ रहा हो तो उसको उल्टी कराने के बाद कृत्रिम सांस देनी चाहिए। अगर व्यक्ति बेहोश हो जाए तो उसके हाथ-पैरों में सिंकाई करें। ऐसे में नमक के पानी का एनीमा भी काफी लाभकारी होता है।
  • अगर व्यक्ति ने बाहर का डिब्बों में बन्द भोजन खा लिया हो ओर पता न हो कि वो खराब हो गया है या फिर अंजाने में सड़ा हुआ भोजन खा लेने पर ज्यादातर हैजे के लक्षण पैदा होते हैं। ऐसे में दस्त रोकने की दवा लेना नुकसानदायक हो सकता है। रोगी को दस्त करवाने के बाद दवा दें और बाद में गर्म दूध के साथ शराब मिलाकर दें।
  • अगर व्यक्ति द्वारा खाए गए जहर की पहचान न हुई हो तो उसे गर्म दूध या चाय में फेंटे हुए कच्चे अण्डे या चावल का पानी देने से लाभ हो सकता है। ये चीजें किसी भी प्रकार के जहर से रोगी को बचाने की कार्य करती है।

9.     जहरीले जन्तुओं का जहर- जहरीले जन्तु, सांप, बिच्छू आदि कीट-पतंगों के काटने से उनका जहर त्वचा द्वारा शरीर में पहुंच जाता है। क्योंकि यह जहर अलग-अलग तरह का होता है इसलिए इनकी चिकित्सा करने की विधियां भी अलग-अलग होती है।

10.   पागल कुत्ते का काटना- अगर किसी को कुत्ता काट लें तो सबसे पहले ये पता लगाना जरूरी है कि कहीं कुत्ता पागल तो नहीं था। अगर कुत्ता पागल हो तो थोड़े समय तक उस पर नजर रखने के बाद यह पता लगाना मुश्किल नहीं होगा। पता लगने पर रोगी को डॉक्टर के पास जाकर इंजैक्शन लगवाना चाहिए। अगर इसका कुछ समय तक इलाज न किया जाए तो यह रोग लाइलाज हो जाता है। दर्द सहने के बाद बेहोशी की हालत में रोगी की मौत हो जाती है। अगर रोगी को तुरन्त डॉक्टर के पास नहीं ले जा सके तो उसके घाव से निकलने वाले खून को बन्द करने का उपाय करना चाहिए नहीं तो दियासलाई की नुकीली लकड़ी में कार्बोलिक एसिड लगाकर घाव को जला देना चाहिए ताकि जहर शरीर में न फैल सके।

11.   सांप का काटना-

  • अगर सांप काट लेता है तो सुई चुभने जैसा दर्द होता है जो धीरे-धीरे बढ़ता जाता है और रोगी को नींद और बेहोशी सी छाने लगती है। उसकी सांस लेने की गति कम और नब्ज धीमी हो जाती है। उसके शरीर के अन्दर चलने और बोलने की ताकत नहीं रह जाती। रोगी का शरीर अकड़ने और कांपने लगता है। उसके मुंह से झाग से निकलते हैं। अगर सांप ज्यादा जहरीला हो तो रोगी के मुंह, नाक और गुदा से खून भी आ सकता है। पर रोगी की मौत तभी होती है जब सांप जहरीला हो।
  • अगर लगे कि सांप ने काट लिया तो जिस जगह पर उसके दांत लगे हो उस जगह और दिल के बीच की शिराओं पर 2-3 जगह कसकर कपड़ा बांध दें। इसके बाद घाव में से खून निकालें। फिर कटे हुए भाग को नीचा करकें उस पर गर्म पानी डाल दें ताकि खून बाहर निकल सके। अगर घाव छोटा हो तो चाकू की तेज नोंक से उस स्थान पर 2 लकीरें खींचकर घाव बना दें तथा उस पर पोटाशियम परमैगनैट का गाढ़ा घोल लगा दें।

12.   बिच्छू का काटना- बिच्छू के काटने पर बहुत ज्यादा दर्द होता है, जो धीरे-धीरे तेज होता जाता है। जहां पर बिच्छू ने काटा हो वहां सूजन आ जाती है। चिकित्सा के लिए उस स्थान को जोर से दबाकर डंक को बाहर निकाल दें, फिर वहां पर स्पिरिट या टिंक्चर आयोडीन लगा दें। अगर डंक बाहर न निकले तो तुरन्त ही डॉक्टर के पास जाएं।

13.   दूसरे जहरीले कीड़े- ततैया, मधुमक्खी और दूसरे जहरीले कीड़ों के काटने पर सबसे पहले काटे हुए स्थान को दबाकर कीड़े के डंक को बाहर निकाल दें। इसके बाद इस पर स्पिरिट या टिंक्चर लगा लें। अगर छिपकली या कनखजूरा काट लें तो जैसे सांप के काटने पर उपचार करते हैं वैसे ही करना चाहिए। काटे हुए स्थान की सूजन और दर्द को कम करने के लिए उस जगह पर सिंकाई करनी चाहिए। डंक निकालने के बाद रोगी को गर्म दूध या गर्म चाय पिला दें ताकि रोगी की घबराहट कम हो जाएं।

14. चोट से खून बहना- एक प्राथमिक चिकित्सा करने वाले चिकित्सक को किसी के चोट लगने, गिरने, कुचले जाने, किसी तेज धार वाले औजार से कट जाने की हालत में खास सावधानी रखनी पड़ती है। ऐसी दुर्घटनाएं जिनमें खाल कट या फट जाए या उसके नीचे के भागों में चोट पहुंचे।

मुख्य तरह के घाव इस प्रकार के होते हैं-

  • पत्थर, डण्डे, लाठी से मारने से या मांसपेशियों के कुचल जाने से।
  • बन्दूक या पिस्तौल की गोली लगने के कारण घाव होने पर।
  • चाकू, छुरी या किसी तेज धार के औजार से कट जाने से जिसमे शरीर का कोई भाग अलग तो नहीं होता पर खून बहाने वाली नलियों के फट जाने से खून बहने लगता है।
  • जानवरों के पंजों और दांतों से होने वाले घाव।

चिकित्सा-

  • अगर मामूली सी खरोंच या चोट हो तो उस जगह को साफ करके उस पर टिंचर आयोडीन लगा देनी चाहिए।
  • अगर कोशिकाओं के कट जाने से खून बह रहा हो तो खून अपने आप हवा में जम जाता है। इस प्रकार की चोट को नहीं छेड़ना चाहिए जिसमे कि खून जम गया हो।
  • चोट को खुला नहीं छोड़ना चाहिए तथा उसे कीटाणुओं से बचाना चाहिए। चोट को तुरन्त ही स्प्रिट या डेटोल के घोल से साफ रुई की मदद से साफ करना चाहिए। चोट को कभी भी गन्दे हाथों से न छुएं और न ही गन्दे कपड़े से ढकें। चोट को हमेशा कीटाणुनाशक दवा मिले हुए पानी से ही धोना चाहिए और साफ रुई और कपड़े से बांधना चाहिए।
  • चोट लगने के कारण रोगी को दिमाग में परेशानी हो सकती है इसलिए रोगी को उससे बचाने की कोशिश करनी चाहिए क्योंकि अगर रोगी को सदमा बैठ गया तो बहुत परेशानी हो सकती है।

15.   खून बहना-

         अगर खून ज्यादा बह रहा हो तो तुरन्त ही खून को बन्द करने का उपाय करना चाहिए नहीं तो बहुत ज्यादा परेशानी हो सकती है। खून बहने पर रोगी को फटाफट लिटा दें ताकि सिर में खून का बहाव सही तरह से चलता रहें। अगर दिमाग में खून सही तरह से नहीं पहुंचता तो रोगी को चक्कर आने लगते हैं, आंखों के आगे अंधेरा छाने लगता है तथा बेहोशी छाने लगती है। अगर छोटे बच्चों का खून निकल रहा हो तो उस समय बहुत ही मुश्किल हालात पैदा हो जाते हैं। वैसे तो वह बाद में शरीर के अन्दर जल्दी खून की कमी को पूरा कर लेते हैं। बड़े व्यक्ति खून को बहने को सह तो लेते हैं पर बहा हुआ खून बनानें में उन्हे बहुत परेशानी हो जाती है जिससे उनको शारीरिक नुकसान हो सकता है। खून बहने पर रोगी को लिटाकर जहां से खून बह रहा हो उस स्थान को ऊपर की तरफ उठा दें क्योंकि लटकाने से खून ज्यादा निकलता है।

16. खून बहने के प्रकार- खून की नलियां मुख्यत: 3 तरह की होती है- धमनियां, शिराएं और केशिकाएं। इसी के कारण खून बहना भी 3 ही प्रकार का होता है। धमनीय स्राव, शिरायी स्राव तथा केशिका स्राव।

  • धमनीय स्राव में धमनी के कट जाने से निकलते हुए खून का रंग चमकीला लाल होता है। यह हृदय गति के साथ ही रुक-रुककर फुहारों में बहता है। यह खून ज्यादातर हृदय की तरफ से ही आता है।
  • शिरायी स्राव में किसी नस के कट जाने पर निकला हुआ खून गहरे बैंगनी रंग का होता है और एकदम से नहीं बल्कि धीरे-धीरे से बहता है। यह रक्त ज्यादातर हृदय की उल्टी तरफ से आता है।
  • केशिका-स्राव में धमनी-स्राव की तरह ही चमकीले लाल रंग का रक्त  आता है। पर यह रक्त थोड़ा-थोड़ा सा करके निकलता है।

17.   बहता हुआ खून रोकने के उपाय- अगर खून ज्यादा बह रहा हो तो ठण्डे पानी में एक साफ कपड़ा भिगोकर चोट पर रखकर दबाएं। लेकिन पानी में कीटाणु मारने वाली दवा जरूर मिला लें।

18.   अगर नस में से खून ज्यादा तेजी से बह रहा हो तो चोट पर एक मोटे कपड़े की पट्टी रखकर बांध दें। इससे खून बहना रुक जाता है। अगर खून न रुके तो चोट के पास की नस पर दिल की उल्टी तरफ में 1 कठोर पट्टी लगाकर जोर डालना चाहिए।

19.   धमनीय-स्राव में हृदय के पास की धमनी पर इसी प्रकार दबाव डालें।

20.   इस तरह दबाव डालने से खून बहना तो रूक जाता है पर अधिक खून बह रहा हो तो हाथ पर दबाव डालकर रोकने से ज्यादा देर तक नहीं रुकता। तब धमनी या नस के दबाव बिन्दु पर एक ढीली सी पट्टी बांध दें तथा उसमें एक डण्डा या छड़ी फंसाकर पट्टी को बल देकर ऐंठ दें। इस तरह आसानी से दबाव डाला जा सकेगा। इस विधि को `टार्नीकेट´ बांधना कहते हैं। `टार्नीकेट´ बांधकर डॉक्टर को जल्दी बुलवा लेना चाहिए। अगर 20 मिनट तक डॉक्टर न आए तो `टोर्नीकेट´ खोलकर देखें अगर खून बहना न रूके तो दुबारा `टॉर्नीकेट बांध दें। पर एक बार में 20 मिनट से ज्यादा तक बांधकर रखें।

21.   टार्नीकेट कसने के साथ ही चोट पर टिंचर आयोडीन में भीगी रुई की ग़द्दी रखकर पट्टी बांध दें।

22.   गले की धमनी पर जोर डालते समय इस बात का पूरी तरह ध्यान रखना चाहिए कि सांस की नली पर जोर न पड़ें।

23.   छाती और पेट की चोट ज्यादा गम्भीर होती है। ऐसी हालत में तुरन्त डॉक्टर के पास जाना चाहिए व रोगी को तब तक चोट के दोनों किनारे मिलाकर आराम से लिटाना चाहिए। घाव को ढककर रखना चाहिए। इस हालत मे रोगी को कुछ भी नहीं पिलाना चाहिए।

24.   अन्दर से खून बहना- कई बार चोट लग जाने पर ऊपर से तो चोट दिखाई नहीं देती पर शरीर के अन्दर के भागों में चोट लगने के कारण अदंर ही अन्दर खून बहने लगता है- जिसके लक्षण निम्नलिखित है-

  • सांस लेते समय परेशानी होना
  • चलते समय या बैठे-बैठे चक्कर आना या थकावट सी लगना
  • होठों और मुंह का पीला पड़ जाना।
  • अचानक बेचैनी और घबराहट होना।
  • नब्ज के चलने की गति कम हो जाना।
  • फेफड़ों से खून बहने पर खांसी के साथ लाल और झागवाला खून निकलना।
  • जिगर, तिल्ली या छोटी आन्त से खून बहने पर चोट वाली जगह पर दर्द और सूजन आना।
  • आमाशय से खून बहने पर उल्टी के साथ खून आना।
  • कभी-कभी त्वचा के अन्दर के भाग पर कॉफी के रंग का खून का जमा हो जाना।

सावधानी-

          शरीर के अन्दर के किसी भी भाग पर चोट लग जाने पर अन्दर ही अन्दर खून बहने पर रोगी को तुरन्त डॉक्टर के पास ले जाएं। पर ध्यान रहे, रोगी को खाने के लिए कुछ नहीं देना चाहिए तथा डॉक्टर के पास ले जाते समय उसे किसी भी प्रकार का झटका नहीं लगना चाहिए।

26.   कुचलने के कारण चोट और केशिकाओं के कटने की वजह से थोड़ा बहुत खून बहना-

          शरीर के अंग के किसी चीज के नीचे आने की वजह से कुचल जाने के कारण खून अन्दर ही अन्दर जमकर काला हो जाता है और सूजन आ जाती है। किसी केशिकाओं के कटने के कारण थोड़ा बहुत खून भी बह सकता है पर खून उसी जगह पर हवा के कारण जम जाता है। ऐसी चोट लगने पर स्प्रिरिट को ठण्डे पानी में मिलाकर चोट लगी हुई जगह पर पट्टी रखें और साफ करके टिंचर आयोडीन लगा दें।

27. नकसीर आना-

  • गर्मी के मौसम के कई बार नाक के या दिमाग के अन्दर की कोई नली फट जाने के कारण नाक से खून बहने लगता है। इसे नकसीर फूटना कहते हैं। नकसीर आने की स्थिति में निम्नलिखित उपचार करना चाहिए-
  • सबसे पहले रोगी को सीधा बिठाकर उसके सिर को गर्दन के पीछे की ओर झुका दें या उसे लिटाकर उसकी गर्दन के नीचे तकिया रखकर सिर को झुका दें। इस तरह करने से खून का बहना कम हो जाता है।
  • रोगी के कपड़ों को ढीला कर दें।
  • रोगी से कहें कि मुंह से सांस लें।
  •  रोगी को कहें कि वह अपना सिर नीचे न करें और न ही नाक छिनके। उसकी नाक को उंगली से दबाकर उसका मुंह खुला रखें।
  • रोगी की नाक पर ठण्डा पानी डालें और उसके सिर भी ठण्डे पानी की पट्टी रखें।
  • अगर `हाइड्रोजन´ पैराक्साइड´ मिल सके तो वो रोगी को सुंघा दें।

28. हडि्डयों में चोट- हडि्डयों में लगने वाली चोट 3 तरह की होती है- मोच आना, हड्डी सरकना, हड्डी टूटना।

  • मोच आना- मोच ज्यादातर टखने या कलाई मे आती है। इसमे किसी भी तरह का दबाव पड़ने या झटका लगने से जोड़-पेशियों के तन्तु कट जाते हैं जिससे मोच वाली जगह पर दर्द और सूजन होने लगती है और जोड़ फेल हो जाता है। इस प्रकार की चोट या मोच आने पर पहले पीड़ित के जूतों को उतार दें और उस स्थान पर गर्म पानी से सिकाई करें। उसके बाद उस स्थान को पोंछकर टिंक्चर आयोडीन लगा दें। मोच आने पर ज्यादा देर तक मालिश नहीं करनी चाहिए। शरीर में जिस अंग में मोच आई हो उसको पूरी तरह आराम देना चाहिए।
  • हड्डी का अपने स्थान से हट जाना- जब हड्डी के सिरे जोड़ पर से अपने स्थान से हट जाते हैं तो ऐसे समय मे जोड़ फेल हो जाते हैं और उस स्थान पर सूजन आ जाती है। वहां का आकार खराब हो जाता है और उस अंग के हिलने पर ही बहुत तेज दर्द होता है। जोड़ों की जगह का आकार बिगड़ने और तेज दर्द होने के कारण हड्डी टूटने या सरकने की पहचान मुश्किल हो जाती है इसलिए हड्डी को हिलाने की कोशिश करके देखें अगर हड्डी अपनी जगह पर न आए तो रोगी को तुरन्त डॉक्टर के पास पहुंचाए।
  • हड्डी टूटना- हडि्डयों की टूट-फूट अनेक प्रकार की होती है-
  • साधारण फ्रैक्चर- हड्डी टूटने के बाद अगर शरीर में कोई जख्म न हो तो उसे साधारण फ्रैक्चर कहते हैं।
  • मिश्रित फ्रैक्चर- अगर टूटी हुई हड्डी खून की नलियों और पेशियों को फाड़कर जख्म बना देती है तो उसे मिश्रित फ्रैक्चर कहते हैं।
  • फ्रैक्चर के लक्षण है- दर्द, सूजन, अंग का बिल्कुल ऐसे हो जाना जैसे कि उसमे कोई जान न हो, आकार खराब हो जाना, टूटी हडि्डयों के सिरों का बाहर निकल जाना या हिलने के कारण आवाज करना। फ्रैक्चर होने के एक दिन बाद पीड़ित व्यक्ति को बुखार भी हो सकता है।

चिकित्सा- हड्डी उखड़ने या टूटने के बाद उसे सही जगह पर मिलाकर बांधने या उस पर प्लास्टर चढ़ाने का काम डॉक्टर को ही करना चाहिए। प्राथमिक चिकित्सक को ये काम नहीं करना चाहिए। पर जब तक डॉक्टर के पास रोगी को न ले जाया जाए तब तक रोगी की मदद की जा सकती है।

35. बिना जोर लगाए बड़ी ही सावधानी से हड्डी को अपनी असली जगह पर लाएं तथा लकड़ियां बांधकर उस हड्डी को न हिलने वाली बनाएं। ऐसे ही लकड़ी और पटि्टयों से हड्डी टूटे हुए स्थान को बांधकर ही रोगी को डॉक्टर के पास ले जाना चाहिए नहीं तो रास्ते में लगने वाले झटकों से फ्रैक्चर बिगड़ भी सकता है।

36. रोगी को पूरा आराम करने देना चाहिए। अगर उसकी टूटी हुई हड्डी को आराम न मिल पा रहा हो तो पट्टी को खोलकर दोबारा बांध दें।

37. अगर टांग की हड्डी टूट जाए तो उसको धीरे से खींचकर सीधा कर लें और वैसे ही उस पर खपच्चियां बांध दें।

38. टूटी हुई टांग को दूसरी सही टांग से या टूटी हुई बांह को दूसरी बांह से स्लिग में डालकर सहारा देना चाहिए।

39. अगर हड्डी टूटने के साथ जख्म भी हो तो पहले खून बहना रोके, जख्म की चिकित्सा करवाएं और फिर टूटी हुई हड्डी पर खपच्चियां बांध दें।

40. खपच्चियां बनाने का तरीका- सबसे पहले बिल्कुल सीधी लकड़ियां, बल्लियां, फट्टे जो भी लकड़ी मिले ले लें और वहीं इस्तेमाल में लाएं। पर खपच्चियां इतनी लंबी ओर मजबूत होनी चाहिए कि टूटी हडि्डयों वाले अंग को मजबूती से पकड़कर एक जगह रोक सकें।

41. खपच्चियों पर पट्टी इतनी कसकर बांधनी चाहिए कि वे अपनी जगह से हिले भी नहीं ओर खून के बहने की गति भी ठीक से चलती रहें।

42. चाहे हड्डी टूटी हो, मोच, घाव या कुछ भी हो हर जगह पट्टी ही इस्तेमाल में लाई जाती है। जख्म पर पट्टी बांधने से वे ढके रहते हैं जिससे उनमे कीटाणु नहीं घुस पाते, जख्म पर लगाई हुई रुई और दवाई भी अपनी जगह पर टिकी रहती है और इसे बांधने से जख्म में आराम भी मिलता है। पटि्टयां एक तो पैर के लिए लगभग 6 सेंटीमीटर चौड़ी तथा उंगली के लिए 3 सेंटीमीटर चौड़ी सही होती है।

43. पटि्टयों के प्रकार- पटि्टयां मुख्यत: 2 तरह की होती है- लंबी ओर तिकोनी पट्टी। प्राथमिक चिकित्सा करते समय ज्यादातर तिकोनी पट्टी ही इस्तेमाल में लाई जाती है।

44. लंबी पट्टी- लंबी पट्टी को जख्म के अनुसार रोगी की जख्म वाली जगह पर बांधना चाहिए। पट्टी इस तरह बांधनी चाहिए कि दूसरी बार में लपेटी हुई पट्टी, पहली बार की लपेटी हुई पट्टी को लगभग 2 तिहाई ढकती जाए। पट्टी न तो बहुत ज्यादा टाईट ओर न ही बहुत ज्यादा ढीली बांधनी चाहिए। जख्म पट्टी से पूरी तरह ढक जाना चाहिए ओर पट्टी उस पर चिपकी रहनी चाहिए। आखिरी सिरे पर पट्टी को बीच में से चीरकर 2 हिस्सों में करके गांठ बांध दी जाती है। गांठ को घाव पर से थोड़ा सा साइड में बांधना ठीक होता है क्योंकि ऐसे बांधने से रोगी को दर्द भी नहीं होगा और जख्म को भी नुकसान नहीं होगा।

45.   तिकोनी पट्टी- प्राथमिक चिकित्सा में सबसे ज्यादा तिकोनी पट्टी ही इस्तेमाल में लाई जाती है क्योंकि तिकोनी पट्टी से कई तरह के काम लिए जा सकते हैं। 1 मीटर चौकोर मारकीन के टुकड़े को आधे में तिरछा काटकर उससे 2 तिकोनी पटि्टयां बना सकते हैं। जरूरत पड़ने पर इसे चार परत या 8 परत में करके लंबी पट्टी के रूप में भी काम में लिया जा सकता है।

46. पट्टी की गांठ- पट्टी बांधते समय गांठ 2 तरह से लगाई जाती है। पहली गांठ बांधने को `रीफ´ कहते है ओर दूसरी को `ग्रेनी´। प्राथमिक चिकित्सा करने मे हमेशा `रीफ गांठ´ ही लगाई जाती है क्योंकि यह चुभती नहीं है। गांठ को बांधने के बाद पट्टी के सिरों को पट्टी की परत से दबा देना चाहिए ताकि वे लटकते न रहें।

47. स्लिग या झोल- हाथ की हड्डी के टूटने पर उसे बांह का सहारा देने के लिए तिकोनी पट्टी को बांधकर गले में लटका दी जाती है। यह झोल पूरी चौड़ाई में हाथ से कोहनी तक के भाग को आधी चौड़ाई में केवल कलाई को सहारा देने के लिए बांधा जाता है। इसमें पट्टी का एक कोना गर्दन के पीछे से लाकर तथा दूसरा सामने से लाकर कंधे पर सामने की ओर बांध देना चाहिए। इसके बाद हाथ को पट्टी के अन्दर डाल दें तथा पट्टी के तीसरे सिरे के कोने को किसी पिन की मदद से पट्टी के साथ टांग दें। इससे रोगी को आराम मिलता है।

48. खपच्चियां या स्प्लिट्स बांधना- टूटी हुई हड्डी को एक ही जगह टिकाने के लिए खपच्चियों का सहारा लिया जाता है। खपच्चियां चोट वाली जगह के बराबर तथा मजबूत ओर चिकनी होनी चाहिए। इनको बांधते समय अन्दर की ओर रुई की मोटी सी परत बनाकर रखकर उसके बाद पट्टी बांधनी चाहिए ताकि वह शरीर में चुभे नहीं।

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