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प्राणायाम की क्रिया

Pranayam men saans gahari v lambi li jati hai, jisase aage kiye jane wale pranayam ke abhyas men lambhi swas prawas kriya men sahayata milati hai.


प्राणायाम की क्रिया


अग्निप्रदीप्त प्राणायाम    |    अग्निसार प्राणायाम    |    अनुलोम-विलोम प्राणायाम    |    अपानायम    |    अतिरिक्त प्राणायाम    |    भस्त्रिका प्राणायाम    |    भ्रमरी प्राणायाम    |    वक्षस्थल रेचक    |    मध्य रेचक    |    कपालभाति    |    कुम्भक    |    मूर्च्छा प्राणायाम    |    दीर्घ श्वास-प्रश्वास    |    नाड़ीशोधन प्राणायाम    |    प्लाविनी और केवली प्राणायाम    |    सहित कुम्भक प्राणायाम    |    उज्जायी प्राणायाम    |    त्रिबन्ध रेचन प्राणायाम    |    सूर्य भेदन प्राणायम    |    शीतकारी प्राणायाम    |    प्राणायाम से पहले की सांस क्रिया     |    सर्वद्वार बद्ध प्राणायाम     |    समवेत प्राणायाम    |    सरल प्राणायाम    |     शीतली प्राणायाम

प्राणायाम से पहले की सांस क्रिया


प्राणायाम के अभ्यास से पहले कुछ देर तक सांस क्रिया का अभ्यास करना आवश्यक है। इससे प्राणायाम के अभ्यास में मदद मिलती है। यह श्वास क्रिया मुख्य रूप से सरल व्यायाम है, फिर भी सांस क्रिया को लयबद्ध बनाने के लिए इस व्यायाम को करना अधिक लाभकारी है। इससे सभी अंग-प्रत्यंग स्वस्थ होते हैं और खून का संचार सही रूप से चलता है। इस क्रिया से शुद्ध वायु खून में मिलकर खून को साफ करती है और दूषित वायु को सांस के द्वारा बाहर निकालती है, जिससे शरीर स्वस्थ रहता है।

          इस व्यायाम में सांस गहरी व लम्बी ली जाती है, जिससे आगे किये जाने वाले प्राणायाम के अभ्यास में लम्बी श्वास-प्रश्वास (सांस लेने व छोड़ने की क्रिया) क्रिया में सहायता मिलती है। अधूरी सांस क्रिया करने से फेफड़ों में पर्याप्त मात्रा में वायु नहीं पहुंच पाती जिससे फेफड़ों में बनी वायु की अनेक कोठरियां (कोष) बन्द होने लगती हैं। फेफड़ों में बनी सभी कोठरियों में वायु न पहुंच पाने के कारण उनकी कार्यक्षमता नष्ट हो जाती है।

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