पीलिया (कामला)


पीलिया (कामला)


परिचय-

        इस रोग में रोगी की त्वचा और आंखों की श्लैष्मिक झिल्ली पीले रंग की होने लगती है। इस रोग के होने के कारण पित्त-नलियों में साधारण सी रुकावट की स्थिति गतिशील रहती है, जिसके कारण जिगर तथा पित्ताशय से निकलने वाला पित्त आंतों के अन्दर अच्छी तरह नहीं जा पाता। इस रोग में रोगी के नाखून की जड़, चेहरे, गर्दन, आंखें की श्लैष्मिक झिल्ली तथा होंठ पर पीलापन होने लगता है। रोगी का पेशाब गाढ़ा पीला हो जाता है तथा यह पेशाब अगर कपड़े पर पड़ जाये तो यह कपड़े पर दाग छोड़ देता है। इस रोग में रोगी का मल भी पीला होने लगता है तथा शरीर में चर्बी अम्लों की अधिकता के कारण मल में बहुत बदबू रहती है। इस रोग में रोगी को हल्का सा बुखार तथा कब्ज या दस्त की शिकायत रह सकती है।

कारण-

1. रोधज पीलिया- इस प्रकार का पीलिया पित्त-नलियों की रुकावट, पित्त-नलियों की जलन, ग्रहणी के अन्दर कीड़े चले जाने या किसी तरह की रसौली आदि के कारण होता है।

2. संक्रामक रक्त- संलयी पीलिया- इस प्रकार का पीलिया लाल रक्त कोशिकाओं के भारी विघटन के कारण होता है।

3. शिशु पीलिया- इस प्रकार का पीलिया छोटे बच्चों में लाल रक्त कोशिकाओं के भारी विघटन के कारण होता है। इसे शिशु पीलिया के नाम से जाना जाता  है।

4. विषाक्त पीलिया- किसी व्यक्ति को किसी जीवाणु तथा रासायनिक पदार्थों के फलस्वरूप जो पीलिया होता है उसे विषाक्त पीलिया कहते हैं।

उपचार-

          पीलिया की अवस्था में रोगी के पैरों के तलुवों पर शक्तिशाली चुम्बक को लगाना चाहिए और चुम्बकित जल को दवाई की मात्रा के बराबर दिन में 3 बार पिलाना चाहिए। इस रोग से पीड़ित रोगी को शराब का सेवन बिल्कुल भी नहीं करना चाहिए तथा चीनी और श्वेतसारिक पदार्थों का अधिक मात्रा में सेवन करना चाहिए।

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