पान


पान

(BETEL LEAF, PIPER BETLE, PIPERACEAE)


A  B  C  D  E  F  G  H  I J  K  L  M  N  P  R  S T  U  V  Y
[ P ] से संबंधित आयुर्वेदिक औषधियां

पाखुर

पद्माख

पहाड़ी गंदाना

पैंशन फ्रूट

पाकर पीपल

पालक

पालक जंगली

पनड़ी

पंचकोल

पोदीना

पोई

प्रेमपुष्पी

पुनर्नवा

पुनर्नवा (लाल)

पाढल

पानी

पापड़

पापरी नं0 1

पापरी नं0 2

पपीता

पारा और रस कपूर

पारस पीपल

पर्णबीज

पर्पटी

पित्त पापड़ा-1

पित्त पापड़ा नं-2

पित्त पापड़ा नं-3

पियारांगा (ममीरी)

सफेद पेठा

परवल

पाषाण भेद

पाषाणभेद नं. 1

पाषाणभेद नं0 2

पत्ते

पत्तागोभी

पाताल गरुणी

पतंग

पतिजिया

पाठा

पाटला

पंवाड़ (चक्रमर्द)

पीलू छोटा 

पीपल

प्याज

पीपल-पाकर

पित्तपापड़ा

पिपरमिंट

फ्लोरिन

फालसे

फूलगोभी

पिण्डीतक

पिप्पली

पीपरा मूल

प्रियंगु

पिस्ता

पिठवन (पृष्ठपर्णी)

पुनर्नवा (श्वेत)

पुष्कर मूल

भारत में पान केवल खाने के लिए ही नहीं बल्कि पूजा, यज्ञ, हवन, सांस्कृतिक कार्यों, मेहमानों का स्वागत आदि कार्यो में इसका इस्तेमाल किया जाता है।परिचय :

        भारत में पान केवल खाने के लिए ही नहीं बल्कि पूजा, यज्ञ, हवन, सांस्कृतिक कार्यों, मेहमानों का स्वागत आदि कार्यो में इस्तेमाल किया जाता है। पान बिहार, पश्चिम बंगाल, बनारस, सांची आदि जगहों में पैदा की जाती है। विभिन्न स्थानों में पैदा होने के कारण पान मद्रासी, बंगला, कपूरी, महोबा, बनारसी, मालवी, विओला, महाराजपुर, देशी आदि नामों से जाने जाते हैं। इन सभी में बनारस का पान सबसे अधिक अच्छा होता है।

विभिन्न प्रकार के पान :

श्री वाटी पान : यह वात, पित और कफ तीनों दोषों का नाश करता है, भोजन में रुचि को पैदा करता है और पचने के समय शीतल होता है।

अम्ल वाटी पान : यह पान चरपरा, खट्टा, तीक्ष्ण, नर्म, मुंह को पकाने वाला जलन को पैदा करने वाला और वायु के दोषों को समाप्त करने वाला है।

सीतसी पान : यह पान मधुर, तीक्ष्ण, कटु (कड़वा), गर्म, पाचक पेट में गैस का गोला और पेट के अनेकों रोगों को दूर करने वाला है, भोजन में रुचि को पैदा करता है और भूख को बढ़ाता है।

पुराना पान : यह पान भोजन में रुचि को पैदा करने वाला, सुगंधित, तीक्ष्ण, मीठा, हृदय का हित करने वाला, जठराग्नि (भूख का लगना) को बढ़ाने वाला तथा पौरुष शक्ति को बढ़ाने वाला, बलकारक, दस्तावर (पेट को साफ करने वाला) और मुंह को शुद्ध करने वाला है।

मालवा का अंगार पान : यह पान अम्ल, सारक (दस्तावर), तीक्ष्ण, मीठा, रुचिकारक, ठंडा, जलननाशक और गर्मी को शांत करके भूख को बढ़ाता है। इसके अतिरिक्त यह बलवर्द्धक है, मुंह में सुगंध पैदा करता है और कब्ज को दूर करता है।

पोट कुली पान : आंध्र प्रदेश का पोट कुली पान कषैला, गर्म, तीखा, बलगम को दूर करने वाला तथा पित्तकारक और वात विनाशक है।

ताजा तोड़ा हुआ पान : इसे खाने से मुंह के रोग और जड़ता का नाश होता है और वात, पित, और जलन उत्पन्न होता है, अरुचि को बढ़ाता है तथा खून के रोगों को पैदा करता है और उल्टी लाता है।

पकाया पान : यह पान खाने में रुचि को पैदा करता है, शरीर के रंग को अच्छा करता है तथा वात, पित और कफ को दूर करता है।

काला पान : यह पान कडुवा, गर्म, कषैला, जलन, मुख की जड़ता और मल को दूर करने वाला है।

सफेद पान : कफ और वात रोगों को नाश करता है, खाने योग्य है, भोजन में रुचि को बढ़ाता है, भूख को बढ़ाने वाला है और भोजन को पचाने वाला है।

पान नसें : यह पान शिथिलता करता है, खून को सुखाता है, यहां तक कि 5 कालीमिर्च के साथ बनाया हुआ पान की नसों का चूर्ण बवासीर के खून को तुरंत ही बंद कर देता है।

सूखे और गले पान : यह पान चर्म रोग, दांतों के रोग और मुंह के रोगों को उत्पन्न करते हैं। पान की जड़ खाने से व्याधियां (बीमारियां) उत्पन्न होती हैं, पान के चूर्ण को खाने से उम्र कम होती है। पान की नसें बुद्धि को भ्रष्ट करती हैं, पान में अधिक सुपारी मन की प्रसन्नता को पैदा करती है और अधिक पान सुगंध पैदा करने वाला है | चोंच टूटा हुआ पान रात में और अधिक टूटा हुआ पान दिन में खाना चाहिए।

पान का फल : यह दिल के लिए लाभकारी, सुगंधयुक्त, कफ और वायु का नाश करने वाला है।

कत्था : कत्था कफ और पित्त का बहुत बड़ा दुश्मन है। चूना वात और कफ का नाशक है, सुपारी भी कफ और पित को नाश करने वाली है और पान में कत्था, चूना और सुपारी मिलाकर खाने से वात, पित और कफ का नाश होता है, चित प्रसन्न होता है, इससे शरीर हल्का और मुंह सुगंघ से भरा होता है, सुबह को पान खाएं तो उसमें सुपारी थोड़ी अधिक रखकर दोपहर में कत्था और रात में चूना थोड़ा अधिक रखकर पान खाना चाहिए। पान की जड़ यानी नाल खाने से विभिन्न रोग उत्पन्न होते हैं, मध्य भाग खाने से आयु का नाश होता है और आगे का भाग खाने से बुद्धि भ्रष्ट होती है। पान की पहली पीक जहर के समान है, दूसरी पीक भारी और दस्तावर है। अत: पान खाकर पहली और दूसरी पीक को जरूर थूकना चाहिए इसके बाद की सभी पीको को निगलना गुणकारी हैं। जिसने जुलाब लिया हो और जो भूखा हो उसको अधिक पान नहीं खाना चाहिए। यदि कोई इसे खाता है तो उसकी आंखों की रोशनी, बाल, दांत, कान, रंग, बल और भूख का नाश होता है और अधिक खाने से सूखा, खुश्की रोग होता है। इससे पित्त, वात और रुधिर (खून) की वृद्धि होती है।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

हिंदी            पान, ताम्बूल
संस्कृत       नागवल्लरी, नागिनी, नागविल्लका, वर्णलता, ताम्बूल, सप्तिशरा, मुखभूषण
गुजराती      नागरबेल
मराठी             नागबेल
बंगाली                पान
तेलगू         नागबल्ली, तामालपाकू
अरबी         तम्बोल, तम्बूल
फारसी                वर्गे तम्बोल, तंबूल
वैज्ञानिक नाम पाईपर बैटल
कुलनाम     पाईपर केस
अंग्रेजी        बीटल

रंग : पान का रंग हरा, सफेद और पीला होता है।

स्वाद : इसका स्वाद चरपरा, कषैला और तेज होता हैं।

स्वरूप : पान एक लता जाति की वनौषधि है। पान की लता बहुत सुंदर होती है। पान के पत्तों की आकृति पीपल के पत्तों के जैसी होती है। पान की बेल 4.5 मीटर से 6 मीटर तक लंबी होती है। इसका तना मजबूत, कड़ा व गांठयुक्त होता है। पान के पत्ते पीपल के पत्ते के समान दिल के आकार के 4 से 8 इंच लंबे और 2 से 4 इंच चौड़े 5 से 7 शिराओं से युक्त, चिकने, मोटे होते हैं। पान के फूल गुच्छों में लगते हैं। पान के फल मंजरी पर एक चौथाई इंच व्यास के व मांसल अनेक संख्या में लगते हैं। इसे पान पिप्पली के नाम से भी जाना जाता हैं। पुष्प की बहार फरवरी-मार्च के मौसम में और फल की बहार गर्मी के मौसम में होती हैं। पान में मनोहर गंध रहती हैं।

स्वभाव : इसकी तासीर गर्म और खुश्क होती है।

हानिकारक : गर्म स्वभाव वालों व्यक्तियों को सुबह खाली पेट बंगला पान नहीं खाना चाहिए। पान का अधिक सेवन करने से आंखों, दांतों के रोग, पुरुषार्थ शक्ति की कमी और भूख न लगना जैसे रोग पैदा होते हैं। फेफड़ों में शुष्कता (सूखापन) और आंतों में विषोत्पति पान में कत्थे की अधिकता के कारण होती है। पान में चूने की अधिकता से दांतों को हानि होती है तथा पान में सुपारी की अधिकता से अरिकेन विष उत्पन्न होता है। तम्बाकू मिलाकर सेवन किया गया पान कैंसर जैसे रोगों को पैदा करता है। इसके सेवन से स्त्रियों की प्रजनन-शक्ति कमजोर होकर उनका गर्भपात भी हो सकता है। पान भूखे पेट सेवन करना हानिकारक होता है। कमजोर, जहर खाये व्यक्ति या जिसको बेहोशी हो और वह रोगी जिसके मुंह, नाक, कान या कहीं से भी खून बहता हो उसे पान खाना छोड़ देना चाहिए।

दोषों को दूर करने वाला : पान में इलायची सफेद, कत्था और सुपारी डालने से पान के दोष दूर हो जाते हैं।

तुलना : इसकी तुलना लौंग के साथ कर सकते हैं।

मात्रा : 1 से 2 चम्मच पान का रस और 1 से 2 ग्राम फलों के चूर्ण को एक साथ मिलाकर दिन में 2 बार ले सकते हैं।

गुण : पान मन को खुश करता है, दिल, जिगर, मेदा (आमाशय) और दिमाग को बलवान करता है, आनंद और प्रसन्नता को पैदा करता है, पेशाब खुलकर लाता है और दोषों को नष्ट करता है, गले की आवाज को साफ करता है, दांत और मुंह के दोषों को समाप्त करता है, धातु को बलवान बनाता है और भूख को बढ़ाता है।

पान में पाये जाने वाले विभिन्न तत्व : पान के पत्तों में प्रोटीन, कार्बोहाइड्रेट, खनिज द्रव्य तथा टैनिन होते हैं। पान में कैल्शियम, फास्फोरस, लौह, आयोडीन तथा पोटैशियम पाये जाते हैं। विटामिन `ए´ `बी´ `सी´ तथा पत्तियों में एक उड़नशील तेल पाया जाता है। पान के तेल में फिनोल और टार्पिन नामक तत्व होते हैं। फिनोल के कारण पत्तियों में विशिष्ट गंध होती है और इसी तत्व के कारण पान की गुणवत्ता निर्भर करती है। राष्ट्रीय पोषक संस्थान के अंतर्गत हुए अनुसंधान के अनुसार 100 ग्राम पान की (खाई जाने वाली) पत्ती में निम्न तत्व होते हैं।

प्रोटीन                  मात्रा
प्रोटीन                  3.1 ग्राम
चर्बी              0.8 ग्राम
लोहा            7.0 ग्राम
कार्बोहाड्रेट        6.1 ग्राम
नियासिन         0.5 ग्राम
कैलोरी          44
चूना             लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग
विटामिन `सी´      लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग
साइबोफ्लेविन      लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग
केरोटीन           लगभग 6 ग्राम
थायोमिन         लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग

विभिन्न रोगों में सहायक : 

1. स्तनों के रोग: स्त्रियों के स्तनों पर पान के रस से मालिश करके सिंकाई करने से स्तनों की सूजन दूर होकर स्तनों का दूध साफ होता है।

2. स्तनों की सूजन: जिन औरतों का बच्चा मर गया हो और उनके स्तनों में दूध जमा होने की वजह से सूजन आ गई हो तो उन औरतों के स्तनों पर पान को गर्म करके बांधने से उनके स्तनों की सूजन कम हो जाती है और स्तनों में जमा हुआ दूध निकल जाता है।

3. गर्भ निरोध हेतु: पान का रस और शहद बराबर की मात्रा में मिलाकर संभोग करने से पहले योनि को धोने से और पान की जड़ को कालीमिर्च के साथ बराबर मात्रा में पीसकर 1 चम्मच की मात्रा में रोजाना सुबह-शाम सेवन करने से गर्भधारण नहीं होता है।

4. मुंह के छाले:

  • पान के पतों का रस शहद में मिलाकर छालों पर रोजाना 2-3 बार लगाने से लाभ होता है।
  • मुंह में छाले हो जाने पर पान की पत्ती को सुखाकर चबाएं।

5. बिच्छू के काटने पर: पान के रस में सोंठ को घिसकर बिच्छू के काटे हुए स्थान पर लगाने से राहत मिलती है।

6. प्यास:

  • पान के रस में थोड़ी-सी पिपरमिंट को मिलाकर सेवन करने से प्यास मिटती है।
  • पान खाने से प्यास कम लगती है।

7. खांसी:

  • सूखी खांसी में पान के सादे पत्ते में 1-2 ग्राम अजवायन रखकर उसे खाकर उसके ऊपर से गर्म पानी पीकर सो जाने से सूखी खांसी, दमा और सांस का रोग ठीक हो जाता है।
  • पान के फलों को शहद के साथ मिलाकर रोजाना 2-3 बार चाटने से खांसी में लाभ मिलता है।
  • पान के साथ 240 मिलीग्राम जायफल को घिसकर सेवन करने से खांसी के रोग में आराम आता है।
  • 3 मिलीलीटर पान के रस को शहद के साथ चटाने से बच्चों की खांसी में बहुत लाभ होता है।
  • पान के रस में शहद मिलाकर दिन में 1-2 बार सेवन करने से खांसी का अंत होता है।
  • सूखी खांसी को दूर करने के लिए हरे पान के पत्ते पर दो चुटकी अजवायन रखकर पान को चबाएं तथा रस को धीरे-धीरे गले के नीचे उतारते जाएं।
  • खांसी बार-बार चलती हो तो सेंकी हुई हल्दी का टुकड़ा पान में डालकर खाना चाहिए। यदि खांसी रात को ज्यादा देर तक चलती हो तो पान में अजवाइन डालकर खाएं तथा पान का पीक निगलते जाएं।
  • पान के फल को पीसकर बनाये गये चूर्ण को शहद के साथ रोगी को खिलाने से बलगम बाहर निकलकर खांसी में आराम मिलता है।
  • पान के पत्ते में 1 लौंग, सिंकी हुई हल्दी का टुकड़ा व थोड़ी-सी अजवायन डालकर 2 से 3 बार खाने से खांसी में आराम मिलता है।

8. नपुंसकता (नामर्दी): पुरुष के लिंग (शिश्न) पर पान के पत्ते बांधने से और पान के पत्ते पर मालकांगनी का तेल 10 बूंद लगाकर दिन में 2 से 3 बार कुछ दिन खाने से नपुंसकता दूर होती है। इस प्रयोग के दौरान दूध और घी का अधिक मात्रा में सेवन कर सकते हैं।

9. चोट:

  • पान के पत्ते पर चूना और कत्था लगाकर उसमें थोड़ा-सा तम्बाकू डालकर पीस लें फिर गुनगुना करके चोट पर बांधे। इससे दर्द दूर होता है और जख्म जल्दी भर जाता है।
  • पान के रस में थोड़े से चूने को मिलाकर सूजन पर पट्टी बांधने से दर्द और सूजन कम होता है।
  • पान के पत्ते को चोट लगी हुई जगह पर लगाने से लाभ होता है।

10. बच्चों के पेट में कब्ज का होना: पान के डंठल में थोड़ा सा घी और नमक लगाकर गुदा में लगाने से दस्त चालू हो जाएंगे और कब्ज का रोग दूर हो जायेगा।

11. श्वास या दमा:

  • लगभग 5 से 10 मिलीलीटर पान के रस को शहद के साथ या अदरक के रस के साथ प्रतिदिन 3-4 बार रोगी को देने से दमा या श्वास का रोग ठीक हो जाता है।
  • गजपीपली का चूर्ण पान में रखकर सेवन करने से श्वास रोग मिट जाता है।
  • बंगाली पान को कूट-पीसकर कपड़े में निचोड़कर 500 मिलीलीटर की मात्रा में रस निकाल लें। इसी तरह अदरक और अनार का रस 500-500 मिलीलीटर की मात्रा में लें। इसके साथ ही कालीमिर्च 60 ग्राम और छोटी पीपल 80 ग्राम लेकर सभी को एक साथ कूट-पीसकर 1 किलो मिश्री मिलाकर धीमी आंच पर रखकर चासनी बना लें। प्रतिदिन इस चासनी को 10-10 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से खांसी, श्वास और बुखार आदि रोग दूर हो जाते हैं तथा भूख बढ़ने लगती है।
  • जावित्री को पान में रखकर खाने से दमा के रोग में लाभ होता है।
  • पान में चूना और कत्था बराबर मात्रा में लगाकर 1 इलायची और 2 कालीमिर्च को डालकर धीरे-धीरे चबाकर चूसते रहने से दमा के रोग में आराम मिलता है।

12. गला बैठने पर: पान की जड़ के टुकड़े को मुंह में रखकर 3-4 बार चूसते रहने से गले में बैठी आवाज खुल जाती है और गला साफ हो जाएगा।

13. ज्वर (बुखार):

  • पान के रस को गर्म करके 1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार रोगी को पिलाने से बुखार में बहुत लाभ होता है।
  • लगभग 3 मिलीलीटर पान के रस को गर्म करके दिन में 2-3 बार रोगी को पिलाने से बुखार आना बंद हो जाता है।
  • 6 मिलीलीटर पान का रस, 6 मिलीलीटर अदरक का रस और 6 ग्राम शहद को मिलाकर सुबह-शाम सेवन करने से बुखार दूर हो जाता है।

14. हृदय रोग:

  • हृदय की अनियमित गति, उच्च रक्तचाप (हाई ब्लड प्रेशर) के रोग में 1 चम्मच पान का रस तथा इतनी ही मात्रा में मिश्री मिलाकर सेवन करने से हृदय की गति नियंत्रित होकर, रक्तचाप कम हो जाता है।
  • दिल की कमजोरी में पान का प्रयोग लाभदायक है। डिजिटैलिस के स्थान पर इसका प्रयोग कर सकते हैं।
  • पान का शर्बत पीने से हृदय का बल बढ़ता है, कफ और मंदाग्नि (भूख कम लगने का रोग) मिटती है।

15. पित्ती: पान खाने वाले 3 पान (नागरबेल) और 1 चम्मच फिटकरी को पानी में डालकर, पीसकर, पित्ती (गर्मी के कारण शरीर में निकलने वाले चकत्ते) निकलती हुई जगह मालिश करने से पित्ती रोग ठीक हो जाता है।

16. गुर्दा के रोग: पान का सेवन वृक्क (गुर्दे) के रोगों में लाभदायक है।

17. यकृत (जिगर) के दर्द: छाती (सीने) पर पान का तेल लगाकर गर्म करके बांधने से यकृत (जिगर) के दर्द और सांस की नली की सूजन में लाभ होता है।

18. खांसी-जुकाम: पान में लौंग डालकर खायें। अगर खांसी बार-बार चलती हो तो सेंकी हुई हल्दी का टुकड़ा पान में डालकर पान खायें। खांसी रात को अधिक चलती हो तो पान में अजवायन डालकर खायें। बच्चों को सर्दी लगने पर पान के पत्ते पर तेल लगाकर गर्म करके सीने पर बांधने से लाभ होता है।

19. फोड़ा: फोड़ों पर पान के पत्तों को गर्म करके बांधने से सूजन व दर्द कम होकर जल्दी ही ठीक हो जाता है।

20. मीठी आवाज:

  • पान की जड़ चूसने से आवाज मीठी होती है। गले में जमा हुआ कफ निकालने व स्वर भंग में आवाज की खराबी ठीक करने के लिए कुलंजन (पान की जड़) अत्यंत लाभकारी है।
  • पान खाने से गले की आवाज मीठी हो जाती है।

21. बदबू को नष्ट करने के लिए: घी और तेल में पान के पत्ते डालकर गर्म करने से उनमें मौजूद बदबू दूर हो जाती है।

22. उत्तेजक: पान खाने से स्नायु (नसों) में उत्तेजना आती है। यह उत्तेजना सुपारी में पाये जाने वाले `ऐरेकोलिन´ नामक पदार्थ से मिलती है। पान में लगा हुआ चूना प्रक्रिया को बढ़ाता है।

23. मुंह का फटना: पान में अधिक चूना लग जाने से मुंह फट जाता है। मुंह फटने पर देशी घी लगायें, पान में कत्था अधिक लगाकर खाना चाहिए।

24. अम्लता (एसिडिटीज): पान खाने से अम्लता (एसिडिटीज) का रोग कम होता है।

25. मुह के छाले और पायरिया: पान में चने की दाल के बराबर कपूर का टुकड़ा डालकर पान चबायें और उसकी पीक को थूकते जायें। ध्यान रहे कि पान की पीक पेट मे न जाये। ऐसा करने से जल्दी लाभ मिलेगा।

26. नाभि का पकना: कभी-कभी नाभि से खून और मवाद आने लगता है। बच्चों की नाल काटने पर नाभि पक जाती है। इस पर चिकनी सुपारी गर्म पानी में घिसकर सुबह-शाम 2 बार रोजाना लगाने से नाभि ठीक हो जाती है।

27. आंखों के रोग: पान के पत्तों के रस को शहद के साथ अंजन (आंखों में काजल की तरह) करने से आंखों के रोगों में आराम आता है।

28. सिर का दर्द: कनपटियों पर पान का पत्ता बांधने से सिर की पीड़ा मिट जाती है।

29. क्रोध: पान का रस दूध में मिलाकर पिलाने से स्त्रियों का क्रोध शांत हो जाता है।

30. रतौंधी (रात को दिखाई देना):

  • पान के पत्तों के रस में शहद मिलाकर आंखों में रोजाना 3 से 4 बार डालने से रतौंधी रोग दूर होता है।
  • पान के रस की 2-2 बूंदे आंखों में डालने से आंखों की रोशनी तेज होने के साथ रतौंधी रोग समाप्त हो जाता है।

31. बच्चों को सर्दी लगने पर: पान को गर्म करके उस पर एरंड का तेल चुपड़कर छाती पर बांधने से, बच्चों की घबराहट कम हो जाती है और सर्दी का प्रभाव मिट जाता है।

32. जुकाम:

  • पान के पत्तों में एरंड का तेल लगाकर गर्मकर छाती पर बांधने से जुकाम ठीक हो जाता है।
  • 2-3 बूंदे पान के रस की निकालकर नाक में डालने से जुकाम के रोग में खुश्की होने के कारण नाक में से खून निकलना बंद हो जाता है।
  • पान की जड़ और मुलेठी को पीसकर शहद के साथ रोगी को चटाने से जुकाम दूर हो जाता है।

33. डिप्थीरिया (गले की सूजन):

  • जब सांस में परेशानी पैदा होकर रोगी को बहुत दर्द होता है, तब पान के रस का सेवन करने से गले की सूजन कम हो जाती है और कफ टूटने लगता है। इस रोग में 2-5 पत्तों का रस थोड़े से गुनगुने पानी में मिलाकर कुल्ले करने से भी फायदा होता है।
  • 3-4 मिलीलीटर पान के रस को शहद के साथ चाटने से सूखी खांसी दूर हो जाती है।
  • पान की डंठल को घिसकर शहद मिलाकर रोगी को चटाने से बच्चों की सर्दी और कफ में आराम मिलता है।

34. पाचन क्रिया:

  • पान के चूसने पर लार की मात्रा अधिक निकलती है, जिससे पाचन क्रिया में मदद मिलती है। यह पेट की वादी को मिटाने वाला उत्तेजक और ग्राही (पाचनशक्तिवर्धक) है। इससे श्वास में मिठास हो जाता है। बोली साफ हो जाती है और मुंह की दुर्गंघ दूर हो जाती है।
  • पान खाने वालों को दूषित जलवायु से होने वाले रोग नहीं होते हैं।
  • 35. कमजोरी: पान के शर्बत में चरपरी चीजें या गर्म चीजों को मिलाकर 25-25 मिलीलीटर दिन में 3 बार पिलाने से शरीर की कमजोरी दूर होती है।

35. ग्रंथि (गांठ) सूजन: शरीर में सूजन होने पर पान को गर्म करके बांधने से सूजन और पीड़ा दूर होकर गांठ बैठ जाती है।

36. घाव:

  • पान के पत्ते गरम कर घाव पर बांधने से सूजन और पीड़ा जल्दी ही ठीक होकर घाव भी अच्छे हो जाते हैं।
  • जख्मों के ऊपर पान के पत्तों को बांधने से जख्म जल्दी भर जाते हैं।
  • अल्सर में आधा चम्मच पान के हरे पत्तों का रस रोजाना पीना चाहिए।

37. सूजन: पान को औरत के प्रसूता (प्रजनन) के स्थान पर रखने तथा पान का सेंक व लेप करने से सूजन नष्ट हो जाती है तथा उनका दूध साफ होकर निकलता है।

38. वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस): पान का रस 5 मिलीलीटर की मात्रा में सुबह-शाम शहद के सेवन करने से वायु प्रणाली शोथ (ब्रोंकाइटिस) में लाभ मिलता है।

39. फेफड़ों की जलन और सूजन: पान के पत्ते का रस 5 से 10 मिलीलीटर की मात्रा में शहद के साथ सुबह-शाम को सेवन करने से फेफड़ों की जलन और सूजन नष्ट हो जाती है। 

40. अंडकोष की जलन: पान के पत्ते पर चूना, कत्था और तंबाकू को डालकर बने बीड़े को पीसकर उसमें थोड़ा-सा घी मिलाकर एरंड के पत्ते पर फैलाकर कसकर अंडकोष पर बांधने से अंडकोष की जलन और दर्द में लाभ मिलता है।

41. कालीखांसी: 3 मिलीलीटर पान के पत्तों के रस में शहद मिलाकर 1-1 बार चाटने से काली खांसी में बहुत अधिक लाभ मिलता है।

42. जुएं का पड़ना: पान और मूली के रस में पारा मिला करके लगाने से जूएं जल्द मर जाती हैं।

43. हिचकी: 10 मिलीलीटर पान के बीज में 3 ग्राम कुटकी पीसकर शहद के साथ खाने से हिचकी मिट जाती है।

44. कान का दर्द: पान के रस को थोड़ा सा गर्म करके बूंद-बूंद करके कान में डालने से ठंड लग जाने के कारण पैदा हुआ कान का दर्द ठीक हो जाता है।

45. मोच: पान के पत्ते पर सरसो का तेल लगाकर पत्ते को गर्म करके बांधना चाहिए।

46. गर्भनिरोध: पान की जड़ को अच्छी तरह से पीसकर प्राप्त बारीक पाउडर 20 ग्राम में 3 कालीमिर्च को पीसकर बने चूर्ण को मिलाकर मासिकस्राव के चौथे दिन से लगभग 7 दिनों तक खाने से गर्भ नहीं रुकता है।

47. शीतपित्त: 3 पान और 1 चम्मच फिटकरी पानी डालकर और उसे पीसकर पित्ती निकली हुई जगह पर मालिश करने से पित्ती ठीक हो जाती है।

48. स्तनों का दर्द और सूजन : पान के पत्ते को हल्का-सा गुनगुना करके बांधने से स्तनों का दर्द और सूजन दूर होता है। सावधानी : इसका प्रयोग करते समय नवजात या छोटे बच्चो के होने पर किसी अन्य चिकित्सा से इलाज करें इसका प्रयोग बिल्कुल भी न करें।

49. पेट के कीड़े: पान का रस पीने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।

50. स्तनों में दूध की अधिकता: पान के पत्तों को हल्का-सा गर्म करके स्तनों पर बांधने से स्त्री के स्तनों पर आने वाली सूजन समाप्त होकर दूध रुक जाता है।

51. स्त्री को द्रवित (संतुष्ट करना): पान में थोड़ी-सी मात्रा में सुहागा को स्त्री को खिलाने के थोड़ी देर बाद सहवास (संभोग) करने से स्त्री पहले स्खलित हो जाती हैं।

52. अंगुलबेल (डिठौन): अंगुली की सूजन व दर्द को कम करने के लिए पान के पत्तों को गर्म करके अंगुली पर बांधने से लाभ मिलता है।

53. फीलपांव (गजचर्म):

  • 7 नाग नागर पान को ठंडाई की तरह घोंटकर कुछ दिनों तक सेवन करने से फीलपांव के रोगी को लाभ मिलता है।
  • पान के 7 पत्तों का चूर्ण गर्म पानी और सेंधानमक के साथ दिन में 3 बार लेने से पीलपांव के रोग में आराम आता है।

54. कंठ रोहिणी के लिए:

  • साधारण आकार के चार पान के पत्तों के रस को गुनगुने पानी में मिलाकर गरारे करने या पान के तेल की 1 बूंद को 125 ग्राम गर्म पानी में डालकर वाश्प (गैस) को सूंघने को रोगी को कहे तो कंठरोहिणी रोग में जरूर लाभ होता है।
  • पान के रस में भुना हुआ सुहागा मिलाकर गले में लगाने से श्लैष्मिका झिल्ली समाप्त हो जाती है।

55. गले की सूजन: पान की जड़ के छोटे-छोटे टुकड़े काटकर मुंह में रखकर चूस लें। इससे गला साफ होता है और आवाज भी साफ होती है।

56. बंद आवाज खोलना : चिराग का गुल पान में रखकर खाने से सिंदूर के खाने की वजह से बंद हुई आवाज खुल जाती है।

Tags: paan ka parichye, paan ka rang, paan ka swad, banarasi paan, band aawaj kholna, pet ke kide