निगलना (निगरण)


निगलना (निगरण)

(Swallowing or deglutition)


पाचन संस्थान :

        भोजन के मुख में पहुंचते ही जो सबसे पहले काम होता है वे है भोजन को दांतों से चबाना। भोजन के चबाने की क्रिया के दौरान जीभ और गालों की पेशियों द्वारा मुख में चारों तरफ घुमाया जाता है जिससे यह मुखगुहा में लार (सैलाइवरी) ग्रंथियों से आए उनके स्राव, लार के साथ मिलकर निगलने के लिए एक आर्द्र (मुलायम) पिण्ड, ग्रास (bolus) बन जाता है। भोजन को चबाने के बाद निगलने की क्रिया तीन चरणों में पूरी होती है-

1- पहला चरण (voluntary oral phase)- इसके दौरान भोजन को चबाने के बाद निगलने की क्रिया ऐच्छिक होती है। इसमें मुख बंद रहता है तथा जीभ और गालों की ऐच्छिक पेशियां ग्रास को मुखगुहा में पीछे की तरफ ग्रसनी में पहुंचा देती है।

2- दूसरा चरण (pharyngeas phase)- इस चरण में ग्रसनी में अनैच्छिक या प्रतिवर्त क्रिया होती है, जो ग्लॉसोफैरिन्जीयल तंत्रिका के (उद्दीपन) उत्तेजना से शुरू होती है। ग्रसनी के पेशियां संकुचित होकर ग्रास को नीचे ग्रासनली में पहुंचा देती है। ग्रास को निगलते समय बाकी सभी मार्ग बंद हो जाते हैं। मुलायम तालू ऊपर को उठकर नासाग्रसनी को बंद कर देता है, जीभ और ग्रसनी की परतें मुख के पीछे वाले मार्ग को बंद कर देती है तथा स्वरयंत्र ऊपर से आगे की ओर उठता है जिससे ऊपर लटके रहने वाले कण्ठच्छद से इसका द्वार बंद हो जाता है। इससे ग्रास श्वास प्रणाली में पहुंच नहीं पाता और आगे बढ़कर ग्रासनली में प्रवेश कर जाता है। निगलने की इस क्रिया के दौरान बोलना और सांस लेना संभव नहीं होता है।

3- तीसरा चरण (involuntary oesophageas phase)- इस चरण के दौरान भी अनैच्छिक या प्रतिवर्त क्रिया होती है। इसमें ग्रसनी की निचली पेशियां संकुचित होकर क्रमांकुचन गतियों (peristalsis) की तरंगे शुरू कर देती है जो ग्रास को ग्रासनली में होकर आमाशय में पहुंचाने का कार्य करती है।

        क्रमाकुंचन (peristalsis) के दौरान दो तरह के पेशीय संकुचन होते हैं- पहला- लंबाकार चिकनी पेशी परत का संकुचन होने से ग्रासनील के ल्यूमन (lumen) का व्यास बढ़ जाता है और दूसरा वृत्ताकार चिकनी पेशी परत का संकुचन होने से ग्रास पाचक नली के साथ-साथ आगे की तरफ बढ़ता है। निगलने की हर क्रिया में क्रमाकुंचन की एक प्रतिवर्ती तरंग पैदा होती है जो ग्रासनली की पूरी लंबाई में फैल जाती है। ग्रसनी की बाहरी भित्ति का उद्दीपन जल्द ही ऐसी तरंग पैदा कर देता है जो मेड्यूला ऑब्लांगेटा के निगरण केंद्र में संवेद भेजता है, जिससे प्रेरक तंत्रिकाओं द्वारा ग्रासनील की भित्ति की वृत्ताकार पेशियां उत्तेजित हो जाती है। क्रमांकुचन ग्रासनली की भित्ति के फैलने से भी प्रतिवर्ती रूप से पैदा होती है। हर एक क्रमिक तरंग द्वारा भोजन का ग्रास आमाशय के पास पहुंचता है। तंत्रिकाओं द्वारा ग्रासनली के ऊपर के लगभग दो तिहाई भाग में क्रमाकुंचन होता है जो ऊसकी भित्तियों की पेशियों को जागृत करती है। ग्रासनील के नीचे वाले लगभग एक तिहाई भाग में चिकनी पेशियां होती है जिनकी क्रिया भित्तियों में मौजूद तंत्रिकाओं द्वारा नियंत्रित होती है। क्रमांकुचन तरंग निचली ईसोफेगियल संकोचनी पेशी तक निगले हुए ग्रास से पहले ही पहुंच जाती है। संकुचित संकोचनी पेशी शिथिल हो जाती है भोजन का ग्रास आमाशय में प्रवेश कर जाता है।