नाड़ी


नाड़ी (नब्ज)

(Pulse)


हृदय में तालबद्ध संकुचन (rhythmic contraction) का गुण मौजूद रहता है। इस तालबद्ध संकुचन की उत्पत्ति मायोकार्डियम के एक विशिष्ट स्थान, एस.ए.नोड से होती है।हृदय में तालबद्ध संकुचन (rhythmic contraction) का गुण मौजूद रहता है। इस तालबद्ध संकुचन की उत्पत्ति मायोकार्डियम के एक विशिष्ट स्थान, एस.ए.नोड से होती है। यह विशेष स्थान गति-प्रेरक (Pace maker) कहलाता है। उत्तेजना एस.ए. नोड से शुरु होकर ए.वी. नोड में पहुंचता है। यहां से यह उत्तेजना कुछ विशेष तन्तुओं, बण्डल ऑफ हिज (Bundle of His) के माध्यम से हृदय के अन्य भागों को संकुचन के लिए प्रेरित और उत्तेजित करता है। यह स्पन्दन हृदयकक्षों की सभी पेशियों में होता है, जिससे हृदय में पर्यायक्रमिक संकुचन और फैलाव होता है। जब यह उत्तेजना हृदय के बाएं निलय (वेन्ट्रिक्ल) में पहुंचती है तो बाएं निलय के संकुचन से रक्त महाधमनी में पम्प होता है। इससे दबाव बढ़कर तरंग की तरह आगे धमनियों में बढ़ता है। धमनियों के फैलने और सिकुड़ने से एक तरंग पैदा होती है जिसे नाड़ी (नब्ज) (Pulse) कहते हैं। यह सभी बड़ी धमनियों में आगे चलती जाती है। नाड़ी ऐसे किसी स्थान पर आसानी से स्पर्श करके अनुभव की जा सकती है जहाँ पर कोई धमनी त्वचा के पास रहती है। सामान्यतः कलाई पर सामने की ओर रेडियल धमनी (Radial artery) की बीच की तीन अंगुलियों से स्पर्श करके नाड़ी को महसूस किया जाता है। वैसे दूसरे स्थानों पर भी जहां धमनी त्वचा के पास तथा हड्डी के ऊपर रहती है, वहां इसे महसूस किया जा सकता है।

सामान्य अवस्था में नाडी़ की गति या दर (pulse rate) हृदय गति (heart rate) के समकालिक (synchronous) ही होती है जैसे- हृदय की गति अगर प्रति मिनट 72 है तो नाड़ी की गति भी प्रति मिनट 72 ही होगी। नाड़ी की गति आयु, लिंग, उत्तेजना, मानसिक अवस्था, परिश्रम तथा दूसरे कारणों पर निर्भर करती है। बच्चों में यह अधिक होती है लेकिन आयु बढ़ने पर और बुढ़ापे में घटती है। वयस्कों में नाडी़ की गति औसतन प्रति मिनट 70 से 90 तथा बच्चों में प्रति मिनट 80 से 140 होती है। जब नाड़ी की गति 100 स्पन्द प्रति मिनट से ज्यादा हो जाती है को इस अवस्था को टैकिकार्डिया (Tachycardia) तथा जब नाड़ी की गति प्रति मिनट 60 स्पन्द से कम हो जाती है। इस अवस्था को ब्रैडिकार्डिया (Bradycardia) कहते हैं।

सामान्यतः नाड़ी की गति नींद के दौरान घट जाती है तथा भोजने करते समय अथवा परिश्रम करते समय बढ़ जाती है। बुखार के दौरान प्रत्येक एक डिग्री ताप से नाड़ी के 10 स्पन्दन बढ़ते हैं। ज्यादा रक्त बहने (blood loss) के बाद नाड़ी की गति काफी बढ़ जाती है तथा तीव्र रक्ताल्पता (खून की कमी) (severe anaemia) के मामलों में अक्सर ज्यादा रहती है। कभी-कभी हृदय के संकुचनों की नियमितता में गड़बडी पैदा हो जाती है, जिससे अतालता (arrhythmia) पैदा हो जाती है।

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