ध्यान

Dhayan men man ko ekagr kar chintan v manna kiya jata hai. At: dhyan hi yog ki antim sithiti hai.


ध्यान


योग ग्रंथों में ध्यान का सबसे अधिक महत्व है तथा योग के आठ अंगों में ध्यान का सातवां स्थान है। ध्यान ही योग की ऐसी साधना है, जिसमें सफलता प्राप्त करने के बाद विभिन्न प्रकार की दिव्य व आलौकिक शक्तियां प्राप्त होती हैं। ध्यान के अभ्यास में मन की चंचलता को वश में किया जाता है और उसे अपनी इच्छा के अनुसार किसी विषय-वस्तु पर केन्द्रित किया जाता है। जब ध्यान के अभ्यास से शरीर, मन और प्राण वश में हो जाते हैं, तब मन में उत्पन्न होने वाले अनेक प्रकार के विचार रुक जाते हैं और मन किसी एक केन्द्र पर ही केन्द्रित हो जाता है। ध्यान में मन को एकाग्र कर चिंतन व मनन किया जाता है। अत: ध्यान ही योग की अंतिम स्थिति है। ध्यान के बाद ही अलौकिक व दिव्य शक्ति का ज्ञान प्राप्त होता है और ध्यान लगाने से ही कुण्डलिनी शक्ति का जागरण होता है। इससे शरीर की ऊर्जा जो मूलाधार में स्थित होती है, वह ऊपर उठकर मस्तिष्क की ओर प्रवाहित होने लगती है।
धारणा या एकाग्रता की प्राप्ति के बाद ही ध्यान का अभ्यास किया जाता है। जब मन एकाग्र होता है, तब ध्यान का अभ्यास किया जाता है। ध्यान में मन को स्थिर करने से मन बाहरी वस्तुओं से हटकर आंतरिक आत्मा व परमात्मा में लीन हो जाता है। ध्यान का अभ्यास करने से व्यक्ति का मन व स्वभाव निर्मल व स्थिर हो जाता है। इस तरह की अवस्था ही ध्यान की वास्तविक अवस्था है।