त्वचा के कार्य


त्वचा के कार्य

(Functions of the skin)


शरीर में त्वचा के निम्नलिखित कार्य होते है-

1. रक्षात्मक कार्य (protective)- त्वचा शरीर का रक्षात्मक बाह्य आवरण है जो कि शरीर के कोमल अंगो, मांसपेशियों, रक्तिवाहिनियों आदि के लिए रक्षात्मक भित्ति का काम करता है। यह बाहरी चोट आदि से शारीरिक अंगों की रक्षा करती है। त्वचा खतरनाक सूक्ष्म जीवाणु एवं बाह्य पदार्थों के शरीर में प्रवेश करने के प्रति अवरोधक की भांति कार्य करती है। त्वचा जल-अभेद्य (water proof) होती है। इसलिए यह बाहर के तरल द्रवों को अंदर प्रवेश करने नहीं देती तथा ऊतकों के तरलों को बाहर निकलने नहीं देती है। त्वचा शरीर को रोगों से बचाने में भी सक्रिय भूमिका अदा करती है।

2. शरीर के तापमान का नियमन (Temperature regulation)- त्वचा वैसे तो पूरी वाटर-प्रूफ है, फिर भी उसकी बाह्य सतह, स्वेद ग्रन्थियों की सूक्ष्म नलियों के द्वारा स्रावित होने वाले द्रव से नम रहती है। पसीना इन सूक्ष्म नलियों के सतही छिद्रों (Pores) से उत्सर्जित होता है तथा वातावरणीय प्रभाव से इसका निरन्तर वाष्पीकरण होता रहता है। इससे शरीर में शीतल प्रभाव बना रहता है। नम (humid) मौसम में शरीर आसानी से शीतल नहीं हो पाता है क्योंकि बाहर की हवा अक्सर जल से संतृप्त होती है तथा पसीना वाष्पीकृत होने के बजाय त्वचा पर बना रहता है। ठण्डे मौसम मे त्वचा इन्सूलेटर की भांति कार्य करती है, जिससे शरीर में ऊष्मा (heat) बनी रहती है और शरीर गर्म बना रहता है। इसके अलावा अन्तरत्वचा (डर्मिस) में रक्तवाहिकाओं का घना जाल मौजूद रहता है। गर्म मौसम में वाहिकाएं फैल जाती है तथा रक्त से ऊष्मा का विकिरण (radiation) बढ़ जाता है। इस तरह से शरीर की ऊष्मा का ह्रास होता है।

3. उत्सर्जन (excretion)- त्वचा स्वेद (पसीने) के माध्यम से बेकार पदार्थों जैसे यूरिया आदि की कुछ मात्रा उत्सर्जित करती है। त्वचा हर घन्टे की दर से लगभग एक ग्राम बेकार नाइट्रोजन को भी निकालती है।

4. सामान्य  संवेदन (general sensation)- त्वचा स्पर्श, दबाव, दर्द, ठंडे तथा गर्म संवेदनाओं को ग्रहण करके मस्तिष्क में भेजती है। ये कार्य त्वचा में मौजूद तन्त्रिका तन्तुओं के अन्तांगों (nerve endings) के द्वारा सम्पादित होते हैं। तन्त्रिका तन्तुओं से बनी ‘स्पर्श कणिकाएं’ (tactile corpuscles) ही स्पर्शेन्द्रिय का कार्य करती है। बालों की जड़ों में भी तन्त्रिका तन्तुओं की अधिकता रहती है इसलिए बाल भी त्वचा की संवेदन क्रिया में मदद प्रदान करते हैं।

5. स्राव उत्पादन (Secretion)- त्वचा में मौजूद त्वग्वसीय ग्रन्थियों से त्वग्वसा (sebum) की उत्पत्ति होती है। इस स्राव मे वसीय अम्ल, कॉलेस्टेरॉल तथा अर्गोस्टेरॉल मुख्य रूप से रहते हैं। इससे त्वचा को स्नेहन होता रहता है जिससे त्वचा चिकनी बनी रहती है। सर्दी के मौसम में इस स्राव के कम हो जाने पर त्वचा सूखी) और पपड़ीदार हो जाती है।

त्वग्वसीय ग्रन्थियों के रूपान्तरित रूप स्तन ग्रन्थियों से भी एक विशेष स्राव पैदा होता है जो संक्रमणों से सुरक्षा करता है।

6. जल सन्तुलन (water balance)- शरीर में पसीना बनना तथा उसका बाहर निकल जाना शरीर के अंदर जल सन्तुलन बनाए रखने में महत्वपूर्ण है।

7. अम्ल-क्षार सन्तुलन (Acid-base balance)- पसीने की अभिक्रिया एसिडिक होती है, इसलिए  इसके साथ पर्याप्त मात्रा में शरीर से अनावश्यक एसिड भी बाहर निकल जाते हैं। अम्लरक्ततता (Acidosis) की अवस्था में पसीना और अधिक एसीडिक होकर शरीर से एसिड के निष्कासन की मात्रा को और भी बढ़ा देता है। इस प्रकार त्वचा के द्वारा शरीर के अंदर की समसमान प्रतिक्रिया (constant reaction in the body) को बनाए रखने में सहायता मिलती है।

 8. संश्लेषण (Synthesis)-  त्वचा की त्वग्वसीय ग्रन्थियों में निर्मित त्वग्वसा (Sebum) मे एर्गोस्टोरॉल (Erogsterol) मौजूद रहता है। इससे सूर्य की अल्ट्रावॉयलेट किरणों कि क्रियाओं द्वारा विटामिन ‘डी’ का निर्माण होता है, जो शरीर के कई कार्यों को संपादित करता है तथा स्वास्थ्य के लिए बहुत महत्वपूर्ण होता है।

9. संचयन (संग्रहण) (Storage)- अन्तरत्वचा (डर्मिस) और अवत्वचीय ऊतक (Subcutaneous tissue) अपने अंदर वसा, जल, लवण, ग्लूकोज और दूसरे पदार्थों का संग्रहण करके रखते हैं।

10. अवशोषण (absorption)- त्वचा अपने अंदर तैलीय पदार्थों को अवशोषित (सोखने) करने की क्षमता रखती है। त्वचा लिपिड्स एवं विटामिन्स को भी अपने अंदर आसानी से सोख लेती है।

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