तन्त्रिका मूल


तन्त्रिका मूल

(Nerve roots)


Agr tantrika mool men prerak tantrika tantu aur anukmpi tantrika tantu shamil hote hain.अग्र तन्त्रिका मूल (Anterior or ventral nerve root)-

अग्र तन्त्रिका मूल में प्रेरक तन्त्रिका तन्तु (Motro nerve fibres) और अनुकम्पी तन्त्रिका तन्तु शामिल होते हैं। प्रेरक तन्त्रिका तन्तु सुषुम्ना में स्थित भूरे रंग के द्रव्य के एन्टीरियर कॉलम में, थॉरेसिक और लम्बर क्षेत्रों में स्थित तन्त्रिका कोशिकाओं के अक्ष-तन्तु होते हैं। अनुकम्पी तन्त्रिका तन्तु (Sympathetic nerve fibres) भूरे रंग के द्रव्य के लेटरल कॉलम्स में स्थित कोशिकाओं के अक्ष तन्तु होते हैं। इससे पेशियों में संकुचन और गति की क्रिया होती है।

 पश्च तन्त्रिका मूल (Posterior or dorsal nerve root)-  

पश्च तन्त्रिका मूल में संवेदी तन्त्रिका तन्तु (Sensory nerve fibres) शामिल होते हैं। दोनों मूलों से निकली तन्त्रिकाएं वर्टिब्रल केनाल के अंदर एकसाथ मिलकर एक हो जाती हैं और इन्टरवर्टिब्रल फोरामेन से होकर बाहर निकल जाती है। बाहर निकलने के बाद हर एक स्पाइनल तन्त्रिका अग्र एवं पश्च शाखाओं (Anterior and posterior ramus) में बंट जाती है। पश्च शाखाएं (Posterior rami) सिर, गर्दन एवं धड़ के पिछले भाग की त्वचा एवं पेशियों की आपूर्ति करती हैं तथा अग्र शाखाएं (anterior rami) गर्दन, धड़ एवं हाथ-पैरों के एन्टीरियर एव लेटरल भाग की आपूर्ति करती हैं। यह अपेक्षाकृत कुछ लम्बी होती हैं,

          अग्र शाखाएं बाकी स्पाइनल तन्त्रिकाओं की शाखाओं से मिलकर बड़ी जालिकाएं (Plexus) बनाती हैं। थॉरैसिक क्षेत्र को छोड़कर वर्टिब्रल कॉलम के हर ओर मिश्रित तन्त्रिकाओं की 5 बड़ी जालिकाएं बनती है। ये निम्नलिखित होते हैं-