छाती


छाती

CHEST


परिचय :-

          छाती में उत्पन्न विभिन्न प्रकार के रोगों को ठीक करने के लिए विभिन्न औषधियों का प्रयोग किया जाता है। यह औषधि छाती से सम्बंधित छोटे-छोटे लक्षणों को समाप्त करके उसके रोग को ठीक करती है। यह औषधि छाती में कफ व बलगम बनने तथा कैंसर तथा स्तनों के रोगों को दूर करने में लाभकारी होती है।

छाती के रोग और उसमें प्रयोग की जाने वाली औषधियां :-

  • ऐन्जिना पेक्टोरिस रोग से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए विभिन्न औषधियां- ऐमोन-का, एपिस, आर्ज-ना, आर्नि, आर्स, कैक्ट, नेजा, अक्जै-ऐ, फास, रस, स्पाइजी, स्पन्जि या टर्मि-अर्जु आदि का प्रयोग करने से लाभ होता है।
  • बलगम के साथ खून आने पर जस्टि-रूबम औषधि का सेवन करना चाहिए।
  • यदि किसी रोगी के छाती में ट्यूमर हो गया हो तो रोगी को स्क्रो-नोडो औषधि का सेवन करना अत्यन्त लाभकारी होता है।
  • क्रियात्मक उपद्रव (फंक्सीनल डीस्टुरबेंस) होने पर अमो-वैलेरी औषधि का प्रयोग करना लाभकारी होता है।
  • छाती का कैंसर या स्तनों का कैंसर रोग होने पर बूफो, कोना, ग्रैफ, मर्क, साइली या कार्सि औषधि का प्रयोग करें। यह औषधियां कैंसर रोग में अत्यन्त लाभकारी होती है।
  • छाती या स्तनों का फट जाना या चिटक जाना आदि छाती में होने वाले रोगों में कास्टि, ग्रैफ, फाइटों, रैटें औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • तपेदिक (फ्थिसीज) रोग में रोगी को कैल्के, कैल्के-फा, हिप, काली-का, काली-स, लाइको या फास औषधि का सेवन करना चाहिए।
  • हृदय की धड़कन तेज होना अर्थत हाईब्लड प्रेशर रोग में थाइरा औषधि लेनी चाहिए।
  • छाती में साधारण दर्द या सुई के सुभने की तरह दर्द होने पर रोगी को आराम के लिए ब्रायो, कैलि-का, रेनन-ब या एलूमिना-सिलि औषधि का प्रयोग सेवन करना चाहिए।
  • छाती या दिल पर दबाव महसूस होने पर आर्स, आरम, कैक्ट, इपि, पल्स व स्पाइजी का प्रयोग करें।
  • यदि बच्चे के जन्म के बाद मां के स्तनों में दूध भरपूर मात्रा में नहीं बन रहा हो तो ऐसे में ऐसाफ, कैल्क, ब्रायो, कास्टि, लैके-कैन, लैक-डि या अर्टिक-यूरेन औषधियों में से कोई भी औषधि प्रयोग किया जा सकता है।
  • यदि नाड़ी की गति धीमी हो गई हो तो नाड़ी की गति को सामान्य करने के लिए लुपु-हुमु औषधि का प्रयोग किया जाता है।
  • यदि किसी कारण से दिल की धड़कन कम या अधिक तेज होती है तो ऐसे में रोगी इन औषधि का सेवन करना चाहिए जैसे- ऐकोन, आर्स, कैल्के, चायना, डिजि, कैक्ट, ग्लोन, आयोड, काली-का, कैल्मि, लैके, लाइको, नेजा, नेट्रम-फा, नक्स-वो, फास, सिपि, स्पाइजी, स्पन्जि, सल्फ या एको-काली आदि।
  • यदि दाईं करवट लेटने से धड़कन की गति तेज होती हो तो रोगी को एलूमेन औषधि लेनी चाहिए।
  • न्यूमोनिया रोग होने पर इन औषधि का प्रयोग करें- ऐकोन, ऐन्टि-टा, आर्स, ब्रायो, कार्बो-वे, चेलि, फेर-फा, हिपर, लोबे, लाइको, मर्क, फास, पल्स, रस-टा, सेनेगा, सल्फ, बैल-पेरू औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • प्लूरिसि रोग से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए एपिस, ऐपोसा, आर्स, ब्रायो, कालचि, हेले, काली-का, लाइको, मर्क, सल्फ, रेननक्यू या एण्टि-आर्से औषधि का प्रयोग किया जाता है।
  • यदि स्तनों का फोड़ा हो गया हो तो ब्रायो, ग्रैफ, मर्क, फाइटो, साइली या सल्फ औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • दमा (ब्रोकाईटीस) रोग से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए ऐन्टि-टा, आर्स, बैरा-म्यू, ब्रायोख् ड्रासे, फेर-का, हिपर, इपि, लाइको, नेट्रम-म्यू, फास, पल्स, सैनेशि, सैडिव, साइली, स्पन्जि, स्टैन, सल्फ या ऐलियम-सैटा औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • यदि किसी स्त्री का स्तन कठोर हो गया हो तो स्तनों की कठोरता को दूर करने के लिए कार्बो-ऐनि, कैमो, साइली या कोना औषधि का सेवन करना चाहिए।
  • अगर स्त्री के स्तन सूख गए हो तो कोना, आयोड या काली-आयोड औषधि लेनी चाहिए।
  • हृदय रोग से ग्रस्त रोगी को ठीक करने के लिए क्रैटेगिस या फैसियों-ना औषधि का प्रयोग करना चाहिए।,
  • हृदय की पेशी अपजनन (मायोकार्डियल डेजेनव्रेशन) रोग में चिनी-आर्से औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • यदि हल्का कार्य करने या सीढ़ी चढ़ने से दम फूलने लगता हो तो ऐसे में चिनी-आर्से औषधि का प्रयोग करें।
  • बुढ़ापे में उत्पन्न दमा रोग में हिप्पोजेनियम औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • स्तनों पर दर्द वाले फोड़े होना, स्तनों में अधिक दूध इक्ट्ठा होना तथा स्तन का सिकुड़ जाना आदि रोगों में चिमा-अम्बे औषधि का प्रयोग करना चाहिए।
  • छाती में सूजन या कांख में गिलटियां होने पर  लाइको, लैके, मर्क, नाइट्र-ऐ, फास या साइली औषधि का प्रयोग करना अत्यन्त लाभकारी होता है।
  • अगर स्तनों में सूजन आ गई हो तो ऐलियम-सैटा औषधि का प्रयोग करें। इससे स्तनों की सूजन आदि दूर होकर स्तन सामान्य होते हैं।