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गुर्दे


गुर्दे

(Kidneys)


      गुर्दे सेम के बीज की आकृति (bean shaped) के समान शरीर की सबसे अधिक सक्रिय ग्रंथियां है। यह कशेरुका दण्ड (vertebral column) के दोनों पार्श्वों में एक-एक पेरीटोनियम के पीछे पश्चज उदरीय भित्ति पर स्थित रहते हैं। इनका मुख्य कार्य मूत्र का निर्माण करना और रक्त में घुले हुए व्यर्थ उत्पादों और अधिक मात्रा में मौजूद पदार्थों को छानने (filter) का हैं। ये अक्सर बारहवें थॉरेसिक वर्टिब्रा (कशेरुका) से तीसरे लम्बर वर्टिब्रा (कशेरुका) (T12 to L3) के स्तर तक स्थित रहते हैं। इनमें से दाहिना गुर्दा जिगर के द्वारा काफी जगह घेर लेने के कारण बायें गुर्दे की अपेक्षा कुछ नीचे स्थित रहता है। हर गुर्दा लगभग 11 सेमीमीटर लम्बा, 6 सेमीमीटर चौड़ा तथा 3 सेमीमीटर मोटा होता है।

     हर गुर्दे में ऊर्ध्व एवं निम्न सिरे होते हैं जिन्हें क्रमशः ऊर्ध्व ध्रुव (superior pole) तथा निम्न ध्रुव (inferiorpole) कहा जाता है। दोनों गुर्दों के ऊर्ध्व ध्रुव पर एक-एक अधिवृक्क (adrenal gland) स्थित रहती है। इनकी अग्र (anterior) और पश्च (posterior) परतें तथा पार्श्वीय (lateral)  और अभिमध्य (medial) किनारे (border) होते हैं। इसका पार्श्वीय अर्थात बाह्य किनारा उत्तल (उभरा) (convex) हुआ रहता है तथा भीतरी अभिमध्य किनारा अवतल (concave) रहता है, जिसमें एक गड्ढ़ा, हाइलम (hilum) होता है। इसी हाइलम से होकर गुर्दे की धमनी (renal artery), गुर्दे की शिरा (renal vein), लिम्फेटिक वाहिनियां, तंत्रिकाएं (nerves) और दोनों मूत्रनलियां (ureters) गुर्दे में प्रवेश करती है और बाहर निकलती है।

हर गुर्दा ऊतक की तीन परतों से ढका रहता है-

  • इसकी सबसे अंदर की परत मजबूत और तंतुमय पदार्थ की बनी होती है, जिसे वृक्कीय (गुर्दे) सम्पुट (renal capsule) कहा जाता है। यह परत मूत्रनलियों (ureters) की सतही परत में विलीन हो जाती है।
  • इसकी मध्य की परत परिवृक्कीय (गुर्दे) वसा की बनी होती है जिसे वसीय सम्पुट (adipose capsule) कहा जाता है। वसा की यह गद्दीनुमा परत गुर्दे को झटकों और आघातों से बचाती है।
  • इसकी बाह्य परत सीरमी कला के नीचे स्थित प्रावरणी होती है, जिसे वृक्कीय प्रावरणी (renal fascia) कहते हैं। वृक्कीय प्रावरणी के चारों ओर वसा की एक दूसरी परत और होती है जिसे परिवृक्कीय वसा (pararenal fat) कहते हैं। वृक्कीय प्रावरणी संयोजी-ऊतक की बनी होती है, जो गुर्दे को घेरे रहती है तथा इसे पश्च उदरीय भित्ति से कसकर जोड़े रहती है।

आतंरिक रचना- गुर्दे की खड़ी शाखा (sagittal section) में (अंदर से बाहर की ओर) तीन अलग-अलग भाग दिखाई देते हैं- श्रोणि (pelvis) अंतस्था (medulla) और प्रान्तस्था (cortex)।

वृक्कीय (गुर्दे) श्रोणि (Renal pelvis)- यह गुर्दे के अंदर एक बड़ा संचयक स्थान (collecting space) होता है जो मूत्रनली के फैले और चौड़े हुए कीपाकार ऊपरी भाग से बना होता है। श्रोणि (पेल्विस) दो छोटी गुहाओं में बंटा होता है, जिन्हें वृहत् आलवाल (major calyces) तथा लघु आलवाल (Minor calyces) कहा जाता है। हर गुर्दे में अक्सर वृहत् आलवाल संख्या में 2 से 3 तथा लघु आलवाल 8 से 18 की संख्या में रहते हैं।

वृक्कीय (गुर्दे) अंतस्था (Renal medulla)- यह गुर्दे के बीच का भाग होता है। इसमें 8 से 18 की संख्या में गुर्दे के पिरामिड्स (renal pyramids) रहते हैं जिनका आकार शंकु (conical) के जैसा होता है। हर पिरामिड का आधार (base) गुर्दे की कॉर्टेक्स से चिपका रहता है तथा शिखर (apex) से अंकुरक (papilla) बनता है, जो लघु आलवाल (minor calyx) में खुलता है। गुर्दे के पिरामिड्स में नेफ्रॉन्स (nephrons) की संग्राही वाहिकाएं (collecting ducts) और नलिकाएं (tubules) रहती है। पिरामिड्स की नलिकाएं फिल्टर (छने) हुए पदार्थों के दुबारा अवशोषण का कार्य करती है। मूत्र पिरामिड्स की संग्राही वाहिकाओं से गुजरकर पहले लघु आलवालों (minor calyces) में और फिर वृहत् आलवालों (major calyces) में और फिर वृक्कीय श्रोणि (पेल्विस) में पहुंचता है, जहां से मूत्र आलवाल (कैलिक्स) की भित्तियों में पैदा होने वाली संकुचन की तरंग से मूत्रनली (ureter) से होता हुआ मूत्राशय में पहुंच जाता है।

वृक्कीय (गुर्दे) प्रान्तस्था (Renal cortex)- यह गुर्दे का सबसे बाहरी भाग होता है जो दो भागों में बंटा रहता है- बाहरी कॉर्टिकल भाग तथा दूसरा आतंरिक जक्स्टामेड्यूलरी (juxtamedullary) भाग, जो मेड्यूला से सटा होता है। कॉर्टेक्स कणिकीय (granular) दिखाई देता है तथा गुर्दे के बाह्य सम्पुट (capsule) से वृक्कीय (गुर्दे) पिरामिड्स के आधार तक फैला रहता है। कॉर्टेक्स के अंदर का कणिकीय रूप कोशिकाओं के गुच्छों तथा नेफ्रान्स के कारण होता है। कॉर्टिकल ऊतक जो वृक्कीय पिरामिड्स के बीच में मेड्यूला की गहराई में निकलता है, उससे वृक्कीय स्तम्भ (renal columus) बनते हैं। ये स्तम्भ मुख्यतः संग्राही नलिकाओं (collecting tubules) के बने होते हैं, जो मूत्र को लघु कैलिक्स में पहुंचाते हैं। हर लघु कैलिक्स में मूत्र गुर्दे के एक खण्ड (lobe) से आता है। हर खण्ड एक पिरामिड तथा इसके ऊपर सम्बद्ध कॉर्टिकल ऊतक से बना होता है।

गुर्दे की रक्त आपूर्ति (Blood supply of kidney)- वृक्कीय (गुर्दे) धमनी (renal artery) हर गुर्दे के हाइलम से प्रवेश करके सीधे उदरीय महाधमनी से रक्त लाकर उनमें पहुंचाती है। गुर्दे के अंदर पहुंचकर वृक्कीय धमनी अंतखण्डीय शाखाओं (interlobar arteries) में बंट जाती है, जो वृक्कीय स्तम्भों (renal columns) में से होकर गुजरती है। जब ये धमनियां कॉर्टेक्स और मेड्यूला के मिलन स्थल पर पहुंचती है तो ये मुड़ जाती है तथा वृक्कीय (गुर्दे) पिरामिड्स के आधारों के समान्तर बढ़ती है। मुड़ने के स्थान पर ये धमनियां (धनुष के समान मुड़ी हुई) चापी-धमनियां (Arcuate arteries) कहलाती है, जो कॉर्टे्क्स और मेड्यूला के किनारे के चारों ओर छोटे-छोटे चाप (arcs) बनाती है। चापी धमनियां विभाजित होकर इंटरलोब्यूलर धमनियों (interlobular arteries) में बंट जाती है जो कॉर्टेक्स की ओर जाती है। इसके बाद ये फिर विभाजित होकर बहुत सी छोटी-छोटी अभिवाही धमनिकाओं (afferent arterioles) में बंट जाती है, जो रक्त को फिल्टर होने (छनने) के स्थानों (ग्लोमेरुलाइ) तक पहुंचाने का कार्य करती है।

      हर अभिवाही धमनिका (आर्टीरियोल) कोशिकाओं के कुण्डल के आकार गुच्छे बनाने के लिए बंट जाती है, इन्हें कोशिका गुच्छ (Glomerulus) कहा जाता है और यही रक्त को छानने (filter) का कार्य करता है। कुण्डलाकार गुच्छ (Glomerulus) कोशिकाएं दुबारा आपस में मिलकर, अपवाही धमनिका (efferent arteriole) का निर्माण करती है, जो रक्त को गुच्छ (Glomerulus) से ले जाती है अपवाही धमनिका अभिवाही धमनिका से संकरी होती है, जिससे गुच्छ (Glomerulus) में रक्त का दाब अधिक हो जाता है जो रक्त के छनने के लिए जरूरी होता है।

      अपवाही धमनिका बाहर निकलने के बाद दुबारा विभाजित होकर दूसरा सघन कोशिका जाल (second capillary bed) बना लेती है (पहला कोशिका जाल गुच्छ (Glomerulus) होता है), जो नलिकाओं के चारों ओर की कोशिकाओं (peritubular capillaries) का बना होता है। गुच्छ (Glomerulus) में रक्त से छनकर आये जल एवं दूसरे उपयोगी पदार्थों में से कुछ मात्रा वृक्कीय (गुर्दे) नलिकाओं द्वारा पुनरवशोषण (reabsorb) करने के बाद, ये उत्पाद पेरिट्ब्युलर कोशिकाओं में पहुंच जाते हैं। पेरिट्ब्युलर कोशिकाएं आपस में मिलकर इंटरलोब्युलर शिराओं (interlobular veins) की रचना करती है, जो रक्त को कॉर्टेक्स से चापी शिराओं (arcuate veins) में पहुंचाती है। छोटी-छोटी चापी शिराएं आपस में मिलकर वृक्कीय (गुर्दे) स्तम्भों में बड़ी इंटरलोबर शिराएं (interlobar veins) बनाती हैं, जो एकसाथ मिलकर एक वृक्कीय (गुर्दे) शिरा (renal vein) बनाती है तथा रक्त को हर गुर्दे से निम्न महाशिरा (inferior vena cava) में पहुंचाती है।

       अपवाही धमनिकाएं (efferent arterioles) आगे चलकर सीधी धमनियों (arteriae rectae) में बदल जाती है जो नेफ्रोन के लूप या लूप ऑफ हेनले (loop of henle) को घेरकर रहती है। यह मेड्यूला में पहुंचकर बड़ी शिरा (venaerecta) में खुलती है तथा रक्त को इंटरलोब्यूलर शिराओं में पहुंचाती है। इन वाहिकाओं में होकर सारे वृक्कीय (गुर्दे) रक्त का केवल लगभग 1 या 2 प्रतिशत रक्त बहता (flow) है। इन वाहिकाओं को सामूहिक रूप से ऋज-वाहिका या वासा रेक्टा (vasa recta) कहा जाता है।

वृक्काणु (Nephron)- हर गुर्दे में लगभग 10 लाख वृक्काणु (Nephron) होते हैं जिनमें से हर वृक्काणु मूत्र बनाने वाला एक स्वतंत्र इकाई होता है। इन्हें केवल सूक्ष्मदर्शी के द्वारा ही देखा जा सकता है। गुर्दे के कार्यात्मक इकाई के रूप में वृक्काणु रक्त का प्रारम्भिक निस्यन्दन (filtration) पूर्ण करके, निस्यन्द से उन पदार्थों का दुबारा अवशोषण कर लेते हैं जो शरीर के लिए उपयोगी होते हैं (selective reabsorption) तथा व्यर्थ पदार्थ मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं।

वृक्काणु दो प्रकार के होते हैं- कॉर्टिकल (cortical) और जक्स्टामेड्यूलरी (juxtamedullary)। कॉर्टिकल वृक्काणु कॉर्टेक्स के शुरुआती दो तिहाई भाग में रहते हैं जिनकी नलिकीय संरचनाएं केवल मेड्यूला के वृक्कीय पिरामिड के आधार तक होती है जबकि जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु के लम्बे लूप वृक्कीय पिरामिड की गहराई में निकले रहते हैं। कॉर्टिकल वृक्काणु जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु की अपेक्षा लगभग सात गुने अधिक होते हैं। सामान्य अवस्थाओं में (under normal conditions) गुर्दों का कार्य, कॉर्टिकल वृक्काणु में होता रहता है लेकिन जक्स्टामेड्यूलरी वृक्काणु दबाव (conditions of stress) अधिक होने की स्थितियों में ही सक्रिय होते हैं।

हर वृक्काणु के निम्न दो मुख्य भाग होते हैं-

  1. कोशिकागुच्छीय या बोमैंस सम्पुट (Glomerular or Bowman’s capsule),
  2. वृक्कीय (गुर्दे) नलिका (Renal tubule)।

1- कोशिकागुच्छीय या बोमैंस सम्पुट (Glomerular or bowman’s capsule)- यह वृक्काणु का शुरुआती प्यालेनुमा फैला हुआ भाग होता है जो कोशिकागुच्छ (glomeurlus) को घेरे हुए रहता है। सम्पुट (capsule) और गुच्छ (ग्लोमेरुलस) दोनों मिलकर वृक्कीय या मेल्पीघियन कॉर्पुसल (Renal or malpighian carpuscle) बनाते हैं। गुच्छ (ग्लोमेरुलस)  कैप्सूल हमेशा गुर्दे के कॉर्टेक्स में स्थित रहता है। इसकी आतंरिक एवं बाह्य भित्तियां एक गुहा बनाती है जिसे ‘सम्पुटीय अवकाश (खाली स्थान)’ (capsular space) कहा जाता है। गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल की बाहरी ‘पार्श्विक परत’ (parietal layer) सिम्पल स्क्वेमस इपीथिलियल कोशिकाओं की बनी होती है, जो वृक्कीय नलिका में विलीन हो जाती है, तथा आतंरिक ‘अंतरांगी परत’ (visceral layer) विशिष्ट इपीथीलियल कोशिकाओं (इन्हें पोडोसाइट्स (podocytes) कहा जाता है) से बनी होती है जो गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कोशिकाओं को ढककर रहती है।

रक्त का निस्यन्दन (filtration) वृक्कीय (गुर्दे) कॉर्पुसल में तीन परतों से होकर होता है-

  • इसकी पहली परत गुच्छ (ग्लोमेरुलस) की एण्डोथीलियम होती है। इसमें सूक्ष्म छिद्र होते हैं जिन्हें फेनेस्ट्रेशन्स (fenestrations) कहा जाता हैं।
  • इसकी बीच की परत गुच्छ (ग्लोमेरुलस) की आधारी कला (basement membrane) होती है।
  • इसकी तीसरी परत गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल और पोडोसाइड्स की अंतरांगी (विसरल) परत होती है। पोडोसाइट्स केंद्रक मय अपेक्षाकृत बड़ी कोशिकाएं होती है, जिनमें से कुछ प्रक्षेप (processes) निकले रहते हैं। ये प्रक्षेप बहुत से छोटे, अंगुलियों के समान शाखाओं में बंट जाते हैं जिन्हें ‘पादपवर्ध’ (foot processes) (pedicels) कहते हैं। ‘पादपवर्ध’ (पेडिसेल्ज) पोडोसाइट्स के ही अंश होते हैं जो गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कोशिकाओं के सम्पर्क में रहते हैं। पेडिसेल्ज के बीच का छोटा-सा क्षेत्र नीचे की आधारी कला को खुला छोड़ देता है, जिसे ‘निस्यन्दक ददार’ (filteration slit) कहते हैं। चिपकी हुई पोडोसाइट कोशिकाओं की पेडिसेल्ज के बीच एक पतली स्लिट झिल्ली (मेम्ब्रेन) रहती है जो फिल्ट्रेशन स्लिट में होकर कुछ विशेष अणुओं को जाने से रोकती है लेकिन दूसरे तत्वों को जाने देती है। इसे फिल्ट्रेशन बेरियर (filtration barrier) कहा जाता है तथा यह छिद्रिल एण्डोथीलियम (fenestrated endothelium) आधारी कला (basement membrane) और निस्यन्दक ददारों (filtration slits) से बना होता है।

      सामूहिक रूप से वृक्कीय (गुर्दे) कॉर्पसल की तीनों परतें मिलकर ‘सम्पुटीय कला’ (capsular membrane) बनाती है। निस्यन्दन (छनने) की प्रक्रिया पूरी कला में होती है। इस कला से होकर रक्त के कोशिकीय घटक और बड़े प्रोटीन्स अणु सामान्यतः गुजर नहीं पाते हैं लेकिन जल तथा घुले हुए लवण (इलेक्ट्रोलाइट्स, ग्लूकोज, यूरिया, अमीनो एसिड्स एवं पॉलीपेप्टाइड्स) रक्त से छनकर गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल के सम्पुटीय अवकाश (capsular space) में पहुंच जाते हैं। रक्त छना हुआ यह तरल कोशिका गुच्छीय निस्यन्द (glomerular filtrate) कहलाता है।

वृक्कीय (गुर्दे) नलिका (Renal tubule)- यह गुच्छ (ग्लोमेरुलस) या बोमैंस कैप्सूल की निरंतरता में स्थित होती है।

इसके निम्न चार भाग होते हैं-

  • समीपस्थ संवलित नलिका (Proximal convoluted tubule)
  • हेनले का लूप (Loop of henle)
  • दूरस्थ संवलित नलिका (Distal convoluted tubule)
  • संग्राही नलिका (Collecting duct)

समीपस्थ संवलित नलिका (Proximal convoluted tubule)- वृक्कीय (गुर्दे) नलिका का यह भाग गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल के पास स्थित होता है तथा यह ऐंठा हुआ, कुण्डलाकार दिखाई देता है। गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल से इसी भाग में ग्लोमेरुलर निस्यन्द (Filtrate) पहुंचता है।

     यह नलिका घनाकार उपकला कोशिकाओं की बनी होती है तथा इसकी अंदरूनी परत सूक्ष्म अंकुरों (microville) से अस्तरित रहती है जो ब्रुश बॉर्डर बनाते हैं। ये अवशोषण की क्रिया के लिए उपकलीय परत का क्षेत्रफल बढ़ा देते हैं। वृक्कीय (गुर्दे) नलिका के इस भाग में गुच्छ (ग्लोमेरुलस) निस्यन्द से बहुत से पदार्थों जैसे- जल, इलेक्ट्रोलाइट्स, ग्लूकोज तथा कुछ अमीनो एसिड्स एवं पॉलीपेप्टाइड्स का पुर्न अवशोषण होता है।

हेनले का लूप (Loop of henle or of the Nephron)- यह समीपस्थ कुण्डलाकार नलिका की निरंतरता में, अंग्रेजी के अक्षर यू के आकार का भाग होता है। इसमें आरोही (ascending) और अवरोही (descending) दो भुजाएं होती है जो घनाकार उपकला (cuboidal epithelium) से बनी होती है। अवरोही (पतली) भुजा गुर्दे के मेड्यूला में धंसी रहती है तथा अधिक संकरी हो जाती है। इस स्थान पर यह ऊपर की ओर U मोड़ लेकर बढ़ती है तथा दुबारा चौड़ी हो जाती है। यह आरोही (मोटी) भुजा मेड्यूला से गुजरकर कॉर्टेक्स में पहुंच जाती है।

दूरस्थ संवलित नलिका (Distal convoluted tubule)- वृक्कीय (गुर्दे) नलिका का यह ऐंठा हुआ भाग गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल से दूर स्थित होता है तथा समीपस्थ नालिका के समान घनाकार उपकला कोशिकाओं से बना होता है लेकिन इसकी अंदरूनी सतह (lumen) पर सूक्ष्म अंकुर (microvilli) बहुत ही कम होते हैं।

संग्राही नलिका (Collecting duct)- यह वृक्कीय (गुर्दे) नलिका का अंतिम चौड़ा भाग होता है, जिसमें गुच्छ (ग्लोमेरुलस) निस्यन्द (filtrate) आकर जमा होता है।

संग्राही नलिका दो तरह की उपकला कोशिकाओं से अस्तरित होती है-

  • हल्की कोशिका (light cell)- इनके शिखर पर सूक्ष्म अंकुर और सिलिया होते हैं।
  • गहरी कोशिका (dark cell)- इनके शिखर पर अनियमित (टेढ़े-मेढ़े) फ्लेप्स होते हैं। अलग-अलग नेफ्रॉन्स की दूरस्थ नलिकाएं एक संग्राही नलिका में खुलती है जो मेड्यूला से होकर, लगभग वृक्काणु के लूप की भुजाओं के समानान्तर गुजरती है। संग्राही नलिकाएं एक-दूसरे के साथ जुड़कर बड़ी-बड़ी नलिकाएं (tubes) बनाती है। इन्हें ‘डक्ट ऑफ बेलिनी’ (duct of bellini) कहा जाता है और ये लघु आलवाल (minor calyx) तक पहुंचती है, जहां से अंतिम निस्यन्द (filtrate) (जिसे अब मूत्र कहा जाता है), वृक्कीय श्रोणि में पहुंचता है, जो मूत्र को मूत्रनलिका (ureter) एवं इसके बाद मूत्राशय में पहुंचाता है।

जक्स्टाग्लोमेरुलर एपरेटस (juxtaglomerular apparatus)- कॉर्टेक्स में, दूरस्थ सवंलित नलिका गुच्छ (ग्लोमेरुलस) की अभिवाही (afferent) और अपवाही (efferent) धमनिकाओं के साथ अंतरंग सम्पर्क बनाती है। यहां धमनिकाओं की मध्यवर्ती परत (tunica media) की चिकनी पेशी कोशिकाओं में जीवद्रव्य (cytoplasm) रहता है, जिसमें पेशी तंतुओं (myofilaments) से ज्यादा ग्रेन्यूल्स रहते हैं। इन विशेष चिकनी पेशी कोशिकाओं को ‘जक्स्टाग्लोमेरुलर कोशिकाएं’ कहते हैं- ये कोशिकाएं दूरस्थ नलिका की उपकला कोशिकाओं के समूह के सम्पर्क में व्यवस्थित रहती है जिसे ‘मेक्यूला डेंसा’ (macula densa) अर्थात सघन स्थान (densespot) कहा जाता है। मेक्यूला डेन्सा की कोशिकाएं दूरस्थ नलिका की उपकला कोशिकाओं से लम्बी तथा संकरी होती है तथा इनके केंद्रक (nuclei) पास-पास सटे होते हैं।

     जक्स्टाग्लोमेरुलर कोशिकाएं, मेक्यूला डेन्सा तथा अभिवाही और अपवाही धमनिकाएं आपस में मिलकर जक्स्टाग्लोमेरुलर एपरेटस की रचना करती है, जो रेनिन (renin) नामक एन्जाइम का स्रोत (source) होता है तथा रक्तदाब (blood pressure) के नियमन में सहायता करता है।

गुर्दों के कार्य (function of kidneys)- गुर्दों का मुख्य कार्य रक्त को छानना तथा छने हुए तरल से शरीर के लिए उपयोगी और जरूरी पदार्थों का दुबारा अवशोषण करके मूत्र का निर्माण करना है।

मूत्र का निर्माण करने के अलावा ये निम्नलिखित कार्य भी करते हैं-

  • ये भोजन के चयापचय के आखिरी उत्पाद- जल, यूरिया और यूरिक एसिड को बाहर निकालने के साथ ही शरीर में प्रविष्ट हानिकारक औषधियों, विषों तथा रासायनिक पदार्थों को भी शरीर से बाहर निकालते हैं।
  • ये शरीर में जल और इलेक्ट्रोलाइट्स का संतुलन बनाए रखते हैं।
  • पूरे शरीर में जल संतुलन का नियमन करके, रक्त के प्लाज्मा आयतन को स्थिर बनाए रखते हैं।
  • ये रक्त के और शरीर के बाकी तरलों (बर्हिकोशिकीय द्रव) के रासायनिक संगठन (chemical compostion) को नियंत्रण में रखते हैं।
  • ये शरीर में अम्ल-क्षार संतुलन को नियंत्रित रखते हैं।
  • ये शरीर में स्थित तरल के परासरणी दाब (osmotic pressure of fluid) को बनाए रखने में मदद करते हैं।
  • ये अमोनिया पैदा कर शरीर में रक्त का हाइड्रोजन आयतन सांद्रण स्थिर रखते हैं।
  • ये शरीर के तरलों की मात्रा, उनकी तानता और प्रतिक्रिया को नियंत्रित करते हैं।
  • ये रेनिन (rennin) नामक एन्जाइम को पैदा करते हैं जो रक्तदाब (blood pressure) का नियमन करने में मदद करता है।

मूत्र का निर्माण (Formation of Urine)- मूत्र को बनाने में गुर्दे तीन प्रक्रियाओं का प्रयोग करते हैं-

  • कोशिका गुच्छीय निस्यन्दन (Glomerular filtration)
  • नलिकीय पुनरवशोषण (Tubular reabsorption),
  • नलिकीय स्त्रावण (Tubular secretion)।

कोशिका गुच्छीय निस्यनद्न (Glomerular filtration)- गुच्छ (ग्लोमेरुलस) एक निस्यन्दक (filter) के रूप में कार्य करता है। जब रक्त अभिवाही धमनिका (afferent arteriole) से गुच्छ (ग्लोमेरुलस) में से होकर बहता है तो इसका दबाव अधिक होता है (लगभग 75 mm Hg)। इस दबाव से रक्त प्लाज्मा का कुछ भाग गुच्छ (ग्लोमेरुलस) कैप्सूल में पहुंच जाता है लेकिन रक्त कोशिकाएं और प्लाज्मा प्रोटीन्स के बड़े अणु गुच्छ (ग्लोमेरुलस) के अंदर ही रह जाते हैं क्योंकि ये कैप्सूल की अर्द्धपारगम्य भित्तियों के छिद्रों से होकर गुजर नहीं पाते हैं। इस प्रक्रिया को ‘गुच्छ (ग्लोमेरुलस) निस्यन्दन या फिल्ट्रेशन’ कहते हैं तथा उत्पन्न हुए द्रव को गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द या फिल्ट्रेट कहते हैं।

नलिकीय पुनरवशोषण (Tubular reabsorption)- छनकर आया हुआ द्रव (ग्लोमेरुलर निस्यन्द) फिर वृक्काणुओं या वृक्कीय (गुर्दे) नलिकाओं से होकर गुजरता है तो शरीर के लिए उपयोगी पदार्थों जैसे- जल, सोडियम, आयन्स, ग्लूकोज तथा अमीनो एसिड्स का वृक्काणु नलिकाओं की कोशिकाओं द्वारा पुर्नवशोषण हो जाता है तथा शरीर की चयापचयी क्रियाओं के दौरान उत्पन्न तथा रक्त में जमा विषैले पदार्थ, जैसे- यूरिया, यूरिक एसिड और क्रिएटिनीन आदि का अवशोषण नहीं होता और ये मूत्र के रूप में शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया ‘नलिकीय पुर्नवशोषण’ कहलाती है।

नलिकीय स्त्रावण (Tubular secretion)- शरीर के लिए कुछ अनावश्यक आयन्स और पदार्थ परिनलिकीय कोशिकाओं के रक्त से गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द में पहुंच जाते हैं जो संवलित नलिकाओं में होकर गुजरते हैं। इस प्रकार पोटैशियम आयन्स, हाइड्रोजन आयन्स जैसे उत्पाद, कुछ औषधियां और कार्बनिक यौगिक मूत्र के साथ शरीर से बाहर निकल जाते हैं। यह प्रक्रिया नलिकीय स्त्रावण कहलाती है।

     गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द वृक्काणु (नेफ्रॉन) में होकर गुर्दे के अंदरूनी भाग मेड्यूला में तथा फिर दुबारा कॉर्टेक्स में पहुंचता है। इस प्रक्रिया में जरूरी पदार्थ जैसे- जल और ग्लूकोज का रक्त में पुनरवशोषण हो जाता है। अंत में, गुच्छ (ग्लोमेरुलर) निस्यन्द दुबारा मेड्यूला में पहुंचता है, जहां यह मूत्र कहलाता है तथा मूत्रनली से होकर मूत्राशय में पहुंच जाता है। छना हुआ रक्त दुबारा वृक्कीय शिरा द्वारा शरीर में पहुंच जाता है।