एनाटॉमी एवं फिजियोलॉजी­

Anatomy athart sharir rachana vigyan, Yah vigyan ki wah shakha hai jismen manav sharir ki rachana tatha uske vibhinn angon ke parsparik sambandhon ka adhayayan kiya jata hai.

मानव शरीर कैटेगरीज :

एनाटॉमी एवं फिजियोलॉजी­


परिचय-

फिजोयोलॉजी- फिजोयोलॉजी अर्थात शरीर-क्रिया विज्ञान। यह चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जिसमें शरीर में सम्पन्न होने वाली क्रियाओं का अध्ययन किया जाता है। शरीर क्रिया विज्ञान में मनुष्य के शरीर में मौजूद भिन्न-भिन्न अंगों (Organs) एवं तन्त्रों (Systems) के कार्यों और उन कार्यों के होने के कारणों के साथ-साथ उनसे सम्बन्धित चिकित्सा विज्ञान (Medical science) के नियमों का भी ज्ञान दिया जाता है। जैसे कान सुनने का कार्य करते है और आंखें देखने का कार्य करती है लेकिन शरीर-क्रिया विज्ञान सुनने और देखने के रहस्य का ज्ञान कराती है। ध्वनि कान के पर्दे पर किस प्रकार पंहुचती है? प्रकाश की किरणें आंखों के लेंसों पर किस प्रकार पड़ती है? वस्तुओं का चित्र आंखों के पर्दे पर कैसे बनता है? मनुष्य कैसे खाना खाता है? उसका पाचन किस प्रकार होता है? उसका आंतों की भित्तियों से अवशोषण किस प्रकार होता है? अवशोषण के बाद भोजन का स्वांगीकरण (Assimilation) किस प्रकार होता है? मनुष्य मल-मूत्र त्याग कैसे करता है? शरीर में रक्त परिसंचरण कैसे होता है? प्रजनन किस प्रकार होता है? इत्यादि का ज्ञान हमें शरीर क्रिया विज्ञान यानि फिजोयोलॉजी द्वारा प्राप्त होता है।

एनाटॉमी- एनाटॉमी अर्थात शरीर-रचना विज्ञान। यह चिकित्सा विज्ञान की वह शाखा है जिसमें मानव शरीर की रचना तथा उसके विभिन्न अंगों के पारस्परिक सम्बन्धों का अध्ययन कराया जाता है। इसे अनेकों विशिष्ट शाखाओं में बांटा जा सकता है, जिनमें से कुछ को आगे बताया जा रहा है।

ग्रौस एनाटॉमी (Gross or macroscopic anatomy)- इसमें रक्षित हुए मृत शरीर (Cadaver) का विच्छेदन कर नंगी आंखों द्वारा दिखाई देने वाली शरीर की स्थूल रचनाओं का अध्ययन किया जाता है। इसमें क्षेत्रीय शरीर रचना (Regional) अथवा सांस्थानिक शरीर रचना (Systematic) के अनुसार अध्ययन किया जा सकता है। क्षेत्रीय शरीर रचना विज्ञान (regional anatomy) में शरीर के विभिन्न भाग जैसे- सिर, छाती, भुजा या टांग आदि की मांसपेशियों, हड्डियों तथा तन्त्रिकाओं का अध्ययन किया जाता है। सांस्थानिक शरीर रचना विज्ञान (Systematic anatomy) में एकसमान कार्य करने वाली समस्त संरचनाओं जैसे पेशियों का एक इकाई के रूप में अध्ययन किया जाता है।

सर्फेस एनाटॉमी (topographic anatomy)- इसमें शरीर की परत पर मौजूद अथवा इससे सम्बन्धित संरचनाओं (Structures) का अध्ययन किया जाता है क्योंकि उनका सम्बन्ध नीचे स्थित ऊतकों एवं अंगों से होता है। उदाहरण के तौर पर जबड़े की पेशियों का सम्बन्ध चेहरे अथवा खोपड़ी से होता है, जिन्हें मुंह बंद करने पर देखा एवं अनुभव किया जा सकता है। नवजात शिशु की सतही शरीर-रचना में खोपड़ी की हड्डियों के किनारों को बच्चे के सिर के कोमल स्थान (एन्टीरियर फोन्टोनेल) पर देखा जा सकता है।

एप्लाइज एनाटॉमी (Applied anatomy)- इसका सम्बन्ध रोग निदान एवं चिकित्सा, विशेषकर शल्य-चिकित्सा से है। इसके अन्तर्गत शल्य चिकित्सक शरीर का सर्वेक्षण करने, उच्छेदन करने अथवा संरचनाओं की मरम्मत करने के मकसद से शरीर को उन्मुक्त करता है। इसे शल्य क्रियात्मक शरीर-रचना विज्ञान (Surgical anatomy) भी कहते हैं।

  • रेडियोलॉजिकल एनाटॉमी (Radiological anatomy)- इसके अंतर्गत एक्स-रे फिल्म में अंगों का आपसी सम्बन्ध देखकर उनकी शरीर रचना (Anatomical) सम्बन्धी दोषों की जांच की जाती है।
  • काइनेसियोलॉजी (Kinesiology)- इसके अंतर्गत पेशीय गतियों तथा विशेष हड्डी पर पेशियों के दबाव एवं खिंचाव का अध्ययन किया जाता है।
  • ऑस्टियोलॉजी (Osteology)- इसके अंतर्गत हड्डियों का अच्छी तरह अध्ययन किया जाता है। टूटी हुई हड्डियों को ठीक से बैठाने अथवा शरीर के अंगों को बनाने के लिए ऑर्थोपेडिक सर्जन को काइनेसियोलॉजी एवं ऑस्टियोलॉजी दोनों में माहिर होना बहुत जरूरी है।

माइक्रोस्कोपिक एनाटॉमी (Microscopic anatomy)- इसके अंतर्गत सूक्ष्मदर्शी (Microscopy) के विकास के बाद मानव शरीर की अतिसूक्ष्म संरचनाओं का अध्ययन आसानी से कर लिया जाता है। पहले इन सरंचनाओं को नंगी आंखों से नहीं देखा जा सकता था।

  • कोशिका विज्ञान (Cytology)- कोशिका विज्ञान के अन्तर्गत कोशिकाओं की उत्पत्ति, संरचना, कार्य एवं विकृति का अध्ययन किया जाता है।
  • ऊतक विज्ञान (Histolgy)- ऊतक विज्ञान में सूक्ष्मदर्शी द्वारा शरीर के ऊतकों का अध्ययन किया जाता है।
  • अंग विज्ञान (Organ logy)- अंग विज्ञान में सूक्ष्मदर्शी द्वारा प्राथमिक ऊतकों- एपीथईलियल (Epithelial), कनेक्टिव (Connective), मस्कूलर (Muscular) एवं नर्वस (Nervous) ऊतकों के सगंठन से बने शरीर के अंगों का अध्ययन किया जाता है।
  • आकृति विज्ञान (Morphology)- आकृति विज्ञान में शरीर के किसी भाग अथवा अंग की बाह्म रूप-रेखा एवं रचना का अध्ययन किया जाता है।

डेवलपमेन्टल एनाटॉमी (Developmental anatomy)- इसके अन्तर्गत गर्भाधान से लेकर युवावस्था के आरम्भ तक, होने वाले रचनात्मक बदलावों का अध्ययन किया जाता है।

  • भ्रूण-विज्ञान (Embryology)- भ्रूण-विज्ञान में भ्रूण की अवस्था में होने वाले विकास का अध्ययन किया जाता है। मनुष्य में यह अध्ययन गर्भाधान एवं भ्रूणीय जीवन के लगभग 8 सप्ताहों तक अंग-संस्थानों (Organ svstems) के शुरुआती विकास तक किया जाता है।
  • फीटल एनाटॉमी (Fetal Anatomy)- इसके अंतर्गत भ्रूण के आठ सप्ताह के होने के बाद से लेकर बच्चे के जन्म तक होने वाले अंग- संस्थानों के विकास का अध्ययन किया जाता है।
  • टेराटोलॉजी (वैरूपिकी) (Teratology)- टेराटोलॉजी डेवलपमेन्टल एनाटॉमी की ही एक शाखा है। इसके अन्तर्गत भ्रूण के असामान्य विकास का अध्ययन किया जाता है।
  • आनुवंशिकी (Genetics)- इसके अन्तर्गत जीन्स एवं गुणसूत्रों (Chromosomes) और उनका एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में स्थानान्तरण का अध्ययन किया जाता है।

न्यूरोएनाटॉमी (Neuroanatomy)- न्यूरोएनाटॉमी के अन्तर्गत तंन्त्रिका-तन्त्र का अध्ययन किया जाता है।

विकृत या विकृतिजन्य शरीर रचना विज्ञान (Morbid or Pathological anatomy)- इसके अन्तर्गत असामान्य, रोगग्रस्त अथवा क्षतिग्रस्त संरचनाओं का अध्ययन किया जाता है।

एनाटॉमी में प्रयुक्त होने वाली शब्दावली (Anatomical terminology)- शरीर रचना विज्ञान को समझने के लिए शरीर रचना वैज्ञानिकों ने खास तरह की परिभाषिक शब्दावली का निर्माण किया है, जिसका अध्ययन करना बहुत जरूरी है।

संरचनात्मक स्थिति (Anatomical position)- शरीर के खास अंगों की अवस्थिति (Location) के बारे में बताने के लिए शरीर रचना विशेषज्ञों ने एनाटॉमिकल पोजिशन को परिभाषित किया है।

एनाटॉमिकल पोजिशन के अंतर्गत शरीर बिल्कुल सीधी अवस्था में खड़ा रहता है। उसका चेहरा सामने की ओर, आंखे बिल्कुल सीध में देखती हुई, टॉगें आपस में बिल्कुल मिली हुई, भुजाएं (Arms) धड़ के दोनों तरफ लटकी हुई और हथेलियां सामने की ओर रहती है।

     सामान्य तथा अकेली रचना या अकेले अंग की खास तरह की स्थिति को ज्ञात करने के लिए नीचे लिखे पारिभाषित शब्दों का प्रयोग किया जाता है-

उच्च (Superior) या कपाल (Cranial)- सिर की ओर जैसे- टांग (Leg) पांव (Foot) से उच्च (ऊपर) मौजूद होता है।

निम्न (Inferior) या पुच्छीय (Caudal)- पैरो की ओर या पुच्छक्षेत्र जैसे पैर (Foot) टांग से निम्न (नीचे) स्थित होता है।

पूर्व (Anterior) या पेट (Ventral)- शरीर के सामने की ओर जैसे- नाक, कानों के पूर्व (पहले) मौजूद होती है।

पीछे (Posterior) या पृष्ठीय (Dorsal)- शरीर की पीठ को ओर, जैसे- कान नाक के पश्चवर्ती (पीछे) मौजूद होते हैं।

बीच में (Medial)- शरीर की बीच की रेखा (Midline) की ओर जैसे- नाक आंखों के बीच में स्थित होती है।

पार्श्विक (Lateral)- शरीर की बीच की रेखा से दूर जैसे- आंखें नाक से पार्श्विक (Lateral)- होती है।

समीपस्थ (Proximal)- शरीर के धड़ की ओर (समीप) अथवा किसी भुजा का शरीर से संलग्न सिरा जैसे- कन्धा (Shoulder) कलाई (Wrist) से समीपस्थ (Proximal) होता है।

दूरस्थ (Distal)- शरीर के धड़ से दूर अथवा किसी भुजा का संलग्न सिरा जैसे- कलाई अग्रबाहु (Forearm) के दूरस्थ होती है।

बाहरी भौतिक (External) या पृष्ठीय (Superficial)- शरीर की सतह (Surface) के समीप जैसे- पसलियां (Ribs) हृदय से अधिक पृष्ठीय (Superficial) होती है।

अंदरूनी (Internal) या गहरा (Deep)- शरीर के सतह से दूर या अन्दर जैसे हृदय पसलियां से गहरी होती है।

केन्द्रीय (Central)- शरीर के केन्द्र की ओर।

बाह्य (Peripheral)- शरीर के केन्द्रीय धुरी (Central Axis) से दूर जैसे- बाह्य तन्त्रिकाएं (Peripheral nerves) मस्तिष्क एवं सुषुम्ना रज्जु से निकलकर दूर तक फैलती है।

प्लान्टर (Plantar)- पैर की निचली परत (Undersurface of the foot)।

पार्श्विक (Parietal)- किसी शरीर गुहा (Body cavity) की भित्तियों अथवा किसी गुहा की भित्तियों को आस्तरित करने वाली कलाओं (Lining membrane) का उल्लेख करना।

आन्त्र (Visceral)- किसी अंदरूनी अंग, किसी गुहा जैसे- उदरीय गुहा, अथवा अंदरूनी अंग को आच्छादित करने वाली कला का उल्लेख करना।

उदाहरण- जब मानक एनाटॉमिकल शब्दावली में सिर की स्थिति के बारे में बताया जाएगा तो कहा जाएगा- कि ‘सिर गर्दन के सुपीरियर है’ न कि सिर गर्दन के ऊपर है। एनाटॉमी में ये शब्द जोड़ों में प्रयुक्त किए जाते है। यदि एक शब्द ‘ऊपर’ का बोध कराता है तो दूसरा ‘नीचे’ का बोध करायेगा। यदि जांघ घुटने से सुपीरियर (ऊपर) हैं तो घुटने जांघ के इन्फीरियर (नीचे) हैं।

     एन्टीरियर शब्द शरीर की परत के सामने तथा पोस्टीरियर शब्द पीछे (पीठ की ओर) के लिए प्रयुक्त किया जाता है। एन्टीरियर एवं पोस्टीरियर शब्दों के पर्यायवाची शब्द क्रमशः वेन्ट्रल (अभ्युदर) एवं डॉर्सल (पृष्ठीय) है। इन्हें शरीर के आन्तरिक अंगों के लिए प्रयुक्त किया जाता है। जैसे हृदय स्टर्नम के डॉर्सल (पीछे स्थित) होता है तथा स्टर्नम की डॉर्सल सतह हृदय की वेन्ट्रल होती है।

मीडियल शब्द शरीर की अथवा किसी भाग की काल्पनिक मध्यरेखा के समीप तथा लेटरल शब्द मध्यरेखा से दूर के लिए प्रयुक्त किया जाता है जैसे- नाक आंखों के मीडियल तथा आंख नाक के लेटरल होती है।

     प्रोक्जि़मल तथा डिस्टल शब्द अक्सर शरीर की भुजाओं, जैसे बांहें, टांगें तथा अंगुलियों के लिए प्रयुक्त होते हैं। प्रोक्जि़मल शब्द शरीर के धड़ के समीपस्थ (भुजा के जुडे हुए सिरे की ओर) तथा डिस्टल शब्द धड़ से दूरस्थ (भुजा के जुड़े हुए सिर से दूर) सम्बन्ध बताने के लिए प्रयुक्त किया जाता है। उदाहरण के लिए कन्धा कलाई के प्रोक्जिमल तथा कलाई अग्रबाहु के डिस्टल है।

     सुपरफिशियल शब्द का अर्थ है शरीर की परत के समीप (उपरिस्थ) तथा डीप शब्द का अर्थ है सतह से दूर (गहराई में स्थित)। एक्सटरनल (External) शब्द का अर्थ है बाहर (बाह्म) एवं इन्टरनल (Internal) का अन्दर (आभ्यंतर); एक्सटरनल एवं इन्टरनल शब्द सुपरफीशियल एवं डीप शब्दों के समान नहीं है। ये खोखली रचनाओं में अन्य रचनाओं के सम्बन्ध को बताते हैं। सामान्यतः ये शब्द सिर, वक्ष एवं पेट तथा दूसरे अंदरूनी अंगों की भित्तियों के लिए प्रयोग किए जाते हैं। उदाहरण के लिए- पसलियों का जो पार्श्व (Side) वक्ष गुहा की ओर होता है, वह इन्टरनल सर्फेस अर्थात आभ्यन्तर तल तथा जो पार्श्व वक्ष-गुहा से दूर, बाहर की ओर होता है वह एक्सटरनल सर्फेस अर्थात बाह्म तल कहलाता है।

     पैर के निचले तलवे को प्लान्टर तल तथा पैर के ऊपरी तल (Upper surface) को डॉर्सल तल कहा जाता है। हाथ की हथेलियों को पामर (करतल) तथा हाथ के पश्चवर्ती तल को डॉर्सल (पृष्ठीय) तल कहा जाता है।

शरीर के क्षेत्र (Body regions)- शरीर के सामान्य क्षेत्रों का वर्णन करने के लिए शरीर को एनाटॉर्मिकल पॉजीशन में रखकर, अक्षीय (Axial) एवं उपांगीय (Appendicular) भागों में बांट दिया जाता है। अक्षीय भाग में सिर (Head), गर्दन (Neck), छाती (Thorax), पेट (Stomach) एवं श्रोणि (Pelvis); तथा उपांगीय भाग में ऊर्ध्वांग- कन्धे, बाहु, अग्रबाहु, कलाई एवं हाथ तथा निम्नांग- कूल्हे, जांघ, टांगे, टखने तथा पैर (पाद) शामिल होते हैं।

     प्रथानुसार- उदर-क्षेत्र (Abdominal region) दो क्षैतिज (Horizontal) एवं दो अनुलम्ब (Vertical) रेखाओं द्वारा काल्पनिक रूप से 9 भागों में बंटा रहता है।

  1. दायां अधःपर्शुकीय प्रदेश (Right hypochondriac region),
  2. अधिजठरीय प्रदेश (Epigastric region),
  3. बायां अधःपर्शुकीय प्रदेश (Left hypochondriac region)
  4. दायां कटि प्रदेश (Right lumbar region),
  5. नाभि प्रदेश (Umbilical region),
  6. बायां कटि प्रदेश (left lumbar region),
  7. दायां श्रोणिफलकीय प्रदेश  (Right iliac region),
  8. अधोजठरीय प्रदेश (hypo gastric region),
  9. बायां श्रोणिफलकीय प्रदेश (Left iliac region)।

ऊपर की क्षैतिज रेखा स्टर्नम के जीफॉयड प्रवर्ध और नाभि के बीच से होकर गुजरती है तथा नीचे की क्षैतिज रेखा दोनों इलियक हड्डियों के सिरों (Crests) पर एन्टीरियर सुपीरियर इलियक स्पाइन से लगभग 2 इंच पीछे ट्यूबरकिल्स के स्तर पर मौजूद होती है। अनुलम्ब रेखाएं दोनों ओर एन्टीरियर सुपीरियर इलियक स्पाइन एवं सिम्फाइसिस प्यूबिस के बीच में खींची गयी रेखाएं होती है। इससे पेट में मौजूद रचनाओं एवं अंगों की स्थितियों का ठीक से पता चल जाता है और उदरीय अंगों का वर्णन उनकी विभाजनों में स्थिति के अनुसार किया जाता है।

शरीर के तल या काट (Body planes or sections)- शरीर के खास क्षेत्रों को और ज्यादा पहचानने के लिए शरीर को काल्पनिक समतल तलों द्वारा बांटा जाता है।

मध्यवर्ती तल (Midsagittal plane)- मध्यवर्ती तल शरीर को, शरीर की काल्पनिक मध्य रेखा के लम्बवत अर्थात ऊपर से नीचे दायें-बायें दो बराबर भागों (Sections) में बांट देता है। यदि लम्बवत तल मध्य रेखा से हटकर (समान्तर) हो तथा शरीर को असमान दायें-बायें भागों में बांट दे तो, यह समान्तर तल (Sagittal plane) कहा जाता है। मध्यवर्ती तल के समकोण पर सभी लम्बवत् तल फ्रन्टल या कॉरोनल तल (Frontal or coronal planes) कहलाते हैं, जिनसे शरीर दो असमान अग्र (Anterior) एवं पश्च (Posterior) भागों में बंट जाता है। मध्यवर्ती एवं फ्रन्टल दोनों तलों के समकोणों पर शरीर को अनुप्रस्थ या आड़ा काटने वाले तल को अऩुप्रस्थ या क्षैतिज तल (Transverse of horizontal plane) कहा जाता है। इससे शरीर ऊपरी (Superior) एवं निचले (Inferior) भागों में बंट जाता है। अनुप्रस्थ काट (Transverse section) से शऱीर समान भागों में बंटता नहीं है।

     ऊतक विज्ञान (Histology) में भी तलों या काटों (Planes or sections) का प्रयोग किया जाता है, जिसमें ऊतकों को लम्बवत् (Longitudinal), अनुप्रस्थ या आड़े (Transverse of cross) एवं तिरछे (Oblique) तलों से काटा जाता है।

शरीर की गुहाएं (Body Cavities)- शरीर की गुहाएं शरीर के अक्षीय भाग के अन्दर स्थित होती है। जिनके अन्दर अन्तरांग (Viscera) अथवा तरल (Fluid) मौजूद रहते हैं। शरीर में दो मुख्य गुहाएं होती है- अभ्युदरीय (Ventral) एवं पृष्ठीय (Dorsal) गुहाएं। हर गुहा छोटी-छोटी गुहाओं में बंटी रहती है।

     अभ्युदरीय गुहा (ventral cavity) धड़ में मौजूद रहती है तथा मध्यत्छद (Diaphragm) द्वारा निम्न गुहाओं में बंटी होती है-

  • वक्षीय गुहा (Thoracic cavity)
  • उदर-श्रोणिगत गुहा (Abdominopelvic cavity)

पृष्ठीय गुहा (Dorsal cavity) में निम्न गुहाएं होती है-

  • कपालीय गुहा (Cranial cavity)
  • स्पाइनल गुहा (Spinal or vertebral cavity)

1.- वक्षीय गुहा (Thoracic cavity)- वक्षीय गुहा धड़ के सुपीरियर (ऊपरी) भाग में स्थित होती है। यह पसलियों के पिंजरे (Rib cage) एवं इससे सम्बद्ध पेशियों से घिरी हुई होती है। इसमें आगे स्टर्नम तथा पीछे 12 वक्षीय कशेरूकाएं (Thoracic vertebrae) एवं कशेरूकाओं के बीच में स्थित अन्तराकशेरूक चक्रिकाएं (Intervertebral discs) होती है तथा बगल (Side) में अन्तरापर्शुकी पेशियां (Intercostal muscles) होती है।

     इसमें दायीं एवं बायीं ओर फुफ्फुसीय गुहाएं (Pleural cavities) होती है, जिनमें हर एक में फुफ्फुस या फेफड़ा स्थित होता है तथा फेफड़ों के बीच के स्थान में मध्यास्थानिका (Mediastinum) होता है, जो दोनों फेफड़ों को अलग-अलग करता है। मध्यास्थानिका (Mediastinum) में हृदय एवं इससे सम्बद्धित रक्त वाहिकाएं- महाधमनी (Aorta), उर्ध्व एवं निम्न महाशिरा (Superior and inferior vena cava), ग्रासनली (Oesophagus), श्वास-प्रणाली (trachea), थाइमस ग्रन्थि (Thymus gland), लसीका पर्व (Lymph nodes), थोरेसिक डक्ट, फ्रेनिक एवं वेगस तन्त्रिकाएं (nerves) पाई जाती है। परिहृदीय गुहा (Pericardial cavity) जो हृदय के चारों ओर होती है।

     हृदय एवं परिहृदीय गुहा दो भित्ति (Membrane) वाली थैली (Sac) में बंद होते है। इसे हृदयावरण (Pericardium) कहते हैं। दोनों फेफड़ें एवं फुफ्फुसीय गुहाएं दो भित्ति वाली थैली में बंद होते है। इसे प्लूरा (Pleura) कहते हैं।

उदर श्रोणिगत गुहा (Abdominopelvic cavity)- यह शरीर की सबसे बड़ी गुहा (Cavity) होती है, जो धड़ में डायाफ्राम के नीचे (Inferior) से श्रोणि तल तक जाती है। यह श्रोणि (Pelvis) के ऊपरी किनारे (Superior margin) पर एक काल्पनिक रेखा द्वारा ऊपर की ओर उदरीय गुहा (Abdominal cavity) तथा नीचे की ओर श्रोणि-गुहा (Pelvic cavity) में बंटी होती है।

     उदरीय गुहा (Abdominal Cavity) में आगे की ओर अग्र उदरीय की पेशियां होती है। पीछे कटि-कशेरुकाएं (Lumbar vertebrae) तथा पश्च उदरीय भित्ती की पेशियां होती है। पार्श्व में नीचे की पसलियां तथा उदरीय भित्ति की पेशियों के भाग होते हैं। ऊपर डायाफ्राम होता है जो इसे वक्षीय गुहा (Thoracic cavity) से अलग करता है।

     उदरीय गुहा में पाचन संस्थान का ज्यादातर भाग-आमाशय, छोटी एवं बड़ी आंते (Intestines), यकृत (liver), पित्ताशय (Gall bladder), एवं अग्न्याशय (Pancreas) स्थित होते है। इनके अतिरिक्त प्लीहा (ureters) के ऊपरी भाग भी इस गुहा के अन्दर होते है।

     श्रोणी गुहा (Pelvic cavity) में आगे की ओर जघनास्थियां (Pubic bones) और पुच्छास्थि (Coccyx) तथा पार्श्वों में नितम्बास्थियां (Innominate bones) होती है। यह ऊपर उदर-गुहा में विलीन हो जाती है तथा नीचे श्रोणि-तल (Pelvic floor) की पेशियां होती है।

        इसके अन्दर मूत्रनलियों (ureters) के निचले भाग, मूत्राशय (urinary bladder), पाचन संस्थान के निचले भाग- सिग्मॉयड कोलन, मलाशय (rectum) तथा स्त्री एवं पुरूष के आन्तरिक जननांग (Internal reproductive organs), स्त्री में गर्भाशय (uterus), डिम्ब वाहिनियां (Fallopian  tubes), डिम्ब ग्रन्थियां (Ovaries) तथा योनि (Vagina), एवं पुरूष में काउपर ग्रन्थि, c ग्रन्थि, दो स्खलनीय वाहिनियां (Ejaculatory tubules), दो शुक्राशय (seminal vesicles), दो शुक्रवाहिनियां (Vas deferens) तथा दो शुक्र या वृषणरज्जु (spermatic cords) पाये जाते हैं।

कपालीय गुहा (cranial cavity)- इसमें मस्तिष्क मौजूद रहता है तथा इसकी सीमाएं कपालस्थियों (cranial bones) से बनी होती है। स्पाइनल या वर्टिब्रल गुहा (Spinal or vertebral cavity) में मेरू या सुषुम्ना रज्जु (Spinal cord) मौजूद रहती है।

शरीर कलाएं या झिल्लियां (Body membranes)- उपकला (Epithelial) एवं संयोजी (Connective) ऊतक की पतली, कोमल परतों को कलाएं या झिल्लियां कहा जाता है। यह शरीर की गुहाओं को फैलाती है अथवा कुछ निश्चित क्षेत्रों, संरचनाओं एवं अंगों (Organs) को एक दूसरे से अलग करती है। मुख्यतः श्लेष्मिक कला (Mucous membrane), सीरमी कला (Serous membrane) तथा श्लेष्मक कला (Synovial membrane) तीन प्रकार की कलाएं होती है।