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आंखों से सम्बन्धित रोग


आंखों से सम्बन्धित रोग

Eye related diseases


चिकित्सक के द्वारा इलाज :

परिचय-

          आंखों में विभिन्न प्रकार के रोग हो सकते हैं, जिनका इलाज आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से किया जा सकता हैं ये रोग इस प्रकार हैं-

साइनस

        स्त्री-पुरुषों को यह रोग हो जाने के कारण उनके परानासिका विवरों में पीव जमा हो जाती है। जिन साइनसों में ये पीव जमा होती हैं वे इस प्रकार हैं- फ्रंटल साइनस, नाक आंखों के बीच इमाइयल साइनस, मैक्सीलरी साइनस, तथा आंखों के बीच की रेखा स्फेनोइडल साइनस। यह रोग अधिकतर किसी तरह का संक्रमण के हो जाने के कारण या फिर सर्दी-जुकाम हो जाने के कारण होता है। इस रोग के हो जाने पर रोगी की नाक के अन्दर सूजन हो जाती है। इस प्रकार के रोग हो जाने के कारण रोगी व्यक्ति को नींद भी नहीं आती है तथा उसके शरीर में कार्य करने की शक्ति कम होने लगती है उसका ध्यान इधर-उधर भटकता रहता है।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा उपचार-

        इस रोग से पीड़ित रोगी का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा  से उपचार करने के लिए रोगी को बाईं पार्श्विक स्थिति में लिटाना चाहिए।इस रोग से पीड़ित रोगी का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा  से उपचार करने के लिए रोगी को बाईं पार्श्विक स्थिति में लिटाना चाहिए।

        फिर इसके बाद रोगी के मेरू-मज्जा (मस्तिष्क के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग) व ग्रीवा (गर्दन) क्षेत्र पर दबाव देना चाहिए। जब इस आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार इन क्षेत्रों पर दबाव देते है तो रोगी के परासंवेदी स्नायु उत्तेजित हो जाती है और नाक की श्लैष्मिक झिल्ली की रक्तसंचारण नलियों में संकुचन होने लगता है जिसके परिणाम स्वरूप सूजन ठीक हो जाता है तथा सूजन दूर होने पर नाक से सांस लेना आसान हो जाता है और रोगी को बहुत आराम मिलता है।

        इसके बाद रोगी को पीठ के बल लिटाकर उसके सिर के बीच के भाग पर, नेत्र (आंख) क्षेत्र की बाहरी सीमाओं पर, कपोलास्थि की सीमा तथा नाक के दोनों ओर के क्षेत्र पर दबाव देना चाहिए।इसके बाद रोगी को पीठ के बल लिटाकर उसके सिर के बीच के भाग पर, नेत्र (आंख) क्षेत्र की बाहरी सीमाओं पर, कपोलास्थि की सीमा तथा नाक के दोनों ओर के क्षेत्र पर दबाव देना चाहिए। इस प्रकार से रोगी का इलाज आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अंतर्गत कुछ दिनों तक करने से रोगी का यह रोग जल्दी ही ठीक हो जाता है।

आंखों के ऊपरी पलक का गिरना-

        यह रोग हो जाने के कारण व्यक्ति की आंखों की ऊपरी पलक बार-बार नीचे की ओर गिरने लगती है तथा व्यक्ति अपने माथे पर सलवटे डाल अपनी भौं को ऊंचा उठा लेता हैयह रोग हो जाने के कारण व्यक्ति की आंखों की ऊपरी पलक बार-बार नीचे की ओर गिरने लगती है तथा व्यक्ति अपने माथे पर सलवटे डाल अपनी भौं को ऊंचा उठा लेता है तथा अपनी ठोड़ी को आगे लाकर ऊपर की ओर देखने लगता है। जब रोग की अवस्था ज्यादा गंभीर हो जाती है तो व्यक्ति को अपनी पलक अपने आप ही ऊपर की ओर उठानी पड़ती है। यह रोग चेहरे के एक तरफ या दोनों तरफ की पलकों में हो सकती है। यह रोग मांसपेशियों के लकवा रोग के कारण होता है। वैसे देखा जाए तो यह रोग जन्मजात भी हो सकता है। लेकिन यह रोग किसी सदमे या अविकसित लेवाटोर मांसपेशियों के कारण भी हो सकता है। जवान पुरुषों तथा स्त्रियों में यह रोग आंखों में ज्यादा गंभीर बीमारी या पलकों की शेप बनाने के कारण होता है।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा आंखों के ऊपरी पलक का गिरने का उपचार-

        फिर उसके बाद अपनी तीन उंगलियों से तथा अंगूठे से रोगी के आंखों के पास की मांसपेशियों की पांच बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए और उसके बाद रोगी के सिर पर थोड़ा दबाव देना चाहिए।इस रोग से पीड़ित रोगी का आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार करने के लिए सबसे पहले रोगी को पीठ के बल लिटाना चाहिए। फिर उसके बाद चिकित्सक को रोगी के सिर के पीछे की ओर खड़ा होकर अपनी तर्जनी, मध्यम तथा अनामिका उंगलियों से रोगी की बंद लेवाटोर मांसपेशियों पर ठहरा हुआ दबाव देना चाहिए।

        फिर उसके बाद अपनी तीन उंगलियों से तथा अंगूठे से रोगी के आंखों के पास की मांसपेशियों की पांच बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए और उसके बाद रोगी के सिर पर थोड़ा दबाव देना चाहिए।

        चिकित्सक को रोगी की आंखों के पास दबाव देते समय एक बात का ध्यान रखना चाहिए कि उसके नेत्र गोलकों पर सीधा दबाव कभी-भी नहीं पड़ना चाहिए। रोगी की आंखों के पास कंपायमान (हाथ को कंपकपाते हुए) दबाव देना चाहिए।

कानों में घंटियों की तरह आवाज सुनाई देने लगना-

        आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार इस रोग के कारण रोगी को कानों में घंटियों की तरह आवाज सुनाई देने लगती है तथा यह आवाज कान के एक तरफ भी हो सकती है या दोनों तरफ भी लेकिन एक तरफा घंटिया बजने की बाहरी आवाज सुनाई देना, मध्य कान के रोग की अवस्था हो सकती है जबकि दो तरफ की आवाज सुनाई देना शारीरिक रोगियों से जुड़ी अवस्था हो सकती है। जब कानों में धीमी आवाज सुनाई देती है तो वह बाहरी कान की बीमारी की स्थिति हो सकती है और यदि तेज आवाज सुनाई देती है तो यह कान की अन्दरूनी रोग की अवस्था हो सकती है।

        कानों में घंटियों की तरह की आवाजें सुनाई देना, कई प्रकार के रोग हो जाने के कारण होता हैं जैसे- रजोनिवृति से सम्बन्धित रोग, आमवात, नींद न आना तथा रक्तचाप से सम्बन्धित रोग आदि। कान में कोई हानिकारक पदार्थ के चले जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है। कान की रक्त संचारण वाहिनियों में कोई दोष उत्पन्न हो जाने के कारण भी यह रोग हो सकता है।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से कानों में घंटियों की तरह की आवाज सुनाई देने वाले रोगों का उपचार-

        आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को किसी सुरक्षित स्थान जैसे कुर्सी, चारपाई या तख्ता आदि पर बैठा लेना चाहिए फिर चिकित्सक को अपने अंगूठे से रोगी के कान की मांसपेशियों के बाहरी,आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से रोगी का उपचार करने के लिए रोगी को किसी सुरक्षित स्थान जैसे कुर्सी, चारपाई या तख्ता आदि पर बैठा लेना चाहिए फिर चिकित्सक को अपने अंगूठे से रोगी के कान की मांसपेशियों के बाहरी, ऊपरी व पृष्ठा भाग के तीनों बिन्दुओं पर दबाव देना चाहिए।

        फिर चिकित्सक को अपने हाथ के अंगूठे से रोगी के कान के पास (मैस्टायउमड क्षेत्र) के दोनों बिन्दुओं पर कम से कम 5 सेकेण्ड के लिए दबाव देना चाहिए। इस प्रकार का दबाव कान के छोर पर अनेकों बार देना चाहिए।

        सबसे बाद में रोगी के कान पर 5 सेकेण्ड के लिए हथेली से दबाव देना चाहिए। यदि रोगी के दोनों कानों में घंटी बजने जैसी आवाजे सुनाई दे रही हो तो उसके दोनों कानो पर 5 सेकेण्ड के लिए हथेली से दबाव देना देना चाहिए।सबसे बाद में रोगी के कान पर 5 सेकेण्ड के लिए हथेली से दबाव देना चाहिए। यदि रोगी के दोनों कानों में घंटी बजने जैसी आवाजे सुनाई दे रही हो तो उसके दोनों कानो पर 5 सेकेण्ड के लिए हथेली से दबाव देना देना चाहिए।

        इस प्रकार से रोगी के कानों पर आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार दबाव दिया जाए तो कानों में घंटियों की तरह आवाज सुनाई देनी बंद हो जाती है।

नाक से खून निकलना (नकसीर)-

        आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार इस रोग से पीड़ित रोगी की नाक से खून बहने लगता है। नाक से खून तब बहता है जब उसके नाक पर कोई चोट लग जाए या फिर छोटा सा आघात हो जाए। वैसे यह रोग छोटे बच्चों को अधिक होता है क्योंकि छोटे बच्चों की नाक की श्लैष्मिक झिल्ली में अनगिनत छोटी-छोटी रक्त संचारण की नलिकाए होती हैं जो बहुत ही नाजुक होती है। इन नलिकाओं में जरा सा आघात हो जाने पर फट जाती है और नाक से खून बहने लगता है। नाक का अगला भाग कैसेलबैक नकसीर रोग होने का संभावित क्षेत्र होता है। यह रोग कई रोगों के हो जाने के कारण भी हो सकता हैं जैसे- उच्च रक्तचाप, धमनी काठिन्य। यह रोग स्त्रियों को मासिकस्राव में बहुत ज्यादा समस्या होने के कारण भी हो सकता है। दिमागी रक्तस्राव में कोई रोग उत्पन्न हो जाने के कारण भी यह रोग व्यक्ति हो सकता है।

नकसीर रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले किसी सुरक्षित स्थान पर बैठाना चाहिए। फिर इसके बाद उसके मेरू-मज्जा (मस्तिष्क के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग) के भाग पर दबाव देना चाहिए। आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा नकसीर रोग का उपचार-

        नकसीर रोग से पीड़ित रोगी को सबसे पहले किसी सुरक्षित स्थान पर बैठाना चाहिए। फिर इसके बाद उसके मेरू-मज्जा (मस्तिष्क के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग) के भाग पर दबाव देना चाहिए। फिर चिकित्सक को अपने बाएं हाथ से एक साफ रूमाल लेकर, उस रोगी व्यक्ति की नाक से लगा कर, अपने दाएं इस प्रकार से रोगी की नाक के आसपास के क्षेत्र तथा उसके मेरू-मज्जा भाग (मस्तिष्क के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग)  पर दबाव देने से रक्त वाहिनियां (खून बहने वाली नलियां जो शरीर में होती हैं।हाथ के अंगूठे से मेरू-मज्जा (मस्तिष्क के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग) पर दबाव देना चाहिए तथा यह दबाव कम से कम 7 सेकेण्ड तक देना चाहिए। इस क्रिया को दिन में कई बार करना चाहिए।

        इस प्रकार से रोगी की नाक के आसपास के क्षेत्र तथा उसके मेरू-मज्जा भाग (मस्तिष्क के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग)  पर दबाव देने से रक्त वाहिनियां (खून बहने वाली नलियां जो शरीर में होती हैं।) सिकुड़ती हैं और नाक से खून का निकलना रुक जाता है।

गति रूग्णता-

        आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के अनुसार यह रोग छोटी उम्र की लड़कियों को अधिक होता हैं। यह रोग अधिकतर तंरगों की ऊपर नीचे की गति, गाड़ियों, जलयानों तथा वायुयानों (हवाई जहाजों) की गति में विभिन्नता होने के कारण से होता है। इस रोग के कारण लड़कियों को चक्कर सा आना, जी मिचलना, उल्टी आना, तथा ठण्डा पसीना आदि होने लगता है। जो व्यक्ति अनिद्रा रोग से पीड़ित होता है तथा जिसकी पाचन क्रिया कमजोर होती है तथा जिसे स्नायविक अति संवेदनशीलता से सम्बन्धित कोई रोग होता है उस व्यक्ति को इस प्रकार का रोग हो सकता है।

        गति रुग्णता रोग सुनने की शक्ति, आंखों से देखने की शक्ति से जुड़ी होती है। इसलिए इस रोग से पीड़ित रोगी को वाहनों से सवारी करते समय पढ़ते-सुनने का कार्य करते रहना चाहिए उन्हे अपनी आंखों को किसी एक चीज पर टिकाकर नहीं रखना चाहिए।

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा गति रूग्णता रोग का उपचार-

        आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से गति रूग्णता रोग से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को सीधा तनकर बैठाना चाहिए। फिर उसके बाद सहारे के लिए रोगी के बाएं हाथ की हथेली को उसके सिर पर रखना चाहिए।आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से गति रूग्णता रोग से पीड़ित रोगी को ठीक करने के लिए सबसे पहले रोगी को सीधा तनकर बैठाना चाहिए। फिर उसके बाद सहारे के लिए रोगी के बाएं हाथ की हथेली को उसके सिर पर रखना चाहिए। इसके बाद रोगी के मेरू-मज्जा (सिर के पीछे रीढ़ की हड्डी के पास का भाग), पृष्ठ ग्रीवा (गर्दन के क्षेत्र) तथा पार्श्विक क्षेत्र (गर्दन का भाग) पर दबाव देना चाहिए।

        इसके बाद रोगी को पेट के बल लिटाकर उसके पीठ पर दाएं तथा बाएं ऊपरी स्कंधफलक (कंधे के ऊपर का भाग) तथा मध्य स्कंधफलक (रीढ़ की हड्डी के पास का भाग) के क्षेत्रों पर दबाव देना चाहिए तथा उसके बाद मध्य स्कंधफलक के चौथे व पांचवे बिन्दु पर जोर से दबाव देना चाहिए। इसके बाद रोगी को पीठ के बल लिटाकर रोगी के अधिजठर कोटर (रीढ़ की हड्डी के बीच का भाग) क्षेत्र पर दबाव देना चाहिए।

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