अरुचि (भूख न लगना)


अरुचि

(भूख न लगना)

(Anorexia)


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अग्निमांद्य (हाजमे की खराबी)

अजीर्ण रोग

अल्सक

अल्सर

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पाचनक्रिया का खराब होना

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पेट के अन्दर झिल्ली का जख्म

पित्त की पथरी

पेट में बाल जाना

पेट में गांठ पड़ना

गुल्म (वायु गोला)

यात्राजन्य रोग

पेट में पानी भरना (जलोदर)

जिगर की खराबी

जिगर का रोग

जिगर की बीमारी

कंकड़ या कांच खाने पर

खाने के बाद दस्त लग जाना

पेट के अन्दर की सूजन व जलन

पेट का बड़ा होना

पेट का दर्द

पेट में खून या दूध जमना

पुराना अतिसार

रक्तातिसार

संग्रहणी

शीशा खा लेने पर

उल्टी कराना

उरूस्तम्भ

परिचय­:

          आमाशय की खराब या पाचनतंत्र में गड़बड़ी उत्पन्न होने के कारण भूख लगनी कम हो जाती है। ऐसे में यदि कुछ दिनों तक इस बात पर ध्यान न दिया जाए तो भूख लगनी बिल्कुल ही बंद हो जाती है। इस रोग में रोगी को भोजन करने का मन नहीं करता चाहे कितना भी अच्छा व स्वादिष्ट भोजन क्यों न हो। इस तरह भूख न लगने को अरूचि या भूख का न लगना कहते हैं।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

हिंदी            

अरुचि।

अंग्रेजी            

Anorexia

बंगाली            

अरुचि।

कन्नड़            

अरुचि, हसिवुनास।

गुजराती  

अरुचि।

पंजाबी            

भुखनास।

मराठी            

अन्नद्वेश।

तमिल            

रुचियिण्मई, अरुचि।

तेलगू     

अरुचि।

मद्रास     

रुचियिल्लम।

उड़िया            

अरुचि।

कारण :

          जब किसी व्यक्ति को कब्ज की शिकायत होती है और लम्बे समय तक कब्ज बनी रहती है तो आंतों में जमा मल सूख जाता है जिससे पाचनतंत्र में गड़बड़ी उत्पन्न होती है और पाचनतंत्र खराब होने से भूख लगनी बंद हो जाती है। ज्यादा चिंता, डर, गुस्सा और घबराहट के कारण भी भूख समाप्त हो जाती है। कुछ समय तक ऐसी हालत बनी रहने पर भूख पूरी तरह समाप्त हो जाती है और रोगी को भोजन की खुशबू से भी अरूचि होने लगती है। कभी-कभी संक्रामक रोगों के चलते भूख नश्ट हो जाती है। जब किसी कारण से शरीर में खून की ज्यादा कमी हो जाने से रक्ताल्पता (एनीमिया) रोग हो जाता है तो रोगी की भूख समाप्त हो जाती है। रोगी को भोजन को देखकर ही घिन आने लगती है चाहे कितना भी रोगी का पसन्दीदा भोजन क्यों न हो उसका मन बिल्कुल भी खाने को नहीं करता। यकृत (जिगर) की खराबी उत्पन्न होने पर भी भूख नहीं लगती।

लक्षण :

          इस रोग में रोगी को भोजन अच्छा नहीं लगता। रोगी को अगर जबरदस्ती खाने को कहा जाए तो उसे भोजन अरुचिकर लगता है। रोगी 1 या 2 ग्रास से ज्यादा नहीं खा पाता। उसे बिना कुछ खाए-पिए खट्टी डकारे आने लगती है। कुछ भी काम करने और सीढ़ियां चढ़ने में रोगी को बहुत थकावट महसूस होती है। शरीर में कमजोरी महसूस होती है। रक्ताल्पता (एनीमिया) रोग की चिकित्सा में अगर ज्यादा देर हो जाए तो रोगी मरने की हालत में हो जाता है।

भोजन और परहेज :

  • चोकर वाले आटे की रोटिया खानी चाहिए।
  • पुराने चावल का भात खाना चाहिए।
  • दूध, नींबू, अंगूर, आम, अनार, तरबूज आदि फलों के रस पीना चाहिए।
  • पके हुए बेर, मूली, मौसमी, नींबू खाना भी काफी लाभदायक है।
  • पानी में तैरना, सुबह की सैर और व्यायाम करना भी काफी अच्छा है।
  • सड़ी-गली और बासी चीजें नही खानी चाहिए।
  • गंदा पानी नहीं पीना चाहिए।
  • गंदे स्थानों में रहना और गंदी और घृणा वाली चीजों से दूर रहना चाहिए। धूप और आग के पास अधिक नहीं रहना चाहिए।
  • भोजन के बाद एक ही स्थिति में अधिक देर तक नहीं बैठना चाहिए।
  • ज्यादा डर व गुस्सा रोगी के लिए नुकसान दायक होता है।
Anorexia

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