अमलतास


अमलतास

Pudding Pipe Tree, Cassia Fistula

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सामान्य परिचय :

         Amaltas ka ped kafi bada hota hai, jiski unchai 25-30 feet tak hoti hai. iske ped ki chal matmali aur kuch lalima liye hoti hai. अमलतास का पेड़ काफी बड़ा होता है, जिसकी ऊंचाई 25-30 फुट तक होती है। इसके पेड़ की छाल मटमैली और कुछ लालिमा लिए होती है। अमलतास का पेड़ आमतौर पर सभी जगह पाया जाता है। इसे बाग-बगीचों और घरों में सजावट के लिए भी लगाया जाता है। यह मैदानी भागों और देहरादून के जंगलों में अधिकता से मिलता है। अमलतास के पत्ते लगभग एक फुट लंबे, चिकने और जामुन के पत्तों के समान होते हैं। मार्च-अप्रैल में इसकी पत्तियां झड़ जाती हैं। फूल डेढ़ से ढाई इंच व्यास के चमकीले तथा पीले रंग के होते हैं। फूलों से आच्छादित पेड़ की शोभा देखते ही बनती है। इसके फूलों में कोई गंध नहीं होती है। अमलतास के फूल की फलियां एक से दो फुट लंबी और बेलनाकार होती हैं। कच्ची फलियां हरी और पकने पर काले रंग की सुबह पूरे वर्ष वृक्ष पर लटकती मिलती हैं। फली में 25 से 100 तक चपटे एवं हल्के पीले रंग के बीज होते हैं। इनके बीच में काला गूदा होता है, जो दवाई के काम में आता है। इसकी छाल चमड़ा रंगने और सड़ाकर रेशे को निकालकर रस्सी बनाने में प्रयुक्त होती है।

विभिन्न भाषाओं में नाम :

संस्कृत                   आरग्वध, राजवृक्ष, नृपद्रुम, हेमपुष्प।
हिंदी                       अमलतास, धनबहेड़ा।
मराठी                    बाहवा।
गुजराती                 गरमालों।
बंगाली                    सोंदाल, सोनालु।
पंजाबी                    अमलतास, निर्दनली।
तेलगू                     रेलचट्टू
कन्नड़                    कक्केमर।
अरबी                     खियारशम्बर।
द्राविड़ी                    कोन्नेभर, शक्कोनै।
असमी                    सोनास
अंग्रेजी                    पुडिंग पाइप ट्री
लैटिन                    कैसिया फिस्टुला

स्वरूप :

          मार्च, अप्रैल में अमलतास के पेड़ की पत्तियां झड़ जाती हैं। इसके बाद नई पत्तियां और पीले फूल प्राय: एक साथ ही निकलते हैं, उसके बाद फली लगती है जो डेढ़-दो फुट लम्बी, गोल और लटकी रहती है। अमलतास बेलनाकार, कठोर, एक इंच व्यास की होती है। यह कच्ची अवस्था में हरी और पकने पर लाल-काली हो जाती है। इसकी फली के अंदर का भाग (गूदा) अनेक कोष्ठों में बंटा रहता है।

गुण :

          अमलतास मधुर, प्रकृति में शीतल, भारी, स्वादिष्ट, स्निग्ध (चिकना), कफनाशक और पेट साफ करने वाला है। साथ ही यह ज्वर (बुखार), दाह (जलन), हृदय रोग, रक्तपित्त, वातरोग, दर्द, गैस, प्रमेह (वीर्य विकार) एवं मूत्ररोग नाशक है। यह गठिया रोग, गले की तकलीफ, आंतों का दर्द, रक्त की गर्मी और नेत्र रोगों में उपयोगी होता है।

रासायनिक संरचना :

          अमलतास के पत्तों और फूलों में ग्लाइकोसाइड, तने की छाल में 10 से 20 प्रतिशत टैनिन, जड़ की छाल में टैनिन के अलावा ऐन्थ्राक्विनीन, फ्लोवेफिन तथा फल के गूदे में शर्करा 60 प्रतिशत, पेक्टीन, ग्लूटीन, क्षार, भस्म और पानी होता है।

हानिकारक प्रभाव :

          अमलतास को औषधि के रूप में प्रयोग करने से पेट में दर्द तथा मरोड़ पैदा होती है, अत: इसके प्रयोग में सावधानी रखनी चाहिए।

विभिन्न रोगों में सहायक :

1. गले के रोग :

  • अमलतास की जड़ की छाल 10 ग्राम की मात्रा में लेकर उसे 200 मिलीलीटर पानी में डालकर उबालें और पकाएं। पानी एक चौथाई बचा रहने पर छान लें। इसमें से 1-1 चम्मच की मात्रा में दिन में 3 बार सेवन करने से गले की सूजन, दर्द, टांसिल में शीघ्र आराम मिलता है।
  • अमलतास की छाल (पेड़ की छाल) के काढ़े से गरारा करने पर गले की प्रदाह (जलन), ग्रंथिशोध (गले की नली में सूजन) आदि रोग ठीक हो जाते हैं।

2. बिच्छू का विष : अमलतास के बीजों को पानी में घिसकर बिच्छू के दंश वाले स्थान पर लगाने से कष्ट दूर होता है।

3. बच्चों का पेट दर्द : अमलतास के बीजों की गिरी को पानी में घिसकर नाभि के आस-पास लेप लगाने से पेट दर्द और गैस की तकलीफ में आराम मिलता है।

4. त्वचा से सम्बंधित रोग :

  • अमलतास के पत्तों को सिरके में पीसकर बनाए लेप को चर्म रोगों यानी दाद, खाज-खुजली, फोड़े-फुंसी पर लगाने से रोग दूर होता है। यह प्रयोग कम से कम तीन हफ्ते तक अवश्य करें। अमलतास के पंचांग (पत्ते, छाल, फूल, बीज और जड़) को समान मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर लेप बना लें। इस लेप को लगाने से त्वचा सम्बंधी उपरोक्त रोगों में लाभ मिलता है।
  • अमलतास, कनेर और मकोय के पत्ते बराबर मात्रा में लेकर मट्ठे के साथ पीसकर लेप बनाकर लगाने से त्वचा के रोग में आराम होता है।

5. मुखपाक (मुंह के छाले) :

  • अमलतास की गिरी को बराबर की मात्रा में धनिए के साथ पीसकर उसमें चुटकी-भर कत्था मिलाकर तैयार चूर्ण की आधा चम्मच मात्रा दिन में 2-3 बार चूसने से मुंह के छालों में आराम मिलता है।
  • फल मज्जा को धनिये के साथ पीसकर थोड़ा कत्था मिलाकर मुख में रखने से अथवा केवल गूदे को मुख में रखने से मुखपाक रोग दूर होता है।

6. वमन (उल्टी) हेतु : अमलतास के 5-6 बीज पानी में पीसकर पिलाने से हानिकारक खाई हुई चीज वमन (उल्टी) के द्वारा बाहर निकल जाती है।

7. पेशाब होना : पेशाब खुलकर होने के लिए अमलतास के बीजों की गिरी को पानी में पीसकर तैयार गाढ़े लेप को नाभि के निचले भाग (यौनांग से ऊपर) पर लगाएं।

8. कुष्ठ (कोढ़) :

  • अमलतास के पत्तों को पीसकर बना लेप अथवा अमलतास के अंकुरों के रस का लेप कुष्ठ, दाद, खाज-खुजली और विचर्चिका (खुजली) के चकत्तों पर लगाने से लाभ होगा।
  • अमलतास के पत्तों को सिरके के साथ पीसकर कुष्ठ के जख्मों पर लगाने से आराम आता है।
  • अमलतास की 15-20 पत्तियों से बना लेप कुष्ठ का नाश करता है। अमलतास की जड़ का लेप कुष्ठ रोग के कारण हुई विकृत त्वचा को हटाकर जख्म वाले स्थान को ठीक कर देता है।
  • अमलतास के पत्तों को पीसकर लेप करने से कुष्ठ, चकत्ते, दाद, खाज आदि चर्म रोगों में लाभ होता है तथा कब्ज भी दूर होती है।

9. त्वचा के चकत्तों : अमलतास के नर्म पत्तों को पीसकर लेप करना चाहिए।

10. खुजली दूर करने के लिए : अमलतास के पत्तों को छाछ में पीसकर लेप करना चाहिये और कुछ देर बाद स्नान करना चाहिए।

11. पीले प्रमेह : अमलतास की फलियों के अंदर के गूदे के आठवें भाग का काढ़ा करके पिलायें।

12. कफरोग : अमलतास के गूदे में गुड़ मिलाकर और सुपारी के बराबर गोलियां बनाकर गर्म पानी के साथ देना चाहिए।

13. रक्तपित्त :

  • अमलतास और आंवले का काढ़ा बनाकर उसमें शहद तथा शक्कर मिलाकर पिलायें। इससे दस्त होकर रक्तपित्त दूर हो जाता है।
  • अमलतास के फल मज्जा को अधिक मात्रा में लगभग 25 से 50 ग्राम में 20 ग्राम शहद और शर्करा के साथ सुबह-शाम देना रक्तपित्त में लाभकारी है।

14. गण्डमाला : अमलतास के जड़ के बारीक चूर्ण को चावल के धोये हुए पानी में मिलाकर उसका लेप करना चाहिए।

15. भिलावें की सूजन : अमलतास के पत्तों के रस का लेप करना चाहिए।

16. पतले दस्त : सोनामुखी, हरड़ और अमलतास के गूदे का काढ़ा बनाकर पिलायें। इससे पतले दस्त ठीक हो जाते हैं।

17. दस्त साफ होने के लिए : 10 ग्राम अमलतास की फलियों का गूदा और 5 ग्राम हर्र (रंगाई के काम में आने वाली) की छाल को 500 मिलीलीटर  पानी में अष्टमांश काढ़ा बनाकर उसमें शक्कर डालकर देना चाहिए।

18. बवासीर :

  • 10 ग्राम अमलतास की फलियों का गूदा, 6 ग्राम हरड़ और 10 ग्राम मुनक्का (काली द्राक्ष) को पीसकर 500 मिलीलीटर पानी में पकायें। जब यह आठवां हिस्सा शेष बचे तो उतारकर रख दें। इस काढ़े को प्रतिदिन सुबह के समय देना चाहिए। 4 दिन में ही असर दिखाई देता है। रक्त-पित्त यानी नस्कोरे फूटकर खून बहने, पेशाब साफ न होने और बुखार में भी यह काढ़ा दिया जाता है। इससे दस्त साफ होकर भूख भी लगती है।
  • अमलतास का काढ़ा बनाकर उसमें सेंधानमक और घी मिलाकर उस काढ़ा को पीने से खून का बहना बंद होता है तथा रोग ठीक होता है।
  • अमलतास का गूदा 40 ग्राम 400 मिलीलीटर  पानी के साथ मिट्टी के बर्तन में पकायें। पानी का रंग लाल होने पर उसे उतारकर छान लें और उसके पानी में सेंधानमक 6 ग्राम तथा गाय का घी 20 ग्राम मिलाकर ठण्डा करके पीयें। इसे पीने से 3 से 4 दिन में ही खूनी बवासीर में खून का गिरना बंद हो जाता है।

19. सूजन पर : अमलतास के पत्तों को सेंककर बांधने से सूजन उतरती है।

20. शरीर में सूजन : लगभग 20 ग्राम की मात्रा में अमलतास के ताजे फूल और 3 ग्राम की मात्रा में भुना हुआ सुहागा लेकर उसको हल्के गर्म पानी के साथ सुबह और शाम को देने से यकृत और प्लीहा वृद्धि के कारण पैदा होने वाली सूजन दूर हो जाती है।

21. कब्ज :

  • कब्ज पर अमलतास का चमत्कारी प्रभाव होता है। अमलतास की सूखी फली का 4 इंच लंबा टुकड़ा कूटकर 1 गिलास पानी में डाल दें। इसमें गुलाबी रंग वाले गुलाब के तीन फूल (सूखे या गीले ताजा कोई भी) तथा दो चम्मच मसाले में काम ली जाने वाली मोटी सौंफ लें। सबको पानी में 1 घंटा भिगोने के बाद इतना उबालें कि पानी आधा रह जाये। फिर इसे छानकर रात को समय गर्म ही पियें। नयी, पुरानी, गांठदार, सूखा मल, कैसी भी हो, लाभ होगा। जब तक कब्ज रहे, रोजाना पियें। लाभ होने पर बंद कर दें। जब कभी कब्ज पुन: प्रतीत हो, फिर से इसी प्रकार लें। बच्चों को आधी मात्रा में तथा शिशुओं को चौथाई मात्रा में दें। बच्चे से बूढ़े, गर्भवती स्त्रियां भी कब्ज दूर करने के लिए इसे ले सकती हैं। कब्ज में यह अच्छा लाभ करती है।
  • सप्ताह में 1 बार रात को सौंफ 3 ग्राम, अमलतास 3 ग्राम, छोटी हरड़ का मोटा चूरा 2 ग्राम, अनारदाना 5 ग्राम, 2 कप पानी में उबालें। एक कप रहने पर छानकर पीने से कब्ज दूर हो जाती है तथा वर्षा ऋतु में पेट सम्बंधी रोग नहीं होते हैं।
  • गर्मी के मौसम में अमलतास के पेड़ के गहरे पीले रंग के गुच्छेदार फूल दूर से ही दिखाई देते हैं। अमलतास के फूलों का गुलकन्द बनाकर खाने से कब्ज दूर होती है, गुलकन्द अधिक मात्रा में खाने से दस्त लग जाते हैं, जी मिचलाता है और पेट में ऐंठन होने लगती है।
  • गुलाब के सूखे फूल, सौंफ और अमलतास की गिरी बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। 1 कप पानी में 2 चम्मच चूर्ण घोलकर शाम को रख दें। रात्रि में सोने से पूर्व छानकर पीने से अगली सुबह कब्ज में राहत मिलेगी।
  • अमलतास का गूदा 50 ग्राम को 150 मिलीलीटर पानी में रोज भिगोकर रात को सोने से पहले पीसकर चीनी मिलाकर पीने से लाभ होता है।
  • 10 ग्राम अमलतास का गूदा और 10 ग्राम मुनक्का मिलाकर खाने से शौच साफ आती है और कब्ज समाप्त हो जाती है।
  • अमलतास और इमली के गूदे को पीसकर रख लें। फिर इसे सोने से पहले पीने से सुबह शौच अच्छी तरह से आती है।
  • अमलतास के फूल 4 ग्राम की मात्रा में लेकर घी में भून लें। इसे खाना खाने के बाद शाम को प्रयोग करें।
  • अमलतास की जड़ 40 ग्राम से लेकर 80 ग्राम तक रात और सुबह पानी में पीसकर पीने से शौच खुलकर आती है। यदि यह खुराक सुबह लेनी हो तो रात को खिचड़ी में अधिक घी डालकर खाने से आंतों में चिकनाई आ जाती है।
  • अमलतास के फूलों का गुलकन्द, आंत्र रोग, सूक्ष्मज्वर एवं कोष्ठबद्ध में लाभदायक है। कोमलांगी स्त्री को इसका सेवन 25 ग्राम तक रात्रि के समय कोष्ठबद्धता में कराना चाहिए।

22. विसर्प (छोटी-छोटी फुंसियों का दल बनना) :

  • अमलतास के पत्तों को पीसकर घी में मिलाकर लेप करने से विसर्प में लाभ होता है।
  • किक्किस रोग, सद्योव्रण में अमलतास के पत्तों को स्त्री के दूध या गाय के दूध में पीसकर लगाना चाहिए।

23. शिशु की फुंसियां : अमलतास के पत्तों को दूध के साथ पीसकर लेप करने से नवजात शिशु के शरीर पर होने वाली फुंसियां और छाले दूर हो जाते हैं।

24. श्वास : अमलतास की फली का गूदा पानी में उबालकर पीने से दस्त साफ होकर श्वास की रुकावट मिटती है। इससे कब्ज भी दूर हो जाती है।

25. अंडवृद्धि :

  • अमलतास की फली के 1 चम्मच गूदे को 1 कप पानी में उबालकर आधा शेष रहने पर उसमें 1 चम्मच घी मिलाकर खड़े-खड़े पीने से अंडवृद्धि में लाभ होता है।
  • 20 ग्राम अमलतास के गूदे को 100 मिलीलीटर पानी में उबाल लें, 50 मिलीलीटर पानी शेष रह जाने पर 25 ग्राम घी में मिलाकर पीने से अंडकोष की सूजन कम हो जाती है।

26. पेट दर्द :

  • पेट दर्द और गैस में अमलतास के गूदे को बच्चों की नाभि के चारों ओर लेप करने से लाभ होता है।
  • अमलतास के 25 ग्राम गूदे में थोड़ा-सा नमक मिला लें, फिर इसे गाय के पेशाब में पीसकर पेट के ऊपर लेप करने से दर्द में लाभ होता है।
  • थोड़ी-सी मात्रा में अमलतास के गूदे का प्रयोग करने से आराम होता है।
  • पेट दर्द और अफारे में अमलतास की मज्जा को पीसकर बच्चों की नाभि के चारों ओर लेप करने से लाभ होता है।
  • अमलतास के फल के गूदे को मुनक्का के साथ पीसकर लेने से पेट साफ हो जाता है।

27. पक्षाघात : अमलतास के पत्तों के रस की पक्षाघात ग्रस्त अंग पर मालिश करने से लाभ होता है।

28. लकवा (पक्षाघात-फालिस फेसियल, परालिसिस) होने पर : लगभग 10 ग्राम से 20 ग्राम अमलतास के पत्तों का रस पीने तथा चेहरे पर अच्छी तरह से नियमित रूप से मालिश करने से मुंह के लकवे में लाभ मिलता है।

29. प्लेग की गांठ : अमलतास की पकी ताजी फली का गूदा बीजों सहित पीसकर प्लेग की गांठ पर लेप करने से आराम मिलता है। प्लेग की कब्जी और बेहोशी में फली के गूदे का काढ़ा पिलाते हैं।

30. नाक की फुंसी : अमलतास के पत्ते और छाल को पीसकर नाक की छोटी-छोटी फुन्सियों पर लगाने से लाभ होता है।

31. सुप्रसव (आसानी से बच्चे का जन्म) होना : प्रसव (प्रजनन) के समय अमलतास की फली के 2 चम्मच छिलके 2 कप पानी में उबालकर उसमें शक्कर मिलाकर छानकर गर्भवती स्त्री को पिलाने से बच्चा सुख से पैदा हो जाता है।

32. प्रसव (बच्चे का जन्म आसानी से होना) : अमलतास के छिलके लगभग 20 ग्राम की मात्रा में लेकर काढ़ा बना लेते हैं। इस काढे़ का सेवन करने से बच्चे का जन्म आसानी से होता हैं।

33. प्रसव का दर्द : बच्चा पैदा होने में यदि बहुत अधिक कष्ट हो रहा हो तो अमलतास 10 ग्राम को पानी में गर्मकर थोड़ी सी शक्कर मिलाकर पीना चाहिए।

34. कंठमाला :

  • अमलतास की जड़ को चावल के पानी के साथ पीसकर सुंघाने और लेप करने से कण्ठमाला में आराम होता है।
  • अमलतास के वृक्ष की छाल के काढ़े से गरारा करने से गले की ग्रंथि (नस) की सूजन मिट जाती है।

35. अर्दित (यह एक प्रकार का वायु रोग है जिसमें रोगी का मुंह टेढ़ा हो जाता है) :

  • अमलतास के 10-15 पत्तों को गर्म करके उनकी पुल्टिस बांधने से सुन्नवात, गठिया (जोड़ों का दर्द) और अर्दित में फायदा होता है।
  • वात वाहिनियों के आघात से उत्पन्न अर्दित एवं वात रोगों में अमलतास के पत्तों का रस पिलाने से लाभ होता है।
  • अमलतास के पत्तों का रस पक्षाघात से पीड़ित स्थान पर मालिश करने से भी लाभ होता है।

36. बुखार :

  • अमलतास की फल मज्जा को पीपरामूल, हरीतकी, कुटकी, मोथा के साथ बराबर मात्रा में मिलाकर काढ़ा बनाकर पीने से दर्द, कफ, वात और बुखार में लाभ होता है। यह काढ़ा पाचक भी है।
  • अमलतास की जड़ आधा से 10 ग्राम पीसकर पीने से कब्ज दूर हो जाती है।
  • अमलतास की जड़ का बारीक चूर्ण बुखार नाशक और पौष्टिक औषधि के रूप में प्रयुक्त होता है।

37. खांसी :

  • अमलतास की गिरी 5-10 ग्राम को पानी में घोटकर उसमें तिगुना बूरा डालकर गाढ़ी चाशनी बनाकर चटाने से सूखी खांसी मिटती है।
  • अमलतास का 20 ग्राम गुलकन्द खाने से सूखी खांसी गीली खांसी में बदल जाती है।
  • 10 ग्राम अमलतास के फूल तथा 20 ग्राम गुलकन्द को मिलाकर खाने से छाती (सीने) में जमा हुआ कफ निकल जाता है तथा खांसी में बहुत लाभ मिलता है।
  • अमलतास के गूदे में गुड़ को मिलाकर सुपारी के बराबर गोलियां बनाकर पानी के साथ खाने से कफ गलकर निकल जाती है और खांसी भी नष्ट हो जाती है।

39. टॉन्सिल : कफ के कारण टॉन्सिल बढ़ने पर पानी पीने में भी जब कष्ट होता है तब इसकी जड़ की 10 ग्राम छाल को थोड़े पानी में पकाकर उसका बूंद-बूंद कर मुंह में डालते रहने से आराम होता है।

40. पित्त प्रकोप :

  • अमलतास के गूदे के 40-60 मिलीलीटर काढ़े में 5-10 ग्राम इमली का गूदा मिलाकर सुबह-सुबह पिलाने से पित्त प्रकोप में लाभ होता है। यदि रोगी को कफ की अधिकता हो तो इसमें थोड़ा निशोत का चूर्ण भी मिलाना चाहिए।
  • लाल रंग के निशोत के काढे़ के साथ अमलतास की मज्जा का कल्क मिलाकर अथवा बेल के काढ़े के साथ अमलतास की मज्जा का कल्क, नमक एवं शहद मिलाकर पित्त की प्रधानता में 10-20 ग्राम की मात्रा में पीना चाहिए।
  • अमलतास के गुदे का 40-60 मिलीलीटर काढ़ा पित्तोदर में लाभप्रद है।

41. उदावर्त (पेट की अन्तड़ियों का सही ढंग से काम करना) : 4 साल से लेकर 12 साल तक के बच्चे के पेट में यदि जलन तथा उदावर्त रोग से पीड़ित हो तो उसे अमलतास की मज्जा को 2-4 नग मुनक्का के साथ देना चाहिए।

42. उदरशुद्धि (पेट साफ) : अमलतास के 2-3 पत्तों को नमक और मिर्च मिलाकर खाने से उदर की शुद्धि होती है।

43. हारिद्रामेह : अमलतास के 10 ग्राम पत्तों को 400 मिलीलीटर पानी में पकाकर चतुर्थाश शेष काढ़े का सेवन हारिद्रामेह में लाभकारी है।

44. कोष्ठ (भोजन रखने का स्थान) शुद्धि : फली मज्जा को 5-10 ग्राम की मात्रा में गाय के 250 मिलीलीटर  गर्म दूध के साथ देने से कोष्ठ शुद्ध हो जाता है।

45. कामला (पीलिया) होने पर : अमलतास का गूदा, पीपलामूल, नागरमोथा, कुटकी तथा जंगी हरड़। सबको 5-5 ग्राम की मात्रा में लेकर एक कप पानी में उबालें। काढ़ा जब आधा कप बचा रह जाए, तो इसका सेवन करें। लगातार 15 दिनों तक इसका सेवन करने से पीलिया के रोग में लाभ होगा।

46. विरेचन (दस्त लाने वाला) :

  • अमलतास के फल का गूदा सर्वश्रेष्ठ मृदु विरेचक है। यह बुखार की अवस्था में बच्चों एवं गर्भवती महिलाओं को दिया जाता है।
  • अमलतास के फल का 15-20 ग्राम गूदे को मुनक्का के रस के साथ देने से उत्तम विरेचन होता है।

47. वातरक्त : अमलतास मूल 5-10 ग्राम को 250 मिलीलीटर दूध में उबालकर देने से वातरक्त का नाश होता है।

48. आमवात : अमलतास के 2-3 पत्तों को सरसों के तेल में भूनकर सायं के भोजन के साथ सेवन करने से आमवात में लाभ होता है।

49. दाद, खाज-खुजली :

  • अमलतास की 10-15 ग्राम जड़ के बारीक चूर्ण को दूध में उबालकर पीसकर लेप करने से जलन और दाद में लाभ होता है।
  • अमलतास के पंचाग (पत्ती, जड़, तना, फल और फूल) को पानी के अंदर पीसकर दाद खुजली और दूसरे चर्म विकारों पर लगाने से जादुई असर होता है।
  • अमलतास के पत्तों को छाछ में पीसकर दाद पर लगाने से दाद ठीक हो जाता है।
  • दाद को खुजलाकर अमलतास के पत्तों का रस लगाने से दाद ठीक हो जाता है।

50. व्रण (जख्म) होने पर : अमलतास, चमेली, करंज के पत्तों को गाय के पेशाब के साथ पीसकर लेप करें, इससे घाव, दूषित बवासीर और नाड़ी का घाव नष्ट होता है।

51. कंटकरोग (पदि्मनी) : कंटकरोग में अमलतास और नीम का 40-60 ग्राम के काढ़ा का रोजाना प्रयोग करना अच्छा होता है।

52. वात ज्वर : अमलतास का गूदा, कुटकी, हरड़, पीपलामूल और नागरमोथा को बराबर मात्रा में लेकर पिलाने से वात-कफ के बुखार से छुटकारा मिलता है।

53. दमा के लिए : अमलतास की गिरी का काढ़ा बनाकर पीने से मल त्याग होकर दमा मिट जाता है।

54. जीभ का स्वाद ठीक करना : अमलतास का गूदा 20 ग्राम को गर्म दूध 250 मिलीलीटर में मिलाकर कुल्ला करें। इससे अफीम तथा कोकिन के सेवन से खराब जीभ का स्वाद फिर से ठीक हो जाता है।

55. उल्टी कराने वाली औषधियां : अमलतास के 5 से 7 बीज लेकर उसका चूर्ण बनाकर रोगी को खिलाने से तुरंत उल्टी हो जाती है।

56. कान का बहना :

  • 100 ग्राम अमलतास के पत्तों को पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े से कान को अंदर तक धोने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है।
  • अमलतास का काढ़ा बनाकर कान में डालने से कान में से मवाद बहना ठीक हो जाता है।

57. अग्निमान्द्यता (अपच) :

  • अमलतास की जड़ को दूध में उबालकर पीयें।
  • अमलतास के 2 पत्तों को चबाकर गर्म पानी के साथ सेवन करें।

58. मधुमेह के रोग : अमलतास के थोड़े से गुदे को लेकर गर्म करें। फिर मटर के दाने के बराबर उसकी गोलियां बना लें। 2-2 गोली सुबह-शाम पानी के साथ सेवन करने से मधुमेह में आराम मिलता है।

59. जुकाम : अमलतास के गूदे को पानी में मिलाकर उसके अंदर 3 गुना शक्कर डालकर चासनी बनाकर पीने से सूखी खांसी और जुकाम ठीक हो जाता है।

60. उपदंश (सिफिलिस) :

  • अमलतास, नीम, हरड़, बहेड़ा, आंवला तथा चिरायता के काढ़े के साथ विजयसार और खैरसार मिलाकर पीने से हर तरह के उपंदश रोग मिट जाते हैं।
  • अमलतास के पेड़ की जड़ को 50 ग्राम की मात्रा में लेकर पीस लें और उपदंश के घाव पर मले इससे उपदंश में लाभ मिलेगा।
  • अमलतास का गुदा 3 ग्राम की मात्रा में रोज खाने से उपंदश लगभग 8-9 दिनों में ही ठीक हो जाता है।
  • अमलतास के बीजों को पानी के साथ पीसकर उपदंश के घाव पर लगाने से उपदंश के घाव जल्द खत्म हो जाते हैं।

61. गठिया रोग : अमलतास के पत्ते को सरसों के तेल में तलकर रखें। इन्हें भोजन के साथ खाने से घुटने का हल्का दर्द दूर होता है।

62. चालविभ्रम (लंगड़ाकर चलना) : लुढ़ककर चलने वाले रोगी को अमलतास के पत्तों का रस 100 से 200 मिलीलीटर सुबह-शाम सेवन कराने से रोग दूर होता है। इसके रस से पैरों की अच्छी तरह से मालिश भी करें। इससे रोगी का रोग ठीक होता है।

63. उरूस्तम्भ (जांघ का सुन्न होना) : अमलतास के पत्ते को बांधने से जांघ का सुन्न होना दूर हो जाता है। इससे शरीर के दूसरे अंग का सुन्न होना भी दूर हो जाता है।

64. नाखून की खुजली : अमलतास के अंकुरों के रस का लेप नाखूनों पर करने से रोगी के नाखूनों की खुजली दूर हो जाती है।

65. चेहरे के लकवे के लिए : 10 से 20 मिलीलीटर अमलतास के पत्तों का रस रोगी को सुबह और शाम पिलायें इसके साथ ही इसी रस से चेहरे की मांसपेशियों पर दिन और रात को लगातार मालिश करते रहने से जरूर लाभ होगा।

66. शरीर का सुन्न पड़ जाना : अमलतास के पत्ते सुन्न पर अंगों पर बांधने से शरीर का सुन्न होना दूर हो जाता है।

67. डब्बा रोग (बच्चों की पसलियों का चलना) : अमलतास की एक फली लेकर उसे जला लें और बारीक पीसकर शीशी में भरकर रख लें। जब बच्चे की पसली चल रही हो तो उस समय 1 चुटकी चूर्ण चटा दें। जल्दी आराम मिल जायेगा।

68. चेहरे के दाग : अमलतास के मुलायम पत्तों को पीसकर चेहरे पर लेप करने से चेहरे के सारे काले दाग समाप्त हो जाते हैं।

69. जलने पर : अमलतास के पत्तों को पानी के साथ पीसकर शरीर के जले हुए भाग पर लगाने से आराम आ जाता है।

70. त्वचा का सूजकर मोटा और सख्त हो जाने पर : भिलावे की वजह से त्वचा में सूजन पैदा हो जाने पर अमलतास के पत्तों का रस लगाने से त्वचा की सूजन ठीक हो जाती है।

71. कण्ठ रोहिणी के लिए : अमलतास के पेड़ की छाल या उसकी जड़ को पानी से साफ करने के बाद पानी में काफी देर तक उबालकर और छानकर बच्चे को कुल्ला कराने से बहुत आराम आता है।

72. नाड़ी का घाव : अमलतास, हल्दी और मंजीठ बराबर मात्रा में लेकर उसे अच्छी तरह से पीस लें। उस पिसी हुई पेस्ट से बत्ती बनाकर नाड़ी के घाव पर रखने से सभी कारणों से उत्पन्न नाड़ी के घाव में लाभ होता है।

73. बालरोगों पर औषधि : अमलतास की जड़ को बारीक पीसकर पानी में मिलाकर गलगण्ड (घेंघा) तथा गण्डमाला (गले की गांठों) पर लेप करने से दोनों रोग ठीक हो जाते हैं।

74. कंठपेशियों का पक्षाघात : 10 से 20 मिलीलीटर अमलतास के पत्तों का रस सुबह और शाम पिलाने और उसी पत्तों के रस से कण्ठपेशियों (गले की नसों) पर मालिश करने से बहुत आराम आता है।