अन्य जोड़ और गतियां


अन्य जोड़ और गतियां

(Pivot joints)


घुमावदार जोड़ (pivot joints)- स प्रकार के जोड़ों मे सिर्फ एक्सिस या अक्ष के चारों ओर धूर्णन (Rotation) ही सम्भव होता है। ग्रीवा की एटलस वर्टिब्रा (कशेरुका) एवं एक्सिस वर्टिब्रा (कशेरुका) के ऑडोन्टॉइड प्रवर्ध (Odontoid process) के बीच के जोड़ तथा रेडियो अल्नर जोड़ इसी प्रकार के जोड़ हैं।

कॉण्डायलॉइड जोड़ (Condyloid joints)- इस प्रकार के जोड़ हिन्ज के जैसे ही होती है। इनमें पार्श्व में तथा अग्र-पश्च दो दिशाओं में गतियां होना सम्भव होता है। इन जोड़ों के आकुंचन (Flexion), प्रसारण (Extension), अपावर्तन (abdusction), अभिवर्तन (Adduction) तथा कुछ-कुछ पर्यावर्तन (Circumduction) होना सम्भव होता है। परन्तु घूर्णन (Rotation) होना सम्भव नहीं होता। हाथ के अंगूठे को छोड़कर अंगुलियों के मोटाकर्पोफेलेन्जियल जोड़ (Knuckles) और मेटाटार्सोफेलेन्जियल जोड़ इसी प्रकार के जोड़ है।

फिसलने वाली सन्धियां (Gliding joints)- इस प्रकार के जोड़ों में हड्डियों की आर्टिकुलर सतहें चौरस (Flat) होती है, जिससे एक हड्डी दूसरी हड्डी पर फिसलती है। कशेरुका के आर्टिकुलर प्रवर्धों के बीच के जोड़, एक्रोमियोक्लेविकुलर जोड़ तथा कार्पल एवं टार्सल हड्डियों के बीच के जोड़ इसी प्रकार के हैं।

सैडल जोड़ (Saddle joints)- इस प्रकार के जोड़ों में एक हड्डी का उत्तल शीर्ष दूसरी हड्डी में अवतल रचना वाले शीर्ष (सिरे) में जुड़ता है। इनमें अंग को घुमाने की पूरी स्वच्छन्दता (आजादी) रहती है। ऐसा जोड़ हाथ के पहले मेटाकार्पल तथा ट्रैपीजियम हड्डी के बीच का जोड़ होता है। इन जोड़ों में अपावर्तन (Abduction), अभिवर्तन (Adduction), अपोजिशन (Opposition) एवं रीपोजीशन (Reposition) होता है।

बॉल एवं सॉकेट जोड़ (Ball & Socket joints)- इस प्रकार के जोड़ों में एक हड्डी का गोल सिरा दूसरी हड्डी के कप के आकार के सॉकेट (गुहा) में फिट रहता है। ये जोड़ दूसरे सारे जोड़ों से ज्यादा स्वतंत्र रूप से गति करते हैं। इसी प्रकार के जोड़ों में कन्धों के जोड़ तथा नितम्बों के जोड़ आते हैं। इन जोड़ों में आकुंचन, प्रसारण, अपवर्तन, अभिवर्तन, घूर्णन (अन्दर एवं बाहर की ओर) तथा पर्यावर्तन (Cirumduction) होना सम्भव होता है। इनमें उत्तानन (सुपिनेशन) एवं अवतानन (प्रोनेशन) गतियां नहीं हो पाती है।

जोड़ों में होने वाली गतियां (Types of movements at joints)- आकुंचन या मुड़ाव (Flexion)- इस गति के द्वारा अंग को मोड़कर शरीर की मध्य रेखा की ओर लाने की क्रिया आती है। अंग को मोड़ना एवं झुकाना (Bending) भी इसी गति के अन्तर्गत आता है जैसे- कोहनी या घुटने को मोड़ लेना।

प्रसारण या तानना (Extension)- इस गति में अंग को शरीर के मध्य रेखा से दूर फैलाना सम्भव होता है। इस गति में अंग को सीधा करके फैलाने की क्रिया (Straightening) आती है जैसे- बांहों को फैलाना।

अपवर्तन (Abduction)- शरीर के किसी भी अंग को शरीर की मध्य रेखा से दूर ले जाने को अपवर्तन कहते हैं।

अभिवर्तन (Adduction)- शरीर के किसी भी अंग को शरीर की मध्य रेखा के पास लाने की क्रिया को अभिवर्तन कहते हैं।

पर्यावर्तन (Circumduction)- इस गति में किसी भी अंग को शरीर से कुछ दूरी पर गोलाकार गति में घुमाना होता है। उदाहरण- ऐसी गति हाथ घुमाकर क्रिकेट बॉल को फैंकने पर होती है।

घूर्णन (Rotation)- एक्सिस पर घूमने की गति को घूर्णन गति कहा जाता है। ऐसी गति किसी हड्डी के प्रवर्ध के चारों ओर दूसरी हड्डी के घूमने अथवा उसके किसी दूसरी हड्डी के भीतर घूमने से होती है जैसे- एटलस वर्टिब्रा (कशेरुका) एवं एक्सिस वर्टिब्रा (कशेरुका) के ऑडोन्टॉइड प्रवर्ध के बीच के जोड़ में गति होती है।

अंतवर्त्तन (Inversion)- इसके अंतर्गत अंदर की ओर मु़ड़ने की क्रिया होती है जैसे- पैर के तलवे का अंदर की तरफ घूम जाना।

बहिर्वर्तन (Eversion)- इसके अंतर्गत अंग को बाहर की ओर मुड़ने कि क्रिया होती है जैसे- पैर के तलवे का बाहर की ओर को घूम जाना।

उत्तानन (Supination)- यह अग्रबाहु की घुमावदार गति होती है जिसमें रेडियस घूमकर अल्ना के समान्तर हो जाती है या हथेली को ऊपर की ओर घुमाना अथवा पैर के मध्यवर्ती किनारे को ऊपर उठाना या कमर के सहारे सीधा लेटना।

अवतानन (Pronation)- यह अग्रबाहु की घुमावदार गति होती है जिसमें रेडियस अल्ना के ऊपर तिरछी हो जाती है या हथेली को नीचे या पीछे की ओर घुमाना या चेहरे को नीचे की तरफ करके लेटने की क्रिया।

सम्मुख (Opposition)- यह एक कोणीय गति होती है, जिसमें अंगूठे से छोटी अंगुली को स्पर्श किया जाता है। ऐसी गति केवल हाथ के अंगूठे को कार्पोमेटाकार्पल जोड़ पर होती है।

पुनःस्थापन (Reposition)- ऐसी गति जिसमें अंगूठा अपनी एनाटॉमिकल अवस्था में पहुंच जाता है। यह सम्मुख गति के विपरीत गति होती है।

प्रोट्रेक्शन (Protraction)- सामने की ओर गति जैसे मैण्डीबल (mandible) का आगे को बढ़ जाना।

रिट्रैक्शन (Retraction)- पीछे को खींचने की क्रिया जैसे- मैण्डीबल को पीछे की ओर खींचना।

डिप्रेसन (depression)- शरीर के किसी भी अंग का नीचे अथवा अन्दर की ओर विस्थापन।

एलिवेशन (elevation)- शरीर के किसी भी अंग को उठाना (Raising)।

मानव शरीर के मुख्य जोड़ (Articulations of the human body)-

कपाल से सम्बन्द्धित जोड़ (Joints associated with skull)-

जबड़े का जोड़ (temporomandibular joint or TM joint)- चेहरे का सिर्फ यही (TM joint) जोड़ गतिशील होता है। इसे साइनोवियल जोड़ कहते हैं। इसमें हिन्ज (चूलदार) एवं फिसलने वाली (Gliding) संरचनाएं होती है।

एटलेन्टोऑक्सिपिटल सजोड़ (Atlantooccipital joint)- यह एटलस एवं आक्सिपिटल (पश्चकपालिक) हड्डी के बीच का जोड़ है। इसमें हिन्ज (चूलदार) जोड़ होता है जिसमें सिर को ‘हां’ में हिलाया जाता है।

कशेरुका दण्ड के जोड़ (joints of the vertebral column)- सभी कशेरुका में, दूसरी सर्वाइकल कशेरुका से लेकर सेक्रम तक, जोड़ होते हैं। वर्टिब्रा (कशेरुका) के कार्यों (bodies) के बीच उपास्थिमय जोड़ होता है और वर्टिब्रल आर्चेज के बीच साइनोवियल जोड़ पाया जाता है।

पसलियों एवं उरोस्थि से सम्बद्धित जोड़ (joints associated with the ribs and sternum)-

कॉस्टोवर्टिब्रल जोड़ (Costovertebral jointa)- ये पसलियों के शीर्षों पर स्थित आर्टिकुलर फेसेट्स एवं ट्यूबरकल्स तथा थोरैसिक वर्टिब्री (कशेरुका) के ट्रान्सवर्स प्रवर्धों पर स्थित कॉस्टल फेसेट्स के बीच साइनोवियल जोड़ होते हैं। इनमें फिसलने वाली (Gliding) तथा घूर्णन (rotation) गति होती है।

स्टर्नोकॉस्टल जोड़ (sternocostal joints)- पसलियों की कॉस्टल कार्टिलेज (उपास्थि) के सिरे उरोस्थि के पार्श्व में स्थित गड्डों से जुड़ते है, जिससे स्टर्नोकॉस्टल जोड़ बनते हैं। पहली पसली का जोड़ अचल होता है। दूसरी से सातवीं पसलियों के जोड़ों में फिसलने वाली गति होती है। ये साइनोवियल जोड़ होते हैं।

इन्टरकॉणड्रल जोड़ (Interchondral joints)- पांचवीं से नौवीं पसलियों की कॉस्टल कार्टिलेज (उपास्थि) के जोड़ों को इन्टरकॉण्ड्रल जोड़ कहते हैं। इनमें फिसलने वाली गति होती है, जो श्वसन (सांस लेना) के दौरान सामायोजन (adjustment) बनाए रखती है। ये भी साइनोवियन जोड़ होते हैं।

मैन्यूब्रियोस्टर्नल जोड़ (manubriosternal joint)- यह स्टर्नम (उपास्थि) के मैन्यूब्रियम एवं उसकी काय के बीच का जोड़ है। यह जोड़ उपास्थिमय जोड़ होता है। इसमें हल्की गति सम्भव होती है।

जीफीस्टर्नल सन्धि (Xiphisternal joint)- यह स्टर्नम (उपास्थि) के जीफॉइड प्रवर्ध एवं उसके काय के बीच का उपास्थिमय जोड़ है। इसमें भी हल्की गति होती है।

पेक्टोरल गर्डल (कन्धे) के जोड़ (joints of the pectoral girdle)-

स्टर्नोक्लैविक्यूलर जोड़ (Sternoclavicular joint)- यह क्लैविक्ल के स्टर्नल सिरा, स्टर्नम (उरोस्थि) का मेन्यूब्रियम तथा पहली पसली की कॉस्टल कार्टिलेज (उपास्थि) से मिलकर बनता है। यह एक फिसलने वाला (Gliding) जोड़ है, जिसमें एलिवेशन, डिप्रेशन, प्रोट्रेक्शन एवं रिट्रेक्शन गतियां होती है।

एक्रोमियोक्लैविक्यूलर जोड़ (Acromioclavicular joint)- यह क्लैविक्ल के एक्रोमियल सिरे एवं स्कैपुला की एकोमियन की मिडियल सतह के बीच का जोड़ है। यह साइनोवियल जोड़ है तथा इसमें भी फिसलने वाली गतियां होती है। इससे कन्धे के जोड़ पर ह्यूमरस हड्डी की स्वतन्त्र गति में मदद मिलती है।

कोराकोक्लैविक्यूलक जोड़ (Coracoclavicular joint)- यह क्लैविकल एवं स्कैपुला के कोराकॉइड प्रवर्ध के बीच का तन्तुमय जोड़ है। यह  एक अचल (Syndesmoses) जोड़ है, जो क्लैविकल को स्कैपुला से अलग होने से रोकता है।

बाहु (भुजा) (Arm) एवं अग्रबाहु (forearm) के जोड़-

स्कन्ध जोड़ या कन्धे का जोड़ (shoulder joint or glenohumeral joint)- यह बॉल एवं सॉकेट (ball and socket) प्रकार का जोड़ है तथा शरीर के सभी जोड़ों से ज्यादा स्वतंत्र गति होने देता है। यह ह्यूमरस के गोलाकार शीर्ष के स्कैपुला की ग्लीनॉइड गुहा में फिट होने से बनता है। जोड़ बनाने वाली परतें (Articular surfaces) तन्तुमय उपास्थियों द्वारा ढकी रहती है तथा ग्लीनॉइड गुहा तन्तुमय उपास्थि की गोल किनार (fibrocartilaginous rim) द्वारा और भी गहरी हो जाती है जिसे ग्लीनॉइड लेब्रम (Glenoid labrum) कहते हैं। इससे गति को सीमित किए बिना अतिरिक्त मजबूती उपलब्ध होती है और विस्थापन (Dislocation) के जोखिम को कम करती है। स्कैपुला ओर ह्यूमरस दोनों हड्डियां लिगामेन्ट्स के लचीले कैप्सूल के द्वारा आपस में जुड़ी रहती है, जिससे इस जोड़ पर सामान्य रूप से सम्भव स्वतंत्र गति हो सकती है। इसके साथ ही शक्तिशाली पेशियां हड्डियों को सही स्थिति में बनाये रखने में सहायता करती है। बाइसेप्स पेशी का लम्बा टेन्डन इन्ट्राकैप्सुलर लिगामेन्ट का कार्य करता है। यह टेन्डन ह्यूमरस की ट्यूबरोसिटीज के बीच बाइसिपीटल ग्रूव से जोड़ की गुहा में जाता है और चूंकि यह ग्लीनॉइड गुहा के बिल्कुल ऊपर स्कैपुला से निकलता है इसलिए यह जोड़ बनाने वाली परतों को ठीक स्थिति में बनाए रखता है।

कोहनी का जोड़ (Elbow joint)- यह ह्यूमरस हड्डी के निचले सिरे पर स्थित ट्रॉक्लिया (trochlea) एवं कैपीटुलम (capitulum), अल्नाकी ट्राक्लियर जुड़ने से बनी हिन्ज सन्धि (hinge joint) है। ह्यूमरस का ट्रॉक्लिया अल्ना के ट्रॉक्लियर खांचे (notch) में फिट होता है तथा कैपीटुलम रेडियस के शीर्ष से जुड़ता है। इसमें जोड़ कैप्सूल से बाहर (extracapsular) शक्ति पहुंचाने वाले एन्टीरियर, पोस्टीरियर, मीडियल और लेटरल लिगामेंटस भी रहते हैं। इस जोड़ से आंकुचन (Flaxion) एवं प्रसारण (Extension) गतियां होती है।

रेडियोअल्नर सन्धि (Radioulnar joint)- रेडियस एवं अल्ना हड्डियों के बीच निकटस्थ (proximal) और  दूरस्थ (Distal) दो चल जोड़ होते हैं। निकटस्थ रेडियोअल्नर जोड़ रेडियस के शीर्ष एंव अल्ना के रेडियल खांचे (notch) के बीच, तथा दूरस्थ रेडियोअल्नर जोड़ अल्ना के शीर्ष एवं रेडियस के अलनर खांचे (notch) के बीच बनती है। दोनों ही जोड़ पाइवट (Pivot) जोड़ होते हैं।

     जोड़ कैप्सूल के बाहर एक शक्तिशाली एन्यूलर लिगामेन्ट होता है, जो रेडियस के शीर्ष को चारों ओर से घेरे रहता है और इसे अल्ना के रेडियल खांचे (notch) के सम्पर्क में बनाए रखता है।

     इन दोनों जोड़ों में अवतानन (Pronation) और उत्तानन (supination) गतियां होती है। अवतानन गति में हथेली नीचे की ओर तथा उत्तानन गति में हथेली ऊपर की ओर आ जाती है।

कलाई का जोड़ (radiocarpal joint)- यह रेडियस के निचले या दूरस्थ सिरे (एवं आर्टिकुलक डिस्क) तथा निकटस्थ रेखा (proximal row) की स्केफॉइड, ल्यूनेट व ट्राइक्वीट्रल, नामक कार्पल हड्डियों के बीच का जोड़ है।

     जोड़ कैप्सूल के बाहर मिडियल एवं लेटरल लिगामेन्ट तथा एन्टीरियर व पोस्टीरियर रेडियोकार्पल लिगामेन्ट पाए जाते हैं। इस जोड़ पर रेडियल अपवर्तन (abduction), अल्नर अभिवर्तन (Adduction), आंकुचन (flexion), प्रसारण (Extension), अतिप्रसरण (hyperextension) तथा चक्राकार (Circumduction) की गतियां होती है।

हाथ के जोड़ (Joints of the hand)-

कार्पल जोड़ (carpal joints)- ये निकटस्थ (Proximal) एवं दूरस्थ (distal) रेखाओं की कार्पल हड्डियों के बीच का जोड़ है। इनमें हिन्ज जोड़ होता है। चूंकि ये हड्डियां एक-दूसरे से काफी चिपकी हुई होती है। इसलिए इनके बीच हल्की सी आंकुचन (Flexion) और प्रसारण (Extension) की गतियां होती है।

अंगूठे का कार्पोमेटाकार्पल जोड़ (Carpometacarpal joint)- यह ट्रेपीजियम एवं पहली मेटाकार्पल हड्डी के निकटस्थ सिरे की बीच का जोड़ है। यह सैडल प्रकार का जोड़ (Saddle joint) होता है।

मेटाकार्पोफैलेन्जियल जोड़ (Knuckle)- मेटाकार्पल हड्डियों के शीर्षों तथा निकटस्थ फैलेन्जीज के आधारों के बीच कॉण्डीलॉइड (Condyloid) प्रकार के जोड़ बनते हैं। इन जोड़ों पर आंकुचन, प्रसारण, अपवर्तन, अभिवर्तन तथा पर्यावर्तन गतियां होती है।

इन्टरफेनेन्जियल जोड़ (Interophalangeal joints)- फेलेन्जीज़ के शीर्षों तथा सटी हुई फैलेन्जीज़ के अवतल आधारों के बीच हिन्ज प्रकार के जोड़ बनते हैं। इन जोड़ों पर आंकुचन एवं प्रसारण की गतियां होती है।

श्रोणि के जोड़ (joints of the pelvis)-

सैक्रोइलियक जोड़ (Sacroiliac joint)- सैक्रम एवं इलियम हड्डियों के बीच एन्टीरियर (अग्र) एवं पोस्टीरियर (पश्च) दो जोड़ होते हैं। एन्टीरियर जोड़ साइनोवियल जोड़ होते हैं। इनमें मामूली सी फिसलने वाली (Gliding) तथा घूर्णन गतियां होती है जो जोड़ को लचीलापन प्रदान करती है तथा पोस्टीरियर जोड़ तन्तुमय जोड़ (Fibrous joint)होता है। जिसमें हल्की सी गति होती है और यह जोड़ को सुरक्षा प्रदान करती है।

सिम्फाइसिस प्यूबिस (सन्धान्क जघनास्थि) (Symphysis pubis)- प्यूबिक (जघनास्थि) हड्डियों की कार्यों (bodies) के बीच का तन्तु उपास्थिमय जोड़ (Fibrocartilaginous joint) है। यह लगभग अगतिशील (immovable) होता है लेकिन प्रसव के दौरान इसमें हल्की सी गति होती है।

नितम्ब जोड़ (hip joint)- यह बॉल एव सॉकेट प्रकार का जोड़ है, जो इन्नोमिनेट हड्डी (Hipbone) के कप के आकार के गहरे एसीटाबुलम में फीमर अस्थि (ऊर्वस्थि) के गोलाकार सिर के फिट होने से बनती है। जोड़ बनाने वाली सतहें आर्टिकुलर कार्टिलेज (उपास्थि) से ढकी रहती है। एसीटाबुलम के किनारों पर चारों ओर एसीटाबुलम लेब्रम (Acetabular labrum) (यह एक तन्तुमय उपास्थि होती है) द्वारा एसीटाबुलम केविटी की गहराई और ज्यादा हो जाती है। इससे फीमर (ऊर्वस्थि) का शीर्ष अच्छी तरह समायोजित हो जाता है।

     कैप्सूलर लिगामेन्ट फीमर (ऊर्वस्थि) की ग्रीवा के ज्यादातर भाग को ढककर रखता है। फीमर (ऊर्वस्थि) के शीर्ष का लिगामेन्ट शीर्ष पर स्थित एक छोटे और खुरदरे गड्ढे फोविया (Fovea) से शुरू होकर एसीटाबुलम तक जाता है। साइनोवियल मेम्ब्रेन एसीटाबुलम लेब्रम की दोनों साइडों को ढककर रहती है तथा फीमर (ऊर्वास्थि) के शीर्ष के लिगामेन्ट के चारों ओर एक खोल-सा बना लेती है। जोड़ कैप्सूल को चारों ओर से घेरने एवं उसे शक्ति पहुंचाने वाले कई लिगामेन्ट होते हैं, जिनमें से एक इलियोफीमोरल (iliofemoral) लिगामेन्ट सबसे ज्यादा शक्तिशाली होता है। यह जोड़ के सामने रहता है और नितम्ब का प्रसारण धड़ की मध्यरेखा से अधिक दूर नहीं होने देता है। नितम्ब के जोड़ पर आकुंचन, प्रसारण, अपवर्तन, अभिवर्तन, मीडियल एवं लेटरल घूर्णन तथा पर्यावर्तन (Circumduction) गतियां होना सम्भव है।

घुटने का जोड़ (Knee or tibio- femoral joint)- घुटने का जोड़ शरीर का सबसे बड़ा और बहुत ही कठिन (most complex) जोड़ है। यह हिन्ज संरचना (Hinge structure) का एक साइनोवियल जोड़ है।

     असल में घुटने का जोड़ तीन साइनोवियल जोड़ों से मिलकर बना होता है। एक जोड़ फीमर (जघनास्थि) और टिबिया के मिडियल कॉण्डाइलों के बीच होता है। दूसरा जोड़ इन हड्डियों के लेटरल कॉण्डाइलों के बीच होता है तथा तीसरा जोड़ पटेला एवं फीमर (जघनास्थि) के बीच होता है। आर्टिकुलर कैप्सूल का एन्टीरियर भाग क्वाड्रीसेप्स फीमोरिस पेशी के टेण्डन का बना होता है। यह पटेला को भी सहारा देता है। अर्टिकुलर कैप्सूल को बाह्य लिगामेन्टों, टिबियल या मिडियल कोलेटरल लिगामेन्ट एवं फिब्युलर या लेटरल कोलेटरल लिगामेन्ट (जो फीमर (जघनास्थि) के पार्श्वों तक फैले रहते हैं), से शक्ति प्राप्त होती है। जोड़ के  अंदर मध्य में एक दूसरे को क्रॉस करते हुए मजबूत डोरी की तरप एन्टीरियर एवं पोस्टीरियर दो क्रुशिएट लिगामेन्ट्स (Cruciate ligaments) होते हैं, जो फीमर (जघनास्थि) के इन्टरकॉण्डाइलर खांचे (notch) से लेकर टिबिया के इन्टरकॉण्डाइलर उत्सेध (eminence) तक फैले रहते हैं। यह साइनोवियल मेम्ब्रेन करते हैं तथा घुटने की गति को नियंत्रण में रखते हैं।

     जोड़ के अंदर टिबिया के आर्टिकुलर कॉण्डाइलों के शिखर पर श्वेत तन्तुमय उपास्थि की दो अर्द्धचन्द्राकार गद्दियां (Semilunar discs) रहती है। इन गद्दियों को मेनिस्काइ (menisci) कहा जाता है। ये फनाकार (wedge-shaped) होती है और इनका बाहरी किनारा अधिक मोटा होता है। ये हड्डियों के लेटरल विस्थापन (displacement) को रोककर जोड़ को स्थिर होने में मदद करती है तथा टिबिया की आर्टिकुलर सतहों पर फीमर (जघनास्थि) की कॉण्डाइलर सतहों के फिट होने के लिए उन्हें और ज्यादा गहरा कर देती है।

     जोड़ों में कई बर्सा (Bursa) होते हैं, जो गद्दियों का कार्य करते हैं- पटेला के ऊपर का सुप्रापटेलर बर्सा (Suprapatellar bursa)- यह क्वाड्रीसेप्स फीमोरिस पेशी तथा फीमर (जघनास्थि) के बीच स्थित होता है। दूसरा- प्रीपटेलर बर्सा (Prepatellar bursa)- यह त्वचा और पटेला के बीच स्थित होता है। तीसरा- इन्फ्रापटेलर बर्सा- यह त्वचा और टिबियल ट्यूबरोसिटी के बीच में स्थित रहता है। इनसे हड्डी लिगामेन्ट या टेण्डन के बीच तथा त्वचा एवं पटेला के बीच में घर्षण कम होता है।

     घुटने के जोड़ में आकुंचन, प्रसारण और हल्की सी घूर्णन की गति होना सम्भव होती है।

टखने का जोड़ (Ankle or talocrural joint)- यह टिबिया के निचले (दूरस्थ) सिरे एवं उसके मिडियल मैलीयोलस (medial malleolus) तथा फिब्यूला के दूरस्थ सिरे या लेटरल मैलीयोलस एवं टेलस (Talus) की ऊपरी सतह के बीच का हिन्ज प्रकार का जोड़ होता है। जोड़ को डेल्टॉइड तथा एन्टीरियर, पोस्टीरियर, मीडियल एवं लेटरल लिगामेन्टों से शक्ति प्राप्त होती है। इसमें आंकुचन एवं प्रासरण की गति होती है, लेकिन साधारणतः आंकुचन को डॉर्सिफ्लेक्शन (पांव को ऊपर की ओर उठाना) तथा प्रसारण को प्लान्टर फ्लेक्शन (एड़ी को ऊपर उठाना) कहा जाता है

पैर के जोड़ (Joints of the foot)-

टार्सल सन्धियां (टखने के जोड़) (Tarsal joints)- टखने की हड्डियां डॉर्सल, प्लान्टर तथा इन्टरओसियस लिगामेन्टों द्वारा एकसाथ जुड़ी रहती है। उनके बीच फिसलने वाले जोड़ (Gliding joints) होते हैं। टखने की हड्डियों में टेलस और कैल्केनियस के बीच पोस्टटीरियर जोड़ या सबटेलर जोड़ (Subtalar joint) होता है। टेलस और कैल्केनियस तथा टेलस और नोविकुलर हड्डियों के बीच मिश्रित रूप से बने एन्टीरियर जोड़ या टेलोकैल्के- नियोनेविकुलर जोड़ (Talocalcaneonavicular joint) होते हैं। कैल्केनियस और क्यूबॉइड तथा टेलस और नेविकुलर हड्डियों के बीच मिश्रित रूप से बनी ट्रान्सवर्स टार्सल जोड़ (टखने का जोड़) (Transverse tarsal joint) होता है। ये तीनों जोड़ एक इकाई के रूप में जोड़ बनाते हैं। इसके घूर्णन का अक्ष एक रेखा बनाता है, जिसे सबटेलर एक्सिस (Subtalar axis) कहते हैं। इन जोड़ों में अन्तर्वर्तन (inversion) तथा बहिवर्तर्तन (eversion) की गतियां होती है अर्थात पैर अंदर और बाहर की तरफ घूम जाता है।

टार्सोमेटाटार्सल जोड़ (Tarsometatarsal joints)- ये चार एन्टीरियर टार्सल अस्थियों (टखने की हड्डियों) तथा मेटाटार्सल हड्डियों के आधारों के बीच के जोड़ है। ये फिसलने वाले जोड़ होते हैं। इनमें हल्की सी गति होती है।

मेटाटार्सोफैलेन्जियल जोड़ (Metatarsophalangeal joints)- ये पांचों मेटाटार्सल हड्डियों के शीर्षों (Heads) तथा निकटस्थ (proximal), फैलेन्जीज के आधारों के बीच के कॉण्डाइलॉइड प्रकार के जोड़ होते हैं। इन जोड़ों में आकुंचन, प्रसारण, अपावर्तन, अभिवर्तन तथा पर्यावर्तन गतियां होती है।

इन्टरफैलेन्जियल जोड़ (Interphalangeal joints)- फैलेन्जीज के शीर्षों तथा जुड़ने वाली (सटी हुई) फैलेन्जीज के अवतल आधारों के बीच के हिन्ज प्रकार के जोड़ है। इन जोड़ों में आकुंचन एवं प्रसारण गतियां होती है।

जोड़ों पर उम्र का प्रभाव- उम्र बढ़ने के साथ-साथ अक्सर जोड़ों में मौजूद साइनोवियल फ्लूड की मात्रा कम हो जाती है तथा जोड़ों की उपास्थि पतली पड़ जाती है। लिगामेन्ट्स छोटे तथा कम लचीले हो जाते है। इन बदलावों के फलस्वरूप आर्थराइटिस, बर्साइटिस और दूसरे कई जोड़ों के रोग पैदा हो जाते हैं।