अंगूर


अंगूर

Grapes, Grapevine, Raisins


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Angur ek aayu badane wala parsidh fal hai. falon mai yeh sarvotam avem nirdosh fal hai, kyonki yeh sabhi parkar ki prakarti ke manushye ke liye anukul hai.विभिन्न भाषाओं में नाम :

संस्कृत         द्राक्षा, गोस्तनी, कशिषा, हारहूरा।
हिंदी       मुनक्का, अंगूर, दाख
गुजराती       दशख, धराख।
मराठी          द्राक्ष
बंगाली          कटकी
पंजाबी          दाख अंगूर
अरबी           इनब, जबीब अंनब
फारसी          अंगूर रजताफ, मवेका
तेलगू           द्राक्षा
अंग्रेजी          ग्रेप्स, ग्रेप्सवाइन, रेजिन्स
अंगूर
तत्त्व मात्रा तत्त्व मात्रा
प्रोटीन 0.8 प्रतिशत नियासिन लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग/100 ग्राम
वसा 7.1 प्रतिशत विटामिन-सी लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग/100 ग्राम
कार्बोहाइड्रेट 10.2 प्रतिशत लौह लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग/100 ग्राम
पानी 85.5 प्रतिशत फास्फोरस 0.02 प्रतिशत
विटामिन-ए 15 आई.यू/ग्राम कैल्शियम 0.03 प्रतिशत
विटामिन-बी लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग/100 ग्राम    

परिचय :

        अंगूर एक आयु बढ़ाने वाला प्रसिद्ध फल है। फलों में यह सर्वोत्तम एवं निर्दोष फल है, क्योंकि यह सभी प्रकार की प्रकृति के मनुष्य के लिए अनुकूल है। निरोगी के लिए यह उत्तम पौष्टिक खाद्य है तो रोगी के लिए बलवर्धक भोजन। जब कोई खाद्य पदार्थ भोजन के रूप में न दिया जा सके तब मुनक्का का सेवन किया जा सकता है। रंग और आकार तथा स्वाद भिन्नता से अंगूर की कई किस्में होती हैं। काले अंगूर, बैगनी रंग के अंगूर, लम्बे अंगूर, छोटे अंगूर, बीज रहित अंगूर को सुखाकर किशमिश बनाई जाती है। काले अंगूरों को सुखाकर मुनक्का बनाई जाती है। अंगूर स्वस्थ मनुष्य के लिए पौष्टिक भोजन है और रोगी के लिए शक्तिप्रद पथ्य है। जिन बड़े-बड़े भयंकर और जटिल रोगों में किसी प्रकार का कोई पदार्थ जब खाने-पीने को नहीं को दिया जाता तब ऐसी दशा में अंगूर दी जाती है। भोजन के रूप में अंगूर कैन्सर, क्षय (टी.बी.), पायरिया, ऐपेण्डीसाटिस, बच्चों का सूखा रोग, सन्धिवात, फिट्स, रक्त विकार, आमाशय में घाव, गांठे, उपदंश (सिफलिस), बार-बार मूत्रत्याग, दुर्बलता आदि में दिया जाता है। अंगूर अकेला खाने पर लाभ करता है, किसी अन्य वस्तु के साथ मिलाकर इसे नहीं खाना चाहिए।

नोट : जब अंगूर उपलब्ध न हो तो अंगूर की जगह किशमिश को काम में लिया जा सकता है।)

गुण-धर्म :

  • पके अंगूर : पके अंगूर दस्तावर, शीतल, आंखों के लिए हितकारी, पुष्टिकारक, पाक या रस में मधुर, स्वर को उत्तम करने वाला, कसैला, मल तथा मूत्र को निकालने वाला, वीर्यवर्धक (धातु को बढ़ाने वाला), पौष्टिक, कफकारक और रुचिकारक है। यह प्यास, बुखार, श्वास (दमा), कास (खांसी), वात, वातरक्त (रक्तदोष), कामला (पीलिया), मूत्रकृच्छ्र (पेशाब करने में कठिनाई होना), रक्तपित्त (खूनी पित्त), मोह, दाह (जलन), सूजन तथा डायबिटीज को नष्ट करने वाला है।
  • कच्चा अंगूर : कच्चे अंगूर गुणों में हीन, भारी, कफपित्त और रक्तपित्त नाशक है।
  • काली दाख या गोल मुनक्का : यह वीर्यवर्धक, भारी और कफ पित्त नाशक है।
  • किशमिश : बिना बीज की छोटी किशमिश मधुर, शीतल, वीर्यवर्धक (धातु को बढ़ाने वाला), रूचिप्रद (भूख जगाने वाला) खट्टी तथा श्वास, खांसी, बुखार, हृदय की पीड़ा, रक्त पित्त, स्वर भेद, प्यास, वात, पित्त और मुख के कड़वेपन को दूर करती है।
  • ताजा अंगूर : रुधिर को पतला करने वाले छाती के रोगों में लाभ पहुंचाने वाले बहुत जल्दी पचने वाले रक्तशोधक तथा खून बढ़ाने वाले होते हैं।

विभिन्न रोगों में सहायक :

1. मूर्च्छा (बेहोशी) :

  • दाख (मुनक्का) और आंवले को समान मात्रा में लेकर, उबालकर पीसकर थोड़ा शुंठी का चूर्ण मिलाकर, शहद के साथ चटाने से बुखारयुक्त मूर्च्छा (बेहोशी) दूर हो जाती है।
  • 25 ग्राम मुनक्का, मिश्री, अनार की छाल और खस 12-12 ग्राम, जौकूट कर 500 मिलीलीटर पानी में रात भर भिगो दें, सुबह मसल-छानकर, 3 खुराक बनाकर दिन में 3 बार (सुबह, दोपहर और शाम) सेवन करें।
  • 100-200 ग्राम मुनक्का को घी में भूनकर थोड़ा-सा सेंधानमक मिलाकर रोजाना 5-10 ग्राम तक खाने से चक्कर आना बंद हो जाता है।

2. सिर में दर्द : 8-10 मुनक्का, 10 ग्राम मिश्री तथा 10 ग्राम मुलेठी तीनों को पीसकर नस्य देने से पित्त के विकार के कारण उत्पन्न सिर का दर्द दूर होता है।

3. मुंह के रोग : मुनक्का 10 दाने और 3-4 जामुन के पत्ते मिलाकर काढ़ा बना लें। इस काढ़े से कुल्ला करने से मुंह के रोग मिटते हैं।

4. नकसीर (नाक से खून आना) : अंगूर के रस को नाक में डालने से नाक की नकसीर (नाक से खून आना) रुक जाती है।

5. मुंह की दुर्गन्ध : कफ या अजीर्ण के कारण मुंह से दुर्गन्ध आती है तो 5-10 ग्राम मुनक्का नियमपूर्वक खाने से दूर हो जाती है।

6. उर:क्षत (सीने में घाव) : मुनक्का और धान की खीले 10-10 ग्राम को 100 मिलीलीटर पानी में भिगों दें। 2 घंटे बाद मसल-छानकर उसमें मिश्री, शहद और घी 6-6 ग्राम मिलाकर उंगली से बार-बार चटायें। सीने के घाव में लाभ होता है तथा उल्टी की यह दिव्य औषधि है।

7. सूखी खांसी : द्राक्षा, आंवला, खजूर, पिप्पली तथा कालीमिर्च इन सबको बराबर मात्रा में लेकर पीस लें। इस चटनी के सेवन से सूखी खांसी तथा कुकुर (कुत्ता) खांसी में लाभ होता है।

8. क्षय (टी.बी.) : घी, खजूर, मुनक्का, मिश्री, शहद तथा पिप्पली इन सबका अवलेह बनाकर सेवन करने से बुखार, खांसी, श्वास, जीर्णज्वर तथा क्षयरोग का नाश होता है।

9. पित्तज कास : 10 मुनक्का, 30 पिप्पली तथा मिश्री 45 ग्राम तीनों को मिश्रण बनाकर प्रतिदिन शहद के साथ चटाने से लाभ होता है।

10. दूषित कफ विकार : 8-10 नग मुनक्का, 25 ग्राम मिश्री तथा 2 ग्राम कत्थे को पीसकर मुख में धारण करने से दूषित कफ विकारों में लाभ होता है।

11. गलग्रंथि :

  • दाख (मुनक्का) के 10 मिलीलीटर रस में हरड़ का 1 ग्राम चूर्ण मिलाकर सुबह-शाम नियमपूर्वक पीने से गलग्रंथि मिटती है।
  • गले के रोगों में इसके रस से गंडूष (गरारे) कराना बहुत अच्छा है।

12. मृदुरेचन (पेट साफ रखने) के लिए :

  • 10-20 पीस मुनक्कों को साफकर बीज निकालकर, 200 मिलीलीटर दूध में अच्छी तरह उबालकर (जब मुनक्के फूल जायें) दूध और मुनक्के दोनों का सेवन करने से सुबह दस्त साफ आता है।
  • मुनक्का 10-20 पीस, अंजीर 5 पीस, सौंफ, सनाय, अमलतास का गूदा 3-3 ग्राम तथा गुलाब के फूल 3 ग्राम, इन सबके काढ़े में गुलकन्द मिलाकर पीने से दस्त साफ होता है।
  • रात्रि में सोने से पहले 10-20 नग मुनक्कों को थोड़े घी में भूनकर सेंधानमक चुटकी भर मिलाकर खाएं।
  • सोने से पहले आवश्यकतानुसार 10 से 30 ग्राम तक किसमिस खाकर गर्म दूध पीयें।
  • मुनक्का 7 पीस, कालीमिर्च 5 पीस, भुना जीरा 10 ग्राम, सेंधानमक 6 ग्राम तथा टाटरी 500 मिलीग्राम की चटनी बनाकर चाटने से कब्ज तथा अरुचि (भोजन का अच्छा न लगना) दूर हो जाता है।

13. पित्तज शूल : अंगूर और अडू़से का काढ़ा 40-60 मिलीलीटर की मात्रा में पिलाने से पित्त कफ जन्य उदरशूल दूर होता है।

14. अम्लपित्त :

  • दाख (मुनक्का), हरड़ बराबर-बराबर मात्रा में लें। इसमें दोनों के बराबर शक्कर मिलायें, सबको एक साथ पीसकर, एक-एक ग्राम की गोलियां बना लें। 1-1 गोली सुबह-शाम शीतल जल के साथ सेवन करने से अम्लपित्त, हृदय-कंठ की जलन, प्यास तथा अपच का नाश होता है।
  • मुनक्का 10 ग्राम और सौंफ आधी मात्रा में दोनों को 100 मिलीलीटर पानी में भिगों दें। सुबह मसलकर और छानकर पीने से अम्लपित्त में लाभ होता है।

15. पांडु (कामला या पीलिया) :

  • बीजरहित मुनक्का का चूर्ण (पत्थर पर पिसा हुआ) 500 ग्राम, पुराना घी 2 लीटर और पानी 8 लीटर सबको एक साथ मिलाकर पकाएं। जब केवल घी मात्र शेष रह जाये तो छानकर रख लें, 3 से 10 ग्राम तक सुबह-शाम सेवन करने से पांडु (पीलिया) आदि में विशेष लाभ होता है।
  • अंगूर पीलिया रोग को दूर करने में सहायता करता है।

16. पथरी :

  • काले अंगूर की लकड़ी की राख 10 ग्राम को पानी में घोलकर दिन में दो बार पीने से मूत्राशय में पथरी का पैदा होना बंद हो जाता है।
  • अंगूर की 6 ग्राम भस्म को गोखरू का काढ़ा 40-50 मिलीलीटर या 10-20 मिलीलीटर रस के साथ पिलाने से पथरी नष्ट होती है।
  • 8-10 नग मुनक्कों को कालीमिर्च के साथ घोटकर पिलाने से पथरी में लाभ होता है।
  • अंगूर के जूस में थोड़े-से केसर मिलाकर पीयें। इससे पथरी ठीक होती है।

17. मूत्रकृच्छ (पेशाब करने में कष्ट) :

  • मूत्रकृच्छ में 8-10 मुनक्कों एवं 10-20 ग्राम मिश्री को पीसकर दही के पानी में मिलाकर पीने से लाभ होता है।
  • मुनक्का 12 ग्राम, पाषाण भेद, पुनर्नवा मूल तथा अमलतास का गूदा 6-6 ग्राम जौकूटकर, आधा किलो जल में अष्टमांश काढ़ा बनाकर पिलाने से मूत्रकृच्छ एवं उसके कारण उत्पन्न पेट के रोग भी दूर होते हैं।
  • 8-10 नग मुनक्कों को बासी पानी में पीसकर चटनी की तरह पानी के साथ लेने से मूत्रकृच्छ में लाभ होता है।

18. अंडकोषवृद्धि :

  • अंगूर के 5-6 पत्तों पर घी चुपड़कर तथा आग पर खूब गर्मकर बांधने से फोतों की सूजन बिखर जाती है।

19. बल एवं पुष्टि के लिए :

  • मुनक्का 12 पीस, छुहारा 5 पीस तथा मखाना 7 पीस, इन सभी को 250 मिलीलीटर दूध में डालकर खीर बनाकर सेवन करने से खून और मांस की वृद्धि होकर शरीर पुष्ट होता है।
  • मुनक्का 9 पीस, किशमिश 5 पीस, ब्राह्मी 3 ग्राम, छोटी इलायची 8 पीस, खरबूजे की गिरी 3 ग्राम, बादाम 10 पीस तथा बबूल की पत्ती 3 ग्राम, घोटकर पीने से गर्मी शांत होकर शरीर पुष्ट तथा बलवान बनता है।
  • सुबह-सुबह मुनक्का 20 ग्राम खाकर ऊपर से 250 मिलीलीटर दूध पीने से बुखार के बाद की कमजोरी और बुखार दूर होकर शरीर पुष्ट होता है।
  • 20 से 60 ग्राम किशमिश रात को एक कप पानी में भिगो दें, सुबह मसल-छानकर उस पानी को पीने से कमजोरी और अम्लपित्त (ऐसीडिटी) दूर होती है।
  • रात को सोने से पहले मुनक्का खायें फिर ऊपर से पानी पी लें, इससे कुछ दिनों में ही दुर्बलता दूर होकर शरीर पुष्ट होता है (ज्यादा लेने पर दस्त हो जाते हैं, अपनी शारीरिक क्षमतानुसार मात्रा का निर्धारण कर लें)।

20. जलन (दाह), प्यास :

  • 10-20 नग मुनक्का शाम को पानी में भिगोकर सुबह मसलकर छान लें और उसमें थोड़ा सफेद जीरे का चूर्ण और मिश्री या चीनी मिलाकर पिलाने से पित्त के कारण उत्पन्न जलन शांत होती है।
  • 10 ग्राम किशमिश आधा किलो गाय के दूध में पकाकर ठंडा हो जाने पर रात्रि के समय नित्य सेवन करने से जलन शांत होती है।
  • मुनक्का और मिश्री 10-10 ग्राम रोज चबाकर और पीसकर सेवन करने से जलन शांत होती है।
  • किशमिश 80 ग्राम, गिलोय सत्व (बारीक पिसा हुआ चूर्ण) और जीरा 10-10 ग्राम तथा चीनी 10 ग्राम इन सभी के मिश्रण को चिकने गर्म बर्तन में भरकर उसमें इतना गाय का घी मिलायें, कि मिश्रण अच्छी तरह भीग जाये। इसे नियमित 6 से 20 ग्राम की मात्रा में सेवन करने से एक दो सप्ताह में चेचक आदि विस्फोटक रोग होने के बाद जो जलन शरीर में हो जाती है, वह शांत हो जाती है।

21. सन्निपात ज्वर : जीभ सूख जाये और फट जाये तो उस पर 2-3 अंगूर को 1 चम्मच शहद के साथ पीसकर उसमें थोड़ा घी मिलाकर लेप करने से लाभ होता है।

22. पित्त ज्वर :

  • काला अंगूर और अमलतास के गूदे का 40-60 मिलीलीटर काढ़ा सुबह-शाम पिलाने से पित्त ज्वर ठीक हो जाता है।
  • अंगूर के शरबत के नित्य सेवन से भी दाह ज्वर आदि शांत होता है।
  • यदि प्यास अधिक हो तो अंगूर और मुलेठी का लगभग  40-60 मिलीलीटर  काढ़ा दिन में 2-3 बार पिलावें।
  • मुनक्का, कालीमिर्च और सेंधानमक तीनों को पीसकर गोलियां बनाकर मुंह में रखें।
  • एक समान मात्रा में आंवला तथा मुनक्के को लेकर अच्छी तरह महीन पीसकर थोड़ा घी मिलाकर मुंह में रखें।

23. रक्तपित्त :

  • किशमिश 10 ग्राम, दूध 160 मिलीलीटर, पानी 640 मिलीलीटर तीनों को हल्की आंच पर पकावें। 160 मिलीलीटर शेष रहने पर थोड़ी मिश्री मिलाकर पिलाएं।
  • मुनक्का, मुलेठी, गिलोय 10-10 ग्राम लेकर जौकूट कर 500 मिलीलीटर जल में अष्टमांश काढ़ा बनाकर सेवन करें।
  • मुनक्का 10 ग्राम, गूलर की जड़ 10 ग्राम, धमासा 10 ग्राम लेकर, जौकूट कर अष्टमांश काढ़ा बनाकर सेवन करें। इस प्रयोग से रक्तपित्त, जलन, मुंह की सूजन, प्यास तथा कफ के साथ खांसने पर रक्त निकलना आदि विकार शीघ्र दूर हो जाते हैं।
  • अंगूर के 50-100 मिलीलीटर रस में 10 ग्राम घी और 20 ग्राम चीनी मिलाकर पीने से रक्तपित्त दूर होता है।
  • मुनक्का और पके गूलर का फल बराबर-बराबर लेकर पीसकर शहद के साथ सुबह-शाम चटायें।
  • मुनक्का 10 ग्राम, हरड़ 10 ग्राम पानी के साथ पीसकर 6 ग्राम तक बकरी के दूध के साथ पिलायें।

24. त्वचा के रोग : बसन्त के सीजन में इसकी काटी हुई टहनियों में से एक प्रकार का रस निकलता है जो त्वचा सम्बंधी रोगों में बहुत लाभकारी है।

25. धतूरे का जहर : अंगूर का रस 10 मिलीलीटर, सिरका 100 मिलीलीटर दूध में मिलाकर कई बार पिलायें।

26. हरताल के जहर पर : रोगी को उल्टी कराकर किशमिश 10-20 ग्राम, 250 मिलीलीटर दूध में पकाकर पिलायें।

27. नशे की आदत : सिगरेट, चाय, काफी, जर्दा, शराब आदि की आदत केवल अंगूर खाते रहने से छूट जाती है।

28. दुग्धवृद्धि (स्तनों में दूध की वृद्धि) : अंगूर खाने से दुग्धवृद्धि होती है। इसलिए स्तनपान कराने वाली माताओं को यदि उनके स्तनों में दूध की कमी हो तो अंगूरों का नियमित रूप से सेवन करना चाहिए।

  • अंगूर दुग्धवर्द्धक होता है। प्रसवकाल में यदि उचित मात्रा से अधिक रक्तस्राव हो तो अंगूर के रस का सेवन बहुत अधिक प्रभावशाली होता है। खून की कमी के शिकायत में अंगूर के ताजे रस का सेवन बहुत उपयोगी होता है क्योंकि यह शरीर के रक्त में रक्तकणों की वृद्धि करता है।

29. शक्तिवर्द्धक (शारीरिक ताकत) को बढ़ाने के लिए : ताजे अंगूरों का रस कमजोर रोगियों के लिए लाभदायक है। यह खून बनाता है और खून पतला करता है तथा शरीर को मोटा करता है। दिन में 2 बार रोजाना अंगूर के रस सेवन करने से पाचनशक्ति ठीक होती है, कब्ज दूर होती है। यह जल्दी पचता है, इससे दुर्बलता दूर होती है। सिर दर्द, बेहोशी के दौरे, चक्कर आना, छाती के रोग, क्षय (टी.बी) में उपयोगी है। यह रक्तविकार को दूर करता है। शरीर में व्याप्त विशों (जहर) को बाहर निकालता है।

30. बार-बार पेशाब आना : बार-बार पेशाब जाना मूत्राशय (वह स्थान जहां पेशाब एकत्रित होता हैं) के लिए अच्छा नही हैं। अंगूर खाने से बार-बार पेशाब जाने की आदत कम होती है।

31. गुर्दे का दर्द : अंगूर की बेल के 30 ग्राम पत्तों को पीसकर पानी मिलाकर व छानकर और नमक मिलाकर पीने से गुर्दे के दर्द से तड़पते रोगी को आराम मिलता है।

32. अनियमित मासिक-धर्म, श्वेतप्रदर : 100 ग्राम अंगूर रोज खाते रहने से मासिक-धर्म नियमित रूप से आता है। इससे स्वास्थ्य अच्छा रहेगा।

33. घबराहट : अंगूर खाने से घबराहट दूर हो जाती है।

34. बच्चों के दांत निकलते समय का दर्द :

  • दांत निकलते समय अंगूरों का 2 चम्मच रस नित्य पिलाते रहने से बच्चों के दांत सरलता और शीघ्रता से निकल आते हैं। बच्चा रोता नहीं है, वह हंसमुख रहता है। बच्चा सुडौल रहता है तथा बच्चे को `सूखारोग´ नहीं होता। इसके अतिरिक्त बच्चों को दौरे नहीं पड़ते और चक्कर भी नहीं आते लेकिन अंगूर मीठे हो, चाहे तो स्वाद के लिए अंगूर में शहद भी मिला सकते हैं।
  • बच्चों के दांत निकलते समय के दर्द कम करने के लिए अंगूर का रस पिलायें। इससे दर्द कम होता है तथा दांत स्वस्थ व मजबूत निकलते हैं।
  • बच्चों के दांत निकलते समय अंगूर के रस में शहद डालकर देने से दांत जल्द निकल आते हैं। इससे दांत निकलते समय दर्द नहीं होता।

35. जुकाम : कम से कम 50 ग्राम अंगूर खाते रहने से बार-बार जुकाम होना बंद हो जाता है।

36. गठिया : अंगूर शरीर से उन लवणों को निकाल देता है, जिनके कारण गठिया शरीर में बनी रहती है। गठिया की परिस्थितियों को साफ करने के लिए सुबह के समय अंगूर खाते रहना चाहिए।

37. चेचक : अंगूर गर्म पानी में धोकर खाने से चेचक में लाभ होता है।

38. मिरगी : मिरगीग्रस्त रोगियों को अंगूर खाना लाभकारी होता है।

39. माइग्रेन : अंगूर का रस आधा कप नित्य सुबह (सूरज उगने से पहले) पीने से आधे सिर का दर्द जो सूर्य निकलने के साथ प्रारम्भ होकर सूर्य के साथ-साथ बढ़ता है, ठीक हो जाता है।

40. खांसी-कफ : अंगूर के सेवन से फेफड़ों को शक्ति मिलती है, खांसी-जुकाम दूर होता है। कफ बाहर आ जाता है। नोट : अंगूर खाने के बाद पानी न पीएं।

41. हृदय के रोग :

  • रोगी यदि अंगूर खाकर ही रहे तो हृदयरोग शीघ्र ही ठीक हो जाते हैं। जब हृदय में दर्द हो और धड़कन अधिक हो तो अंगूर का रस पीने से दर्द बंद हो जाता है और धड़कन सामान्य हो जाती है। थोड़ी ही देर में रोगी को आराम आ जाता है तथा रोग की आपात स्थिति दूर हो जाती है।
  • यदि हृदय में दर्द हो तो मुनक्का का कल्क (पेस्ट) 30 ग्राम, शहद 10 ग्राम तथा लौंग 5 ग्राम, मिलाकर कुछ दिन सेवन करें।
  • प्रतिदिन 100 ग्राम अंगूर खाने से हृदय की निर्बलता जल्दी ही खत्म हो जाती है।
  • यदि हृदय में दर्द महसूस हो तो आधा कप अंगूर का रस सेवन करें।

42. पेट की गैस और जलन में : अंगूर के रस का नियमित सेवन करने से पेट की जलन, गैस की तकलीफ शांत होती है तथा पाचन में सुधार  होता है।

43. पाचनयुक्त : अंगूर में 50 प्रतिशत तक शर्करा पाई जाती है जोकि परिपक्व होती है। इस शर्करा का शरीर में शोशण आसानी से हो जाता है।

44. पाचन मलत्याग में सहायक : अंगूर का रस आंतों की गति व क्रियाशीलता को बढ़ाता है। इससे पाचन व मलत्याग की क्रियाएं सुचारु हो जाती हैं।

45. रक्तशोधक (खून की सफाई) करने वाला :

  • अंगूर का प्रयोग करने से खून की सफाई होती है क्योंकि अंगूर में मौजूद विभिन्न प्रकार के एसिड रक्तशोधन का कार्य करते रहते हैं।
  • कुछ दिन नियमित रूप से अंगूर का रस पीने से शरीर के अंदर की गरमी दूर हो जाती है और रक्त शुद्ध होता है।

46. मूत्राशय की जलन और पथरी में : मूत्र विकारों, मूत्राशय की जलन और पथरी में अंगूर का नियमित रसपान फायदेमंद होता है।

47. बवासीर : प्रतिदिन अंगूर खाने से कब्ज दूर होती है, बवासीर में भी लाभ मिलता है।

48. अतिसार (दस्त) : अंगूर के रसपान से अतिसार (दस्त) में भी फायदा होता है।

49. श्वास या दमा का रोग :

  • अंगूर का रस 30-40 मिलीलीटर गर्म करके दमा के रोगी को पिलाने से श्वास का वेग घट जाता है।
  • अंगूर का रस फेफड़ों के कोषों को शक्ति देता है। इसलिए दमा, खांसी और टी.बी के रोगियों को अंगूर बहुत लाभकारी रहता है। यदि थूकने में खून आता हो तब भी हमें अंगूर खाने चाहिए।
  • दमे में अंगूर खाना लाभकारी है। यदि थूक में रक्त आता हो तब भी अंगूर खाने से लाभ होता है।

50. फेफड़ों के रोग : फेफड़ों के सभी प्रकार के रोग- यक्ष्मा, खांसी, जुकाम तथा दमा आदि के लिए अंगूर बहुत ही अच्छे होते हैं।

51. खांसी : अंगूर खाने से फेफड़ों को शक्ति मिलती है। कफ बाहर निकल आता है। अंगूर खाने के बाद पानी न पियें।

52. अफारा (गैस का बनना) : अंगूर के 50 मिलीलीटर रस में 5 ग्राम मिश्री और 2 ग्राम यवक्षार मिलाकर पीने से आध्मान (अफारा, गैस) को समाप्त करता हैं।

53. कब्ज : खाना खाने के बाद लगभग 200 ग्राम अंगूर को खाने से पेट में बनी कब्ज मिट जाती है।

54. वमन (उल्टी) : अंगूर का रस चूसने से जलन और उल्टी आने के रोग में आराम आ जाता है।

55. कैन्सर (कर्कट) के रोग में : अंगूर का सेवन 1 दिन में 2 किलो तक कर सकते हैं इससे ज्यादा अंगूर न खायें। कुछ दिनों के बाद छाछ पी सकते हैं और कोई चीज खाने को न दें। इससे धीरे-धीरे महीनों में लाभ होगा। कभी-कभी अंगूर का रस लेने से पेट दर्द, मलद्वार पर जलन होती है। इससे न डरें। दर्द कुछ दिनों में ठीक हो जाता है। दर्द होने के बाद इसे सेंक सकते हैं। इस प्रयोग से कैंसर की बीमारी से आराम मिलता है।

56. मूत्ररोग : अंगूर के रस में शहद डालकर पीने से ज्यादा पेशाब का होना कम हो जाता है।

57. पक्षाघात-लकवा-फालिस फेसियल, परालिसिस : अंगूर, सेब और नाशपाती के फलों का रस रोजाना दो बार पिलाने से रोगी के शरीर में शक्ति आती है और पक्षाघात ठीक हो जाता है।

58. घाव : रोज अंगूर खाने से घाव जल्दी भरता है।

59. कफ में : अंगूर खाने से फेफड़ों को शक्ति मिलती है। जुकाम, खांसी दूर होती है। कफ (बलगम) बाहर आ जाता है। अंगूर खाने के बाद पानी नहीं पीना चाहिए।

60. पित्ताशय की पथरी : रोज 200 मिलीलीटर अंगूर का रस पीने या अंगूर खाने से पित्ताशय की पथरी में बहुत ही फायदा होता है।

61. दिल की धड़कन :

  • नित्य 25 ग्राम अंगूर का रस पिएं।
  • रोगी यदि अंगूर खाकर ही रहे तो हृदय-रोग शीघ्र ठीक हो जाते है। जब हृदय में दर्द हो, धड़कन अधिक हो तो अंगूर का रस पीने से दर्द बंद हो जाता है तथा धड़कन सामान्य हो जाती है। थोड़ी देर में ही रोगी को आराम आ जाता है।

62. सूखा रोग : अंगूर का रस जितना ज्यादा हो सके बच्चे को पिलाना लाभकारी है। इस रस को टमाटर के रस के साथ मिलाकर पिलाने से भी बच्चा सेहतमंद और तंदुरुस्त होता है।

63. खून की कमी : 100 मिलीलीटर अंगूर का जूस (रस) पीने से शरीर में खून की कमी दूर हो जाती है।

64. याददास्त कमजोर होना : रोजाना सुबह और शाम को 4-4 चम्मच की मात्रा में अंगूर के रस को पानी के साथ मिलाकर भोजन के बाद लेने से बुद्धि का विकास और याददास्त मजबूत होती है।

65. कमजोरी दूर करना : लगभग 25 ग्राम की मात्रा में अंगूर का रस भोजन करने के आधे घंटे बाद पीने से शरीर में खून बढ़ता है। इसके अलावा पेट फूलना, अफारा, दिल के दौरे पड़ना, चक्कर आना, सिरदर्द और भोजन न पचना आदि बीमारियां दूर हो जाती हैं। इसका सेवन लगभग 2 या 3 हफ्ते तक लगातार करना चाहिए। इसके अलावा इसका सेवन महिलाओं के लिए भी लाभकारी होता है और कमजोर बच्चों को भोजन के बाद अंगूर का रस पिलाना काफी लाभकारी सिद्ध होता है। अंगूर का रस बच्चों के चेहरे को लाल कर देता है।