अंगमर्दक चिकित्सा का शरीर से सम्बंध


आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा का शारीरिक क्रिया-कलाप से सम्बन्ध


आधुनिक अंगमर्दक थैरेपी :
कुछ खास अर्टिकल :

आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा का प्रभाव शरीर के कई अंगों पर होता है जो इस प्रकार है-

त्वचा में ऊर्जा को सम्माहित करना (त्वचा को ऊर्जा प्रदान करना)-

         आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार करने से शरीर की त्वचा को ऊर्जा मिलती है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार की बीमारियां ठीक हो जाती है। आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा से उपचार करने से शरीर की त्वचा को ऊर्जा मिलती है जिसके फलस्वरूप कई प्रकार की बीमारियां ठीक हो जाती है। आधुनिक अंगमर्दक चिकित्सा के द्वारा उपचार करने पर शरीर की त्वचा में ऊर्जा सम्माहित होती है यह जानने के लिए त्वचा की संरचना को जानना जरूरी है।

शरीर की त्वचा की संरचना-

          मनुष्य का शरीर लगभग दो वर्ग मीटर लंबी त्वचा से ढका होता हैं। त्वचा की ऊपरी परत को बाहरी त्वचा (एपिडरमिस) कहते है तथा इसकी बीच की परत को कोरियम और सबसे नीचे की परत को अधस्त त्वचा कहते हैं। त्चचा के इन भागों में नाड़ियों के आखिरी सिरे होते हैं। इसलिए ही त्वचा किसी चीज या हाथ के उंगलियों आदि के स्पर्श (छू जाने) के द्वारा दबाव और दर्द को महसूस करती है।

        त्चचा के लगभग एक वर्ग सेंटीमीटर भाग में 25 संवेदी अंग होते हैं जो स्पर्श ज्ञान कराते हैं। ये एक से तीन ताप, लगभग 6 से 23 शीत (ठंड) तथा 100 से 200 तक दर्द को महसूस करता है। जबकि अन्य प्रकार के अनुभव जैसे झनझनाहट, खुजली तथा कंपन आदि संग्राहकों के परिणाम नहीं होते बल्कि उत्तेजना के साथ मिली प्रतिक्रिया होती है।

त्वचा के ज्ञान संग्राहक निम्नलिखित होते हैं-

1. पेसिनियन कार्पसल

2. क्रौसेस

3. मेइजनर्स कार्पसल

4. रूफीनी के कार्पसल

5. स्वतंत्र तंत्रिका के छोर

त्वचा के ज्ञान संग्राहक अंगों की आकार तथा स्वरूप इस प्रकार है-

इसका आकार कटे हुए प्याज की परतों की सी परत वाले होते हैं ये गहरे दबाव के संग्राहक कोरियम तथा अधस्त्वचा के बीच के क्षेत्र में स्थित होता है1. पेसिनियन कार्पसल- इसका आकार कटे हुए प्याज की परतों की सी परत वाले होते हैं ये गहरे दबाव के संग्राहक कोरियम तथा अधस्त्वचा के बीच के क्षेत्र में स्थित होता है तथा इसके साथ ही अधस्त्वचा की परत में भी होता है। यह गहरे दबाव के भारी स्वरूप का अनुभव कराता है।

ये संग्राहक कोरियम की ऊपरी परत के पास स्थित होता है। यह शीत (ठंड) के संग्राहक होता है।2. क्रौसेस- ये संग्राहक कोरियम की ऊपरी परत के पास स्थित होता है। यह शीत (ठंड) के संग्राहक होता है।

 

ये संग्राहक बहुत सारे होते हैं तथा ये आपस में एक-दूसरे से लिपटे होते हैं। यह स्पर्श चेतना बिन्दु होते है।3. मेइजनर्स कार्पसल- ये संग्राहक बहुत सारे होते हैं तथा ये आपस में एक-दूसरे से लिपटे होते हैं। यह स्पर्श चेतना बिन्दु होते है। मेइजनर्स कार्पसल कोरियम में स्थित होते हैं। यह पैरों तलुवों, हथेली, उंगलियों के नोकों में बहुत अधिक संख्या में होते हैं। यह हल्के स्पर्श का अनुभव होता है।

 

ये संग्राहक ऊष्मा तथा ताप लिए होता है तथा ये कोरियम में स्थित होता है। यह ताप संग्राहक का अनुभव कराता है। 4. रूफीनी के कार्पसल- ये संग्राहक ऊष्मा तथा ताप लिए होता है तथा ये कोरियम में स्थित होता है। यह ताप संग्राहक का अनुभव कराता है।

 

इसमें असंख्य नाड़ियों की शाखाओं के महीन छेद होते हैं जो दर्द के संग्राहक होते हैं। यह दर्द का अनुभव कराता है।5. स्वतंत्र तंत्रिका के छोर- इसमें असंख्य नाड़ियों की शाखाओं के महीन छेद होते हैं जो दर्द के संग्राहक होते हैं। यह दर्द का अनुभव कराता है।

 

 

त्वचा की कार्य प्रणाली-

1. त्वचा वसा तथा जल का संग्रहन करती है। पसीना तथा वसायुक्त ग्रंथियों का स्राव त्वचा का पोषण कर शुष्कता से बचाने का कार्य करता है। अधस्त त्वचा की वसा. सर्दी तथा बाहरी आघातों से शरीर की रक्षा करता है।

2. त्वचा शरीर के तापमान को नियंत्रण में रखती है। यह शरीर के तापमान पर नियंत्रण, रक्त-संचारण तथा स्वेद-ग्रंथियों के स्राव की सहायता से करता है।

3. त्वचा वसा तथा जल का संग्रहण करती है। पसीना तथा वसायुक्त गंथियों का स्राव त्वचा का पोषण करके शुष्कता से बचाव करता है।

4. अधस्त्वचा की वसा सर्दी तथा बाहरी आघातों से सुरक्षा करती है।

5. त्वचा शरीर के तापमान पर नियंत्रण करता है।

6. त्वचा में पाई जाने वाले बोधक अंग बाहरी खतरे की चेतावनी देते हैं।

7. त्वचा पसीना तथा वसायुक्त ग्रंथियां शरीर से अवांछित पदार्थो को बाहर निकालती है और तथा श्वास लेने की क्रिया में सहायता करती है।

8. त्वचा सूर्य की अल्ट्रा-वायलेट किरणों का शोषण करती है और विटामिन `डी´ का निर्माण करती है जिसके फलस्वरूप बच्चों को रिकेट्स रोग नहीं होता है।

त्वचा का रंग-

          शरीर की बाहरी त्वचा के कोरनियम त्वचा के नये कोषों का निर्माण करती है और मरे हुए कोषों को रूसी व पपड़ी के रूप में बाहर की ओर निकलता है। त्वचा की ऊपरी परत में स्थित मेलानिन रंजक त्वचा के रंग को बनाए रखता है। त्वचा की ऊपरी परत में मेलानिक की मात्रा जितनी ज्यादा होगी उतना ही अधिक त्वचा का रंग काला होगा।

शरीर के विभिन्न भागों में पाई जाने वाली त्वचा की मोटाई-

         शरीर के विभिन्न भागों की त्वचा की मोटाई अलग-अलग होती है लेकिन औसत रूप से देखा जाए तो त्वचा की मोटाई 0.3 से 0.1 मि. मी. होती है। गर्दन, पलकों तथा माथे की त्वचा की मोटाई 0. 04 से 0.1 मि. मी. होती है जबकि हाथ की हथेली की मोटाई 0.6 से 1.2 मि. मी. होती हैं। ठीक इसी प्रकार पैर के तलुवों की त्वचा की मोटाई 1.7 से 2.8 मि. मी. होती है। एड़ियों की त्वचा और भी मोटी हो सकती है।

        अंधस्त त्वचा की मोटाई लगभग 1.7 से 2.8 मि. मी. होती है पलकों पर इस त्वचा की मोटाई 0.6 मि. मी. तथा माथे पर इस त्वचा की मोटाई 1.5 मि.मी. होती है तथा मस्तिष्क पर इस त्वचा की मोटाई 2 मि. मी. होती है और गर्दन पर इस त्वचा की मोटाई लगभग 4 से 5 मि. मी. होती है।

        अन्तर-त्वचा की वसा त्वचा का सबसे मोटा भाग है और यह त्वचा नितंबों, गालों, पेट तथा स्त्रियों के स्तनों पर होता है। वसामय तन्तु अण्डकोष, लिंग, पलकों, तथा लघु भगोष्ठ में नहीं होता है।

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