अंकोल


अंकोल

Tlebid Alu Retis


Ankol ke chote tatha bade dono parkar ke vraksh paye jate hai jo aamtoor par janglon mai sukhi aur unchi bhumi mai utpan hote hai.विभिन्न भाषाओं में नाम :

अंग्रेजी                    टिलिबाईड आलु रिटिस।
संस्कृत                   अंकोल, अंकोट, दीर्घ कील।
हिंदी                      अंकोल, ढेरा।
गुजराती                 अंकोल।
मराठी                    अंकोल।
बंगाली                    आंकोड़, बाघ आंकड़ा।
तेलगू                     अंकोलमु।

सामान्य परिचय :

          अंकोल के छोटे तथा बड़े दोनों प्रकार के वृक्ष पाये जाते हैं जो आमतौर पर जंगलों में सूखे एवं ऊंचे भूमि में उत्पन्न होते हैं। यह हिमालय की तराई, उत्तर प्रदेश, बिहार, बंगाल, राजस्थान, दक्षिण भारत एवं बर्मा में पाया जाता है।

गुण :

          यह चिकना, गर्म, कषैला, दस्तावर, आमशूल, सूजन, कफ पित्त, रुधिर विकार, सांप तथा चूहे के विष का नाश करता है। इसका फल शीतल, स्वादिष्ट, कफनाशक, पौष्टिक, बलवर्धक, वात, पित्त, जलन, टी.बी. तथा रक्त विकार का नाशक है।

हानिकारक : अंकोल का अधिक मात्रा में प्रयोग हानिकारक है।de

विभिन्न रोगों में सहायक :

1. जलोदर (पेट में पानी की अधिकता) :

  • अंकोल की जड़ के चूर्ण को 1.5 से 3 ग्राम तक की मात्रा में दोनों समय देने से यकृत की क्रिया में सुधार होकर जलोदर में लाभ होता है।
  • अंकोट की जड़ की छाल लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक दिन में 1 से 2 बार तथा साथ ही यवाक्षार का प्रयोग करने से पेशाब आकर पेट साफ साफ हो जाता है।

2. दमा या श्वास रोग :

  • अंकोल की छाल, राई, लहसुन 6-6 ग्राम खूब बारीक पीसकर उसमें 15 ग्राम 3 वर्ष पुराना गुड़ मिलाकर गोली बनाकर दमे के रोगी को खिलाने से उल्टी द्वारा कफ बाहर निकल जाता है।
  • 10 ग्राम अंकोल की जड़ को नींबू के रस के साथ पीसकर 5 ग्राम की मात्रा में भोजन से एक घंटा पहले सेवन करने से अस्थमा के कारण होने वाली श्वास की पीड़ा खत्म हो जाती है।
  • अंकोल के चूर्ण को फांककर ऊपर से अडूसा का काढ़ा पीने से श्वास रोग नष्ट हो जाता है।

3. अतिसार :

  • अंकोल के 10 ग्राम फल के गूदे को 2 चम्मच शहद में मिलाकर चावलों के पानी के साथ सुबह, दोपहर तथा शाम खाने से अतिसार रोग नष्ट होता है।
  • अंकोल की जड़ की छाल के आधे से 1 ग्राम चूर्ण को चावल के पानी के साथ महीन पीसकर सुबह-शाम सेवन करने से सब प्रकार के अतिसार और संग्रहणी में लाभ होता है।

4. आमातिसार :

  • आमातिसार में अंकोल के 3 ग्राम पत्ते का रस दूध के साथ पिलाने से पहले दस्त होकर पेट साफ होता है, फिर अतिसार में लाभ होता है।
  • लगभग आधा ग्राम कूड़ा की छाल का चूर्ण और लगभग आधा ग्राम अंकोल की जड़ की छाल का चूर्ण दोनों शहद में मिलाकर चावलों के पानी के साथ सेवन करने से अतिसार व संग्रहणी में लाभ होता है।

5. आंतों के कीडे़ : अंकोल के जड़ की छाल 5 ग्राम के चूर्ण की फंकी दोनों समय लेने से आन्त के कीड़े मर जाते हैं।

6. वमन (उल्टी) कराना : सफेद फूल वाले अंकोल के जड़ के चूर्ण की 3 ग्राम फंकी लेने से उल्टी हो जाती है।

7. कब्ज : अंकोल की जड़ के चूर्ण की लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग तक की फंकी लेने से कोष्ठबद्धता में लाभ होता है।

8. बवासीर : अंकोल की जड़ की छाल का 1 ग्राम चूर्ण कालीमिर्च के साथ फंकी देने से बवासीर में लाभ होता है।

9. सुजाक : तिल का क्षार 4 ग्राम और अंकोल के फलों का गूदा 5 ग्राम दोनों को दो चम्मच शहद में मिलाकर सुबह-शाम खाने से सुजाक रोग में लाभ होता है।

10. मूत्राघात (पेशाब में धातु का आना) : अंकोल के फल का गूदा 5 ग्राम और तिलों का क्षार 4 ग्राम को 2 चम्मच शहद में मिलाकर दही के पानी के साथ सुबह-शाम देने से पेशाब में धातु का आना मिटता है।

11. सफेद दाग (कुष्ठ, कोढ़) :

  • अंकोल की जड़ की छाल, जायफल, जावित्री और लौंग प्रत्येक लगभग आधा ग्राम की मात्रा में बारीक पीसकर सुबह-शाम फंकी देने से कोढ़ का बढ़ना बंद हो जाता है।
  • अंकोल की जड़ की छाल को पीसकर कुष्ठ व्रण (कोढ़ के जख्मों) पर लेप करें।
  • श्वेत कुष्ठ (सफेद दाग) में अंकोल का तेल लगाने से बहुत लाभ होता है।

12. ज्वर (बुखार) :

  • अंकोल की जड़ के चूर्ण की 2 से 5 ग्राम तक की मात्रा सुबह-शाम देने से पसीना आकर मौसमी ज्वर उतर जाता है।
  • अंकोल की जड़ 10 ग्राम, कूठ और पीपल 3-3 ग्राम तथा बहेड़ा 6 ग्राम इसको एक लीटर पानी में उबालें। जब 8वां हिस्सा शेष रह जाये तो ठंडाकर छान लें तथा मिश्री मिलाकर दोनों समय पीने से इन्फ्लुएंजा और संक्रामक नजला-जुकाम ठीक हो जाता है।
  • अंकोल की जड़ 25 ग्राम और सोंठ 25 ग्राम की मात्रा में लेकर पानी के साथ पीसकर शरीर पर लेप करने से बुखार की जलन समाप्त होती है।
  • बुखार में दर्द वाले स्थान पर अंकोल के पत्तों को गर्मकर बांध देना चाहिए।

13. डेंगू बुखार : अंकोट (अंकोल) की जड़ की छाल लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग, घोड़बच या सोंठ के साथ चावल के मांड में उबालकर रोजाना सेवन करने से लाभ मिलता है। इसके पत्ते पीसकर जरा-सा गर्म करके दर्द वाले अंग पर बांधने से भी लाभ होता है।

14. दाह युक्त ज्वर (जलन पैदा करने वाला बुखार) :

  • बुखार में जलन हो तो अंकोल के फलों को पानी में पीसकर शरीर पर मलने से बुखार और जलन शांत हो जाती है।
  • अंकोल की जड़ और सोंठ को पानी में पीसकर दाह युक्त ज्वर में शरीर पर मलने से लाभ होता है।

15. पसीना अधिक मात्रा में आना : अंकोल के फलों के 2-3 ग्राम चूर्ण की फंकी देने से और ऊपर से वासा के काढ़े का सेवन नियमित रूप से करने से अधिक पसीना आने का रोग मिटता है।

16. मुंह से खून आना : अंकोल के फलों के 5 ग्राम चूर्ण को मिश्री 10 ग्राम के साथ पीसकर पिलाने से मुंह से खून का बहना बंद हो जाता है।

18. घाव (जख्म) : किसी तेज धार वाले हथियार से कट जाने पर अंकोल के बीजों के तेल में रूई का फाहा भिगोकर कटे हुए स्थान पर लगाने से बहता हुआ रक्त बंद हो जाता है।

19. त्वचा के रोग : इसकी जड़ की छाल को पीसकर लेप करने से त्वचा के रोग मिट जाते हैं। 

20. बिच्छू के विष पर : बिच्छू के डंक लगने पर अंकोल की जड़ को पीसकर लेप करें अथवा इसी लेप में सरसों का तेल मिलाकर कान में डालें।

21. चूहे के विष पर : अंकोल की जड़ को पानी में पीसकर दो-तीन बार पिलाने से चूहे का विष उतर जाता है।

22. जहरीले सांप एवं विषैले कीड़े-मकोड़े के काटने पर : अंकोल की 15 ग्राम जड़ के चूर्ण को दो लीटर पानी में उबालकर काढ़ा बना लें। इस काढे़ को छानकर 15-15 मिनट पर 50 ग्राम घी में मिलाकर पिलायें। इससे दस्त और उल्टी होकर विष की तीव्रता व वेग एकदम कम हो जाता है। इसके बाद नीम की अंतर छाल के काढे़ में 2.5 ग्राम अंकोल की जड़ का चूर्ण मिलाकर पिलायें।

23. इन्फ्लुएंजा  : अंकोल की जड़ की छाल का सेवन करने से लाभ मिलता हैं। इसे घोड़बच या सोंठ के साथ चावल के मांड में उबाल कर दें।

24. खून की उल्टी :

  • अंकोल में मिश्री मिलाकर पीने से मुंह से खून आना रुक जाता है।

25. दस्त : अंकोल के फल का गूदा शहद के साथ मिलाकर चावलों के पानी (मांड) के साथ सेवन करने से दस्तों में लाभ मिलता है।

26. भगन्दर : अंकोल का तेल 100 मिलीलीटर और मोम 25 ग्राम लेकर उसे  आग पर गर्म करें और उसमें 3 ग्राम तूतिया (नीला थोथाद्ध मिलाकर लेप करें। इससे नाड़ी में उत्पन्न दाने नष्ट हो जाते हैं।

27. शीतपित्त :

  • अंकोल की जड़ को पानी में पीसकर शरीर पर लेप करने से शीत पित्त का रोग खत्म होता है।
  • अंकोल की जड़ का चूर्ण बनाकर 1 ग्राम मात्रा में हल्के गर्म पानी के साथ सुबह-शाम खाने से शीत पित्त में बहुत ही लाभ होता है।

28. पेट के कीड़े : अंकोल के पेड़ के जड़ की छाल को बारीक पीसकर चूर्ण बनाकर सेवन करने से पेट के कीड़े समाप्त हो जाते हैं।

29. उपदंश (सिफलिस) :

  • अंकोट की जड़ की छाल आधा से 1 ग्राम 3 बार रोज खाने से तथा इसके बीज का तेल या जड़ पीसकर लगाने से उपदंश और उपदंश से होने वाले रोग ठीक होते हैं।
  • अंकोल का तेल सुबह-शाम उपदंश के घाव पर लगायें इससे घाव जल्द ही दूर हो जायेगें।

30. गठिया रोग :

  • 60 से 120 मिलीग्राम अंकोट की जड़ की छाल प्रतिदिन 3 बार घोड़बच या सोंठ के साथ चावल की मांड में उबालकर लेने से लाभ मिलता है। इसके साथ ही अंकोल के पत्तों को पीसकर जरा गर्म करके दर्द के स्थान पर बांधने से लाभ मिलता है।
  • गठिया के रोगी को अंकोल की जड़ की छाल का लेप बनाकर  दर्द वाले जगह पर लेप करने से आराम मिलता है।

31. दाद : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग अंकोल (अंकोट) की जड़ की छाल को रोजाना 3 बार खाने से या इसके बीज का तेल या जड़ को पीसकर दाद और हर तरह के त्वचा के रोगों में लगाने से आराम आ जाता है।

32. शरीर में सूजन : लगभग 1 ग्राम का चौथा भाग की मात्रा में अंकोल या अंकोट की जड़ की छाल को रोजाना 2 बार रोगी को देने से यकृत वृद्धि, जल वृद्धि और गुर्दे में विकार होने के कारण होने वाली सूजन दूर हो जाती है।